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Friday, February 11, 2011

उदण्‍ड युवा भी सिद्धान्‍तों का सम्‍मान करते हैं – अजित गुप्‍ता


क्‍या आप कभी ऐसी समस्‍या में घिरे हैं, जब कोई उदण्‍ड या शैतान युवा आपका नजदीकी बन जाए? आप समाज के ताने सुन रहे हों लेकिन समझ नहीं आता हो कि इस परिस्थिति में क्‍या किया जाए? आखिर ऐसे उदण्‍ड बच्‍चे मुझ जैसे सीधे-सादे इंसान के पास ही क्‍यों चले आते हैं? मजे की बात यह भी है कि मुझे उनमें कोई खराबी भी दिखायी नहीं देती, जबकि लोग कितनी ही तो बुराइयां मुझे गिनाते रहते हैं। किस्‍मत से ऐसे युवा मेरी बात मान भी लेते हैं।  
एक घटना का स्‍मरण हो रहा है। जब मैं आयुर्वेद कॉलेज में प्राध्‍यापक थी, यह घटना काफी पुरानी हो चली है। मैं फाइनल इयर के विद्यार्थियों को पढ़ाती थी। इसलिए मुझे सीनियर छात्रों से ही साबका पड़ता था। कॉलेज का एक उदण्‍ड छात्र जो उसी वर्ष अंतिम वर्ष में आया था ने कॉलेज के प्राचार्य के नाक में दम कर रखा था। उसका प्रतिदिन एक ही काम था कि वह प्रिंसीपल कक्ष के बाहर बैठकर प्रिंसीपल को गाली देता था और उसके घर की पोल खोलता था। कभी-कभी वह कक्ष में भी जाकर धमका आता था। इस बात की चर्चा पूरे कॉलेज में चटखारे लेकर होती थी।
एक दिन मैं भी प्राचार्य-कक्ष में थी और वो उदण्‍ड छात्र आ गया और उसने अच्‍छी खासी ऐसी की तैसी कर दी प्राचार्य की। मुझे बड़ा बुरा लगा, मैंने बाहर निकलकर स्‍टाफ को कहा कि यह क्‍या मजाक है? इस छात्र को कोई समझाता क्‍यों नहीं है? सभी का कहना था कि यह प्रिंसीपल ही ऐसा है। वैसे वो प्रिंसिपल ऐसा ही था, बिना रीड की हड्डी का। खैर हम भी रोज का तमाशा देखते रहे। कुछ दिनों बाद ही परीक्षाएं आ गयी और अब वो छात्र मेरे सामने था। उसने कभी कोई क्‍लास अटेण्‍ड नहीं की थी तो उसे कुछ भी नहीं आता था। बाह्य परीक्षक ने उसे जीरो नम्‍बर दिए और मैंने भी साइन कर दिए। अब तमाशा शुरू हुआ जब परीक्षा परिणाम आया। उस छात्र ने जयपुर स्थित विश्‍वविद्यालय के बाहर धरना दे दिया कि मेरा सेंटर उदयपुर के स्‍थान पर जयपुर कर दिया जाए। जब प्राचार्य विश्‍वविद्यालय गए तब उसने उनके साथ मारपीट भी की। अखबार-बाजी भी होनी ही थी। कॉलेज भर में तूफान आ गया और लोग मुझे कहने लगे कि आपने उसे फैल क्‍यों कर दिया? प्राचार्य भी बिगड़ने लगे कि आपने उसे फैल क्‍यों कर दिया? मैंने उनसे कहा कि मैंने तो आपके अपमान को देखते हुए उसका फेवर नहीं लिया और आप मुझे ही भला-बुरा कह रहे हैं!
कई दिनों बाद वह छात्र उदयपुर आया और कॉलेज के गलियारे में खड़ा हो गया। मैं अपने कक्ष से निकलकर गलियारे से होकर बाहर जाने लगी तब मुझे स्‍टाफ ने रोका कि मेडम आप उधर से मत जाइए। मैंने विचार किया कि यदि आज मैं डर गयी तो यह मुझे भी हमेशा डराता रहेगा। मैंने सभी के रोकने के बावजूद भी वही मार्ग चुना। गलियारे की सारी खिड़कियां बन्‍द हो गयी थी लेकिन सभी छिपी निगाहों से तमाशा देखने को तैयार थे। मैं आगे बढ़ी तो देखा वो छात्र भी मेरी तरफ बढ़ा। मेरे कदम डगमगाए नहीं, मैं दृढ़ता के साथ आगे बढ़ती रही। वह छात्र भी आगे बढ़ा। अब हम एक-दूसरे के आमने-सामने थे। सारे ही कॉलेज की साँसे रूकी हुई थी। लोगों को  लग रहा था कि आज मेरा कुछ भी हो सकता है। लेकिन यह क्‍या? वह छात्र नीचे झुका और उसने मेरे पैरों को छुआ, मैंने उसे आशीर्वाद दिया और मैं आगे निकल आयी।
अब खिड़कियां खुलने लगी थी। लोगों ने उस छात्र को घेर लिया और कहा कि साले जिसने तुझे फैल किया उसके तू पैर छूता है और जिसने कुछ नहीं किया उसे तू मारता है?
वह छात्र बोला कि इसमें मेडम कि क्‍या गलती थी? वे तो सिद्धान्‍त वाली महिला हैं इसलिए उन्‍हें तो मुझे फैल करना ही था। मैं तो उस प्रिंसिपल के बच्‍चे को इसलिए धमका रहा हूँ कि उसका कर्तव्‍य बनता था कि वो मुझे पास कराए।
इसलिए जिस के पास सिद्धान्‍त हैं उसके पास ऐसे उदण्‍ड युवा भी चले आते हैं, वे भी सिद्धान्‍तों के समझ नतमस्‍तक होते हैं। आज हमारा दुर्भाग्‍य है कि समाज सिद्धान्‍तहीन होता जा रहा है। युवाओं के लिए आदर्श बचे नहीं है और हम युवाओं को दोष दे रहे हैं, उनसे डरकर भाग रहे हैं। आप क्‍या विचार रखते हैं सिद्धान्‍तों के लिए? क्‍या मुझे ऐसे उदण्‍ड युवाओं से दूरी बनाकर चलना चाहिए? क्‍या ये मेरे लिए हानिकारक हो सकते हैं? या ये मेरे कारण और उदण्‍ड हो सकते हैं? आपके विचारों का स्‍वागत है। 

Wednesday, February 9, 2011

युवा पीढ़ी का अनूठा बदलाव - अजित गुप्‍ता


अपनी बात को यदि उदाहरण देकर प्रारम्‍भ करूं तो पूरी पोस्‍ट उदाहरण से ही भर जाएंगी लेकिन उदाहरण कम नहीं होंगे। कल तक बैठकखाने में सीमित पुरुष आज रसोईघर में दखल रखता है, कल तक बच्‍चों के साथ केवल खेलने वाला पुरुष आज उनके डायपर भी चेंज करता है। कल तक हम पीड़ित थे कि विवाह के पूर्व माँ के आगे-पीछे घूमने वाला पुत्र, अचानक विवाह होते ही शेर कैसे बन जाता है और पत्‍नी को आगे-पीछे घुमाने में ही अपना पुरुषत्‍व क्‍यों समझने लगता है? लेकिन आज स्थितियां बदल गयी हैं। कार्यविभाजन समाप्‍त प्राय: सा हो गया है। नयी पीढ़ी बदलाव की अंगड़ाई ले रही है। अभी यह बदलाव उच्‍च शिक्षित युवा में दिखायी देने लगा है लेकिन इस बदलाव की आँधी का वेग तीव्र है और यह मध्‍यमवर्गीय युवा तक जा पहुंचा हैं। आज की युवा पीढ़ी के लिए न जाने कितनी आलोचनाएं हमारे मन में हैं लेकिन उनकी प्रशंसा के लिए हमारे पास ना तो दृष्टि है और ना ही मन। हो सकता है कि आप भी मेरी इस बात से सहमत नहीं हों, लेकिन मुझे तो बदलाव की क्रान्ति दिखायी दे रही है इसीलिए मैं आज युवापीढ़ी को नमन करती हूँ।
पिता की भूमिका में आज का युवा पूर्णतया उत्तरदायी है, वह सारे ही उन कार्यों का सम्‍पादन करता है जो कल तक केवल माँ के हिस्‍से थे। बच्‍चे के डायपर बदलना, नहलाना, खाना खिलाना, सुलाना सभी कार्य तो आज के युवा कर रहे हैं। कल तक इसी सामाजिक बदलाव के लिए हम तरस रहे थे और आज यह बदलाव कब दबे पाँव हमारे घरों में आ गया हमें पता नहीं नहीं चला! निश्चित रूप से यह बदलाव पश्चिम से आया है, वहाँ कार्य विभाजन समाप्‍त प्राय: सा ही है। जब मैंने अपने परिवार में ही नजदीकी रिश्‍तों में यह बदलाव देखा था तो कुछ अजीब सा लगा, क्‍योंकि हमारा मन पूर्वाग्रहों से ग्रसित है और हमने कार्य के बारे में एक रेखा खेंच दी है। यदि किसी पुरुष को डायपर बदलते देखते हैं तो अजीब सा लगता है। लेकिन अब जब यह स्थिति सार्वजनिक हो गयी है तब अच्‍छा सा लग रहा है।
आज समय की यही मांग है कि हम इस कार्यविभाजन को समाप्‍त कर दें। अभी कुछ दिन पूर्व एक महिला साहित्‍यकार सम्‍मेलन में जाना हुआ। वहाँ एक महिला ने प्रश्‍न दाग दिया कि कौन इस बात पर गर्व कर सकता है कि हमने अपने बेटे को इस योग्‍य बनाया है कि वह अपनी पत्‍नी को बहुत अच्‍छी तरह से रखेगा? मैंने तुरन्‍त अपना हाथ खड़ा कर दिया। उसका कारण भी था कि  मेरा बेटा, अपने चार वर्षीय बेटे को बखूबी रख रहा है। क्‍योंकि मेरी बहु पहले पढ़ाई में और अब नौकरी के कारण ज्‍यादा समय नहीं निकाल पाती और उसे सप्‍ताह में पाँच दिन अलग रहना पड़ता है। मुझे उस पर गर्व होता है कि वह अपने कर्तव्‍य को बखूबी निभा रहा है। लेकिन यहाँ बात केवल मेरे बेटे की नहीं है, मैं सारे ही बेटों को देख रही हूँ कि वे सारे ही कार्यों में अपना हाथ बंटा रहे हैं। हो सकता है अभी यह प्रतिशत कुछ कम हो, लेकिन धीरे-धीरे बदलाव की यह आँधी सुखद होगी, मैं यही विश्‍वास करती हूँ। अपनी पत्‍नी के प्रति जिस निष्‍ठा के साथ आज का युवा जुड़ा है वह प्रशंसा के योग्‍य है। दोनों की आपसी समझ में बढोत्तरी हुई है, उनमें दोस्‍ती का भाव आया है। वे एक दूसरे की कठिनाइयों को समझने लगे हैं। आपने भी इस बदलाव की आंधी का साक्षात्‍कार किया हो तो बताएं। मैं यह जानती हूँ कि अभी परिवर्तन छोटा है लेकिन है तो!