Thursday, January 2, 2014

कोहरा छाया है, सूरज भैया रजाई में हैं

बस हम जैसे खिटपिटये रजाई से निकल गए हैं और अपने शब्‍दों को जाँचने में लगे हैं कि वे जमे तो नहीं हैं। खिड़की से कोहरे का आनन्‍द लेते हुए शब्‍द धीरे-धीरे सकुचाते हुए बाहर आ रहे हैं।
पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%9C-%E0%A4%AD%E0%A5%88%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%9C/

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (03-01-2014) को "एक कदम तुम्हारा हो एक कदम हमारा हो" (चर्चा मंच:अंक-1481) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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ईस्वीय सन् 2014 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

smt. Ajit Gupta said...

आभार शास्‍त्री जी।

Prasanna Badan Chaturvedi said...

वाह...बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो