Showing posts with label मेरा मन. Show all posts
Showing posts with label मेरा मन. Show all posts

Friday, June 3, 2011

सुकून आता जाएगा - अजित गुप्‍ता


वर्तमान में हम सब प्रेम के लिए तरस उठते हैं, सारे सुख-सुविधाएं एक तरफ हो जाती हैं और प्रेम का पलड़ा दूसरी तरफ हमें बौना सिद्ध करने पर तुला रहता है। कुछ दिन पूर्व एक आलेख लिखा था, आज उसका स्‍मरण हो आया। कारण भी था कि कुछ पोस्‍ट ऐसी पढ़ी जिसमें उहापोह था, शायद मेरे मन में भी था, इसलिए वे पोस्‍टे मन को छू गयी और सोच में डाल गयी कि क्‍यों इंसान सब कुछ पाने के बाद भी प्रेम से वंचित क्‍यों रह जाता है? इस वंचना से बचने का भी कोई उपाय है क्‍या? अधिक भूमिका नहीं बांधते हुए सीधे ही आलेख पढ़ा देती हूँ।
सुकून आता जाएगा

      कई दिनों से मन में एक उद्वेग उथल पुथल मचा रहा है, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि क्या है? तभी डॉक्टर पति के पास एक बीमार आया, उसे फूड पोइजनिंग हो गयी थी और वह लगातार उल्टियां कर रहा था। मुझे मेरी उथल पुथल भी समझ आ गयी। दिन रात मनुष्यता को समाप्त करने वाला जहर हम पीते हैं, शरीर और मन थोड़ा तो पचा लेता है लेकिन मात्रा अधिक होने पर फूड पोइजनिंग की तरह ही बाहर आने को बेचैन हो जाता है। मन से निकलने को बेचैन हो जाता है यह जहर। कुछ लोग गुस्सा करके इसे बाहर निकालते हैं, कुछ लोग झूठी हँसी हँसकर बाहर निकालने का प्रयास करते हैं और हम स्याही से खिलवाड़ करने वाले लोग स्याही को बिखेर कर अपनी उथल-पुथल को शान्त करते हैं। बच्चा जब अपने शब्द ढूंढ नहीं पाता तब वह स्याही की दवात ही उंडेल देता है। शब्द भी पेड़ों से झरे फूलों की तरह होते हैं, वे झरते हैं और सिमट कर एक कोने में एकत्र हो जाते हैं। अच्छा मकान मालिक उन्हें झोली में भरता है और अपने घर में सजा लेता है। लेखक भी शब्दों को अपनी स्याही के सहारे पुस्तकों में सजा देता है। जैसे ही कमरे में फूलों का गुलदस्ता सजा दिया जाता है स्वतः ही वातावरण सुगंधित हो जाता है। वहाँ फैली घुटन, सीलन झट से बाहर भाग जाती है। ऐसे ही जब हम शब्दों को मन में सजाते हैं उन्हें कोरे पन्नों में उतारते हैं तब मन की घुटन और ऊब पता नहीं कहां तिरोहित हो जाती हैं। जीवन फिर खिल उठता है।
      आज एक कसक फिर उभर आयी। बचपन से ही मेरे पीछे पड़ी है, कभी भी छलांग लगाकर मेरे वजूद पर हावी हो जाती है। मैं नियति का देय मानकर सब कुछ स्वीकार कर चुकी हूँ लेकिन फिर भी यह कसक मेरे अंदर अमीबा की तरह अपनी जड़े जमाए बैठी है। जैसे ही अनुकूल वातावरण मिलता है यह भी अमीबा की तरह वापस सक्रिय हो जाती है। आदमी सपनों के सहारे जिंदगी निकाल देता है। बचपन में जब नन्हें हाथ प्रेमिल स्पर्श को ढूंढते थे तब एक सपना जन्म लेता था। हम बड़े होंगे अपनी दुनिया खुद बसाएंगे और फिर प्रेम नाम की ऑॅक्सीजन का हम निर्यात करेंगे। जिससे कोई भी रिश्ते में उत्पन्न हो रही कार्बन-डाय-आक्साइड का शिकार ना हो जाए। लेकिन यह कारखाना लगाना इतना आसान नहीं रहा। हवा इतनी दूषित हो चली थी कि आक्सीजन का निर्यात तो दूर स्वयं के लिए भी कम पड़ती थी। जैसे तैसे करके काम चलाते रहे। बच्चे बड़े होने लगे, तब फिर सपना देख लिया। सपने में देखने लगे कि अब तो प्राण वायु का पेड़ बड़ा होगा और हमें भरपूर वायु मिलेंगी। लेकिन क्या? हमने पेड़ बोना चाहा लेकिन बच्चे पंछी बन गए। वे हमारे पेड़ से उड़कर बर्फ की धवल चोटी पर बैठ गए। जहाँ उष्मा नहीं थी, थी केवल ठण्डक। हम फिर आक्सीजन के अभाव में तड़फड़ाने लगे। अब तो सपने भी साथ छोड़ने को आमादा हो गए। वे बोले कि तुम जिंदगी भर हमारा सहारा लेते रहे, तुमने सच करके कुछ भी नहीं दिखाया। हम भला तुम्हारा साथ कब तक देंगे? और एक दिन उन्होंने बहुत ही रुक्षता के साथ हम से कह दिया कि नहीं अब नहीं होगा, बाबा हमारा पीछा छोड़ो।
      हमने भी जिद ठान ली कि देखें सपने कैसे नहीं आते? लेकिन सपनों ने नींद से दोस्ती कर ली। वे बोले सपने तभी देखोंगे ना, जब नींद आएगी? हम नींद को भी अपने साथ ले जाते हैं। हम फिर भी हताश नहीं हुए। हमने कहा कि कोई बात नहीं हम खुली आँखों से सपना देखेंगे। लेकिन इतना सुनते ही सपने फिर हँस दिए, वे बोले कि दिन में जब भी खुली आँखों से सपना देखने की कोशिश करोगे तो नींद झपकी बनकर उसे तोड़ देगी। अब तुम उस संन्यासी की तरह हो जिस का तप भंग करने के लिए अप्सरा जरूर आएगी। अतः भूल जाओ सपने और कठोर धरातल पर जीना सीखो। यहाँ रिश्तों में जहरीली हवा ज्यादा है और प्रेम की ताजगी से भरी प्राण वायु कम है। तुम ने जिस प्राण वायु का कारखाना लगाना चाहा था वह भी तुम्हारे लिए नहीं रहा। तुम्हें तो उसी जद्दो-जहेद में अपनी जिंदगी निकालनी है। यदि हिम्मत को बटोर सको तो फिर जुट जाओ। लेकिन इस बार ध्यान रखना कि सपनों की दुनिया बसाने का अब समय नहीं है, जो भी करना है ठोस धरातल पर खुली आँखों के सहारे करना है। रोज ही पीना है जहर और जब भी आत्मसात ना हो तब शब्दों के सहारे उन्हें उलट देना है। तुम्हारी बगियां की प्राण वायु शायद तुम्हारें लिए ना हो लेकिन उठो और खोजों शायद कहीं किसी की बगियां में थोड़ी प्राण वायु तुम्हारे लिए हो। विवेकानन्द की तरह हिम्मत मत हारो, जब तक प्रयत्न करते रहो जब तक कि मंजिल ना मिल जाए। बस शब्दों की निर्झरनी को बहाते रहो और अपने आप सुकून आता जाएगा, आता जाएगा बस आता जाएगा।

Saturday, May 7, 2011

मन से पंगा कैसे लूँ, यह अपनी ही चलाता है - अजित गुप्‍ता


यह मन भी क्‍या चीज है, न जाने किस धातु का बना है? लाख साधो, सधता ही नहीं। कभी लगता है कि नहीं हमारा मन हमारे कहने में हैं लेकिन फिर छिटककर दूर जा बैठता है। अपने आप में मनमौजी होता है “मन”। ना यह हमारी परवाह करता है और ना ही हम इसकी परवाह करते हैं। जीवन के घेरे में ना जाने कितनी बार मन को परे धकेल देते हैं! इस मन की कीमत हम कभी नहीं लगा पाते। नौकरी और व्‍यापार से कमाए धन की गणना हम खूब कर लेते हैं, लेकिन मन की खुशियों की कीमत का हम आकलन कर ही नहीं पाते। एक फकीर से पूछ बैठते हैं कि तुम फकीर क्‍यों हो? साधनों का अभाव खटकता नहीं है? लेकिन उसके मन की पूँजी जो उसके पास है उसकी गणना कोई नहीं कर पाता। उसे दुनियादारी से वंचित व्‍यक्ति मान लिया जाता है। जो तन के सुख के लिए लाखों कमाए, बस उसी की गणना होती है लेकिन जो मन के सुख के लिए लाखों गँवा दे उसे तो कभी गणना के लायक भी नहीं मानते।
लेकिन यदि इसी की सुनो तो दुनियादारी ऐसी छूटती है कि आप चारों तरफ से विरोध से घिर जाते हो। सुबह उठे, अभी चाय बनाने रसोई में घुसे ही थे कि इस मन ने न जाने कब का भूला-बिसरा गाना जुबान पर ला दिया और बस सारा दिन वही टेप चलता रहा। इन्‍टरनेट खोला तो बस उसी गाने के इर्द‍-गिर्द घूमता रहा मन। बड़ी अच्‍छी-अच्‍छी पोस्‍ट लगी हैं, ना जाने कितने विषयों पर लोगों ने लिखा है लेकिन आज तो आपका मन उसी गाने के चारों तरफ घूम रहा है तो बस उसे उसी के अनुरूप पोस्‍ट चाहिए और कुछ नहीं। ढूंढ मच गयी, सारी श्रेष्‍ठ पोस्‍ट रिजेक्‍ट हो गयी, बस जो मन को जँची उसी को पढ़ा गया। लेकिन इस मन के चक्‍कर में दुनियादारी पीछे छूट गयी। न जाने कितने लोग नाराज हो गए। हमने इतने अच्‍छे विषय पर पोस्‍ट लिखी लेकिन फला व्‍यक्ति ने पढ़ी ही नहीं, जरूर कोई नाराजी है। बस इस मन ने करा दिया लोगों को नाराज।
कभी इस मन का मन होता है कि गद्य पढे तो कभी मन होता है पद्य पढे। कभी मन होता है कि परिवार से सम्‍बंधित कोई बात पढे तो कभी मन होता है कि देश से सम्‍बंधी कोई पोस्‍ट पढे। कहने का तात्‍पर्य यह कि गलती यह करे और सजा मिले व्‍यक्ति को। लेकिन कुछ लोग हैं जो दुनियादारी खूब निभाते हैं और इस मन को परे धकेल कर रखते हैं। अब आप ही बताइए कि मन को परे धकेलकर केवल दुनियादारी ही निभानी चाहिए या फिर मन की सुननी चाहिए। मैं कई दिनों से उहापोह में हूँ। इस मन ने मेरी ऐसी की तैसी कर रखी है। लोग मुझसे नाराज होते जा रहे हैं और यह पठ्ठा मजे में है। लोग कह रहे हैं कि आप हमारे घर नहीं आते, ब्‍लाग पर लोग कह रहे हैं कि आप हमारी पोस्‍ट नहीं पढ़ते। सामाजिकता क्‍या होती है, इसने भुला दिया है। हमारा नाम भी लोगों की सूची से कटता जा रहा है।
मुझे एक घटना याद आ रही है, जब मैं कॉलेज में थी। एक बदमाश टाइप के छात्र ने विवाह कर लिया, बाहर कितना ही शेर बने लेकिन पत्‍नी के आगे गीदड़ जैसा। जब ज्‍यादा परेशान हो गया तो मुझे बुलाने आया, बोला कि मेडम एक बार मेरे घर चलो, मेरी पत्‍नी को देख लो। मैंने टालमटोल की लेकिन वो माना नहीं तो अपने राम भी चल दिए। मनोवैज्ञानिक समस्‍या थी, उसे समझाया और वापस आ गए। लेकिन कॉलेज में चर्चा का विषय बन गए कि ये बदमाशों के घर जा आती हैं। अब उन्‍हें कैसे समझाऊँ कि भाई मेरा उससे कोई लेना-देना नहीं, बस मानवता और चिकित्‍सक होने के नाते ही गयी थी। यहाँ ब्‍लाग-जगत में भी ऐसा ही है। आपके ब्‍लाग पर कौन आता है और आप किसके ब्‍लाग पर जा आते हैं, वह चर्चा का विषय बन जाता है। आप लोगों के साथ होता हो या नहीं लेकिन मेरे साथ तो बड़ा होता है। लोग लठ्ठ लेकर पीछे पड़ जाते हैं कि तुम्‍हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। कभी-कभी लगता है कि मैं कुछ खास हूँ क्‍या? जो मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। लोग कहने लगते हैं कि आप ऐसे लोगों से बात करें यह शोभा नहीं देता। अब मैं क्‍या करूँ? यह मन ऐसा है कि दूसरों के सामने बड़ी समझदारी और अपनेपन से बात करने लग जाता है तो कुछ लोग कहते हैं कि नहीं हमें आपकी मित्रता चाहिए। एक बार ऐसा ही हुआ, एक बहुत बड़े व्‍यक्ति आ गए, मन से कुछ असंयमित थे। हमारा मन बोला कि बेचारे दुखी हैं तो यहाँ सकून ढूंढ रहे हैं तो कुछ देर बात करने में क्‍या जाता है? हद तो तब हो गयी जब रक्षा-बंधन के दिन आ टपके। सारा घर मुझ पर हँस रहा और मैं दीवार कूदकर पड़ोसी के घर। लेकिन दुनिया आजतक मुझे चिढ़ाती है। अब इसका ईलाज है आप लोगों के पास?  
अब यह पोस्‍ट भी यह मन ही लिखा रहा है, मैंने कहाँ से शुरू की थी और कहाँ समाप्‍त होगी मुझे नहीं मालूम। इस मन से परेशान होकर ही इस ब्‍लाग-जगत में आयी थी कि यहाँ अपने मन की करने की पूरी छूट होगी। कोई टोका-टोकी नहीं होगी। लेकिन यहाँ भी पूरी दुनियादारी निकली। कभी कोई नाराज तो कभी कोई राजी। ऐसा भी नहीं है कि मेरे से ही लोग नाराज होते हैं, मेरा मन भी लोगों से दूर भाग जाता है। कई बार मैंने अनुभव किया है कि यह बड़ा डरपोक भी है। किसी ने कुछ ऊँचा-नीचा कह दिया तो अपनी चादर समेटने में देर ही नहीं करता। कहता है कि दुनिया में पत्‍थरबाजी क्‍या कम है जो यहाँ भी झेलने चले आए। जो बिना बात ही तुमपर पत्‍थर मार रहे हों, उनसे दूर ही रहो ना। यह समझो कि तुम्‍हारे और उनके गण नहीं मिलते बस। इसलिए आज इस पोस्‍ट के माध्‍यम से बस यही कहना चाह रही हूँ कि मुझे मेरा मन जहाँ ले जाता है बस उसी के इशारे पर चले जाती हूँ। जो पोस्‍ट पढ़ने को कहता है, बस उसे ही पढ़ती हूँ। आप लोग मुझसे नाराज ना हो, क्‍योंकि मैं किसी से नाराज नहीं हूँ। बस पत्‍थरबाजी से डरती हूँ, मेरी गलती हो तो प्रेम से बता दें कि आप यहाँ गलत हैं, मैं मान लूंगी। लेकिन यह कभी ना सोचे कि मैं किसी नाराजी के कारण आपकी पोस्‍ट पर नहीं आ रही हूँ। आपने यदि अपने मन को साध रखा है और दुनियादारी के अनुसार चलते हैं तो आपको मैं महान मानती हूँ लेकिन मैं अपने मन को साध नहीं पाती हूँ, बस इसके कहने में ही रहती हूँ। मेरा मानना है कि मन की मानो तो बात लाखों की है और ना मानो तो फिर खाक की है। अन्‍त में एक प्रश्‍न क्‍या आप भी मन की बात सुनते हैं या फिर दुनियादारी को महत्‍व देते हैं? इस पोस्‍ट को पढ़कर भी मुझसे नाराज रहेंगे?