इस पोस्ट को लिखने की प्रेरणा आज सुबह हुई, जब हमारे घर की विद्युत व्वस्था को देखने वाला मेकेनिक “अहमद” सुबह हमारे घर की घण्टी को दुरस्त करने के लिए आया। टेबल पर मेरी कल ही प्रकाशित होकर आयी नयी पुस्तक लघु-कथा संग्रह पड़ी थी। उसने पुस्तक को देखा और बोला कि एक किताब मुझे भी चाहिए। मैंने अभी तक किसी को भी यह पुस्तक नहीं दी थी लेकिन उसे कहा कि अवश्य ले जाना।
तभी मुझे एक और वाकये का स्मरण आ गया, जब मैं एक टेक्सी लेकर कहीं गयी थी और मेरी एक पुस्तक जो काव्य-संग्रह थी, टेक्सी में रखी हुई थी। मैं जब कार्यक्रम में गयी तब पीछे से उसे ड्राइवर ने पढना शुरू किया और मेरे वापस आने पर उसने कहा कि आपकी यह पुस्तक मुझे चाहिए। मैंने उसे दी। तब भी मेरे दिमाग ने यह प्रश्न किया था कि एक ड्राइवर को किताब देना कितना उचित है और आज भी यही हुआ लेकिन उसका उत्तर तब भी दिल ने दिया था और आज भी दिल ने ही दिया। और मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हम अपनी पुस्तकें किस को भेंट करें और किसे नहीं? मेरे पास भेंट स्वरूप आयी हुई इतनी पुस्तकें हैं कि मेरे घर की समस्त अल्मारियां उनसे अटी पड़ी हैं, रखने को जगह नहीं हैं। मैं उन सबको पढ़ भी नहीं सकती, जैसे हम सारी ही पोस्टों को नहीं पढ़ सकते। लेकिन जो निम्न आय वर्ग का तबका है जिसे पढने के प्रति रुचि है हम उसे अपनी पुस्तकें नहीं देते। यदि हम ऐसे व्यक्तियों को अपनी पुस्तकें पढ़ने को दें जो वास्तव में उनके पाठक बन सकते हैं तो हमारी पुस्तकों का मूल्यांकन भली-भांति होगा। समाज हमारे बारे में जानेगा।
मैं अभी ग्वालियर एक मीटिंग में गयी थी, मैं अपने साथ चार पुस्तकें भी ले गयी थी। उस मीटिंग में लगभग 100 से अधिक राष्ट्रीय स्तर की महिलाएं थी, मैं अपनी पुस्तक सभी को नहीं दे सकती थी क्योंकि मेरे पास कुल चार थीं। मैं अनुमान लगाने लगी कि इनमें से ऐसा कौन है जो वास्तव में मेरी पुस्तक को पढ़ेगा और उसका मूल्यांकन करेगा? मैंने एक पुस्तक हम सबमें वरिष्ठ और विचारवान विदुषी को दी, वो भी इसलिए कि मुझे मालूम था कि मेरी पहली पुस्तक को भी इन्होंने बड़े मनोयोग से पढ़ा था। वहाँ पास में ही एक राजनैतिक विदुषी महिला भी बैठी थीं, मैंने उन्हें पुस्तक नहीं दी। उन्हें कुछ अजीब सा लगा, क्योंकि लोग तो राजनीतिज्ञों को अपनी पुस्तक भेंट करने में अपनी शान समझते हैं। उन्होंने प्रकरान्तर में यह बता भी दिया कि मैं साहित्यिक रुचि की हूँ। मैं उन्हें पुस्तक दे भी सकती थी लेकिन मुझे पता था कि ये अपनी राजनैतिक व्यस्तताओं में पुस्तक को नहीं पढ़ेगी। खैर मेरा यह लिखने का अर्थ केवल इतना है कि हम अपनी पुस्तकों को उन्हीं हाथों में सौंपे जहाँ उनका सम्मान हो। बहुत बड़े व्यक्तित्वों के पास इतना समय नहीं होता है कि वे आपकी पुस्तक को पढ़े। लेकिन आज निम्न मध्य वर्ग ऐसा वर्ग है जिसे साहित्य में गहरी रुचि है लेकिन वे पुस्तके खरीद नहीं सकते और ना ही पुस्तकालय में जाकर पढ़ सकते हैं। यदि हमने अपनी पुस्तके उन्हें भेंट की तो निश्चय मानिए कि वे उसे ना केवल पढ़ेंगे अपितु आपके विचारों को जीवन में उतारने का भी प्रयास करेंगे। क्योंकि जब-जब मैंने अपनी पुस्तक ऐसी जगह दी है तो उन्होंने बेहद खुशी व्यक्त की है और जब भी ऐसी जगह दी हैं जहाँ मेरे विचार या मेरी पुस्तक की आवश्यकता ही नहीं है वहाँ वो ना जाने कौन सी गुमनाम अल्मारी में रखी गयी है? इसलिए मैं तो इस तथ्य को भली-भांति समझ गयी हूँ। मेरा अनुभव यदि आपके भी काम आए और आप भी ऐसे ही किसी अनुभव से मुझे परिचित करा सकें तो इस पोस्ट की सार्थकता होगी।