Wednesday, March 16, 2011

जिन्‍दगी का यह कौन सा पाठ है? - अजित गुप्‍ता



आज सुबह रश्मि रविजा जी से चेट पर मुलाकात हो गयी, पूछने लगी कि पुणे में कैसे बीत रही है? मैने कहा कि लग रहा है कि भगवान ने किसी ट्रेनिग पर भेजा है। आप लोग कहेंगे कि एक मॉं अगर अपनी बेटी के घर आकर रहे तो भला इसमें काहे की ट्रेनिंग? लेकिन आप को क्‍या बताएं, हमारी आपबीती? अब देखिए हम ठहरे छोटे शहर के लोग, हमारा दिन ही ठहराव के साथ शुरू होता है, खरामा खरामा। सुबह समाचारपत्र और टीवी के साथ हम पति-पत्‍नी बड़ी तसल्‍ली से चाय पीते हैं और फिर वे अपने क्लिनिक पर और हम अपने नेट पर। लेकिन पुणे जैसे महानगर में यह सम्‍भव नहीं है। यहॉं चाय पीने के लिए समय निकालना पड़ता है। शुरू के कुछ दिन तो मुझे चाय कभी 9 बजे तो कभी उसके भी बाद नसीब हुई लेकिन अब गणित समझ आने लगा है तो उठते ही सबसे पहले अपनी चाय का बंदोबस्‍त करती हूँ। यहॉं जल्‍दी उठना तो महज कल्‍पना ही है क्‍योंकि जल्‍दी सो जो नहीं सकते। अब जब चाय बनाने लगती हूँ तो सबसे पहले काम करने वाली से पूछ लेती हूँ कि चाय पीनी है? कभी तो वह आर्डर सा मारती हुई कह देती है कि हॉं बना लो, तब उसका आर्डर मारना भी चैन की सॉंस बन जाता है। मेरे यहॉं तो हमेशा मेरी कामवाली ही पूछती है कि चाय बनाऊं? लेकिन कोई बात नहीं यहॉं बड़ा शहर है तो कुछ तो बदलाव होगा ही ना? लेकिन यदि वह मना कर दे कि नहीं आज चाय नहीं पीनी है तब कई प्रश्‍न एक साथ मन में आने लगते हैं। नाराज तो नहीं हो गयी? मेरे पूछने में कहीं कोई गड़गड़ तो नहीं थी? आदि आदि। फिर पूछ ही लेती हूँ कि क्‍यों नहीं पीनी? तो वह बड़े ठसके के साथ कहती है कि आण्‍टी क्‍या है ना कि आजकल गर्मी हो गयी है तो ज्‍यादा चाय चलती नहीं है। वह नाराज नहीं है यह सोचकर भगवान को धन्‍यवाद देती हूँ। अब जैसे ही चाय बनाकर पीने लगती हूँ बेटी पूछ लेती है कि आपने मीरा की चाय नहीं बनायी? अरे भाई उसने मना किया था, क्‍या करूं?

मुझे पद्मा सचदेव की याद आ जाती है, उन्‍होंने एक उपन्‍यास लिखा "इन बिन", अरे नहीं समझे? इनके बिना याने कामवालों के बिना आप कितने अधूरे हैं। मुझे लगता है कि मैं तो दो-चार दिन में चले जाऊंगी लेकिन यदि मेरे किसी भी व्‍यवहार से इनकी नौकरानी भाग गयी तो बस भूचाल ही आ जाएगा। नौकरानी भी यदि स्थानीय हो तो समस्‍या अधिक है, क्‍योंकि वह दूसरे को भी नहीं आने देगी। फरमान जारी हो जाएंगा कि इनके यहॉं काम ज्‍यादा है कोई नहीं जाए। बस फिर क्‍या है आप लाख सर पटक लो क्‍या मजाल कोई आपके यहॉं काम कर ले। एक बात का ज्ञान और हुआ मुझे। ये आपकी परीक्षा भी ले लेती हैं कि आपमें कितना दम है? मैं यहॉं आयी ही थी कि दो-चार दिन बाद अचानक ही मेम साहब नहीं आयी। बेटी मेरा मिजाज जानती है उसने पडोस में कहा कि आप अपनी भेज देना, मम्‍मी को आदत नहीं है। अब मुझे लगा कि यहॉं कुछ सीख ही लेना चाहिए तो मैं डट गयी वाशबेसन पर बर्तनों के साथ। पडोस में भी मना कर दिया कि नहीं मैने ही सब कर लिया है। अब जब दूसरे दिन उसे मालूम पड़ा कि मैंने सारा काम कर लिया तो उसे लगा कि ये तो परेशान ही नहीं हुए। शायद मैं उसकी परीक्षा में पास हुई थी।

अब एक और है, केवल शाम के लिए खाना बनाने आता है। गिनकर रोटियां बनाता है यदि एक भी रोटी ज्‍यादा हो जाए तो आपका रिकोर्ड बिगड जाएगा। उसमें लिखा जाएगा कि इनके यहॉं मेहमान ज्‍यादा आते हैं। अब हमारे यहॉं तो रोज कोई भी टपक जाता है, कभी कोई शिकायत नहीं। हॉं हम भी पूरा ध्‍यान रखते हैं और बराबर से उसका हाथ काम में बंटाते हैं। थोड़ा भी काम ज्‍यादा हुआ नहीं कि अलग से पैसे दे देते हैं। पैसे तो यहॉं भी देने पड़ते हैं लेकिन काम उतना ही। अब उसे देखते ही मेरा डर फिर बाहर निकल आता है और उससे कहती हूँ कि भैया जितनी रोटी हमेशा बनाते हो उतनी ही बना लो और रही सब्‍जी की बात तो काट के रख दो मैं ही बना लूंगी। अब जब शाम को बेटी आती है तो कहती है कि आप उससे काम क्‍यों नहीं कराती? अब हम ठहरे छोटे शहर वाले अपनी इज्‍जत से बड़ा डर लगता है, क्‍योंकि और तो कुछ हमारे पास होता नहीं तो बस इज्‍जत को लेकर ही बैठे रहते हैं कि कोई यह ना कह दे कि उनके कारण हमारा नौकर छोड़कर चला गया।

अब आप सोच रहे होंगे कि हमने पहली पोस्‍ट में तो लिखा था कि महानगरों में नौकरों के सपने नहीं होते और अब आप लिख रही हो कि इनसे डरकर रहना पड़ता है। तो नौकर भी कई प्रकार के होते हैं। स्‍थानीय नौकरों की पूरी दादागिरी है और जो बाहर से आए हैं वे अपने बेहतर भविष्‍य के लिए चाहे सपने ना देखे लेकिन कामचोरी जरूर सीख लेते हैं। फिर जो लड़के हैं वे तो कमाई के जरिए ढूंढ ही लेंते हैं। यदि ये लोग सपने देखने लगें तो अच्‍छे मालिक और बुरे मालिक का अन्‍तर भी समझने लगेंगे और फिर इनके सपने भी पूरे होंगे। लेकिन ये तो बस चन्‍द पैसों के लिए ही जीते हैं। खैर मैं यहॉं नौकरों की मानसिकता से अधिक अपनी मानसिकता को लिख रही हूँ कि कैसे बदल गयी है यहॉं आकर। मुझे लगने लगा है कि मैं भी सुपर हाउस वाइफ में तब्‍दील होती जा रही हूँ। ना ज्‍यादा पोस्‍ट पढ़ पाती हूँ और ना ही टिप्‍पणी कर पाती हूँ। इसलिए जो हाउस-वाइफ रहकर ब्‍लागिंग की दुनिया में मजबूती के साथ डटी हुई हैं उन्‍हें मैं प्रणाम करती हूँ। यहॉं तो लग रहा है कि दिमाग शून्‍य हो चला है क्‍योंकि यहाँ घरों के अन्‍दर ही करण्‍ट है बाहर तो एकदम शान्ति रहती है। कहॉं से मिले नयी कहानी? चलो अब बन्‍द करती हूँ आप लोग बोर हो रहे होंगे। इतना पढ़ा उसके लिए आभार। अपनी नातिन के जलवों के बारे में अलग से लिखूंगी। बस अभी तो लहरों पर हूँ, जीवन का नया पाठ पढ़ रही हूँ। सोचा आप लोगों से ही सांझा कर लूं बाकि तो बात करने की किसी को फुर्सत नहीं है।



44 comments:

anoop joshi said...

ma'm,
isi karan ham to apna kaam khud karte hai.

रश्मि प्रभा... said...

क्या सही खाका खींचा है आपने ... मज़ा आ गया . कामवाली के बारे में बताते हुए आपने कहा है कि आप पुणे आई हुई हैं , तो मैं भी यहीं हूँ ... आ जाइये मेरे पास , मैं बातें करुँगी

Manpreet Kaur said...

kya baat ha visit my blog plz
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प्रवीण पाण्डेय said...

हर जगह हर समय हम तो सीखने के लिये पाठ तलाशते रहते हैं।

अन्तर सोहिल said...

चलो अच्छा हुआ आपने अपने को उस शहर के (नौकरों के) हिसाब से ढाल लिया।
नातिन के बारे में लिखियेगा।
और रश्मि प्रभा जी से भी मिल आईये।

प्रणाम

Sushil Bakliwal said...

घरेलू कामगारों की मनोस्थिति - जितना इन पर चिंतन करो उतने ज्ञानचक्षु खुलवा सकती हैं । हमारे परिवार में एक संकटकालीन समय में रोटी बनाने वाली आई और रोज सुबह आते ही पहला प्रश्न - कितनी रोटियों बनाना है ? बडा अजीबोगरीब अनुभव.

टिप्पणीपुराण और विवाह व्यवहार में- भाव, अभाव व प्रभाव की समानता.

मुकेश कुमार सिन्हा said...

lo di:) aapko do iss post ke through ek padosan bhi mil gayee.........rashmi di ke roop me!!

ab kahna
khub jamega...
jab
mil baithenge
do chaar nahi sirf do.........:D

सुज्ञ said...

सही अनुभव है।
हमारी परिक्षाएं लेकर हमें परेशानीयों में डालकर असल में तो इस में खुश हो लेते है कि…"तुम सुधरेले से अपुन में ज्यादा होशीयारी है"

arvind said...

bahut badhiya post..padhkar majaa aa gayaa.

अजित गुप्ता का कोना said...

रश्मिप्रभा जी आपने फोन नम्‍बर तो दिया ही नहीं।

संजय कुमार चौरसिया said...

bahut achchhi seekh milti hai

bahut badhiya post..padhkar majaa aa gayaa.

rashmi ravija said...

अब यहाँ नहीं हंसूंगी....चैट पर ही कोटा पूरा कर लिया था :)

सचमुच सामंजस्य बिठाना बहुत कठिन होता है. यहाँ तो ज़िन्दगी भागती रहती है. उन हाउस वाईव्स का सोचिये...जिन्हें घर के काम के साथ...सब्जी-शॉपिंग के साथ ढेर सारे बिल भी जमा करने होते हैं...फिर फिल्म फ्रेंड्स...पार्टियां भी हैं..जैसे उनके लिए ४८ घंटे हों दिन के.:)

कामवालियों की तो खूब कही...वे कुछ चाय-नाश्ता कर लें...तो जी खुश हो जाता है...जैसे कोई अहसान किया हो,हम पर ...मैने एक पोस्ट लिखी थी इन पर....और वो अखबार में भी छपी थी

खुदा महफूज़ रखे इन्हें हर बला से,हर बला से

anshumala said...

सही कहा आप ने कई बार बड़े शहरों में तो अपने घर वालो से भी ज्यादा इज्जत से इनसे बात करनी होती है घरवाले गलती करे तो उन्हें डांट भी सकते है पर इनके साथ तो वो भी नहीं कर सकते है |

vandan gupta said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (17-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

mridula pradhan said...

bahut saral aur sundar bbaten batayeen ...bahut achcha laga.

डॉ टी एस दराल said...

कामवाली का तो बहुत ध्यान रखना पड़ता है जी ।
अगर ये बिगड़ जाएँ तो देश विकासशील देश से अविकसित देश में तब्दील हो जाए ।

लेकिन बड़े शहरों में तो कामवाली के न आने से सबसे ज्यादा गाज़ घरवाले पर पड़ती है । :)

Satish Saxena said...

बहुत कुछ याद दिला दिया आपने
पुणे में रश्मि प्रभा जी के साथ मिलकर एक ब्लोगर कम दोस्ताना मीटिंग करिए ! नया अनुभव होगा ...फिर इंतज़ार करेंगे एक प्यारी पोस्ट का ! शुभकामनायें !!

Kailash Sharma said...

बहुत सच कहा है..महानगरों में कामवालियों के नखरे तो एक आम बात हैं..बहुत सुन्दर और रोचक ..आभार

अनामिका की सदायें ...... said...

ye bhi tasveer ka dusra rukh hai janaab. aur aapki zindgi ke anubhavo me ek naya safa. maja aaya post padh kar.

Udan Tashtari said...

आपके पास तो अमरीकी अनुभव भी है..हा ह

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

छोटी जगह ही भली.

राज भाटिय़ा said...

बाप रे लगता हे यह कामवालिया नही हम इन के काम करने वाले हे..... बहुत रोचक, लेकिन हमरी रेखा बहुत अच्छी थी, कितनी रोटियां सब्जी बनवा लो कोई दिक्कत नही, बस बेचारी के पास समय कम था, क्यो वो कोई मेरे पक्की काम करने वाली नही थी, फ़िर भी समय निकाल कर मेरे लिये खाना बना देती थी.

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

बडे शहर के बडे तेवर... कामवाली के नखरे भी झेलना पड़ता है :)

डॉ. मोनिका शर्मा said...

आपका अवलोकन बहुत सुंदर और संवेदनशीलता का पुट लिए होता है हर बार :)
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सच में 'इन ' के बिना यानि की कामवाली या कामवालों के बिना महानगरीय जीवन अधूरा हो जायेगा.... ये लोग तो परिवारों की धुरी बन गए हैं.... मुंबई में ऐसा देखा है....

प्रतिभा सक्सेना said...

अइसाईच होता बई,
काय म्हणते ,नौकर आहे पण पूरा ठसका !

वाणी गीत said...

इनके ठसके उठाने से अच्छा लगता है काम खुद ही कर लेना ...वैसे भी राजस्थानियों को अपना काम स्वयं करने की ही आदत ज्यादा होती है , कोई विशेष मजबूरी ना हो तो ...
पुणे में ब्लॉगर मीट कर ही लीजिये ...रश्मि प्रभा जी से मिलना जरुर अच्छा लगेगा !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

:):) बड़ा सूक्ष्म अवलोकन कर डाला काम वालियों का ...बड़े शहरों की बड़ी बातें ...वैसे काम वालियां हर जगह एक सी ही पायी जाती हैं .

naresh singh said...

वक्त के थपेडो से विचारों में थोड़ा बहुत बदलाव आना स्वभाविक है |

Atul Shrivastava said...

जिंदगी का हर पल नया सीख देता है।
अच्‍छा संस्‍मरण।
हमें इंतजार रहेगा आपकी नातिन के किस्‍सों का।
शुभकामनाएं आपको।
रश्मि जी से मिल आईए और इस मुलाकात पर भी एक पोस्‍ट हो जाए।

Unknown said...

धटनाओं को गहनता से परखने की दृष्टि है…

निरामिष: शाकाहार : दयालु मानसिकता प्रेरक

नीरज मुसाफ़िर said...

ना ना, बोर नहीं हुए।
बढिया लग रहा है।

shikha varshney said...

sukshm avlokan kar dala hai :) vaise pune badhiya jagah hai ..rashmi prabha di se milin ya nahi?

rajesh singh kshatri said...

आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

Patali-The-Village said...

जिंदगी का हर पल नया सीख देता है।
अच्‍छा संस्‍मरण। धन्यवाद|

Khushdeep Sehgal said...

अजित जी, ये सुबह चाय न मिलना तो मेरी भी समस्या है...पत्नीश्री स्नान, पूजा-पाठ करने के बाद ही मेरे साथ सुबह की चाय पीती है...अब वो इन कामों में लगी रहती है और मैं चाय के लिए कुढ़ता रहता हूं...खुद ठहरा महाआलसी जीव और ऊपर से ब्लॉगिंग का रोग...इसलिए चाहते हुए भी खुद चाय न बनाना अपनी शान का हिस्सा समझता हूं...खैर छोड़िए ये चाय-पुराण...आज तो बस...

तन रंग लो जी आज मन रंग लो,
तन रंग लो,
खेलो,खेलो उमंग भरे रंग,
प्यार के ले लो...

खुशियों के रंगों से आपकी होली सराबोर रहे...

जय हिंद...

Unknown said...

भजन करो भोजन करो गाओ ताल तरंग।
मन मेरो लागे रहे सब ब्लोगर के संग॥


होलिका (अपने अंतर के कलुष) के दहन और वसन्तोसव पर्व की शुभकामनाएँ!

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं। ईश्वर से यही कामना है कि यह पर्व आपके मन के अवगुणों को जला कर भस्म कर जाए और आपके जीवन में खुशियों के रंग बिखराए।
आइए इस शुभ अवसर पर वृक्षों को असामयिक मौत से बचाएं तथा अनजाने में होने वाले पाप से लोगों को अवगत कराएं।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

कल ही हमारी भौजी दो घंटे तक काम वालियों को घर घर मस्का लगाती रही। तब भी नहीं आई। अगर वह खुद ही लग जाती तो 10 मिनट का काम था।

सही कहा है आपने।

होली की शुभकामनाएं

Dr Xitija Singh said...

आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

Shikha Kaushik said...

sahi kaha hai aapne ...mushkil to hota hai par nibhana hi padta hai .
आप को रंगों के पर्व होली की बहुत बहुत शुभकामनायें ..
रंगों का ये उत्सव आप के जीवन में अपार खुशियों के रंग भर दे..

ZEAL said...

इनकी जबरदस्त यूनियन है आजकल । इनके नखरे नहीं उठाये तो तुरंत नाराज़ हो जाते हैं । गरज अपनी है , ख्याल रख लेने में ही भलाई है।

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

सोचने को मजबूर कर दिया आपने।

होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं।
धर्म की क्रान्तिकारी व्या ख्याa।
समाज के विकास के लिए स्त्रियों में जागरूकता जरूरी।

Dinesh pareek said...

बहुत ही सुन्दर कहा अपने बहुत सी अच्छे लगे आपके विचार
फुर्सत मिले तो अप्प मेरे ब्लॉग पे भी पधारिये

शोभना चौरे said...

मै भी बेंगलोर में रहते हुए बराबर कुछ भी नया नहीं लिख प् रही हूँ पहले मैंने आपकी नानी वाली पोस्ट पढ़ी लगा आपने मेरी कहानी बयां कर दी पर ये पोस्ट तो उससे भी अपनी लगी यहाँ के लोकल काम वालो से तंग आकर अब इंदौर से ही मेरी हमउम्र की" आई" को ले आये है भले ही उनसे काम ज्यादा नहीं बनता किन्तु मुझे उनसे और उनको मुझसे संबल तो मिलता है |
कुछ दिन पहले जील ने मौन अच्छा या संवाद उसपर एक पोस्ट मौन के विरोध में लिखी थी किन्तु काम वालो के साथ मौन कितना" सार्थक "है ये मैंने अब -अब जाना है |
क्योकि इंदौर में तो सब आपने ही होते है अकेले होते है तो सारी बाते उन्ही से होती है और लेखन को भी गति मिलती है |