Tuesday, September 14, 2010

आप विशेष हैं लेकिन पारिवारिक प्रेम आपको अतिविशेष बनाता है – अजित गुप्‍ता


मेरी भान्‍जी का ढाई वर्षीय पुत्र है सम्‍यक। वह अभी कुछ दिन पहले ही अमेरिका से आया है, उसका जन्‍म भी वहीं हुआ था तो अधिकांश परिवार के सदस्‍यों ने उसे पहली बार देखा था। उसका नाम आने पर सभी लोग गदगद सा महसूस कर रहे थे। खैर अभी 2 सितम्‍बर को ही मैं भी उससे जयपुर में मिली तो वह एकदम से गोद में आ गया और कसकर चिपक गया। तब मालूम पड़ा कि वह सभी से ऐसे ही गले मिलता है या कहें तो प्‍यार की झप्‍पी देता है। जैसे केरल की अम्‍मा (hugging saint) सभी के गले लगती हैं। यही कारण था कि रूक्ष से रूक्ष व्‍यक्ति भी उससे मिलकर बेहद खुश था कि इसने हमें गले लगाया। वे अपने अन्‍दर के प्रेम को पाकर बेहद प्रसन्‍न थे। लेकिन मेरी पोस्‍ट के लिखने का तात्‍पर्य सम्‍यक के बारे में लिखना नहीं है, मैं इस पोस्‍ट के माध्‍यम से यह कहना चाहती हूँ कि किसी भी व्‍यक्ति का व्‍यक्तित्‍व कितना भी बड़ा क्‍यों ना हो उसे प्रेम की चाहत हमेशा रहती है। ऐसे बच्‍चे या ऐसे कोई भी व्‍यक्ति उनके प्रेमांकुरों को विकसित करते हैं और उन्‍हें जीवन को जीने की कला बताते हैं। 
इस ब्‍लाग जगत में ऐसे कितने ही नाम होंगे जो स्‍वनाम धन्‍य हैं या बहुत ही उच्‍च पदों पर आसीन हैं लेकिन उनकी हमें खबर नहीं। हम सभी को अपना बंधु समझकर टिप्‍पणी करते हैं। कभी प्रसन्‍नता में, कभी सहजता से तो कभी आक्रोश से भी। आपस में लड़-भिड़ भी लेते हैं और फिर एक हो जाते हैं। ऐसे व्‍यक्तित्‍वों से कभी आप पूछ देखिए कि वे ब्‍लाग पर क्‍यों एक सामान्‍य व्‍यक्ति बनकर पोस्‍ट लिख रहे हैं? क्‍योंकि कई बार कटु टिप्‍पणियों से भी गुजरना पड़ता है। उनकी बात तो वे ही बताएंगे लेकिन इस बारे में चिंतन करने पर  मुझे एक बात समझ आयी कि हमारे अन्‍दर दो व्‍यक्तित्‍व छिपे होते हैं। वैसे तो किसी मानसिक चिकित्‍सक से पूछेंगे तो वह दोहरे व्‍यक्तित्‍व वाली बीमारी बता देगा जिसे हम देसी भाषा में कहते हैं कि इसके डील में भूत या भूतनी आ गयी है। लेकिन मैं अभी उस दोहरे व्‍यक्तित्‍व की बात नहीं कर रही, वैसे यह बीमारी उन्‍हीं को होती है जो स्‍वयं को नहीं पहचान पाते हैं।
खैर मूल विषय पर आते हैं। मेरा मानना है कि हमारे अन्‍दर दो व्‍यक्तित्‍व हैं एक बाहरी और एक पारिवारिक। बाहरी जगत के सम्‍मुख हमारा व्‍यक्तित्‍व अक्‍सर अलग होता है क्‍यों‍कि वहाँ हमें अपने सम्‍मान की रक्षा करनी होती है इसलिए कुछ गम्‍भीर, कुछ संजीदा, कुछ अनुशासनप्रिय, कुछ सादगी भरा आदि आदि रूप धारण करने होते हैं। तभी हमारी बात में वजन आता है। लेकिन परिवार के मध्‍य हमें सम्‍मान की नहीं प्रेम की आवश्‍यकता होती है इसलिए अपने कृत्रिम आवरण को हटाकर सहजता और सरलता से व्‍यवहार करते हैं। देश के प्रधानमंत्री से लेकर किसी भी अधिकारी या सेलेब्रिटी के व्‍यवहार का अध्‍ययन करेंगे तो यही व्‍यवहार आम तौर पर मिलेगा। जो बाहर के जगत में हमारा रूप था उसका एकदम विपरीत। यह व्‍यक्ति की आवश्‍यकता है। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो जीवन का वास्‍तविक आनन्‍द उसे प्राप्‍त नहीं होगा और वह अवसाद का शिकार हो जाएगा।
कई लोग परिवार में भी अधिकारी ही बने रहते हैं इस कारण अपने बच्‍चों से और परिवार के अन्‍य सदस्‍यों से दूर हो जाते हैं। परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन आदि अनेक रिश्‍ते होते है, आप उनके समक्ष अभी भी मुन्‍ना, पप्‍पू, गुडिया आदि ही हो। वे आपको इसी नाम से पुकारेंगे और यदि नहीं पुकारते तो मानिए कि कहीं दूरी का निर्माण हो गया है। हमारे प्रेम के ऊपर सम्‍मान हावी हो गया है। दुनिया में ऐसा कोई व्‍यक्ति नहीं है जिसे प्रेम नहीं चाहिए। यदि वह अपने परिवार में प्रेम के स्‍थान पर सम्‍मान को महत्‍व देता है तब वह प्‍यासे हिरण की तरह रेगिस्‍तान में भटकने को अभिशप्‍त ही रहेगा। परिणाम अवसाद के रूप में आएगा और आप एक मनोरोगी के रूप में व्‍यवहार करेंगे। इसलिए अपने बाहरी और पारिवारिक व्‍यक्तित्‍व को अलग-अलग बनाइए। सम्‍मान की जगह सम्‍मान है लेकिन प्रेम की जगह तो प्रेम ही होना चाहिए। मुझे अच्‍छा लगता है यह ब्‍लाग जगत जहाँ हम एक परिवार की तरह ही प्रेम बांटते हैं। यहाँ महफूज और दीपक जैसे नवयुवा भी हैं तो बहुत उम्रदराज भी, लेकिन हम सभी से एकसा व्‍यवहार करते हैं। इसलिए ही यह परिवार है। उम्रदराज लोगों का नाम नहीं लिखा है कहीं वे एक सूची पोस्‍ट कर दें कि देखो मुझसे ज्‍यादा तो ये उम्रदराज हैं। इसलिए मेरा अनुभव है कि हम अलग-अलग व्‍यक्तित्‍व लेकर बाहर और परिवार में अलग-अलग व्‍यवहार करते हैं या करना चाहिए। आप क्‍या मुझसे सहमत हैं? नहीं तो कभी हमारे सम्‍यक से मिल लीजिए वह आपको प्रेम का आनन्‍द समझा देगा।  

46 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बाहर के और अन्दर के व्यवहारों में जितना अलगाव होगा, जीवन की ऊर्जा उतनी ही व्यर्थ होगी। समुचित यही होगा कि साम्य बनाकर रखा जाये।

राज भाटिय़ा said...

अजित जी बहुत सुंदर बात लिखी आप ने, मेरे मन मै भी कई बार यही विचार आते है लेकिन मै इन्हे कोई रुप ना दे पाया या मेरे मै इअतनी समझ नही कि इसे इस सुंदर रुप मे लिख पाता, आप के इस सुंदर लेख के लिये धन्यवाद

ajit gupta said...

अभी रचना जी का मेल मिला और उन्‍होंने फोन भी किया कि मेरी टिप्‍पणी पोस्‍ट नहीं हो रही है इसलिए आप उचित समझे तो इसे यहां लगा दें। मैंने उनकी टिप्‍पणी पढी है और उसे यहां लगा रही हूं।

नारी-NAARI

परिवार और ब्लॉग दो अलग अलग विषय हैं . जब एक परिवार होता हैं तो उसमे एक दूसरे के प्रति आपसी भेद भाव भी होता जो हमारे निर्णय को एक दबाव भी देता हैं . बच्चो की बात छोड़ दे क्युकी वो बचपन हैं वो जितनी जल्दी स्नेह करते हैं उतनी ही जल्दी भूलते भी हैं . इंसानी फितरत भूलती नहीं हैं . ब्लॉग पर जब आप परिवार कहते हैं तो आप स्वत ही ब्लॉगर से जुड़ जाते हैं मुद्दे से नहीं . यानी एक भीरु समाज जो केवल अपने आस पास ही देखता हैं , बस अपनों के लिये सोचता हैं . महफूज़ आप को माँ कहते हैं वही दूसरी जगह और महिला के प्रति एक तालिबानी नज़रिया भी रखते हैं . आप के ब्लॉग बेटे हैं आप को प्रिय हैं पर महिला अधिकारों और हितो के मुद्दे पर उनका व्यवहार अनियमित हैं आप नहीं पढ़ती हैं उन ब्लोग्स को सो आप नहीं जानती हैं . किसी एक प्रति अगर हम स्नेह रख कर किसी मुद्दे का , समाज का नुक्सान करते हैं तो ब्लॉग लिखने की क्या जरुरत हैं .
सब के पास घर हैं , पिता हैं , भाई हैं , पति हैं बच्चे हैं पर इन सब संबंधो इस इतर ब्लॉग लेखन हो निस्पक्ष निर्भीक मुद्दे से जुदा लेखन तो ब्लॉग पर कुछ सार्थक दिखेगा ये मेरा अपन व्यक्तिगत नज़रिया हैं ब्लोगिंग के लिये . रिश्ते बनाइये लेकिन उनका ब्लॉग पर प्रदर्शन संबंधो के समीकरण को जनम देता हैं रिश्तो की निजता का ब्लॉग पर डालना उस संपदा को ख़तम करना होता हैं . और रिश्तो की डोर से बाँध कर स्नेह से दबाकर अगर बात कहलाई जाये टिपण्णी मंगवाई जाए तो क्या फायदा . स्नेह शब्दों से हो , मुद्दों से हो रिश्ते से नहीं ब्लॉग पर

दिस्क्लैमेर महफूज़ का नाम केवल और केवल इस लिये क्युकी वही नाम यहाँ हैं

ajit gupta said...

अभी रचना जी का मेल मिला और उन्‍होंने फोन भी किया कि मेरी टिप्‍पणी पोस्‍ट नहीं हो रही है इसलिए आप उचित समझे तो इसे यहां लगा दें। मैंने उनकी टिप्‍पणी पढी है और उसे यहां लगा रही हूं।

नारी-NAARI

परिवार और ब्लॉग दो अलग अलग विषय हैं . जब एक परिवार होता हैं तो उसमे एक दूसरे के प्रति आपसी भेद भाव भी होता जो हमारे निर्णय को एक दबाव भी देता हैं . बच्चो की बात छोड़ दे क्युकी वो बचपन हैं वो जितनी जल्दी स्नेह करते हैं उतनी ही जल्दी भूलते भी हैं . इंसानी फितरत भूलती नहीं हैं . ब्लॉग पर जब आप परिवार कहते हैं तो आप स्वत ही ब्लॉगर से जुड़ जाते हैं मुद्दे से नहीं . यानी एक भीरु समाज जो केवल अपने आस पास ही देखता हैं , बस अपनों के लिये सोचता हैं . महफूज़ आप को माँ कहते हैं वही दूसरी जगह और महिला के प्रति एक तालिबानी नज़रिया भी रखते हैं . आप के ब्लॉग बेटे हैं आप को प्रिय हैं पर महिला अधिकारों और हितो के मुद्दे पर उनका व्यवहार अनियमित हैं आप नहीं पढ़ती हैं उन ब्लोग्स को सो आप नहीं जानती हैं . किसी एक प्रति अगर हम स्नेह रख कर किसी मुद्दे का , समाज का नुक्सान करते हैं तो ब्लॉग लिखने की क्या जरुरत हैं .
सब के पास घर हैं , पिता हैं , भाई हैं , पति हैं बच्चे हैं पर इन सब संबंधो इस इतर ब्लॉग लेखन हो निस्पक्ष निर्भीक मुद्दे से जुदा लेखन तो ब्लॉग पर कुछ सार्थक दिखेगा ये मेरा अपन व्यक्तिगत नज़रिया हैं ब्लोगिंग के लिये . रिश्ते बनाइये लेकिन उनका ब्लॉग पर प्रदर्शन संबंधो के समीकरण को जनम देता हैं रिश्तो की निजता का ब्लॉग पर डालना उस संपदा को ख़तम करना होता हैं . और रिश्तो की डोर से बाँध कर स्नेह से दबाकर अगर बात कहलाई जाये टिपण्णी मंगवाई जाए तो क्या फायदा . स्नेह शब्दों से हो , मुद्दों से हो रिश्ते से नहीं ब्लॉग पर

दिस्क्लैमेर महफूज़ का नाम केवल और केवल इस लिये क्युकी वही नाम यहाँ हैं

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत सही विश्लेषण किया है आपने . फिर भी इस तरह का साम्य रखने वाले लोगों का प्रतिशत बहुत कम है. इसके पीछे कारण कुछ भी रहते हों लेकिन दोनों के प्रति न्याय करने के लिए ये आवश्यक हो जाता है.
कि वे इसके बीच में सामंजस्य बना कर रखे.

शिक्षामित्र said...

प्रेम कही हमारे भीतर ही है। किंचित परिस्थितियों के कारण वह हमारे जीवन से बहुत दूर चला गया है इसलिए हम प्रेम की तलाश करते फिरते हैं। यह तलाश स्व की खोज है।

वाणी गीत said...

प्रेम और सम्मान कौन नहीं चाहता ...मगर प्रेम भी थोडा सम्मान तो मांगता ही है ...आभासी हो या वास्तविक जीवन ...
परिवार बना रहे मगर अपने विचार एक दूसरे पर थोपे नहीं जाए , और सभी से हर मुद्दे पर सहमत होने की आशा भी नहीं रखी जाए तभी सौहाद्र बना रह सकता है ...यह कयास भी नहीं लगाना चाहिए कि फलाना उस ब्लॉग पर टिप्पणी कर रहा है , इसका मतलब उस ब्लॉगर की हर बात से सहमत है ...प्रेम अपनी जगह हो मगर विचारों की स्वतंत्रता का सम्मान तो किया ही जाना चाहिए ...

एक अच्छा मुद्दा लिया है आपने पोस्ट के लिए ...उम्रदराज का नाम लेने में क्यूँ घबरा गयी आप ...बेहिचक हमारा नाम ले लेती ना ...:)

rashmi ravija said...

बहुत ही सूक्ष्म विश्लेषण...प्यार की दरकार तो हर जीव को है....कुछ लोग परिवार में भी अपना रुआब कायम रखते हैं और बाहरी आवरण से बाहर नहीं निकलते पर उन्हें भी अपने नाती-पोतों पर खुलकर प्यार लुटाते देखा जाता है...इसलिए दोनों व्यक्तित्व में अच्छा सामंजस्य जरूरी है.

हास्यफुहार said...

विचारोत्तेजक!

cmpershad said...

’ हमारे अन्‍दर दो व्‍यक्तित्‍व हैं ’

असल में ब्लागिंग मे व्यक्ति दो तरह के होते हैं.... धीर-गम्भीर और मौज-मस्ती वाले। टिप्पणी का वज़न भी उसी को देखते हुए लेना चाहिए।
डिस्क्लेमर : मैं दूसरी श्रेणी में आता हूं, इसलिए मुझ पर कृपा बनाए रखिए :)

राजेश उत्‍साही said...

अजित जी आपने एक ऐसा विषय चुना है जिस पर सचमुच विमर्श की जरुरत है। मुझे याद आती हैं वे गोष्ठियां जहां हम दस-बारह लोग बैठकर एक दूसरे को अपनी कविताएं सुनाया करते थे। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी किसी ने दूसरे की आलोचना की हो। क्‍योंकि हरेक को रचना सुनानी थी। तो बस सब एक दूसरे की वाही वाही ही करते रहते थे। नतीजा यह कि जिसका स्‍तर जहां था वही रहा। मैंने जल्‍द ही इस प्रवृति को पहचान लिया और इन गोष्ठियों से किनारा कर लिया।

मुझे कई बार ब्‍लाग की दुनिया में भी यह प्रवृति दिखाई देती है। हम एक दूसरे की वाही वाही करते रहते हैं,या बस हां में हां मिलाते रहते हैं। ऐसे में अगर इस मित्रता को किसी पारिवारिक रिश्‍ते का नाम दे दें तो फिर तो और बंध जाते हैं।
हां जो लोग ब्‍लाग को केवल एक प‍ारिवारिक पत्र-व्‍यवहार के नए रूप में देखते हैं उनके लिए यह ठीक है। पर जो लोग इसे समकालीन मुद्दों पर विमर्श का मंच मानते हैं उनके लिए यह ठीक नहीं है।
क्‍योंकि समकालीन मुद्दों पर चर्चा घर के आंगन में शुरू तो हो सकती है पर उसे विस्‍तार देने के लिए आपको घर से बाहर आना पड़ेगा। घर के बाहर जो सभा होगी वहां कोई रिश्‍ता नहीं होगा।
मैं तो आपसे इस बात से सहमत हूं कि पारिवारिक रिश्‍तों को ब्‍लाग के दुनिया से अलग रखें।
हां इसमें कोई एतराज नहीं कि यहां रिश्‍ते बनाएं, पर उन्‍हें फिर अपने घर ले जाएं।

ajit gupta said...

राजेश जी, मैं एक बात स्‍पष्‍ट कर दूं कि मेरा यह पोस्‍ट लिखने का उद्देश्‍य था कि हो सकता है कि अपनी जिन्‍दगी में कई बड़े नाम यहाँ हो लेकिन हम सब उनके साथ एक सा ही व्‍यवहार करते हैं और अच्‍छी बुरी सभी तरह की टिप्‍पणी अपने विचारों के अनुसार करते हैं। लेकिन फिर भी प्रेम बना रहता है जैसे परिवार में रहता है। हो सकता है मैं अपने भाव अच्‍छी प्रकार से प्रकट नहीं कर पायी इस कारण ब्‍लाग जगत के रिश्‍तों की बात आ गयी। फिर भी सभी के विचार स्‍वतंत्र होने ही चाहिए, यह मंच ही इसलिए है।

Dr Varsha Singh said...

अजित जी अच्छी बात लिखी आप ने, दुनिया में ऐसा कोई व्‍यक्ति नहीं है जिसे प्रेम नहीं चाहिए।

निर्मला कपिला said...

प्यार बाँटते चलो । प्यार को पता नही लोग किस दृष्टी से लेते हैं क्या सब से प्रेम पूर्वक व्यवहार करना गलत बात है आपसे बिलकुल सहमत हूँ मैं तो ब्लाग जगत को एक परिवार मानती हूँ जहाँ से मुझे बहुत प्रेम मिला है भाई बहनो जैसा बेटे बेटियों जैसा दोस्तों जैसा तो इस मे क्या गलत है रचना जी की इस बात से सहम्त नही हूँ कि ब्लाग जगत मे रिश्ते नही होने चाहिये। अगर घर मे दो भाई बहनो के विचार नही मिलते तो क्या उनका रिश्ता भाई बहन का नही रहता? वैसे भी जिस से अपने विचार मिलते हों उन्हें हे ह्म प्यार करते हैं
हां उनकी गलत बात पर उन्हें कहते भी हैं। हम जैसे बूढे लोग तो प्यार के दो शब्दों के मोहताज होते हैं ।ाउर इतने तो परिपक्व हैं कि किसे अपना बनाना है ये प्रेम स्नेह वात्सल्य भगवान के अनुपम देन है जितना बांम्टो उतनी ही मिलेगी। वैसे भी ब्लाग स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के लिये एक अच्छा माध्यम है। जिसे जो अच्छा लगे उसे सही कहे नही तो गलत। मुझे जो नही अच्छा लगता उसे कह देती हूँ चाहे कोई हो। हाँ कई बार धर्म और जाति जैसे मुद्दों पर चुप रहती हूँ बस।इस छाछ को जितना मथोगे उतनी बुरा। आपने अच्छा मुद्दा उठाया है। शि़क्षामित्र जी ने भी सही कहा है। अजित जी ब्लागजगत मे रिश्तों को लेकर जो बात उठती है उस पर भी कभी लिखें। धन्यवाद शुभकामनायें

Arvind Mishra said...

आपका यह कहना सही है की हर व्यक्ति कुछ सीमा तक अपने भीतर एक मिस्टर जेकिल और मिस्टर हाईड को रखता है -
हम यहाँ ब्लागर हैं और यही रिश्ता सबसे अहम् और वास्तविक है -

Arvind Mishra said...

मिस्टर हाईड =डॉ हाईड

anshumala said...

रचना जी और रमेश जी की बात से सहमत हु | मुझे ज्यादा समय नहीं हुआ ब्लॉग जगत में पर मुझे नहीं लगता है की यहाँ पर बड़े नाम और छोटे नाम वालो के साथ एक सा व्यवहार होता है कई बड़े नाम है जिनकी बेमतलब की पोस्ट पर भी वाह वाही मिल जाती है और जबकि कई छोटे नाम वालो के कई अच्छी पोस्ट पर लोग कुछ कहने की जरुरत ही नहीं समझते है जबकि असली मुद्दे वही उठाया जाता है |

प्रवीण शाह said...

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दुनिया में ऐसा कोई व्‍यक्ति नहीं है जिसे प्रेम नहीं चाहिए। यदि वह अपने परिवार में प्रेम के स्‍थान पर सम्‍मान को महत्‍व देता है तब वह प्‍यासे हिरण की तरह रेगिस्‍तान में भटकने को अभिशप्‍त ही रहेगा। परिणाम अवसाद के रूप में आएगा और आप एक मनोरोगी के रूप में व्‍यवहार करेंगे। इसलिए अपने बाहरी और पारिवारिक व्‍यक्तित्‍व को अलग-अलग बनाइए। सम्‍मान की जगह सम्‍मान है लेकिन प्रेम की जगह तो प्रेम ही होना चाहिए।

यदि केवल उपरोक्त कथन पर विचार देना हो तो मैं पूर्ण रूप से आपसे सहमत हूँ...

परंतु ब्लॉगिंग समकालीन मुद्दों पर विमर्श का मंच है... रिश्ते बनाने/निभाने या नये रिश्ते कायम करने के लिये तमाम नेटवर्किंग साइटें हैं तो...हम सब के पास अपना-अपना परिवार है...और हम में से ज्यादातर अपने असली परिवार के रिश्तों को भी बहुत जतन करके ही निभा पाते हैं...क्या करें समय की कमी जो है... :-(

अत: ब्लॉगिंग में रिश्ते बनाना/निबाहना व नये रिश्ते कायम करना मैं उचित नहीं मानता... हम सबके बीच एक ही रिश्ता है कि ब्लॉगिंग के सफर में हम सहयात्री हैं...और मुद्दों पर अपनी सोच से ईमानदारी व बेबाकी ही हमारी विश्वसनीयता का मानक होनी चाहिये...

परंतु फिर-फिर मैं यह भी कहूँगा कि यह सिर्फ मेरे विचार हैं...और किसी भी मसले पर खुद के ही सही होने का कोई गुमान मैं नहीं पालना चाहता... :)


आभार!


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महफूज़ अली said...

ममा..... मैं तो प्यार का भूखा हूँ.... मैं तो प्यार ही खोजता हूँ.... आपने और सबने मुझे इतना प्यार दिया है... कि मेरी तो मज़बूरी है उन प्यार को रिश्तों में बांधना.... हमारे नोर्मल लाइफ में भी तो कितने रिश्ते बन जाते हैं..... बिना कुछ कहे... तो अगर ब्लॉग पर भी रिश्ते बन जाते हैं... तो क्या गलत है... अब मेरे साथ ही देख लीजिये... कोई भी परेशानी होती है या मन उदास होता है... तो... आप... रश्मि मम्मी , संगीता जी ... संगीता पूरी जी .... वाणी दीदी ... रश्मि रविजा जी... अदा जी... शिखाजी.... इंदु पूरी जी... वंदना गुप्ता जी... मीनू दीदी... और भी कई... कितने लोग मुझे संभाल लेते हैं... ऐसे ही पुरुषों में... पाबला जी... समीर लाल जी... खुशदीप भैया... और भी बहुत सारे ...(मेरे साथ प्रॉब्लम यह है कि मैं अगर यहाँ सबके नाम लिखने लगूं ना... तो एक पूरी पोस्ट तैयार हो जाएगी... ) इसलिए... शोर्ट में ही लिख रहा हूँ... अब यह सब रिश्ते तो ब्लॉग पर ही बने हैं ना... और ब्लॉग से पर्सनल लाइफ में ... अब कोई भी बात होती है... टेंशन में होता हूँ... तो आप सब लोग कितने प्यार से संभाल लेते हैं.... और जब हम प्यार ही बांटते हैं तो क्यूँ ना प्यार की चाहत करें? मुझे तो कुछ छिपाने की ज़रूरत भी नहीं होती... यहीं ब्लॉग पर कितनी बदमाशियां कर डालता हूँ... मगर कभी कोई यह नहीं कह सकता कि मैं बदतमीज़ हूँ... सब लोग तो यही कहते हैं कि यह 30 + बच्चा है... All that what we need is love.... बस इसी फिलौसोफी पर मैं चलता हूँ... और सबसे बड़ी बात मैं आपसे वो सब बातें शेयर कर लेता हूँ... जो एक बेटा अपनी माँ से ही शेयर कर सकता है.... तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है... तो यह तो है कि अगर रिश्ते आप कहीं भी बनाइये... बस उसे निभाना आना चाहिए...

विनोद कुमार पांडेय said...

आपके ब्लॉग पर जब जब आया हूँ कुछ ना कुछ सीख के गया...आज भी एक नई सीख..बढ़िया विचारों से सजी एक उत्तम पोस्ट..माता जी प्रणाम

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बक़ौल दिल्ली पुलिस के "सदैव आपके साथ" कालजयी प्रतिक्रिया है nice..
ना काहू की झंडाबरदारी ना काहू की ...

Udan Tashtari said...

उम्दा आलेख...साम्य तो जरुरी है ही...


हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

आपसे सहमत हूं.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

प्रेम तो विशेष ही है चाहे बचपन में बडों से मिले या बडप्पन में बच्चों से। दूसरा पक्ष यह भी है कि परिवार के अन्दर और बाहर अलग-अलग रूप धरने वालों के द्वारा भारत का बहुत कबाडा हुआ है। जितने प्रेमी और ज़िम्मेदार हम लोग अपने परिवार की उन्नति के लिये होते है उसका सहस्रांश भी सत्य, समाज और राष्ट्र के लिये हो जायें तो स्वर्ग धरती पर उतर आये।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी पोस्ट पढ़ी और उस पर टिप्पणियाँ भी ...

पोस्ट पढ़ कर मन में अलग भाव आये और टिप्पणियाँ पढ़ कर ऐसा लगा की मुख्य बात से अलग हट कर बात कही जा रही है ...

खैर सबकी अपनी अपनी सोच है ...

हर इंसान न जाने कितने मुखौटे लगाये रहता है ...यह कहना सरासर गलत है कि कोई यह कह दे हम तो हमेशा एक जैसे रहते हैं ...कोई रह ही नहीं सकता ...आप घर से बाहर निकलते ही बदल जाते हैं ...आपके व्यवहार में ज़मीन आसमान का अंतर आ जायेगा ...सौम्यता स्निग्धता का आवरण होगा ...
तो आपकी बात सही है कि बाहर वही व्यवहार होगा जिससे आपकी प्रशंसा हो ...लेकिन हर समय आप मुखौटा लगा कर नहीं रह सकते ...जैसी प्रकृति है वो अपने घर में रहते हुए स्पष्ट होती है ..लेकिन कोई बाहर का व्यक्ति घर आ जाये तो फिर मुखौटा चढ जाता है ...तो सबके साथ हर इंसान का अलग अलग व्यवहार होता है ...

रही ब्लॉग में रिश्ते बनने कि बात तो यहाँ रिश्ते बनाये नहीं जाते ..स्वत: अपनी रूचि के अनुसार बन जाते हैं ...क्यों कि आप स्वयं नहीं मिले हैं ..लेकिन एक दूसरे के विचारों से प्रभावित होते हैं ...और विचार पर तो मुखौटा नहीं लगाया जा सकता ...जहाँ आपकी सोच मिलती है उसके प्रति आकर्षण होता है ..बात चीत होती है और अपनापन बढ़ता है ...लेकिन ऐसा कुछ नहीं है कि यहाँ अपने विचारों को किसी के दवाब में आ कर न रख पायें ...

ajit gupta said...

संगीता जी, आप सही कह रही हैं, मुझे भी आज ऐसा ही प्रतीत हुआ कि मैं क्‍या कहना चाह रही थी और क्‍या लोगों ने समझा? शायद यह मेरे लिखने का ही भ्रम है। या फिर इस ब्‍लाग जगत में ऐसा कुछ अन्‍दर है जिसकी भनक मुझे नहीं है। इसी कारण कुछ लोगों ने इसे रिश्‍तों से जोड लिया। लेकिन सभी के अपने दृष्टिकोण है तभी तो कहते हैं कि लेखक या कवि तो पता नहीं क्‍या लिख जाता है और उसके अनेक अर्थ निकाल लिए जाते हैं। अब मुझे भी दोहरे अर्थ निकालकर लिखना होगा। हा हा हा हा।

ZEAL said...

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पोथी पढ़-पढ़ जुग भया, पंडित भया न कोय ,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।

सबले पहले तो सम्यक बाबु को उनकी दिव्या आंटी का टाईट-हग [ जादू की झप्पी ]। उम्मीद है सम्यक हमेशा इतना ही प्रेम करने वाला रहेगा। वैसे एक गाने की पंक्ति है-

" मेरे दिल के कोने में एक मासूम सा बच्चा , बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है "

कुछ बातें --

१- घर बाहर , दफ्तर , ब्लोग्स , हर जगह एक सा ही व्यक्तित्व होना चाहिए।--निर्भीक , निष्पक्ष एवं इमानदार।
२- लेकिन " सब धान बाईस पसेरी " नहीं होता । इसलिए सभी व्यक्ति प्रेम के अधिकारी नहीं होते।
३- शठे शाठ्ये समाचरेत ।

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शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

veerubhai said...

main ek aise vyakti ko jaantaa hoon jo ghar me bhi bo lgaakar khaanaa khaate the (the isliye ab khaanaa banaane parosne vaali unki vah ptni nahi hai jiske khaane me vah meen megh nikaalte the ).ye sajjan ek sharaab kampni me kaam karte hain .daaining tebil par bhi afsari jhaadne se baaz nahin aate the .khaane ki taareef karne ke sukh se yah sadaiv hi vanchit rhen hain .khaanaa to prasaad hai ,khush hokar hi grhan karnaa chaahiye ,kaisaa bhi ho ,kaisaa bhi kyon naa bnaa ho ,taarif karne me kyaa jaataa hai ?
veerubhai .

राजेश उत्‍साही said...

अजित जी, इस बहस को आगे बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है। पर चूंकि आपने ही सवाल उठाया है तो अपनी ही यह पंक्तियां एक बार देख लें-.....इसलिए अपने बाहरी और पारिवारिक व्‍यक्तित्‍व को अलग-अलग बनाइए। सम्‍मान की जगह सम्‍मान है लेकिन प्रेम की जगह तो प्रेम ही होना चाहिए। मुझे अच्‍छा लगता है यह ब्‍लाग जगत जहाँ हम एक परिवार की तरह ही प्रेम बांटते हैं। ..... इसलिए मेरा अनुभव है कि हम अलग-अलग व्‍यक्तित्‍व लेकर बाहर और परिवार में अलग-अलग व्‍यवहार करते हैं या करना चाहिए। आप क्‍या मुझसे सहमत हैं?..... कम से कम मैंने तो इन पंक्तियों के आधार पर ही अपनी बात की थी। बहरहाल यह आप ही बेहतर जानती हैं या बता सकती हैं कि आपका मंतव्‍य आखिर क्‍या था या क्‍या है।

सतीश सक्सेना said...

बहुत प्यारा लेख है और यह आपके स्नेही व्यक्तित्व की झलक भी देता है ! आपकी इस पोस्ट में सीखने वालों के लिए बहुत कुछ है मगर यहाँ सीखेगा कौन ....? एक बेहतरीन पोस्ट के लिए मेरी शुभकामनायें

शोभना चौरे said...

अजितजी
संगीताजी की बातो से सहमत हूँ |स्नेह देने और लेने में क्या हर्ज है ?
बहुत अच्छी पोस्ट |

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

उम्दा प्रस्तुति,
काफी कुछ जानने को मिला.
यहाँ भी पधारें :-
अकेला कलम...

नीरज गोस्वामी said...

आपने सही कहा ब्लॉग जगत में हम सब एक परिवार की तरह हैं...अपने ओहदे और उम्र को दर किनार करते हुए एक समान हैं और ये ही इस जगत की खूबी है...

नीरज

Akshita (Pakhi) said...

ये तो बहुत अच्छा लेखा है....पसंद आया.


_____________________________
'पाखी की दुनिया' - बच्चों के ब्लॉगस की चर्चा 'हिंदुस्तान' अख़बार में भी.

mridula pradhan said...

apki baaten bahot achchi lagi.

दीपक 'मशाल' said...

मैम आपकी बेहतरीन पोस्टों से कुछ ना कुछ सीख मिलती ही है हमेशा..

अनामिका की सदायें ...... said...

बेशक हमारे दो आवरण हैं और रहने भी चाहिए. लेकिन चाहे हम बाहर वालों के आगे कितने भी गंभीर बन जाएँ या मस्त-मौला...लेकिन जो हमारा स्वभाव है वो फिर भी कहीं ना कहीं सामने आ ही जाता है. और हम सच में जितना अपने परिवार में सहज होंगे उतना ही हमें ही सुकून मिलेगा. बाकी रही
ब्लॉग जगत के रिश्तों की बात तो जो रिश्ते अपनी सीमा और सम्मान में कायम रहें वाही ज्यादा सुखकर होते हैं...मैं रचना जी की बात से बिलकुल सहमति नहीं रखती. हम जिस ब्लॉग जगत के जरिये इतना सकूं पाते हैं, खुशिया पाते हैं तो उसमे ये आभासी रिश्ते भी अपना अहम स्थान रखते हैं.

बहुत अच्छी पोस्ट डाली आपने.
आभार.

डॉ. हरदीप संधु said...

सही व सूक्ष्म विश्लेषण .........हर किसी को प्रेम चाहिए आप ने बिल्कुल सही लिखा है. प्रेम के बद्ले हे प्रेम मिलेगा ....

Babli said...

बहुत ही बढ़िया और शानदार आलेख! उम्दा प्रस्तुती!

खुशदीप सहगल said...
This comment has been removed by the author.
खुशदीप सहगल said...
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खुशदीप सहगल said...

अजित जी,
मैं अपने प्रोफेशन में क्या हूं, ये न तो मैंने अपने प्रोफाइल में कहीं लिखा है, और न ही ब्लॉग जगत में उस पहचान से जाना जाना पसंद करता हूं...यहां मैं सिर्फ खुशदीप हूं...वही खुशदीप जैसी मेरी प्रकृति है...यहां लोगों से मेरा संपर्क प्रोफेशन की वजह से नहीं खुद की वजह से है...ये ब्लॉगिंग की देन है कि हम कभी आपस में मिले नहीं, लेकिन एक दूसरे से आत्मीयता का भाव रखने लगते हैं, भरोसा करने लगते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देने लगते हैं...

महफूज़ से मैं आज तक नहीं मिला, लेकिन उस पर खुद से भी ज़्यादा भरोसा करने लगा हूं...ऐसा क्यों, क्योंकि उसके लेखन में एक बालक जैसी निश्चलता, ईमानदारी नज़र आती है, लगता नहीं कि वो प्रीटेंड कर रहा है...जैसा अंदर से है वैसा ही बाहर से है...ऐसे में अगर कहीं कहीं वो नाटकीयता की हद तक रिश्ते जताने लगता है तो ये उसके अंदर का बच्चा ही है...जो खुद को क्लास में सबसे अव्वल देखना चाहता है....चाहता है कि सब उसे पैम्पर करें...दीपक मशाल को भी मैं छोटा भाई ही मानता हूं...वो धीर-गंभीर है, जो उसके लेखन में झलकता है...दीपक भी महफूज़ जितना ही भावुक और रिश्तों को लेकर ईमानदार है...अगर इन दोनों के लिए मेरी ये सोच है, तो ये सोच सिर्फ उनका लिखा पढ़-पढ़ कर ही बनी है...लेकिन ऐसा भी नहीं कि गलती करने पर मैं इन दोनों को नहीं टोकता...और ऐसा भी नहीं कि मेरी गलती पर ये मेरा ध्यान नहीं दिलाते...इसलिए इस तरह की ट्यूनिंग को कोई गुटबाजी या स्वार्थ से जो़ड़ता है, तो ये मात्र उसका वहम ही हो सकता है...

जय हिंद...

खुशदीप सहगल said...
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Dr.R.Ramkumar said...

मेरा मानना है कि हमारे अन्‍दर दो व्‍यक्तित्‍व हैं – एक बाहरी और एक पारिवारिक। बाहरी जगत के सम्‍मुख हमारा व्‍यक्तित्‍व अक्‍सर अलग होता है क्‍यों‍कि वहाँ हमें अपने सम्‍मान की रक्षा करनी होती है इसलिए कुछ गम्‍भीर, कुछ संजीदा, कुछ अनुशासनप्रिय, कुछ सादगी भरा आदि आदि रूप धारण करने होते हैं। तभी हमारी बात में वजन आता है। लेकिन परिवार के मध्‍य हमें सम्‍मान की नहीं प्रेम की आवश्‍यकता होती है इसलिए अपने कृत्रिम आवरण को हटाकर सहजता और सरलता से व्‍यवहार करते हैं।

चिन्तनपरक लेखन। गंभीर और सुलझा हुआ।