Saturday, November 7, 2009

हम अपनी छवि में कैद हैं

कभी आप बेहद उदास हैं, उदासी भी आपकी निजी है। मन करता है कि दुनिया को बता दें कि आप क्‍यों उदास हैं फिर लगने लगता है कि आपने तो दुनिया के सामने एक छवि बनायी थी कि आप बेहद सुखी हैं। उसका क्‍या होगा? हम अपनी छवियों में कैद हैं, कभी लगता है कि हम एक फोटो फ्रेम में कैद होकर रह गए है। जब फोटो खिचवाने जाओ, फोटोग्राफर कहता है कि जरा मुस्‍कराइए। हम मुस्‍कराने का प्रयास करते हैं और फोटो क्लिक हो जाती है। बरसो तक यही फोटो फ्रेम में चिपकी रहती है। हम भी उसे देख देखकर खुश होते रहते हैं कि वाह क्‍या हमारा चेहरा है? कितने ही मौसम आकर निकल जाते हैं, कभी दुख की पतझड़ पत्रविहीन कर जाती है कभी वर्षा से भीग-भीग जाते हैं और कभी सर्दी में अपने आप में ठिठुर जाते हैं लेकिन फोटो तो वैसी ही बनी रहती है। दुनिया के सामने हमारा अस्तित्‍व भी बस ऐसा ही होना चाहिए। हमारा सब कुछ शाश्‍वत है, बस यही दिखना चाहिए। कहीं मृत्‍यु दस्‍तक देती हैं तो हम कहते हैं कि नहीं यह दस्‍तक हमारे यहाँ नहीं होगी। कहीं संतान आँखे दिखाने लगती हैं, तब भी हम कहते हैं कि नहीं हमारी संतान ऐसी नहीं होगी।
हम सब ब्‍लाग पर अपने जीवन की इस छवि को सबके सामने उधेड़ते हैं। शायद लेखक ही ऐसा प्राणी हैं जो अपने जीवन को छिपा नहीं पाता। वह अपने दुख को अपने शब्‍दों के माध्‍यम से गति देता है, उसे बाहर निकालने का प्रयास करता है। फिर कुछ हल्‍का होता है। उसकी फोटो शायद पल-पल बदलती रहती है। कभी आँसू टपकने लगते हैं तो कभी मोती झरने लगते हैं। संवेदनशील मन पड़ोस की घटना से दुखी हो जाता है लेकिन वह किसी को कह नहीं पाता, क्‍योंकि वह उसकी पड़ोस की घटना है। उसे पता लगेगा तो वह व्‍यक्ति आहत होगा। लेकिन जब घर में ही कुछ अघटित होने की दस्‍तक सुनायी देने लगे तब तो आहत मन सुन्‍न सा हो जाता है। किसके कहे अपना दुख? क्‍यों कहे अपना दुख? बदले में उपदेश ही तो मिलेंगे। जीवन के सार तत्‍व का उपदेश, जिन्‍दगी के नश्‍वरता का उपदेश।
बस आप अपनी छवि में कैद हो जाते हैं। मुझे दिखायी दे रही है एक माँ। जिसने सारे सुखों को एकत्र किया अपनी विरासत को बड़ा करने में। लेकिन क्‍या है आधुनिकता की इस आँधी का सच? प्‍यार क्‍यों छोटा पड़ने लगा है, क्‍यों बड़े बन गए हैं अहंकार? क्‍यूं बेटे के मुँह से ये शब्‍द निकलने लगे हैं कि अब मैं बड़ा बन गया हूँ तो तुम मेरे अधीन रहो। जो मैं कहता हूँ वही सत्‍य है। तुम्‍हारा अस्तित्‍व अब कुछ भी नहीं। सब कुछ सुनती है माँ, बर्दास्‍त भी करती है। लेकिन शायद शरीर और मन की इस जंग में कहीं शरीर हार जाता है। अघटित की दस्‍तक आ जाती है। तब लगता है कि अहंकार का फण कुचल जाएगा और रह जाएगा निर्मल प्‍यार। लेकिन नहीं यह सर्प कुचलता नहीं। ऐसा लगता है कि और विकराल रूप धर कर सामने आ गया है। माँ को सम्‍भालने की ह‍ताशा ने उसे और विकराल बना दिया है। माँ का अस्तित्‍व पहले ही समाप्‍त हो गया था और शायद अब तो बिल्‍कुल भी उसका वजूद नहीं बचा है। अब आप ही बताइए, ऐसे में मन क्‍यों उदास ना हो? क्‍यों न रोए मन उस माँ के लिए? जो प्‍यार की भीख माँग रही हो, बोल रही हो कि अब तो बस कुछ दिन ही शेष हैं, लेकिन प्‍यार का वो निर्मल झरना न जाने कहाँ खो गया है? बाहर से सारे ही फोटो फ्रेम दुरस्‍त है, फोटो भी मुस्‍कराहट वाली लगी है, लेकिन अन्‍दर कितने आँसू हैं क्‍या कभी हम इसे दिखा पाएंगे, अपनी छवि की वास्‍तविकता को दिखा पाएंगे?

24 comments:

ललित शर्मा said...

एक माँ। जिसने सारे सुखों को एकत्र किया अपनी विरासत को बड़ा करने में। लेकिन क्‍या है आधुनिकता की इस आँधी का सच? प्‍यार क्‍यों छोटा पड़ने लगा है,
हम क्यों अपने संस्कारों को भुलते जा रहे है,यह एक चिंतन का विषय है? आलेख हेतु आभार

shubhi said...

सच है कि हमने ऐक ऐसी दुनिया बनाई है जहां अधिकांश लोग दुखी हैं और इस वजह से हैं कि वह अकेले हैं इस वजह से भी कि उन्हें अपनी गरिमा से प्यार है लेकिन इसके बावजूद भी हम दूसरों की गरिमा पर लगातार हमले करते हैं क्या हम इस छवि से आजाद होंगे।

जी.के. अवधिया said...

"प्‍यार क्‍यों छोटा पड़ने लगा है, क्‍यों बड़े बन गए हैं अहंकार?"

यही होता चला आया है सदियों से। अहंकार शाश्वत सत्य है और निर्मल प्यार सिर्फ एक आदर्श।

आज के युग में किसी से, यहाँ तक कि सन्तान से भी, किसी प्रकार की अपेक्षा रखना केवल आत्मवंचना है।

शोभना चौरे said...

मन कि सारी परते खोल गया आपका ये आलेख |सुनते है काफी इंसानों कि शकले एक सी मिलती है किन्तु विचारो कि सोच कि समानता एक ही समय में एक ही दिशा में होती है ये आज मैंने महसूस किया है कुछ ऐसे ही मै सोच रही थी छबी और परम्पराए पर कुछ सिरा नही मिल रहा था आपको पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा |कुछ कविता कि पंक्तिया बनी थी उसे आपके आलेख पर टिप्पणी में देती हूँ \
अस्तित्व में न होना अलग बात है
अस्तित्व होकर अस्तित्व विहीन व्यवहार
सिर्फ आंसू और दुःख
दे जाता है |

Dr. Smt. ajit gupta said...

शोभना जी
हम यहाँ सभी संवेदनशील प्राणी हैं इसी कारण सभी का दिल एक तरह से ही धड़कता है। हाँ कहीं कुछ लोग स्‍वयं को विचारधारा के अन्‍तर्गत कैद कर लेते हैं, इसी से विरोध होता है। आप सभी की टिप्‍पणी का आभार।

पी.सी.गोदियाल said...

जी हाँ ,एकदम सही बात कही आपने , यहाँ ब्लॉग पर लिखना भी अपने दिल की बात बताना जैसा ही है और उस बात बताने से जो छवि आपकी बनती है, वही आपकी पहचान बन जाती है !

Arvind Mishra said...

मां की मार्मिक वेदना को आपने सशक्त अभिवयक्ति दी है -मगर क्या अब मातृत्व यही नियति भोगने को अभिशप्त होगी ?

rashmi ravija said...

मन को झिंझोड़ने वाला आलेख...शायद यही नियति है हर माँ की...पीढी दर पीढी,यही कहानी दुहराई जाती है...सब पर प्यार लुटाती,नेह बरसाती माँ,एक दिन अकेले रह जाती है...फ्रेम में जड़े उस मुस्कुराते हुए फोटो को देखते हुए

दिगम्बर नासवा said...

ye baat sach hai ham sab ek mukhota adhe rahte hain aur usi mein rahna chahte hain ....... aadunikta ki doud mein maa का रिश्ता भी ऐसे ही कब dhumil ho gaya ........... ye shayad kisi ko pata ही nahi chalaa ........ shayad isi ko parivartan का niyam kahte hain ......

श्यामल सुमन said...

संवेदनाओं को झकझोर दिया आपने डा० साहिबा। जीवन के नकली पक्ष पर चोट करती इह रचना बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है। वाह।

मन-दर्पण को जब-जब देखा, उलझ गई खुद की तस्वीरें।
चेहरे पे चेहरों का अंतर, याद दिलाती ये तस्वीरें।।

पात्रों सा निज- रूप सजाता, रंगमंच जाने से पहले।
प्रति पल रूप बदलता मेरा, और बदलती है तक़रीरें।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कल इस लिंक पर आपकी पोस्ट की चर्चा छप रही है।
http://anand.pankajit.com/
आपने सुन्दर पोस्ट लगाई है।
बधाई!

cmpershad said...

आधुनिक मानव मुखौटे लगाए घूमता है, असली संवेदना और अभिव्यक्ति से दूर....

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

bahut hi sunder lekh hai didi.aise hi halaton ko bayaan karti hai meri bhi ye panktiyan-
HAAL ACHCHA HAI DILANE KO YAKEE.
JANE KITNE GUM CHUPANE AAYI HOTHIN PER HANSEE.

M VERMA said...

माँ को सम्‍भालने की ह‍ताशा ने उसे और विकराल बना दिया है। माँ का अस्तित्‍व पहले ही समाप्‍त हो गया था और शायद अब तो बिल्‍कुल भी उसका वजूद नहीं बचा है। "
बहुत गहराई है आपके आलेख में

विनोद कुमार पांडेय said...

हर आदमी के अंदर कुछ ना कुछ ऐसा चलता रहता है जो उसे परेशान सा करता रहता है वो खुश तो रहता है पर कभी कभी कुछ ना कुछ मन में उठती रहती है..

अल्पना वर्मा said...

आप के इस लेख को पढ़ कर लग रहा है बहुत ही सूक्ष्मता से आप हर स्थिति का अवलोकन करती हैं.
आप की कही बातों से सहमत हूँ.
संवेदनशील व्यक्ति के लिए निर्मल प्यार की प्राप्ति ही सब कुछ होता है.
स्त्री भी माँ के रूप में उसी स्नेह की प्राप्ति के लिए समर्पित रहती है ताउम्र.

सुलभ सतरंगी said...

माँ के अंदरूनी दुखों को उजागर कर आपने एक प्रकार से पुत्रों को उसके कर्तव्यों(कर्त्तव्य सिर्फ बाहरी नहीं वास्तविक में प्रेमसहित) की याद दिलाई है. ममतामयी माँ को इसकी सदैव जरुरत रहती है. इसे समझना होगा.

POTPOURRI said...

bahut hi satya kaha aapne. Bhgwaan Krishna ne Geeta me kaha hai ki phal ki ichcha mat karo sirf karma karo. attachment se dil ko thes pahuchati hai isliye detach ho kar hi hum tar sakte hai.

Rajey Sha said...

इस भाव से देना कि‍ बदले में कुछ मि‍ले तो नि‍श्‍ि‍चत ही बदले में दुख के सि‍वा कुछ नहीं मि‍लने वाला।

आदमी और आदमी के बीच कोई भी रि‍श्‍ता हो भले ही मां-बाप और संतान का, बेशर्त या शर्तहीन होना ही एकमात्र पालन की जा सकने वाली शर्त है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अजित जी, आपकी बात सही है. हम सब अपनी छवि में कैद हैं. और अगर असलियत जान भी पायें तो भी उसे दिखाना ज़रूरी तो नहीं है. और भी ग़म हैं ज़माने में... रही बात प्यार की, तो जो छोटा पद जाए वह प्यार ही कैसा? वह तो सिर्फ अपना बनाने (स्वामित्व) की चाहत है.

खुशदीप सहगल said...

जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई...
जय हिंद...

Nirmla Kapila said...

आपका स्नेह पा कर अभिभूत हूँ। अब आपसे दिइर रह कर अपना कोई अस्तित्व ही नहीं लगता।ाउर आपने आज मेरे मन की बातें लिखी हैं। सच है आधुनिकता की इस आँधी मे हम अपनी संवेदनायें खोते जा रहे हैं । यूँ भी अपनी छवि मे कैद हो कर रहने मे ही अब सुख लगता है कौन किसी के दुख बांटता है? अगर छवि से बाहर आने की कोशिश करें तो खुद से दूर हो जाते हैं। मुझे लगता है लेखक लोग बहुत ही संवेदनशील भी होते हैं। हम आपस मे एक दूसरे का दर्द समझते भी हैं । शोभना जी ने सही कहा है
अस्तित्व में न होना अलग बात है
अस्तित्व होकर अस्तित्व विहीन व्यवहार
सिर्फ आंसू और दुःख
दे जाता है |
बहुत अच्छा विचार्णीय विश्य चुना है आपने अपने लिये आपके स्नेह से अभिभूत हूँ शुभकामनायें

रंजना [रंजू भाटिया] said...

वक़्त इतनी तेजी से बदला है की सब रिश्तों की मिठास खो गयी है ..अहम् अधिक है और प्रेम कम ..आज की सच्चाई की बात सशक्त ढंग से बताता है आपका यह लेख ...शुक्रिया

cmpershad said...

"शायद लेखक ही ऐसा प्राणी हैं जो अपने जीवन को छिपा नहीं पाता। वह अपने दुख को अपने शब्‍दों के माध्‍यम से गति देता है, उसे बाहर निकालने का प्रयास करता है"

लेखक ही तो वह प्राणी है जो बोलता अधिक है:) आम आदमी सोचता है पर अभिव्यक्त नहीं करता॥