Tuesday, March 8, 2016

मुझमें ही जीवन अमृत हैं

क्या-क्या नहीं हूँ मैं! मैं सृष्टि की जननी हूँ, मैं कोमलता का सरल प्रवाह हूँ। मुझसे ही होकर प्रेम निकलता हैं, मैं ही आनन्द की जननी हूँ। पोस्ट को पढ़ने के लिये इस लिंक पर क्लिक करें - 
http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8-%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82/

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-03-2016) को "आठ मार्च-महिला दिवस" (चर्चा अंक-2276) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

smt. Ajit Gupta said...

आभार।