Thursday, June 10, 2010

बताओ भारतीयों ( Indians) तुम्हारे पास क्या है? मेरे पास ----- है।

अमेरिका में प्रत्येक भारतीय की जुबान पर एक ही बात रहती है कि भारत में क्या है? यहाँ कितना चुस्त प्रशासन है, पुलिस कितनी रौबदार है, सड़कों का जाल बिछा है, साफ-सफाई इतनी कि चेहरे पर कभी गर्द जमे ही नहीं। भारत नहीं बोलकर हमेशा कहेंगे इण्डिया में क्या है? भ्रष्टाचार, खूनखराबा, गन्दगी, भीड़भाड़ आदि आदि। कभी लगता है कि स्वर्ग और नरक की जब कल्पना की होगी तो जितने भी अच्छे गुण एक देश में होने चाहिए वे सब गुण स्‍वर्ग के हिस्से आ गए होंगे और आगे जाकर अमेरिका में तब्दील हो गए होंगे। और जब नरक की बात आयी तब सारे ही अवगुण भारत के हिस्से आ गए। इसलिए हम दो शब्दों में ही अमेरिका और भारत की व्यावख्या कर लेते हैं। स्वर्ग याने अमेरिका और नरक याने इण्डिया।


जब मेरे पास भी बारबार इसी भाव के प्रश्‍न आते हैं तो मुझे दीवार वाला डायलाग बरबस याद आ जाता है। जब अमिताभ बच्चन शशी कपूर से पूछता है कि बताओ तुम्हारे पास क्या है? मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, धन-दौलत सब कुछ है। तब शशी कपूर धीरे से कहता है कि मेरे पास माँ है। लेकिन मैं कभी यह नहीं कहती कि मेरे पास भारत माता है या वो जीती जागती माँ है जिन्हें तुम भारत में छोड़ आए हो, अपने हिस्से का नरक भुगतने को। भारत की माँ अपने देश को नरक नहीं कहती और ना ही मानती है लेकिन जो तुम उसे नारकीय यातना देकर गए हो वो वही भुगतने को अभिशप्त है। इसलिए माँ की बात करना तो अब बेमानी सा हो गया है। मुझे एक लघुकथा और याद आ रही है जब एक डाकू लाचार और बीमार बनकर एक साधु से उसके घोड़े पर बैठकर जाने की मांग करता है और वह साधु उस डाकू को बीमार समझकर घोड़े पर बैठा लेता है तो वह डाकू साधु को धक्का मारकर घोड़ा ले जाता है। उस पर साधु डाकू से कहता है कि इस घटना का जिक्र कही मत करना, वरना लोग लाचार और बीमार आदमी पर विश्वास करना छोड़ देंगे। तो ऐसे ही आज की माँ भी कभी शिकायत नहीं करती, वह कहती है कि यदि हमने शिकायत की तो आगे जाकर कोई भी स्त्री माँ बनना पसन्द नहीं करेंगी।

खैर बात थी उत्तर की। मैं जवाब ढूंढती हुई घूम रही थी और जवाब नहीं मिलता तो आसमान पर निगाहे चले जाती हैं कि हे भगवान तू ही कुछ सहायता कर। जब ऊपर की ओर देखा तो पेड़ दिखायी दिए। आदत के अनुसार आँखे ढूंढने लगी अपना नीम का पेड़, पीपल का पेड़, अमलताश और सेमल का पेड़। लेकिन कहीं भी अपने औषधीय गुणों वाले वृक्ष दिखायी नहीं दिए। बरसों पहले की जिज्ञासा आज सामने आ खड़ी हुई कि ये अमेरिका वाले भारत के नीम और हल्दी के पीछे क्यों पड़े हैं। उनके पास भी तो होंगे, फिर हमारा नीम ही क्यों पेटेंट कराना है? क्या धरती के सारे ही नीम इन्हें चाहिए। लगा था कि सामन्तशाही मानसिकता में यही होता है कि सब कुछ हमारे पास ही होना चाहिए। लेकिन यह पता नहीं था कि उनके पास है ही नहीं तो हमारा देखकर हमसे छीनना चाह रहे हैं। तो आज मेरे पास इस प्रश्‍न का उत्तर है कि बोलो भारतीयों तुम्हारे पास क्या है? हमारे पास वैभव है, भौतिक संसाधन हैं, स्वच्छता है, तकनीक है और तुम्हारे पास? तब मेरे जैसा कोई भारतीय धीरे से कहता है कि मेरे पास नीम है। मेरे पास सारी प्राकृतिक वनौषधियां हैं।

57 comments:

वाणी गीत said...

प्राकृतिक वनौषधियों के अलावा के भारत के पास मानवता है , भावनाएं हैं , परिवार है , परम्पराएँ हैं ,
दुःख है कि धीरे धीरे खोते जा रहे हैं हम ..

ajit gupta said...

वाणीजी, हमारे नीम के आगे इनका सारा वैभव फीका हो जाता है ये सारे तो ब‍हुत भारी पड़ते हैं। जैसे मेरे पास माँ है कहने से ही सारा दम्‍भ समाप्‍त हो जाता है वेसे ही हमारे नीम का तो मुकाबला कर लें।

Suman said...

nice

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मुझे एक लघुकथा और याद आ रही है जब एक डाकू लाचार और बीमार बनकर एक साधु से उसके घोड़े पर बैठकर जाने की मांग करता है
"हार की जीत" नामक वह कथा (लघुकथा नहीं) अपने समय के अति सम्माननीय साहित्यकार पंडित सुदर्शन की लिखी हुई है. प्रसिद्ध फिल्म गीत "तेरी गठरी में लागा चोर", "बाबा मन की आँखें खोल" आदि उन्ही के लिखे हुए हैं. वे १९४५ में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी प्रचार सभा वर्धा की साहित्य परिषद् के सम्मानित सदस्यों में थे।

Arvind Mishra said...

वहां भौतिकता की चकाचौध है और यहाँ मानवीय संवेदनाएं शेष हैं !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मिश्रा जी, मानवीय संवेदनाओं को भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता है. जब तक और जहां तक मानव है, मानवीय संवेदनाएं रहेंगी, यहाँ भी हैं, बल्कि भारत से अधिक मुखरित हैं.

'अदा' said...

इसमें कोई शक नहीं, मानवीय संवेदनाएं भी हैं यहाँ...बल्कि ब्लॉग में लोगों के तौर तरीके देख कर लगने लगा है ...कि भारतीयों को अब संस्कार और संस्कृति भी यही से सीखनी पड़ेगी....क्यूंकि हम हिन्दुस्तानी किसी भी बात की कदर तब तक नहीं करते जब तक वो फोरेन रिटर्न न हो....जैसे 'गांधी जी '...गाँधी की पूछ तभी हुई जब वो साऊथ अफ्रीका होकर आये....जैसे 'योग' ...जब ही योग फोरेन रिटर्न हुआ तभी उसे लोगों ने पूछा...उसी तरह...सभ्यता, संस्कृति ....वहां से लोप हो रहे हैं सब...यहाँ आ रहे हैं...तब ही इनकी कदर होगी ....जब ये यहाँ से वापिस जायेंगी...
अजित जी...माँ की जो दुर्दशा है वहां ..किसी से छिपी नहीं है...कम से कम यहाँ के लोग अपनी गलतियों के प्रति ईमानदार तो हैं....गेम नहीं खेलते...
हम तो अपनी संस्कृति, सभ्यता का बिगुल न जाने कब से यहाँ बजा रहे हैं...लेकिन जब भी वहां जाते हैं....आहत ही होकर आते हैं....फिर कमर कस कर तैयार होते हैं सब कुछ भूल कर...और फिर मुंहकी खाते हैं ...यही चल रहा है अनवरत....

Udan Tashtari said...

संवेदनाओं में यहाँ क्या कमी है लेकिन हाँ , बस, तरीके जुदा हैं. नीम तो खैर है ही. :)

विनोद कुमार पांडेय said...

नीम,तुलसी,बाबुल इत्त्यादि ऐसे बहुत सी औषधियाँ भारत में भरी पड़ी है जिसके पीछे सब चक्कर लगते रहते है..संसाधनों की कमी नही है भारत में...बढ़िया आलेख..

आचार्य जी said...

आईये सुनें ... अमृत वाणी ।

आचार्य जी

Shekhar Kumawat said...

sahi hai hamare pass wo wo chize hai jo unhone khawabo me bhi nahi sochi hogi


or koi bat nahi ji india nahi aana chahte he to na aaye wese bhi yaha insano ki koi kami thodi hai

गिरिजेश राव said...

हमारे पास है:
मानव मल से गंधाते सड़क , गलियाँ
धूल धक्कड़ कूड़ा
बजबजाती नालियां
उफनते सीवर
सीवर बगल में बीच सड़क मंदिर मस्जिद
सीवर के ढक्कन पर छनती पकौड़ी
जितने साफ घर उतना ही गन्दा बाहर
सारा देश सड़क किनारे
अनुशासन लापता
किसी की इज्ज़त नहीं
भ्रष्टाचार :
चपरासी से मंत्री तक
ठेकेदार से मज़दूर तक
मास्टर से दरोगा तक
शिष्य से शिक्षक तक
सबकी रगों में खून बन दौड़ता
किस भारत की बात ?
हम सनातन कीड़े हैं
नाली के .
बायो डायवर्सिटी हमीं से बची है.
संवेदना ? कौन परवाह करता है ?
नीम ?
घर के आगे लगाओ तो कमीने
पूरा पौधा ही तोड़ ले जाते हैं
(दातुन से दांत साफ़ रहते हैं)
ज़रा सी तमीज बची है क्या?
यह देश सौ वर्षों में होगा
फिर टुकड़े टुकड़े.

क्षमा कीजिएगा अगर कटु लगूँ
लेकिन हम लोग आत्ममुग्ध
- पशु से भी गए बीते हैं -

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भारत जैसा भी है भारतीयों ने बनाया है अच्छा या बुरा. इसे और अच्छा बनाने के लिए हमें आउटसोर्सिंग की ज़रूरत नहीं है...बाक़ी भी ख़ुद ही कर लेंगे. हमारा भारत जैसा भी है बहुत अच्छा है. उन्हें उनकी दुनिया मुबारक़.

वाणी गीत said...

@ नीम ?
घर के आगे लगाओ तो कमीने
पूरा पौधा ही तोड़ ले जाते हैं...

हमारे घर के पास कम से कम १० पौधे नीम के , इतने ही अशोक के , और इनके अलावा अमलतास , गुलमोहर , शीशम , बेल . सहजन, अमरुद , अनार , बादाम आदि भी हैं ...बिना किसी सरकारी मदद के लगाये गए ...कोई भी उखाड़ कर नहीं ले गया ...

हाँ , भारत टुकड़े-टुकड़े होगा और परिवार भी ...यह साफ़ नजर आने लगा है ...मगर जबतक है तब तक आत्ममुग्ध होने में क्या बुराई है ...!!

गिरिजेश राव said...

@ वाणी गीत
भाग्यशाली हैं आप. जहरीला कनेल तक ३ बार में दुपहरी के सुनसान में आ कर कोई तोड़ गया. मिल जाता तो उसे तोड़ डालता. बाद में जो होता देखा जाता.

H P SHARMA said...

अजित जी, ये सभ्यता का सफ़र है. कभी हम विश्व गुरू थे. जब यूरोप को ठीक से मुह धोना नही आता था (अमरीका तो और भी पीछे था) तब हम ग्यान का केन्द्र थे. हमे उन कारणो पर मनन करना चाहिये जिनके रहते प्रतिभाशाली लोग पैसे और सुविधा को ग्यान और गौरव से बडी चीज समझते है जो लोग बाहर जाकर भरत के बारे मे ऐसा सोचते है उन्होने भारत को आगे बढाने मे रुचि दिखाई होती तो भारत आज भी ग्यान का केन्द्र बना रहता.

नीरज जाट जी said...

बहुत खूब जवाब।
मेरे पास भी नीम है। और नीम की छांव है।

Mukesh Kumar Sinha said...

ek bhartiya hone ka ahsaas dilane ke liye shukriya.........yaani hamare pass bhi bahut kuchh hai.......aur ab to ham dhire dhire sayad har baat me aage hone ki koshish me hain...........der hai bar andher nahi.........

ham bhi aage honge...........!!
dhanyawad ajeet jee!!
hamare blog pe aana!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अजीत जी ,

आपका ये लेख मंत्रमुग्ध सा कर गया...कुछ तो है हमारे पास जो वहाँ है ही नहीं...

रही मानवीय संवेदनाओं की बात तो जहाँ मानव हैं संवेदनाएं तो होंगी ही...कहीं कम कहीं ज्यादा...जो लोग स्वर्ग की चाह में अपने परिवार को अपने देश को छोड़ वहीँ जीवन यापन कर रहे हैं वो भी तो अपने संस्कार भूल तो नहीं जाते...बस रम जाते हैं वहाँ के माहौल में...

खुशदीप सहगल said...

जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने,
भारत ने मेरे भारत ने,
दुनिया को तब गिनती आई,
तारों की भाषा भारत ने,
दुनिया को पहले सिखलाई,
देता न दशमलव भारत तो,
यूं चांद पे जाना मुश्किल था,
धरती और चांद की दूरी का,
अंदाज़ा लगाना मुश्किल था,
सभ्यता जहां पहले आई,
पहले जन्मी है जहां पे कला,
अपना भारत वो भारत है,
जिसके पीछे संसार चला,
संसार चला और आगे बढ़ा,
यूं आगे बढ़ा बढ़ता ही गया,
भगवान करे ये और बढ़े,
बढ़ता ही रहे और फूले-फले,
बढ़ता ही रहे और फूले-फले,

है प्रीत जहां की रीत सधा,
मैं गीत वहां के सुनाता हूं,
भारत का रहने वाला हूं,
भारत की बात सुनाता हूं...

जय हिंद...

पी.सी.गोदियाल said...

आज मेरे पास इस प्रश्‍न का उत्तर है कि बोलो भारतीयों तुम्हारे पास क्या है? हमारे पास वैभव है, भौतिक संसाधन हैं, स्वच्छता है, तकनीक है और तुम्हारे पास? तब मेरे जैसा कोई भारतीय धीरे से कहता है कि मेरे पास नीम है। मेरे पास सारी प्राकृतिक वनौषधियां हैं।

जिसकी हम कद्र करना नाहे जानते ! हाँ आपके आलेख के सुरुआती पंक्तियों में जो बात अमेरिकी कहते है वे एकदम ठीक बोलते है !

रचना said...

Every country has its own set of problems but the desire to "reach" makes many leave their country and move out its something like a person from a remote village coming to delhi to seek employment .

I appreciate those people who are settled abroad who at least say that they dont find any thing good in india so they have moved out at least these people are TRUTHFUL

others who have moved out but always pretend that INDIA is best are hypocrites to me because they dont believe in what they say if they find india good then they should not have gone to america in any case , if they loved their country as they say then they should have stayed here it self and tried to make it a better place

Nothing is good or bad its thinking which makes it so .

anoop joshi said...

हमारे पास इतने दुःख.तकलीफ के बाद भी, "मेरा भारत महान " कहने का जज्बा है.

Tarkeshwar Giri said...

hamare pass sanskar aur sanskriti hai. hamare pass parivar aur pyar hai. hamare andar kshama hai shahansheelta hai.

shikha varshney said...

उनके पास (USA/ UK )दोगलापन है ,कूटनीति है, सामंतवाद है ...हमारे (Indians ) पास क्या है ? हमारे पास भावनाएं हैं ,गेरों को अपनाने का जज्बा है ओर सबसे बड़ी बात उन्हें पालने की औकात है .

Dr. shyam gupta said...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...
मिश्रा जी, मानवीय संवेदनाओं को भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता है. जब तक और जहां तक मानव है, मानवीय संवेदनाएं रहेंगी, यहाँ भी हैं, बल्कि भारत से अधिक मुखरित हैं.

---बस यही तो बात है संबेदनाओं की --वहां बस मुखरित हैं, भारत में क्रितित्व में हैं, बस मुखरित नहीं.

Dr. shyam gupta said...

---आपकी मां यदि बीमार होगी तो क्या आप छोडकर भाग जायेंगे, उसकी खांसी की, सान्स चलने की आवाज़ की कठिनाइयों से घबराकर, या रहकर इलाज़ करेंगे-करायेंगे, हो सकता है विदेश से भी चिकित्सा/चिकित्सक मंगवायेंगे.

rashmi ravija said...

अभी अभी समीर जी की पोस्ट पर कामने तकर के आई हूँ कि ..
"जगजीत सिंह की वो ग़ज़ल सुनने का मन हो आया..."हम तो हैं परदेस में.... देस में निकल होगा चाँद...." परदेस में भी चाँद तो जरूर निकलता होगा पर शायद नीम की डाली पर नहीं अटकता होगा..:)"....और वहाँ से आपकी पोस्ट पर आई तो नीम का जिक्र देखा...wt a coincidence :)

rashmi ravija said...

कमेन्ट कर के *

zeal said...

Indians living in India are fortunate because they have their mother [mother land].

" Apni maan apni hi hai, amit pyaar jo hai karti.."

zeal said...

.

डॉ टी एस दराल said...

अजित जी , आपकी लिखी शुरू की पंक्तियाँ अक्षरश: सत्य हैं ।

गिरिजेश राव जी ने भी एक कठोर और कड़वा सत्य ब्यान किया है ।

खुशदीप ने जो सत्य लिखा है , वो अब कवि लोग मंच पर बोलकर खूब तालियाँ और पैसे बटोरते हैं ।

सच तो यही है कि हम आज भी विकास के मामले में इथिओपिया जैसे देश से पीछे हैं ।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

@Dr. shyam gupta said...
---आपकी मां यदि बीमार होगी तो क्या आप छोडकर भाग जायेंगे, उसकी खांसी की, सान्स चलने की आवाज़ की कठिनाइयों से घबराकर, या रहकर इलाज़ करेंगे-करायेंगे, हो सकता है विदेश से भी चिकित्सा/चिकित्सक मंगवायेंगे.


कुम्भ मेले के बाद कभी वहां नज़र डालकर देखिये इस महान संस्कृति के कितने स्तम्भ अपनी अबला माताओं को राम-भरोसे छोड़कर चले जाते हैं.

यह निराधार अहम् (भले ही भारत माता का अहंकार हो) स्वार्थ और भ्रष्टाचार के बाद हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वाणी जी की बात अपनी जगह सही है मगर गिरिजेश की बात भारत में हर कहीं सही है - जब तक हम सच को स्वीकारेंगे ही नहीं - बदलाव की उम्मीद रखना झूठ बोलने जैसा ही है.

संगीता पुरी said...

आधुनिकता के भ्रामक जाल में न फंसे .. तो आज भी भारतीयों के पास सबकुछ है !!

राजकुमार सोनी said...

देश सिर्फ कागज का नक्शा नहीं है। देश बीमार भी नहीं है। देश बूढ़ा भी नहीं है। देश धड़कता है। देश सबसे पहले हैं। देश सबसे बड़ा है।
मैं अपनी मिट्टी से बेहद प्यार करता हूं।

zeal said...

No country on earth has the treasure that India possess.

We have-

-Kasaab
-Rathod
-Priyabhanshu
-V P Singh
-Arjun Singh
-....
-....
-....

ajit gupta said...

बहस बहुत ही अच्‍छी चल रही है। मेरा पक्ष यह था कि माना कि हमारे पास कुछ भी गौरव करने लायक नहीं है फिर भी ऐसा बहुत है जिनको यदि समेट लिया जाए तो हमारा गौरव वापस आ सकता है। हो सकता है मैं गलत हूँ और ब्‍लागिंग होती ही इसलिए है कि विभिन्‍न विचार प्राप्‍त हो सकें। मुझे आपत्ति तब होती है जब हम अपने देश को यह कहकर त्‍याग देते हैं कि वह गन्‍दा है, तो साफ कौन करेगा? माना कि हम साफ नहीं कर सकते लेकिन भागने से तो बिल्‍कुल भी नहीं कुछ हो सकता हाँ यदि मैदान में डटे रहे तो सम्‍भावना तो बनी रहेंगी। आज भारतीयों के पास गौरव ही नहीं है और जो यहाँ हैं वे अमेरिका में भारत बसाना चाहते हैं तो कुछ तो भारत में है जिसे वे मन में संजोकर रखते हैं और यहाँ उसे साकार करना चाहते हैं। बहस बहुत लम्‍बी है, बस मैं अपनी माँ को अकेले छोड़कर कहीं नहीं जा सकती, मेरा तो यही जज्‍बा है। कम से कम अपनी जीवित माँ को तो कदापि नहीं।

रचना दीक्षित said...

अजिता जी, सच है हमारे पास वो सब कुछ है जिसकी वो कल्पना भी नहीं कर सकते.नीम के लिए कहते हैं की जब हवा नीम के पेड़ से हो कर गुजरती है तो आस पास की हवा भी शुद्ध हो जाती है उसके औषधीय गुण मिलकर.

राज भाटिय़ा said...

अजित गुप्‍ता आप का लेख सत्य है लेकिन यह सत्य हम लोगो ने झूठलाना शुरु कर दिया है, भारत एक ऎसा देश है जहां भगवान ने सब कुछ दिया है, प्राकृतिक सम्पदां से भरा पुरा, इसे युही सोने की चिडिया नही कहा गया, यह है भी सोने की चिडियां , लेकिन अब हम नालायको ने इसे कुडे का डिब्बा बना दिया है, हर तरफ़ विचारो का कुडा, स्वार्थ का कुडा, लडाई का कुडा.... ओर फ़िर हमारा फ़ेंका हुआ कुडा..... बीमार मां ? अजी आज कल लोग मां बाप को घर से निकाल देते है, भारत मै, मां बाप की पिटाई करते है, उन से उन की पेंशन ले कर... बाकी मै गिरिजेश राव से सहमत हुं

ajit gupta said...

राज भाटिया जी, मैं आपकी बात को काट नहीं रही हूँ लेकिन यह मेरा तर्क है कि जो लोग अपने माता-पिता को छोड़ आते हैं और जो लोग उनकी पेंशन छीन लेते हैं क्‍या दोनों में आपको कोई अन्‍तर दिखायी देता है। फिर छोड़कर आने वाला उसे कैसे गलत ठह‍रा सकता है? कभी भारत आकर देखें कि कैसे लोग अपने माता-पिता को रखते हैं। जो लोग उन्‍हें छोड़कर चले गए हैं केवल यह तर्क उन्‍हीं का है कि वे सब गन्‍दे थे इसलिए हमने उन्‍हें छोड़ दिया। आज भी अधिकांश भारतीय अपने माता-पिता को कमोबेश सम्‍मान देते ही हैं और यदि भारत में भी यह हुआ है तो इसका कारण भी पलायन करने वाले लोग ही हैं, यहाँ के लोग कहते हैं कि वो तो तुम्‍हें छोड़कर आनन्‍द से रह रहा है और हम यहाँ तुम्‍हारा सब कुछ करके भी बुरे बने हुए हैं।

महफूज़ अली said...

मेरे पास अब माँ है....

डा० अमर कुमार said...


गिरिजेश की टिप्पणी से असहमत होने का कोई कारण नहीं दिखता ।
ऎसी हताशा और गुस्सा हम बहुतों में पायेंगे ।
पर एक बात तो है..
हमारे पास भारतीयता है, और स्वाभिमान !
भले ही यह ठर्रे में मस्त रहने की भारतीयता हो
या नाली में बेहिचक लोटने का अभिमान !

अपने घर की कच्ची पक्की रोटी और अपनी देहरी के सोंधेंपन की बात ही अलग है ।
गंधाते सड़क ,कूड़ा, नालियां, बीच सड़क मंदिर मस्जिद , लापता अनुशासन, भ्रष्टाचार .. यह सब ठीक है, पर क्या किसी आसमानी खुदा बाप ने यह सब हम पर बरपा किया है, याकि हमारा मूल चरित्र ही यही है ? पालम पर पान मसाला थूकने वाला.. पेनाँग या पेकिंग में प्लेन के लैन्ड करते ही एक सभ्य शहरी में कैसे तब्दील हो जाता है ? कोई ज़वाब .. किसी के पास नहीं !
हाँ, यह देश पुनः टुकड़े टुकड़े कभी न होगा,
क्योंकि यह कभी एक था ही नहीं !
तब काँधार से लेकर उत्कल तक सभी तो चक्रवर्ती सम्राट और छत्रपति राजा हुआ करते थे ।
आज तमिलनाडु से लेकर महाराष्ट्र तक या गौहाटी से लेकर लखनऊ तक की ज़मीं नव-सम्राटों और मलिका-ए-आज़म से इस कदर अटी पड़ी हैं, कि तिल रखने की जगह नहीं । सबके अपने नियम और कायदे... फिर भी हमारी पहचान अपने मुल्क से ही जुड़ी रहेगी । अपने घर की कच्ची पक्की रोटी और अपनी देहरी के सोंधेंपन की बात ही अलग है ।
हमारे पास गाल बजाने को स्वर्णिम अतीत है,
हमारे पास भारतीयता है, और स्वाभिमान !
भले ही यह ठर्रे में मस्त रहने की भारतीयता हो
या नाली में बेहिचक लोटने का अभिमान !

'अदा' said...

जिस नीम के लिए इतनी बातें हो रहीं हैं...उस नीम का ही इस्तेमाल कितने लोग करते हैं..??
जिस प्राकृतिक सम्पदा की बात हो रही है वो बची ही कितनी है....सारा जंगल ठेकेदारों ने बेच दिया है....हरीतिमा के नाम पर क्या शेष है..कभी अपने आस-पास देखिएगा...नदियों के नाम पर क्या बचा है वो भी देखिएगा....गंगा-जमुना की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है...
जंगल कट जाने की वजह से ..जल स्तर कहाँ पहुँच गया है....आप उसे झुठला नहीं सकते हैं...आने वाले दिनों में ..भारत पहला देश होगा जहाँ सबसे पहले जल का संकट आएगा...ओर यह ऐसी सच्चाई है, जिससे आप आँख नहीं चुरा सकते हैं....
और हां कितने लोग है तो आयुर्वेदिक औषधियों का इस्तेमाल करते हैं....बल्कि योग , आयुर्वेद, हथकरघा , handicraft सारे व्यवसाय..पश्चिम कि ओर ही देखते हैं...एक्सपोर्ट करने के लिए....इसलिए आत्ममुग्ध होइए..परन्तु सच्चाई को स्वीकारिये...
एक बात और बताऊँ आपको....ऐसा भी नहीं है कि यहाँ आने के बाद हिन्दुस्तानी एकदम से बदल जाते हैं...सबसे ज्यादा ख़राब तरीके से वही रखते हैं अपने माँ-बाप को....क्योंकि ये खून में ही है ...जगह बदल देने से स्वाभाव नहीं बदल जाता है....इस बात पर मैंने एक रेडियो प्रोग्राम भी किया था....
जिसमें बहुत सारे लोगों का भन्डा फोड़ हुआ था...
हम भी भारत को बहुत प्यार करते हैं ...लेकिन अँधा प्यार नहीं...अब भी अगर सिर्फ आत्ममुग्ध हुए बैठे रहेंगे....तो खुद तो डूबेंगे ही आने वाली पीढियां हमें पानी पी पी कर कोसेंगी...
हाँ नहीं तो...!!

निर्मला कपिला said...

अजित जी नमस्कार ब्लाग पर तस्वीर बदलने के लिये बधाई और यहाँ आ कर आपसे बात नही कर पाई मेरी दूसरी बेटी के भी बेटी हुयी है इस लिये व्यस्त रही आपने सही लिखा है वहाँ एक भी भारतीय ऐसा नही मिला जो वहाँ रह कर अपने देश की कुछ अच्छी बातें भी बताता हो बस अवगुण ही गिनाये जाते हैं।ैऔर कैसी चल रही है क्या साधना वैद जी से मुलाकात हुयी? शुभकामनायें। बच्चों को प्यार दीजियेगा। आपसे एक गहरा रि8श्ता जुड गया है कितना सुन्दर इतिफाक है विदेशी धरती पर देशी प्यार का आनन्द ही कुछ और है।

राम त्यागी said...

नीम ही नहीं और भी बहुत कुछ है मेरे देश में !!
अमेरिका की अपनी खूबियाँ और बुराइयाँ है भारत की अपनी खूबी और बुराइयाँ ...

सतीश सक्सेना said...

साधू और डाकू बाली लघु कथा की घटना बड़े साल बाद आपने याद दिला दी ! आपका शुक्रिया ! अरविन्द मिश्र जी के कथन में काफी कुछ जवाब है आपके प्रश्न का ! इसी पर हम गर्व करते रहे हैं मगर शायद अन काफी बदल चुकी हैं हमारी भावनाएं जबकि संवेदनाओं का अभाव पाश्चात्य जगत को अब खलने लगा है चिंताजनक यह है कि हम उनकी संस्कृति को तारीफ़ भरी निगाहों से देखने की कोशिश करने लगे हैं ! गिरिजेश राव की बात एक कटु सत्य है जिसे स्वीकार करने में हमें शर्म आती है और जिसे हम भुलाने की कोशिश करना चाहते हैं !
सादर
सादर

सतीश सक्सेना said...

आपकी बेहतरीन पोस्ट पर बधाई देने का दिल है ! अतः इसी पर एक पोस्ट लिखकर वापस आया हूँ ! कल सुबह प्रकाशित करूंगा, कृपया देखिएगा ! मेरी इस पोस्ट के लिए आपको और गिरिजेश राव को आभार !

आशीष/ ASHISH said...

Maikya Ajit Ma,
Paraspar virodhon ke bawajood bhi HUM HAIN!!!
Ye hi bahut bada achievement hai...

Kuchh baat hai ke hastee mit ti nahin hamari,
Sadiyon raha hai dushman daur-e-zamaa hamara!

शोभना चौरे said...

हमारे एक पड़ोसी है वो पाच महीने अपनी बेटी के घर अमेरिका रहकर आये आने के बाद हर रोज वहां की सफाई, अनुशासन अदि चीजो की सराहना करते नहीं थकते |लेकिन हर सुबह दूसरो के बगीचे के फूल तोड़ने में कभी परहेज नहीं करते |और हद तो एक दिन तब हुई जब भरी दोपहर में अपने घर के तीन -तीन टायलेट छोड़ कालोनी की पीछे की दीवार के पास लघुशंका करते हुए पाएगये |
अब क्या कहे ?
आपका आलेख बहुत ही अच्छा लगा और चर्चा में बहुत कुछ सामने आया |सुदर्शन जी द्वारा लिखित कहानी "हार की जीत "हमे कक्षा 7वि के सिलेबस में थी शायद बाबा भारती था नाम उनका जिन्होंने ये कहा था |
और हाँ कभी कुम्भ में किसी ने अपनी माँ को छोड़ा होगा ?
इसका ने मतलब नहीं की सारे ऐसे ही होते है ",दुनिया रंग बिरंगी बाबा "

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Healthy discussion will open road to improvements .

America & BHARAT - both have many good & Bad points.

It is upto ALL of us, to progress
and not sit on our laurels.

संजय भास्कर said...

हमारा भारत जैसा भी है बहुत अच्छा है. उन्हें उनकी दुनिया मुबारक़.

संजय भास्कर said...

मेरा भारत महान ..........

Shraddha said...

मै एक ग्रेह्नी हू और भारत माता की सेवा में नित्य वर्षो अपने घर के कचरे का प्रबंधन करती हू .और अब पूरी कालोनी का करने का विचार है

Shraddha said...
This comment has been removed by the author.
अनूप शुक्ल said...

रोचक पोस्ट! इस पर आईं टिप्पणियां भी रोचक हैं। हर देश के अपने रोने गाने होते हैं। भारत के भी हैं अमेरिका के भी। स्मार्ट इंडियन की टिप्पणी से सहमत कि मानवीय संवेदनाओं को भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता।

dr kiran mala jain said...

good job