Friday, January 22, 2010

जमाखोरों के विरोध में आम जनता को जागृत होना होगा

कहते हैं कि सुधार सरकारे नहीं समाज करता है। लेकिन आज हम सब सरकारों के मुँह की ओर ताक रहे हैं। सरकारों को वे लोग संचालित कर रहे हैं जिनके पास शक्‍कर की ‘मिले’ हैं, हजारों बीघा जमीन हैं। क्‍या ऐसी सरकार और ऐसे मंत्री जमाखोरों को सबक सिखा सकते हैं?


उदयपुर में सहकारी बाजार संचालित है। वहाँ रोजमर्रा की आवश्‍यकताएं पूरी की जा सकती है। आप सभी के शहरों में भी संचालित ही होगा। हमारे यहाँ अभी दो-तीन वर्ष से एक स्‍कीम आयी कि आप दस हजार रूपए जमा कराएं और प्रतिमाह 100 रूपए के कूपन लें ले समान खरीदने के लिए। आज जहाँ बैंक में ब्‍याज के नाम पर कुछ नहीं मिलता है, वहीं यह स्‍कीम अच्‍छी लगी। हमनें भी तीस हजार रूपए जमा करा दिए। अब हमें तीन सौ रूपए के कूपन प्रतिमास मिल जाते हैं। हम घर में दो ही प्राणी हैं तो हमारा तैल, साबुन, चावल, दाल आदि का छोटा-मोटा खर्चा इस कूपन से चल ही जाता था। लेकिन अभी दो माह पहले हमें लगा कि यहाँ पैसा जमा कराना लाभ का सौदा है तो हमने पचास हजार रूपए और जमा करा दिए। अब हमारे पास आठसौ रूपए के कूपन हो गए। हमें लगा कि अरे ये तो खूब हैं। इनका तो हम सामान ला ही नहीं पाएंगे। लेकिन जैसे ही इस महिने सहकारी बाजार गए तो हमें जिन्‍दगी में पहली बार आटे-दाल का भाव मालूम पड़ा। ये क्‍या? आठ सौ के कूपन तो फुर्र से उड़ गए। बीस रूपए आने वाली शक्‍कर पचास रूपए हो चुकी थी और दालें तो सौ के भाव से बिक रही थी। इन बढ़ती कीमतों से आज एक मजदूर का दर्द सामने आ गया। सौ रूपए प्रतिदिन कमाने वाला मजदूर अब कैसे खा पाएगा दाल और रोटी? दूध तो उसके नसीब में था ही नहीं, बस छंटाक भर दूध से सारे घर की चाय बना लेता था तो अब तो शरद पँवार जी ने दूध की कीमत बढ़ाने की भी मुनादी करा दी है। आखिर ऐसा क्‍या हो गया, रातों-रात की कीमतें आसमान छू रही हैं? माना की सरकार के बस की नहीं है जमाखोरों पर लगाम लगाना। क्‍योंकि इन्‍हीं के पैसे से तो वे चुनाव लड़ते हैं। लेकिन जमाखोर भी तो जनता के ही व्‍यक्ति हैं, क्‍या वे लोगों का निवाला छीनकर अपनी सुख की सेज सजाना चाहते हैं? हम सुबह उठने से लेकर रात सोने तक प्रतिपल स्‍वर्ग में जाने की इच्‍छा रखते हैं और जैसे भी बने पुण्‍यों का संचय करने का प्रयास करते हैं। जमाखोर कौन से पुण्‍यों का संचय कर रहे हैं? आम जनता से निवाला छीनकर ये जमाखोर मन्दिर बनवाते हैं, धर्मशालाएं बनवाते हैं। सारे ही संन्‍यासियों को दान देते हैं। राजनेता तो इनसे नहीं पूछते लेकिन संन्‍यासियों को तो इनसे पूछना ही चाहिए कि तुम जमाखोरी तो नहीं कर रहे हो? कहीं ऐसा न हो कि जनता ही इनके गोदामों को लूट ले और एक समग्र क्रांति का सूत्रपात इस देश में हो जाए। हम सब ब्‍लागरर्स को ऐसे जमाखोरों के प्रति निन्‍दा प्रस्‍ताव पारित करना चाहिए और जहाँ भी कोई परिचित हो उससे अवश्‍य पूछना चाहिए कि क्‍या तुम भी जमाखोरी कर रहे हो? आज सरकारें बेबस हैं लेकिन जनता को अब जागरूक होना पड़ेगा। वो ही देश फलता-फूलता है जहाँ की जनता जागरूक होती है।

11 comments:

शोभना चौरे said...

बहुत ही महत्वपूर्ण सुझाव है हम आपके साथ है

डॉ टी एस दराल said...

अजित जी , यदि सभी सात्विक विचारों वाले बन जाएँ तो कलयुग का आना और टाला जा सकता है।

लेकिन क्या करें कलयुग का प्रभाव इतना आ चुका है की आप और हम जैसे अब थोड़े ही बचे हैं।

फिर भी सही है , प्रयास तो करना चाहिए।

Kiran Maheshwari said...

महंगाई नें आम आदमी का जीना दुर्भर कर दिया है।

यदि जनता सप्ताह में एक दिन चीनी का उपयोग नहीं करने का संकल्प लेले तो काला बाजारियों द्वारा आपुर्ति में कमी का बनाया गया वातावरण नष्ट हो जाएगा।

महंगाई का वर्तमान दौर सबसे लम्बा चला है। वर्ष 2005 से जारी इस दौर नें निर्धनों को भुखमरी कि स्थिति में ला दिया है। कांग्रेस पार्टी की षडयंत्रकारी आर्थिक नीतियों का दुष्परिणाम है, अनियंत्रित महेगाई का यह काल खण्ड।

किरण माहेश्वरी

ताऊ रामपुरिया said...

आपके कथन से सहमति है. परंतु यह ग्लोब्जाईजेशन के कांटे हमारे आकाओं के बोये हुये हैं और अब किसी के हाथ मे कुछ नही है. बहुसंख्यंक आबादी को कुछ चंद लोगो के स्वार्थ के लिये भूख और अभावों मे जीने के लिये छोड दिया गया है.

सिर्फ़ खाने पीने की चीजें ही नही बल्कि चिकित्सा, शिक्षा मकान आदि हर क्षेत्र मे म्हंगाई ने वो आतंक मचाया है कि मुझे तो लगता है फ़ि कोई जेपी पैदा होगा.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

यह सारा तो करैंसी का किया धरा है।
आम आदमी ही इसके बोझ के नीचे दबा है!
इन खास लोगों के खिलाफ इस आवाज में
हम आपके साथ हैं।

वाणी गीत said...

जमाखोरों के खिलाफ सरकार तो कुछ करेगी नहीं ...जनता को ही जागरूक होना पड़ेगा ...सही कह रही हैं आप ..!!

दिगम्बर नासवा said...

आपने सच कहा है ...... पर जनता उलझी है अपनी छोटी छोटी बातों में ...........

SURINDER RATTI said...

Dr.Sahiba, namaste,
Aapke vichare bahut nek hain, lekin belagaam mehangaai ka rath rukne ka naam nahin le raha, sarkari tantr aur jamakhor, apni jeben bharnay mein lage hue hain, ek dusare per dosharopan kar rahe hain, Aam aadmi ko agar pata bhi chale ki amuk vayakti jamakhor hai to bhi koi laabh nahin, usay koi saza nahin miliegi..... chor chor mosere bhai.....
Ram Bharose Chal raha hai Bharat .....Surinder

निर्मला कपिला said...

मैम बहुत ही बडिया सुझाव है। लेकिन आप जिन सन्यासियों की बात कर रही हैं उनके चन्दे भी तो इन्हीं की जेब से जाते हैं वो क्यों अपनी दुकानदारी बन्द करेगे इसके लिये तो आम जनता को ही हर शहर मे एक ग्रुप बना कर ये काम करना पडेगा। इस आवाज़ मे हम आपके साथ हैं । शुभकामनायें

ह्रदय पुष्प said...

बिलकुल सही - यही समय की पुकार है.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा फ़ायदा है कि जब चाहो, उठो और किसी को भी दो चपत लगा आओ...