वर्धा का नाम आते ही महात्मा गाँधी और विनोबा भावे का स्मरण होने लगता है। यह पावन भूमि दोनों ही महापुरुषों की कर्मभूमि रही है। इसी कारण महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा में ब्लोगिंग पर कार्यशाला का निमंत्रण एक सुखद बात थी। साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्मेलन, सेमिनार और कार्यशालाएं नित्य प्रति होती हैं लेकिन ब्लागिंग के क्षेत्र में विधिवत कार्यशालाओं का प्रारम्भ करने का श्रेय श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी को जाता है। अभी हम जैसे कई लोग जो ब्लागिंग के क्षेत्र से नए जुड़े हैं, समझ नहीं पाए हैं, ब्लागिंग और ब्लागर की मानसिकता। कभी एक परिवार सा लगने लगता है तो कभी एकदम ही आभासी दुनिया मात्र। मेरे जैसा व्यक्ति जो नदी में डूबकर नहीं चलता बल्कि किनारे ही अपनी धुन में चलता है, के लिए एक नवीन अनुभव था।
वर्धा पहुंचने पर त्रिपाठी जी ने विश्वविद्यालय के बारे में बताया कि यह लगभग 300 एकड़ क्षेत्रफल में विस्तार लिए है और इसकी खूबसूरती इसकी पांच पहाडियों में हैं। वर्धा बेहद खूबसूरत और सादगी भरा शहर लगा। गाँधी जी की कुटिया देखना ऐसा अनुभव था जैसे हम भी उस ऐतिहासिक युग का हिस्सा बन गए हों। मैं जब रेल से वर्धा जा रही थी तो बजाज कम्पनी का एक पूर्व अधिकारी मेरे साथ ही यात्रा कर रहे थे, उन्होंने मुझे बताया कि किस प्रकार बजाज परिवार आज भी वर्ष में एक बार वर्धा जाते हैं और उसी सादगी के साथ रहते हुए सारी योजनाओं पर विचार होता है। विनोबा जी की पावन स्थली जो पवनार नदी के किनारे बसी है, एक अभूतपूर्व आनन्द देती है। हमने इन दोनों महापुरुषों को नहीं देखा लेकिन वहाँ जाने पर इतिहास को अपने साथ खड़े हुए पाया। मुझे वर्धा में सबसे अधिक खुशी तब हुई जब मैंने गाँधीजी के निजि सचिव महादेव भाई के नाम पर बना एक भवन देखा। गाँधीजी के बारे में पढ़ते हुए महादेव भाई सर्वाधिक प्रभावित करते रहे हैं, लेकिन देश उनके कृतित्व का स्मरण नहीं करता। यहाँ आने पर उन्हें नमन करने का मन हो आया।
जैसा मैंने लिखा है कि ब्लागिंग का क्षेत्र अभी नवीन है और इसकी नब्ज कहाँ से संचालित है इसका किसी को इल्म नहीं है, ना ही यह समझ है कि आखिर हम लिख क्या रहे हैं? सब बस अपनी समझ और अपनी धुन में लिखे जा रहे हैं। यहाँ बात आचार-संहिता की करनी थी, लेकिन सभी ने किसी भी व्यावहारिक या सैद्धान्तिक प्रतिबन्धों को नकार दिया। लेकिन हमारे नकारने से तो दुनिया चलती नहीं कि हमने कह दिया कि बिल्ली मुझे नहीं देख रही और हम कबूतर की तरह आँख बन्द कर बैठ जाएंगे। बिल्ली तो आ चुकी है, सायबर कानून भी बन चुके हैं और हम मनमानी के दौर से कहीं दूर जिम्मेदारी के दौर तक आ पहुंचे हैं। वो बात अलग है कि हमें अभी पता ही नहीं कि कानून का शिकंजा हम पर कस चुका है। बस अभी सुविधा यह है कि हमारी पुलिस इस कानून के बारे में ज्यादा कुछ जानती नहीं। श्री पवन दुग्गल जी ने सायबर कानूनों के बारे में बताया तो पुलिस की कार्यवाही के बारे में कुछ मजेदार तथ्य भी बताए। यहाँ तो घटनाओं का उल्लेख कर रही हूँ जो दुग्गल जी ने बतायी थी -
1- अश्लीलता को परोस रही एक दुकान पर छापा मारा गया और वहाँ से 17 कम्प्यूटर बरामद किए गए। पुलिस वाले इसे अपनी बहुत बड़ी जीत मान रहे थे। लेकिन उन्हें धक्का जब लगा कि न्यायालय ने जब उनसे कम्प्यूटर मांगा। असल में वे सब मोनीटर उठा लाए थे और सीपीयू वहीं छोड़ आए थे।
2- इसी प्रकार एक जगह से पुलिस ने कुछ सीडी बरामद की। अब देखिए हमारी पुलिस। उन्होंने बड़े प्रेम से छेद करके उन सीडियों को फाइल कर दिया।
हमारी पुलिस अभी अज्ञानी है लेकिन कुछ ही दिनों में उसे भी कम्प्यूटर का ज्ञान हो जाएगा तब इस ब्लाग जगत पर प्रसारित अश्लीलता को कानून से नहीं बंचा पाएंगे।
कार्यशाला पर कई दृष्टिकोणों से लिखा गया, इसलिए उन सारी बातों को दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। मुझे दुख रहा कि मैं समापन सत्र में वहाँ उपस्थित नहीं रह पायी। मुझे नागपुर में एक अन्य कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी थी। लेकिन फिर भी वहाँ आए सभी लोगों को जानने और समझने का अवसर मिला। ब्लागिंग का मिजाज क्या है, कुछ-कुछ समझ भी पायी। यहाँ कुछ लोगों के लिए अवश्य लिखने का मन हो रहा है, लेकिन पोस्ट लम्बी ना हो जाए उसका डर है। लेकिन अभी तो पहली बार मिले हैं, इस सफर में न जाने कितनी बार आमने-सामने होंगे तब शायद हम जैसे अपनी धुन में चलने वाले लोग भी यहाँ के रंग-ढंगों से परिचित हो जाएं।
अन्त में धन्यवाद देना चाहती हूँ त्रिपाठी जी का, जिनके सौहार्द के कारण मेरी नवीन पुस्तक – प्रेम का पाठ – लघु कथा संग्रह का वहाँ विमोचन हो सका। जिन लोगों ने मुझे प्रभावित किया मैं उनके बारे में एक अलग पोस्ट लिखने का प्रयास करूंगी क्योंकि वह एक अलग अनुभव है। बस अन्त में यही कहना चाहूंगी कि ऐसे आयोजन प्रारम्भ हैं हमें भी अपने स्तर पर अकादमियों, विश्वविद्यालयों आदि के संसाधनों के माध्यम से इस पहल को निरन्तर रखना चाहिए जिससे हमारा लेखन सार्थक दिशा में कदम रख सके। साहित्यिक संस्थाओं के समान ही ब्लागिंग की संस्थाएं बनाकर इन आयोजनों को करने की पहल करनी चाहिए। अभी छाछ को बिलौना बाकी है, बस बिलोते रहिए, मक्खन निकल आएगा और तब छाछ भी अमृतमयी बन जाएगी और मक्खन भी। आपने यहाँ तक पढ़ लिया, आपका आभार।