Tuesday, January 12, 2010

तीन लघुकथाएं

 रोटी और कुत्ते

झबरा कुत्ता आराम से सो रहा था। तभी कालू कुत्ता उसके पास आया और बोला कि अरे झबरे तू बड़े आराम से सो रहा है, अभी मालिक देखेंगे तो तुझे रोटी भी नहीं देंगे और दो लात भी लगाएँगे।
मैं अब उनकी रोटी पर नहीं पलता। मुझे उनकी चिन्ता भी नहीं। मुझे लात मारकर तो देखें, मैं उनकी टंगड़ी को ही चबा डालूँगा।
अरे भाई ऐसा क्या हो गया? मालिक तो बड़े भले हैं!
अरे कुछ नहीं, शहर के बहुत लोग रोज यहाँ घूमने आते हैं और हमें मुफ्त में ही रोटियां डालते हैं तो फिर हम काम क्यों करें?

 दुश्मन
यार सुधांशु! तुम इतने कठोर क्यों हो? अपने किसी भी कर्मचारी की पदोन्नति नहीं करते। पदोन्नति तो उनका अधिकार है। तुम्हारे कार्यालय में बेचारे तीन र्कचारी दस वर्ष से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन वे अभी भी अस्थायी ही हैं। ये सारे ही निम्न वर्ग के लोग हैं। इनका भला करो, तुम्हें दुआएं देंगे।
हाँ राजेन्द्र तुम सत्य कहते हों। मैं अभी इस विभाग में दो वर्ष पूर्व ही आया हूँ और शायद एक वर्ष बाद मेरा स्थानान्तरण दूसरे विभाग में हो जाएगा। मैं पदोन्नति और स्थायीकरण करके किसी को भी अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहता।


 अशिक्षित माँ
एक आत्मा एक दिन भगवान के सामने हाथ जोड़े खड़ी थी। भगवान मुझे माँ चाहिए। माँ के माध्यम से ही मैं शरीर धारण कर सकूंगा, धरती का उपभोग कर सकूंगा।
तथास्तु। भगवान ने कहा। लेकिन साथ ही एक प्रश्न भी कर दिया।
तुमको कैसी माँ चाहिए?
मेरे पास एक माँ है जो शिक्षित है और दूसरी है अशिक्षित।
शिक्षित तुम्हें ममता देगी, संस्कार देंगी, अच्छे, बुरे की समझ देगी।
अशिक्षित केवल ममता देगी। तुम जो भी मांगोंगे बस वो देगी।
अच्छा और बुरा सबकुछ उसकी ममता के सामने टिक नहीं पाएगा।
बोलो तुम्हें शिक्षित माँ चाहिए या अशिक्षित?
कलियुग की आत्मा बोली कि अशिक्षित।

17 comments:

Rajey Sha said...

अच्‍छी लघुकथाएं पढ़वाई धन्‍यवाद।

sangeeta swarup said...

बहुत बढ़िया लघु कथाएं....विशेष रूप से दुश्मन और अशिक्षित माँ....बधाई

अजय कुमार झा said...

तीनों ही लघुकथाओं में मिले संदेश बहुत कुछ समझा गए
अजय कुमार झा

डॉ टी एस दराल said...

कलयुग के प्रभाव को उजागर करती प्रभावी लघु कथाएं।

संगीता पुरी said...

आज के जीवन की घटनाओं को बडी सुंदर अभिव्‍यक्ति दी आपने !!

विनोद कुमार पांडेय said...

बढ़िया लघुकथाएँ..बढ़कर अच्छा लगा..धन्यवाद

Udan Tashtari said...

यथार्थ पर चोट करती...तीनों उम्दा लधु कथायें. अच्छा लगा पढ़कर,

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

तीनों ही कथाएं एक से बढ़कर एक रहीं. पढ़कर लगा कि इन सभी पात्रों से अपना परिचय है.

खुशदीप सहगल said...

जिसको हमने कभी देखा नहीं,
उस भगवान की सूरत क्या होगी,
ए मां, तेरी सूरत से अलग,
भगवान की सूरत क्या होगी, क्या होगी...

आपको लोहड़ी और मकर संक्रांति की बहुत बहुत बधाई...

जय हिंद...

दिगम्बर नासवा said...

बहुत अच्छी लगी आपकी कहानियाँ ........ सार्थक बहुत सामयिक हैं .........

वन्दना said...

teeno hi kahaniyan ek sandesh deti huyi........badhayi.

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

shubhkamnao ke liye shukriya didi. sath hi achhi aur sachhi laghu kathaon ke liye badhai.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

तीनों लघुकथाएँ बहुत अच्छी हैं।
लोहिड़ी पर्व और मकर संक्रांति की
हार्दिक शुभकामनाएँ!

Harsh said...

bahut sundar

गौतम राजरिशी said...

सुंदर कथायें दी....आपकी लेखनी को सलाम\

आपका हुक्म था मेरे इ-मेल के लिये। मेरा इ-मेल है:-

gautam_rajrishi@yahoo.co.in

निर्मला कपिला said...

आपने लघु कथाओं के माध्यम से बहुत अच्छे मुद्दों पर कलम चलाई है दूसरी कहानी मे आज कर जो प्रशासन का हाल है उसमे लोगों की ये प्रवृति भी घातक सिद्ध हुई है। पहली कहानी मे भी उन लोगों की मानसिकता का चित्र है जो काम करना नहीं चाहते घते सरकारी अनुदान पर पलने वाले गरीब लोग और भिखारी लोग इसी केटेगरी मे आते हैं। जब मुफ्त मे रोटी मिले तो काम क्यों करें। तीसरी कहानी भी इन्सान की नासमझी को दर्शाती है बहुत अच्छी लगीं आपकी लघु कथायें धन्यवाद मकर संक्राँति की आपको व पूरे परिवार को शुभकामनायें

मनोज कुमार said...

तीनों लघुकथाएं अच्छी लगी।