Monday, February 16, 2009

अपनी लकीर को बचाएं

जीवन में लकीरे जन्म के साथ ही आपकी परछाई की तरह संगिनी बनकर रहती हैं। इनका स्वरूप कभी हाथ की साक्षात् रेखाओं में नजर आता है और कभी भाग्य रेखा बनकर ललाट पर अंकित हो जाता है। इन भाग्य रेखाओं के अतिरिक्त भी आपके व्यक्तित्व की लकीरें समय के अनुरूप घटती बढ़ती रहती हैं। जब आप अपनी लकीर को बढ़ाने में जी जान से जुटे होते हैं तभी दूसरे लोग आपकी लकीर को घटाने में ही अपने जीवन का अर्थ ढूंढ रहे होते हैं। हमारा व्यक्तित्व जीवन की अमूल्य धरोहर बनकर हमेशा हमारे साथ बना रहता है। यह हमारी परछाई की तरह ही हमेशा साथ रहता है। कभी बौना कभी विशाल और कभी बराबर। कोई आपसे पूछे कि आपके जीवन का संचय क्या है? इस प्रश्न का उत्तर धन सम्पदा के संचयन तक जाकर ही अकसर थम जाता है। लेकिन क्या सम्पदा का संचय ही जीवन के लिए पर्याप्त होता है? नहीं! संचयन तो वास्तव में व्यक्तित्व का है। लेकिन क्या व्यक्तित्व का विकास इतना आसान है?
एक दिन की घटना अकसर ही जेहन में आ जाती है, एक मीटिंग के दौरान निरूत्तर करने वाला प्रश्न जब मेरी तरफ से पूछा गया तब मेरे समीप बैठे व्यक्ति ने कहा कि आप का तो इस सदन में पक्का पट्टा हो गया। तभी मैंने कहा था कि मेरे दोस्त यह पक्का पट्टा नहीं वरन हमेशा की छुट्टी है। हुआ भी ऐसा ही। कोई नहीं चाहता कि किसी की लकीर बढे़। आपको शुरू में लगता है कि आपके साथ बहुत लोग खड़े हैं लेकिन उनको आपके व्यक्तित्व से नहीं आपसे मतलब होता है। हर आदमी को चाहिए एक पिछलग्गू। यदि आप बनने को तैयार हैं तो आप सही हैं नहीं तो आपकी लकीर को नहीं बढ़ने दिया जाएगा। आज प्रत्येक आदमी दूसरों के व्यक्तित्व की लकीरों को ही छोटा करने में लगा है। यदि हम अपना समय अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए ही उपयोग में लेंवे तो शायद अधिक उपयोगी होगा। हम बिना दूसरों की ओर देखे स्वयं को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कुछ चिंतन अपने आपके लिए।
जब हम अपने लिए सोचते हैं तो अपनी खूबियों को आसानी से पहचान नहीं पाते, अतः प्रश्न उठता है कि हम अपनी खूबियों को कैसे पहचाने? जब हम स्वयं की खूबियों को पहचान लेते हैं तब किसी की भी लकीरों को छोटा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके लिए आवश्यक है बस थोड़े से चिंतन की। आप जिस क्षेत्र में कार्य करते हैं उसमें किस कार्य में आपको सबसे ज्यादा अच्छा लगता है, बस वहीं से प्रारम्भ कीजिए। गृहणी से लेकर उच्च शिक्षित व्यक्तियों के लिए एक समान सिद्धांत है अपने आपको पहचानने का। यदि आप गृहणी है तो आप किस में सिद्धहस्त हैं उसी पर अपना ध्यान केन्द्रित करिए। शेष दुनिया की बातों को भूल जाइए, भूल जाइए कि आपको क्या नहीं आता बस याद रखिए कि मुझे क्या श्रेष्ठ आता है। आप में धीरे-धीरे आत्मविश्वास आता जाएगा और आप अपने काम में भी निपुण होते चले जाएंगे। यह भी ध्यान रखिए कि कौन आपके वजूद को नकारने में लगे हैं। बस उनके सामने अपनी कला का प्रदर्शन अवश्य करिए। फिर देखिए जो लोग आपको कुछ नहीं समझते थे और अक्सर आपका मखौल उड़ाया करते थे वे ही लोग आपसे किनारा करने लगेंगे। अपनी नाकामियों को कभी भी अपने पर हावी मत होने दीजिए। दुनिया में इतना कुछ है जिसे हम जान नहीं सकते, ना कोई भी जान पाया है, फिर हम ही क्यों हीनभावना से ग्रसित हों?
बस सफलता के लिए और अपनी लकीर को बढ़ाने के लिए इतना आवश्यक है कि आप अपने किसी एक काम में निपुणता हासिल करें। काम फिर वह कितना ही छोटा क्यों ना हो। छोटा सा काम ही आपको महान बना देगा। लेकिन आप यह भ्रम कभी मत पालिए कि आपको लोग आपकी खूबी के लिए पसन्द करेंगे। आपको हर हाल में अपनी लकीर को तो बचाए रखना ही होगा। आपको मुट्ठी भर प्रशंसक भी मिल जाएं तो आप अपने आपको खुशकिस्मत समझिए। जैसे ही आप अपनी लकीर को बनाने में जुट जाते हैं वैसे ही दस हाथ उसे मिटाने के लिए आगे बढ़ जाते हैं। अतः अपने कदमों को सम्भाल कर रखिए, नहीं तो निराशा आपको घेर लेंगी। कोशिश कीजिए कि ऐसे लोगों से दूर कैसे रहा जाए? इस बात को भी ध्यान में रखिए कि जितनी ईर्ष्‍या आपको घेरेगी समझिए कि उतनी ही आपकी निपुणता बढ़ रही है। अतः बिना अहंकार पाले बस अपने व्यक्तित्व विकास में जी जान से जुट जाइए, अपनी खूबियों को पहचाने और उन्हें विकसित होने दें। आप की सारी बाधाएं स्वयं दूर होती चली जाएंगी।
हम अक्सर अपने प्रशंसक तलाशते हैं। अपने कार्य की उनसे प्रशंसा सुनना चाहते हैं जो उस कार्य के बारे में जानता तक नहीं। आप कल्पना कीजिए कि हमने ए बी सी डी लिखी है। अब आप उसे किस से जांच कराएंगे? निःसंदेह जिसे ए बी सी डी आती होगी। लेकिन जिसे आती ही नहीं वह भला कैसे जांच सकता है और सही और गलत का फर्क कर सकता है? अतः जिसे आपके कार्य के बारे में कुछ भी नहीं आता वह कैसे आपकी प्रशंसा कर सकता है? यदि आप का कार्य अच्छा है और एक व्यक्ति ने भी उसे पसंद किया है तो समझिए कि वह अच्छा है। श्रेष्ठ कार्य को समझने वाले अक्सर कम ही होते हैं। प्रशंसा अक्सर वे लोग करते हैं जिनकी लकीरें आपसे बहुत बड़ी हैं या जो उस कार्य क्षेत्र में नहीं हैं। अतः प्रशंसा के लोभ में अपने आपको कमजोर मत बनाइए।
आप स्वयं के बारे में चिंतन करें कि आपने अब तक क्या पाया और क्या खोया है? आप अनुभव करेंगे कि आपको 10 लोगों की नापसंदगी मिली होगी और आप निराशा में डूबे होंगे कि मेरा भविष्य क्या होगा? लेकिन तभी आपको पदोन्नति मिल जाती है। आप अपने साथियों से कहीं आगे निकल जाते हैं। यह क्या है? यह आपके कार्य का मूल्यांकन है जो जौहरी ने किया है। अतः निराश मत होइए, जहां लकीरे मिटाने वाले हाथ आपकी ओर बढ़ रहें हैं वहीं जौहरी की पारखी नजर भी आप पर लगी है। बस कार्यक्षेत्र में जुट जाइए। अपने व्यक्तित्व को कमजोर मत होने दीजिए। सिद्धांतो से व काम से समझौता नहीं। धीरे-धीरे जौहरी आपको पहचानेगा वैसे ही आप भी जौहरी को पहचान जाएंगे और अपना माल लेकर जौहरी के पास ही जांएगे। बस धैर्य रखिए, आपकी लकीर क्षितिज छू लेगी।

6 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुंदर विचार. दरअसल हमारी प्रतियोगिता अपने आप से ही है. देखना यह है की समय बीतने और अनुभव बढ़ने के साथ हम पहले से कितने बेहतर हो पाते हैं.

Tara Chandra Gupta "MEDIA GURU" said...

kafi sundar rachna. sargarbhit hai. achha laga.

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

सोचने को मजबूर करने वाली रचना है यह.
आपकी कवितायेँ "वसीयत", "पाती", "अपने देश में तुम आना" और "पूछती है इन्दर की माँ" पढीं.
प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. अगले महीने कुछ पैसे बचाकर आपकी कोई किताब खरीदने की सोच रहा हूँ.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 05/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आत्मविश्वास बढ़ाने और अपनी लकीर को पहचानने का नायब तरीका .. अच्छी पोस्ट

Navin C. Chaturvedi said...

यशवंत भाई की वजह से आज इतनी पुरानी प्रस्तुति पर पहुँचने का सुअवसर मिला। बिलकुल ठीक कहा है आपने - कर्म प्रधान विश्व कर राखा।