क्या आप कभी ऐसी समस्या में घिरे हैं, जब कोई उदण्ड या शैतान युवा आपका नजदीकी बन जाए? आप समाज के ताने सुन रहे हों लेकिन समझ नहीं आता हो कि इस परिस्थिति में क्या किया जाए? आखिर ऐसे उदण्ड बच्चे मुझ जैसे सीधे-सादे इंसान के पास ही क्यों चले आते हैं? मजे की बात यह भी है कि मुझे उनमें कोई खराबी भी दिखायी नहीं देती, जबकि लोग कितनी ही तो बुराइयां मुझे गिनाते रहते हैं। किस्मत से ऐसे युवा मेरी बात मान भी लेते हैं।
एक घटना का स्मरण हो रहा है। जब मैं आयुर्वेद कॉलेज में प्राध्यापक थी, यह घटना काफी पुरानी हो चली है। मैं फाइनल इयर के विद्यार्थियों को पढ़ाती थी। इसलिए मुझे सीनियर छात्रों से ही साबका पड़ता था। कॉलेज का एक उदण्ड छात्र जो उसी वर्ष अंतिम वर्ष में आया था ने कॉलेज के प्राचार्य के नाक में दम कर रखा था। उसका प्रतिदिन एक ही काम था कि वह प्रिंसीपल कक्ष के बाहर बैठकर प्रिंसीपल को गाली देता था और उसके घर की पोल खोलता था। कभी-कभी वह कक्ष में भी जाकर धमका आता था। इस बात की चर्चा पूरे कॉलेज में चटखारे लेकर होती थी।
एक दिन मैं भी प्राचार्य-कक्ष में थी और वो उदण्ड छात्र आ गया और उसने अच्छी खासी ऐसी की तैसी कर दी प्राचार्य की। मुझे बड़ा बुरा लगा, मैंने बाहर निकलकर स्टाफ को कहा कि यह क्या मजाक है? इस छात्र को कोई समझाता क्यों नहीं है? सभी का कहना था कि यह प्रिंसीपल ही ऐसा है। वैसे वो प्रिंसिपल ऐसा ही था, बिना रीड की हड्डी का। खैर हम भी रोज का तमाशा देखते रहे। कुछ दिनों बाद ही परीक्षाएं आ गयी और अब वो छात्र मेरे सामने था। उसने कभी कोई क्लास अटेण्ड नहीं की थी तो उसे कुछ भी नहीं आता था। बाह्य परीक्षक ने उसे जीरो नम्बर दिए और मैंने भी साइन कर दिए। अब तमाशा शुरू हुआ जब परीक्षा परिणाम आया। उस छात्र ने जयपुर स्थित विश्वविद्यालय के बाहर धरना दे दिया कि मेरा सेंटर उदयपुर के स्थान पर जयपुर कर दिया जाए। जब प्राचार्य विश्वविद्यालय गए तब उसने उनके साथ मारपीट भी की। अखबार-बाजी भी होनी ही थी। कॉलेज भर में तूफान आ गया और लोग मुझे कहने लगे कि आपने उसे फैल क्यों कर दिया? प्राचार्य भी बिगड़ने लगे कि आपने उसे फैल क्यों कर दिया? मैंने उनसे कहा कि मैंने तो आपके अपमान को देखते हुए उसका फेवर नहीं लिया और आप मुझे ही भला-बुरा कह रहे हैं!
कई दिनों बाद वह छात्र उदयपुर आया और कॉलेज के गलियारे में खड़ा हो गया। मैं अपने कक्ष से निकलकर गलियारे से होकर बाहर जाने लगी तब मुझे स्टाफ ने रोका कि मेडम आप उधर से मत जाइए। मैंने विचार किया कि यदि आज मैं डर गयी तो यह मुझे भी हमेशा डराता रहेगा। मैंने सभी के रोकने के बावजूद भी वही मार्ग चुना। गलियारे की सारी खिड़कियां बन्द हो गयी थी लेकिन सभी छिपी निगाहों से तमाशा देखने को तैयार थे। मैं आगे बढ़ी तो देखा वो छात्र भी मेरी तरफ बढ़ा। मेरे कदम डगमगाए नहीं, मैं दृढ़ता के साथ आगे बढ़ती रही। वह छात्र भी आगे बढ़ा। अब हम एक-दूसरे के आमने-सामने थे। सारे ही कॉलेज की साँसे रूकी हुई थी। लोगों को लग रहा था कि आज मेरा कुछ भी हो सकता है। लेकिन यह क्या? वह छात्र नीचे झुका और उसने मेरे पैरों को छुआ, मैंने उसे आशीर्वाद दिया और मैं आगे निकल आयी।
अब खिड़कियां खुलने लगी थी। लोगों ने उस छात्र को घेर लिया और कहा कि साले जिसने तुझे फैल किया उसके तू पैर छूता है और जिसने कुछ नहीं किया उसे तू मारता है?
वह छात्र बोला कि इसमें मेडम कि क्या गलती थी? वे तो सिद्धान्त वाली महिला हैं इसलिए उन्हें तो मुझे फैल करना ही था। मैं तो उस प्रिंसिपल के बच्चे को इसलिए धमका रहा हूँ कि उसका कर्तव्य बनता था कि वो मुझे पास कराए।
इसलिए जिस के पास सिद्धान्त हैं उसके पास ऐसे उदण्ड युवा भी चले आते हैं, वे भी सिद्धान्तों के समझ नतमस्तक होते हैं। आज हमारा दुर्भाग्य है कि समाज सिद्धान्तहीन होता जा रहा है। युवाओं के लिए आदर्श बचे नहीं है और हम युवाओं को दोष दे रहे हैं, उनसे डरकर भाग रहे हैं। आप क्या विचार रखते हैं सिद्धान्तों के लिए? क्या मुझे ऐसे उदण्ड युवाओं से दूरी बनाकर चलना चाहिए? क्या ये मेरे लिए हानिकारक हो सकते हैं? या ये मेरे कारण और उदण्ड हो सकते हैं? आपके विचारों का स्वागत है।