Friday, January 20, 2017

तेरे बिना मेरा नहीं सरता रे


हमेशा कहानी से अपनी बात कहना सुगम रहता है। एक धनवान व्यक्ति था, वह अपने रिश्तेदारों और जरूरतमंदों की हमेशा मदद करता था। लेकिन वह अनुभव करता था कि कोई भी उसका अहसान नहीं मानता है, इस बात से वह दुखी रहता था। एक बार उसके नगर में एक संन्यासी आए, उसने अपनी समस्या संन्यासी को बतायी। संन्यासी ने पूछा – क्या तुमने भी कभी उनकी मदद ली है? व्यक्ति ने कहा कि नहीं मैंने कभी मदद नहीं ली। तब संन्यासी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के लिये उपयोगी बनना चाहता है, किसी के लिये उपयोगी बनने पर ही उसे गौरव की अनुभूति होती है। एकतरफा सहयोग, एक व्यक्ति को बड़ा और दूसरे को छोटा सिद्ध करता है, इसलिये तुम्हारी सहायता पाकर भी कोई खुश नहीं होता। तुम जब तक दूसरों को उपयोगी नहीं मानोंगे तब तक कोई भी तुम्हारी इज्जत नहीं करेगा।

मन की भी यही दशा है, मन चाहता है कि दूसरों पर अपना नियंत्रण बनाकर रखूं। अपनी सत्ता और सम्मान सभी के मन में स्थापित कर दूं। लेकिन जब हम अपने मन को दूसरे के नियंत्रण में जाने देते हैं तब हमें सुख मिलता है। हमारी सत्ता हमारा मन  भी नहीं मानता तो हम दूसरों पर अपनी सत्ता कैसे स्थापित कर सकते हैं! हम यदि स्वयं को ही कर्ता मानते रहेंगे तो कभी सुखी नहीं हो सकते। माता-पिता कहते हैं कि हमारे अस्तित्व को मानो, संतान कहती है कि हमारा भी अस्तित्व है। अन्य रिश्तों में भी यही है। जब तक हम एक-दूसरे की जरूरत नहीं बनते तब तक खुशी हमारे पास नहीं आती। स्वयं को स्वयंभू बनाने के चक्कर में हम भाग रहे हैं, एक-दूसरे से भाग  रहे हैं। किसी के अधीन रहना हमें पसन्द नहीं, इसलिये हम अपनी सत्ता के लिये भाग रहे  हैं। जिस दिन हम दूसरों को अपनी जरूरत समझेंगे उस दिन शायद हम एक-दूसरे के साथ के लिये भागेंगे। दूसरों की जरूरतों को पूरा करने का हम दम्भ रखते हैं लेकिन अपने मन की जरूरतों को ही पूरा नहीं कर पाते, मन तो हमारा दूसरों के लिये तड़पता है लेकिन हम ही दाता है, यह भावना हमें सुखी नहीं रहने देती। मेरे लिये मेरे नजदीकी बहुत उपयोगी हैं, बस यही भावना  हमें पूरक बनाती है। जिस दिन हम किसी पराये को भी यह कह देते हैं कि – तेरे बिना मेरा नहीं सरता रे, तो वह पराया भी अपनों से अधिक हो जाता है। फिर अपनों से ऐसा बोलने में हमारी जुबान अटक क्यों जाती है!

3 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "टूटी सड़क के सबक - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kavita Rawat said...

सच सबका अपना अपना महत्व है ....
बहुत सुन्दर प्रस्तुति

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज रविवार (22-01-2017) को "क्या हम सब कुछ बांटेंगे" (चर्चा अंक-2583) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'