Saturday, September 17, 2016

आदत नवाबी की और सफर रेल का

अब वे सुबह 6 बजे से ही चाय वाले की बाट जोहने लगे कि चाय वाला साहब के लिये ट्रे सजाकर चाय लाएगा। मैं लगातार यात्रा और काम के कारण थकी हुई थी तो नींद पूरी कर लेना चाहती थी, इसलिये जब उदयपुर आने लगा तब मेरी आँख खुली। मेरे जगते ही उन्होंने पूछा कि यहाँ चाय नहीं आती।
पोस्ट को पढ़ने के लिये इस लिंक पर क्लिक करें - http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4-%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%AB%E0%A4%B0-%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%BE/ 

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (18-09-2016) को "मा फलेषु कदाचन्" (चर्चा अंक-2469) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

smt. Ajit Gupta said...

आभार।