Saturday, March 5, 2016

आजाद तो प्रकृति भी नहीं है


जब आँधी चलती है तब धूल का गुबार उठता ही है. पेड़ से पत्ते झड़ते ही हैं। जब भूकम्प आता है तब समुद की लहरे तूफानी हो ही जाती है, जब मेघ गरजते हैं तब बरसाती आफत अपना कहर बरपाती ही है। क्या कहेंगे इसे? प्रकृति का नियम या प्रकृति की बर्बरता? जिस प्रकृति को हम जड़ मान लेते हैं, उसमें भी नियम हैं तो जहाँ चेतना है वह बिना नियम कैसे रह सकती है? इस सृष्टि के प्रत्येक प्राणी किसी ना किसी नियम से बद्ध है, फिर वे एकेन्द्रिय हों या पंचेन्द्रिय। 
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http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%A4%E0%A5%8B-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%88/

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (06-03-2016) को "ख़्वाब और ख़याल-फागुन आया रे" (चर्चा अंक-2273) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

smt. Ajit Gupta said...

आभार शास्त्री जी