पिछले कई दिनों से
रह-रहकर औरंगजेब के काल की याद आ रही है, देश के किसी मन्दिर
को बक्शा नहीं गया था और ना ही ऐसी कोई मूर्ति शेष रही थी जो तोड़े जाने से बच गयी
हो। घर में भी पूजा करना दुश्वार हो गया था, लोग चोरी-छिपे पूजा
करते थे और खुश हो लेते थे। लोगों के पास से मन्दिर बनाने का काम चुक गया तो लोग
अपने परिवार बनाने लगे, परिवारों में मनुष्य तैयार होने लगे और देखते ही
देखते औरंगजेब का काल समाप्त हो गया और मुगल सल्तनत का चाँद भी सूरज की रोशनी में
कहीं खो गया। अंग्रेज आए, फिर मन्दिर बनने प्रारम्भ हुए और इस बार आर्य
समाज ने सावचेत किया कि मूर्तियों से प्यार मत करो, अपितु
देश से प्यार करो। विवेकानन्द ने भी कहा कि 50 साल तक सारे भगवानों को भूल जाओ और
केवल भारत माता का स्मरण करो। लेकिन भारतीय मन नहीं माना और स्वतंत्रता के बाद तो
मन्दिरों की बाढ़ सी आ गयी। आज सारे ही सम्प्रदाय के साधु-सन्त मन्दिर बनाने में
होड़ कर रहे हैं, समाज का बेशकीमती पैसा और समय केवल मन्दिर बनाने
में लग रहा है। लोग कह रहे हैं कि हिन्दू समाज शीघ्र ही अल्पसंख्यक होने वाला है, शायद 25-30 सालों में हो ही जाएगा। तो फिर वही प्रक्रिया दोहरायी
जाएगी, मन्दिर टूंटेंगे और मूर्तियां टूटेंगी। एक तरफ
मूर्तियां प्रतिष्ठित हो रहीं हैं और दूसरी तरफ मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में
पड़ा है। मन्दिरों के कंगूरे सोने से मंड रहे हैं तो परिवार के आंगन समाप्त हो रहे
हैं। समाज और देश को बचाने की मानसिकता ही परिवारों के साथ अवसान पर है।
राम मन्दिर निर्माण
के लिये हम जोर-शोर से आवाज उठा रहे हैं, यदि मन्दिर 2-5 साल
में बन भी गया तो 25-30 साल बाद शायद सबसे पहले यही टूटेगा। कोई भी औरंगजेब हमारी
आस्था पर आघात ना कर पाए, हमें वह काम करना चाहिये ना कि सारा ध्यान
मन्दिर बनाने में लगाना चाहिये। चारों तरफ से हिन्दू समाज पर आक्रमण हो रहा है, सामने वाले को बहुत जल्दी है, देश को बुत-विहीन करने
की लेकिन हमें बुत बनाने से फुर्सत ही नहीं। देश में ऐसी-ऐसी समस्याओं ने जन्म ले
लिया है, जो शायद किसी अन्य देश में हों। लेकिन हम आँखे
मूंदे बस मन्दिर बना रहे हैं। हमारे पूर्वजों को कोई गाली देता है तो हम उनके
पूर्वजों को गाली देने लगते हैं, यह नहीं देखते कि
हम सब के पूर्वज एक ही हैं, हम खुद को ही गाली दे रहे हैं। लोग लिख रहे हैं
कि सम्भलों हिन्दू, सम्भलों। लेकिन क्या कोई हिन्दू सम्भलने को तैयार है? तैयार तो तब हो जब कोई हिन्दू हो! यहाँ तो कोई हिन्दू है ही नहीं।
सभी अपने-अपने सम्प्रदाय में विभक्त हैं। जैसे किसी जमाने में यहूदियों को समाप्त
किया गया वैसे ही हिन्दुओं का हश्र होने वाला है। यहूदियों के समान ही फिर वे लोग
जो हिन्दू से पहचान बताने में गौरव का भाव रखते हैं, पुन:
एकत्र होंगे और इजरायल की तरह भारत के किसी कोने में नया भारत बनाएंगे। फिर वह नया
भारत ऐसा सशक्त होगा कि उसकी तरफ कोई आँख
उठाकर देखने की हिम्मत कोई भी नहीं कर पाएगा। तब तक शायद हम सब मन्दिर ही बनाते
रहेंगे और मन्दिरों में मूर्तियां सजाते रहेंगे। उन्हें जल्दी है हमें मिटाने की
और हमारे पास फुर्सत ही फुर्सत है। हमें गुलामी का अनुभव है तो अब गुलाम होने से
डर भी नहीं लगता, सोचते हैं कि जैसे पहले के काल निकल गये, फिर निकल जाएंगे। आज साधु-संन्यासियों के पैरों में लौटते हैं तो कल
हुक्मरानों के पैरों में लौट लेंगे, क्या अन्तर आएगा! हम
तो पूजा करने वाले लोग हैं, तो इनकी ना सही तो उनकी कर लेंगे। हम किसी की
नहीं सुनेंगे क्योंकि हमें उस अनजान सफर के लिये निकलना है, जिसका अता-पता तक हमारे पास नहीं है लेकिन जिस धरती का सच हमारी आँखों
के सामने हैं, उसे जल्दी से जल्दी त्याग देना चाहते हैं। इस
धरती से पीछा छुड़ाने का मंत्र एक ही है कि मन्दिर बनाओ और मूर्तियों की पूजा करो।
चलिये समाप्त करती हूँ, आप सभी को मन्दिर जो जाना होगा।
3 comments:
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (17-04-2017) को "सबसे बड़े मुद्दा हमारे न्यूज़ चैनल्स" (चर्चा अंक-2944) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-04-2017) को "सबसे बड़े मुद्दा हमारे न्यूज़ चैनल्स" (चर्चा अंक-2944) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आभार शास्त्रीजी
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