Friday, July 14, 2017

नाम शबाना

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अभी दो दिन पहले एक फिल्म देखी – नाम शबाना। शायद आप लोगों ने देखी होगी और हो सकता है कि नहीं  भी देखी होगी, क्योंकि इस फिल्म की चर्चा अधिक नहीं हुई थी। फिल्म बेबी की चर्चा खूब थी, यह उसी फिल्म का पहला भाग था,  लेकिन शायद बना बाद में था। खैर छोड़िये इन बातों को, मूल विषय पर आते हैं। एक लड़की है – शबाना, उसकी माँ रोज ही अपने पति से पिटती है। एक दिन माँ चिल्ला उठी – शबाना – शबाना-शबाना। अब शबाना ने एक रोड उठायी और अब्बा के सर  पर दे मारी, अब्बा वहीं ढेर हो गये। नाबालिग शबाना को पुलिस ले जाती है और तभी एक फोटो क्लिक होती है – खचाक। नाबालिग होने से शबाना छूट जाती है और कॉलेज में प्रवेश लेती है, वहाँ कराटे क्लास में जाती है – फोटो खिंचती है – खचाक। उसके हर तेवर की फोटो खिंचती है। एक दिन रात को अपने मित्र के साथ आ रही थी कि कुछ गुण्डे घेर लेते हैं, मित्र कुछ नहीं करने की सलाह देता है लेकिन वह नहीं मानती और गुण्डों को मारती है, लेकिन तभी एक गुण्डा उसके मित्र को सर पर वार करता है और वह वहीं मर जाता है। गुण्डे  भाग जाते हैं, पुलिस आती है। तीन माह तक वह पुलिस के चक्कर काटती है लेकिन केस आगे नहीं बढ़ता। वह फिर तेवर दिखाती है और पुलिस कहती है कि अब यहाँ मत आना। तभी उसके पास फोन आता है कि तुम इस केस में क्या चाहती हो? वह कहती है कि मैं उस लड़के को मारना चाहती हूँ। सामने से आवाज आती है कि ठीक, हम तुम्हारी सहायता करेंगे लेकिन बदले में तुम्हें हमारे लिये काम करना होगा। हम भी सरकार की गुप्त पुलिस हैं। हमारे पास वर्दी नहीं होती, हमें गुमनामी में ही जीना होता है और गुमनामी में ही मरना होता है। शबाना उनका प्रस्ताव मानती है और वह शामिल हो जाती है, इस गुमनाम पुलिस में। बेबी फिल्म में भी शबाना थी।

फिल्म में बताया गया है कि प्रधानमंत्री की देखरेख में ऐसी स्पेशल सेल का गठन किया गया  है, जो अपराधियों को चुपचाप समाप्त करे। काश यह फिल्म ही ना हो लेकिन सच्चाई भी हो। वैसै ऐसे दल हमेशा से सरकारों के काम के हिस्से रहे हैं, लेकिन कई सालों से ये निष्क्रीय हो गये थे, अब शायद वजूद में आए हैं। वर्तमान परिस्थितियों के देखते हुए, जहाँ राजनीति देश में आग लगाने कि परिस्थितियां पैदा करती है, ऐसे विकल्पों पर काम होना ही चाहिये। जो युवा कानून हाथ में लेने का हरदम प्रयास करते हैं, उनको ऐसी सेवाएं देनी ही चाहिये। शबाना का चयन भी हजारों लोगों में से हुआ था, उसके तेवरों को देखकर उसकी फोटो खेंची जा रही थी और समय आने पर उसका चयन किया गया था। जो लोग जोश खाते रहते हैं, उन्हें अपनी सेवाएं देने के लिये सरकार से निवेदन करना चाहिये और इसके लिये वैसा ही प्रशिक्षण भी लेना चाहिये। आज हजारों नहीं लाखों युवाओं की जरूरत है जो देश और समाज की रक्षा के लिये आगे आएं। एक शबाना से काम नहीं चलेगा, आप सभी को आगे आना होगा, जैसे इजरायल में लोग आगे आए हुए हैं। जब विनाश के लिये युवा आगे आ रहे हैं तो बचाव के लिये भी आगे आना ही होगा।
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3 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

फ़िल्म तो हमने नहीं देखी पर विषय वस्तु अनुसार यह उपाय शायद सभी सरकारें करती हैं. इजरायल में यह काम मोसाद करती है. आपकी राय से सहमत हूं कि सत्ता व्यवस्था को सुचारू चलाने में ऐसी मुहिम काम आ सकती है यदि इनका दुरूपयोग ना हो.
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (14-07-2017) को "धुँधली सी रोशनी है" (चर्चा अंक-2667) (चर्चा अंक-2664) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "प्यार का मोड़ और गूगल मॅप“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार