Saturday, April 8, 2017

तू इसमें रहेगा और यह तुझ में रहेगा

प्रेम में डूबे जोड़े हम सब की नजरों से गुजरे हैं, एक दूजे में खोये, किसी भी आहट से अनजान और किसी की दखल से बेहद दुखी। मुझे लगने लगा है कि मैं भी ऐसी ही प्रेमिका बन रही हूँ, चौंकिये मत मेरा प्रेमी दूसरा कोई नहीं है, बस मेरा अपना मन ही है। मन मेरा प्रेमी और मैं उसकी प्रेमिका। हम रात-दिन एक दूजे में खोये हैं, आपस में ही बतियाते रहते हैं, किसी अन्य के आने की आहट भी हमें नहीं होती और यदि कोई हमारे बीच आ भी गया तो हमें लगता है कि अनावश्यक दखल दे रहा है। मन मुझे जीवन का मार्ग दिखाता है और मैं प्रेमिका का तरह सांसारिक ऊंच-नीच बता देती हूँ, मन कहता है कि आओ कहीं दूर चलें लेकिन मैं फिर कह देती हूँ कि यह दुनिया कैसे छोड़ दूं? मन मुझे ले चलता है प्रकृति के निकट और मैं प्रकृति में आत्मसात होने के स्थान पर गृहस्थी की सीढ़ी चढ़ने लगती हूँ। हमारा द्वन्द्व मान-मनोव्वल तक पहुंच जाता है और अक्सर मन ही जीत जाता है। मैं बेबस सी मन को समर्पित हो जाती हूँ। मन मेरा मार्गदर्शक बनता जा रहा है और मैं उसकी अनुयायी भर रह गयी हूँ।
यह उम्र ही ऐसी है, उसमें मन साथ छोड़ता ही नहीं, जब जागतिक संसार के लोग साथ छोड़ रहे होते हैं तब यह मन प्रेमी बनकर दृढ़ता से हमें आलिंगनबद्ध कर लेता है। मैं कहती हूँ हटो, मुझे ढेरों काम है लेकिन मन कहता है कि नहीं, बस मेरे पास बैठो, मुझसे बातें करो। मैं कहती हूँ कि आज बेटे से बात नहीं हुई, मन कहता है – मैं हूँ ना। मैं तुम्हें उसके बचपन में ले चलता हूँ, फिर हम दोनों मिलकर उसके साथ ढेरों बात करेंगे। मन कहता है कि आज बेटी क्या कर रही होगी, सभी मन बोल उठता है कि चलो मेरे साथ रसोई में, उसकी पसन्द के साथ बात करेंगे। मैं और मेरा मन अक्सर बाते करते रहते हैं – ऐसा होता तो कैसा होता, नहीं हम ऐसी बात नहीं करते। हम सपने देखते हैं खुशियों के, हम सपने देखते हैं खुशहाली के, हम सपने देखते हैं खुशमिजाजी के।
इन सपनों के कारण दुनिया के गम पीछे छूट जाते हैं, कटुता के लिये समय ही नहीं बचता और झूठ-फरेब गढ़ने का काम अपना नहीं लगता। बस हर पल हम दोनों का साथ, हर पल को जीवंत करता रहता है। किसी अकेले को देखती हूँ तो मन कहता है कि यह कहाँ अकेला है, अपने मन को क्यों नहीं पुकार लेता? मन को पुकार कर देख, कैसे तेरा अपना होकर रहता है, फिर तुझे किसी दूसरे की चाह होगी ही नहीं। तू अकेला नहीं निकलेगा कभी किसी का साथ ढूंढने, तेरा मन हर पल तेरे साथ होगा, बस आवाज दे उसे, थपथपा दे उसे, वह दौड़कर तेरे पास आ जाएगा। तुझसे बाते करेगा, तेरा साथी बनकर रहेगा। परछाई भी रात को साथ छोड़ देती है लेकिन यह गहरी अंधेरी रात में तेरे और निकट होगा, तू इसमें रहेगा और यह तुझ में रहेगा।

3 comments:

विकास नैनवाल 'अंजान' said...

सही कहा. अकेले में मन का साथ हो तो अकेलापन इतना परेशान नहीं करता है. आज के वक्त में जब ज्यादातर युवा लोग कमाई के सिलसिले में परिवार से दूर रहते हैं तो रात के वक्त कमरा कचोटने को आता है. फिर ये मन ही है जो साथ हो तो इस अकेलेपन से लड़ता है.
मन, किताबें और चाय. ये तीनो ही अकेलेपन को दूर करने के बहुत सुन्दर माध्यम हैं.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा आज रविवार (09-04-2017) के चर्चा मंच

"लोगों का आहार" (चर्चा अंक-2616)
पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अजित गुप्ता का कोना said...

विकास नैनवाल आभार आपका।