उदयपुर का सबसे पुराना बाग है यह गुलाब-बाग। यहाँ जो बिल्डिंग दिखायी दे रही है वह सरस्वती पुस्तकालय की है। यहाँ एक जू भी है और बच्चों के लिए एक रेलगाड़ी भी चलती है। यह एक अन्य पार्क है जिसे माणिक्य लाल वर्मा गार्डन कहते हैं। पास में ही दूध-तलाई है और इसी के एक पहाड़ी पर है दीनदयाल पार्क। यहाँ पर म्यूजिकल फाउण्टेन है और रोप-वे भी है जो दूसरी पहाड़ी पर स्थित करणीमाता मन्दिर तक जाता हैं। यहाँ से पूरे उदयपुर को देखा जा सकता है।
उदयपुर में एक सांस्कृतिक केन्द्र भी है जहाँ दिसम्बर में शिल्प ग्राम मेले के नाम से दस दिवसीय मेला भरता है। उसी मेले में कठपुतलियों का प्रदर्शन।
उदयपुर से 100 किमी की दूरी पर एक ऐतिहासिक जैन मन्दिर है – राणकपुर। इसकी भव्यता यहाँ आकर ही देखी जा सकती है क्योंकि अन्दर के चित्र लेना मना है।
हमारे घर से होकर जा रहा है रास्ता सज्जन गढ़ का। आप पैदल भी जा सकते हैं और गाड़ी से भी। मेरे पतिदेव सुबह-सुबह पैदल ही चढ़ गए इस चढ़ाई पर। अब बताइए कैसा लगा उदयपुर का छोटा सा भ्रमण। अभी केवल यह समुद्र की एक बूंद है। आप लोग आएं तब जानेंगे कि उदयपुर क्या है? यहाँ का इतिहास और शौर्य की गाथाओं से यह क्षेत्र पटा पड़ा है। उसे एक पोस्ट में नहीं लिखा जा सकता, बस एक झांकी है।


