Friday, July 1, 2016

मधुशाला की हाला

शायद आदमी को भगवान ने अतृप्त बनाया है, वह संतुष्ट हो ही नहीं पाता। अपने आपको हमेशा कमतर आंकता है और गम में डूबने को मजबूर हो जाता है। काश हमारे वैज्ञानिक इस समस्या का कोई निदान निकाल सकें।
पोस्ट को पढ़ने के लिये इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE/ 

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (03-07-2016) को "मीत बन जाऊँगा" (चर्चा अंक-2392) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

smt. Ajit Gupta said...

आभार।