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Wednesday, December 7, 2011

मन को जानना सबसे बड़ी साधना है, क्‍या आप यह कर पाए?


दुनिया को जानने का दम्‍भ रखने वाले हम, क्‍या स्‍वयं को भी जान पाते हैं? कभी आत्‍मा को जानने का प्रयास तो कभी परमात्‍मा को खोजने का प्रयास, कभी सृष्टि को समझने का प्रयास तो कभी मानवीय जगत को परखने का प्रयास करते हुए म‍हर्षि भी कभी बोध तो कभी ज्ञान तो कभी केवल ज्ञान प्राप्‍त करने के क्रम में जीवन समर्पित कर देते हैं। लेकिन फिर भी स्‍वयं को परखने का कार्य अधूरा ही रह जाता है। हम आध्‍यात्‍म की बात करते हैं अर्थात् अपनी आत्‍मा को पहचानने की बात। लेकिन हमारे मन में किसकी चाहत है, हम क्‍या करना चाहते हैं शायद कभी समझ ही नहीं पाते। शरीर तो जैसे तैसे सध जाता है, कभी गरीबी में और कभी अमीरी में भी स्‍वयं को ढाल ही लेता है लेकिन यह जो मन है वह कभी सधता नहीं है। क्‍यों नहीं सध पाता? क्‍यों‍कि इसका हमें बोध ही नहीं है, बस भागता है, कभी इधर तो कभी उधर। हम बस सागर में गोते खा रहे हैं। मन को साधने के लिए प्रत्‍येक रिश्‍ते में बस मित्रता ही ढूंढते हैं। कहते हैं कि माँ हो तो मित्रवत, पिता हो तो मित्रवत, भाई बहन सभी मित्रवत होने चाहिए और मित्र? जब मित्र तलाशते हैं तो उनके अन्‍दर अपने मन को ढूंढते हैं। न जाने कौन सी ध्‍वनी तरंगे मन से निकल आती हैं और मन को मन से राहत मिल जाती है। मित्र बन जाते हैं। लगता है हमें सब कुछ मिल गया। लेकिन बोध की प्‍यास नहीं बुझती। मित्र तो मिल गया लेकिन अपने मन सा सारा ही कच्‍चा चिठ्ठा उड़ेलने का साहस तो अभी नहीं आया ना? बहुत कुछ भर रखा है मन ने, ना जाने कितने कलुष, कितने राग और कितने द्वेष। एक मित्र कहता है कि मुझे रिक्‍त होने दो तो दूसरा कहता है कि नाहक ही मुझे मत भरो। इस रिक्‍त होने और भरने की प्रक्रिया में मित्रता कहीं पीछे छूट जाती है। तब आपका बोध वहीं रह जाता है। जब तक मन रिक्‍त नहीं होगा तब तक बोध नहीं आ पाएंगा, ज्ञान नहीं आ पाएंगा।
स्‍वयं की जानने की प्रक्रिया वास्‍तव में बड़ी पेचीदा है, हम स्‍वयं के बारे में न जाने कितने श्रेष्‍ठ विचार रखते हैं लेकिन दुनिया हमारे बारे में एकदम विपरीत विचार रखती है। तब क्‍या करें? हमें हमारी एक भूल बहुत छोटी सी दिखायी देती है लेकिन दुनिया को वही भूल चावल का एक दाना समझ आता है। लेकिन मित्र की आँखों मे सत्‍यता होती है। हम सब चाहत रखते हैं मित्र की, लेकिन सच्‍चाई यह है कि हम मित्र तो चाहते हैं केवल स्‍वयं को रिक्‍त करने के लिए लेकिन सच्‍चाई को जानने से डरते हैं। जैसे अकस्‍मात मुसीबत आने पर आपके मुँह से आपकी मातृभाषा में ही शब्‍द निकलते हैं वैसे ही आपके अन्‍दर का छिपा हुआ गुण भी संकट के समय बाहर निकल आता है। हम स्‍वयं को निर्भीक समझते हैं लेकिन सामने सर्प आ जाने पर ही आपके साहस को पता लगता है। ऐसे ही हम समझते हैं कि हम बहुत ही विनम्र हैं लेकिन जब एक दुर्जन व्‍यक्ति आपके समक्ष हो तब आपकी परीक्षा होती है। ऐसे ही कितने बोध हैं जो नित्‍य प्रति आपको आपसे परिचय कराते हैं लेकिन हम उन्‍हें नजर अंदाज कर देते हैं। हम प्रतिदिन लोगों से सर्टिफिकेट लेने के फेर में रहते हैं। बस कोई हमारी तारीफ कर दे। इसलिए कभी मुझे लगता है कि हम चाहे सारी दुनिया की समझ रखते हों लेकिन यदि स्‍वयं के बारे में अन्‍जान हैं तो हमेशा धोखा ही खाते हैं। जीवन में कभी सुख और शान्ति का अनुभव नहीं करते।
स्‍वयं को पहचाने बिना कुछ लोग अपना कार्य क्षेत्र चुन लेते हैं। ऐसे कितने ही लोग हैं जो लेखन को अपना विषय चुनते हैं लेकिन उनके अन्‍दर लेखन के तत्‍व नहीं हैं। बस धोखा खाते हैं और असफलता का दंश भोगते हैं। कुछ सामाजिक कार्य करने का दम्‍भ रखते हैं और किसी गरीब की झोपड़ी में जाकर जब उसके टूटे प्‍याले से चाय पीनी पड़ती है तब? कुछ राजनीति में जाने की चाहत रखते हैं और जब चारों दिशाओं से प्रहार होते हैं तब आपका मन भाग खड़ा होता है। इसलिए मन की पहचान या उसका बोध करना भी एक साधना है। ले जाओ इस मन को जीवन के हर प्रसंग में, तब देखो कि वह कहाँ खुश होता है? मत डालो उस पर कोई भी बंधन। मत आडम्‍बर रचकर स्‍वयं को गुमराह करो, कि हम ऐसे हैं या वैसे हैं। हम जैसे भी हैं उस सच को सामने आने दो। जिस दिन सच सामने आ जाएगा आप जो चाहते हैं वैसे ही बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसलिए मित्रों स्‍वयं को जानने का प्रारम्‍भ करो तो दुनिया को भी जान जाओगे नहीं तो केवल अपनी ही नजर से दुनिया को देखते रहोंगे और फिर कहोगे कि यह दुनिया मेरे काम की नहीं। आप जैसे लाखों लोग इस दुनिया में हैं लेकिन हम नहीं खोज पा रहे हैं उन्‍हें। क्‍योंकि उस खोज का हमें ही पता नहीं। केवल आदर्श में जीना चाह रहे हैं। जो दुनिया ने आदर्श बनाए हैं बस उन्‍हें ही अपने अन्‍दर का सच समझ बैठे हैं। नहीं यह आपके अन्‍दर का सच नहीं है, आपके अन्‍दर का सच तो आपको ही खोजना है। साँप जहरीला है इसका उसे बोध है, इसलिए वह केवल दुश्‍मन पर आक्रमण करता है, कोयल मीठा बोलती है इसलिए वह बसन्‍त के आगमन पर ही कुहकती है। हम मनुष्‍य स्‍वयं को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं लेकिन दुनिया के सारे ही जीवों से अधिक अज्ञानी है। सभी को स्‍वयं का ज्ञान है बस नहीं है तो हमें ही नहीं है। हमारे अन्‍दर भी विष है, हमारे अन्‍दर भी अमृत है। लेकिन प्रयोग नहीं आता। कभी सज्‍जन को विष दे देते हैं और कभी दुर्जन को अमृत। यह प्रयोग इसलिए नहीं आता कि हम स्‍वयं को नहीं जानते हैं और जो स्‍वयं को नहीं जानता है वह भला दूसरों को कैसे जान सकता है? मुझे कौन हानि देगा और कौन लाभ, यह तभी सम्‍भव होगा जब हम स्‍वयं के मन को जानेंगे। हम केवल प्रतिक्रिया करते हैं। दूसरे की क्रिया पर प्रतिक्रिया। केवल क्रिया करके देखिए, करने दीजिए दूसरों को प्रतिक्रिया। दुनिया अच्‍छी ही लगने लगेगी। मन में आवेग आता है, हम श्रेष्‍ठ बनने के चक्‍कर में उसे दबा लेते हैं तब स्‍वस्‍थ क्रिया नहीं होती तो उस आवेग जैसा ही प्रसंग उपस्थित होने पर प्रतिक्रिया स्‍वत: बाहर आ जाती है। प्रतिक्रिया तब ही अपना वजूद स्‍थापित करती है जब आप क्रिया नहीं कर पाते। इसलिए जैसा आपका मन है वैसी ही क्रिया करिए। धीरे-धीरे स्‍वत: ही आपको आपका मन समझ आने लगेगा। अच्‍छी है या बुरी है इस पर मत जाइए, बुरी है तब भी आपकी ही है, तो उसे बाहर आने दीजिए। हमने अपने अन्‍दर बहुत कुछ समेट रखा है, उसके कारण हमारा सत्‍य कहीं छिप गया है। इसलिए स्‍वयं के बोध के लिए अंधेरों के बादल छटने जरूरी हैं। बोध होने पर ही प्रकाश होगा और प्रकाश से ही हम दुनिया को प्रकाशित कर पाएंगे। इसलिए दुनिया को जानने से पहले स्‍वयं को जानने का प्रयास ही सुख का मार्ग प्रशस्‍त करता है। स्‍वयं को स्‍वीकारने से ही मन में दूसरे ज्ञान के लिए स्‍थान बन पाएगा। इसलिए आध्‍यात्‍म की पहली सीढ़ी है स्‍वयं को पहचानो। अपने गुण को पहचानो, अपने स्‍वार्थ को पहचानो, अपनी विलासिता को पहचानो और अपने वैराग्‍य को पहचानो। बस धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कल्‍पना साकार हो जाएगी।  

Thursday, September 22, 2011

हर व्‍यक्ति जरूरी होता है - अजित गुप्‍ता



निर्मम पतझड़ का आक्रमण! हरे-भरे पत्तों का पीत-पात में परिवर्तन! कभी तने से जुड़े हुए थे और अब झड़ के अलग हो गए हैं! वातावरण में वीरानी सी छायी है। सड़कों पर पीत-पत्र फैले हैं। बेतरतीब इधर-उधर उड़े जा रहे हैं। वृक्ष मानों शर्म हया छोड़कर नग्‍न हो गए हैं। भ्रम होने लगता है कि कहीं जीवन तो विदा नहीं हो गया? ठूंठ बने वृक्ष पर कौवा आकर कॉव-कॉव करने लगता है। सूखे श्रीहीन वृक्ष पर कैसा कर्कश स्‍वर है? लेकिन य‍ही नियति है। निर्मम पतझड़ ने सबकुछ तो उजाड़ दिया है। क्‍यों किया उसने ऐसा? यह पतझड़ ही खराब है, चारों तरफ से आवाजें आने लगी हैं। हवाएं भी चीत्‍कार उठी हैं, सांय-सांय बस चलती रहती हैं। माहौल गर्मा गया, हरियाली विलोप हो गयी। आँखों का सुकून कहीं बिसरा गया। प्रकृति का ऐसा मित्र? नहीं हमें जरूरत नहीं ऐसे मित्र की। पशु-पक्षी सभी ने मुनादी घुमा दी, नहीं चाहिए हमें पतझड़।
अभी बवण्‍डर अपना रूप ले ही रहा था कि एक अंकुर फूट गया। वृक्ष पर हरीतिमा छाने लगी। नवीन कोपल मन को उल्‍लास से भरने लगी। देखते ही देखते वृक्ष लहलहा गया। इतनी सुंदरता? इतनी मोहकता? कहाँ थी यह पहले? पतझड़ ने धो-पौंछकर नवीनता ला दी। अब तो राग भी बदल गया, कौवे का स्‍थान कोयल ने ले लिया। चिड़ियाऐं भी फुदकने लगी। मधुमक्‍खी ने भी छत्ता बना डाला। पुष्‍पों से पराग सींच-सींचकर मकरन्‍द बन गया।
बहुत सुन्‍दर है प्रकृति, बहुत जरूरी है इसके सारे ही तत्‍व। सारी ही ॠतुएं। इनमें से एक भी अपना कर्तव्‍य भूल जाए तो चक्र डांवाडोल हो जाएगा। प्रकृति ही विनाश करती है और प्रकृति ही सृष्टि को पुन: रचती है। जब-जब भी विरूपता-कुरूपता का आक्रमण हुआ, प्रकृति ने नवनिर्माण किया। जब प्रकृति डोलती है तब उसकी नाराजी सहन नहीं होती। लेकिन वह तो नव-निर्माण कर रही होती है। मनुष्‍य को सावचेत कर रही होती है कि इस संसार में सभी कुछ नश्‍वर है। पुरातन के बाद ही नवीन का उदय होगा।
हमारे मन में भी अनेकानेक विचार करवट लेते रहते हैं। कभी ये विचार भूचाल ला देते हैं तो कभी सुनामी। एकबारगी तो धरती विषैली सी हो जाती है लेकिन विष के बाहर आने के बाद एकदम शान्ति। आवश्‍यक है विचारो का उर्ध्‍व-वमन, निकल जाने दो इन्‍हें बाहर। प्रकृति में विष विस्‍तार लेगा तो अमृत की भी खोज होगी। समुद्र मंथन शायद हमारे मनों में ही हुआ हो। अमृत और विष दोनों ही बाहर आ सके थे। जिसको जो लेना था, उसने वो ले लिया। य‍ह सृष्टि ऐसे ही विस्‍तार लेती है। आज की युवा-पीढ़ी कहती है “सारे ही फेंडस जरूरी है”। हम भी यही कहते हैं कि सारे ही व्‍यक्ति जरूरी हैं। भोजन में षडरस। यात्रा पर निकलिए, करेला कितना मधुर लगता है। तीखे अचार का तो कहना ही क्‍या। भोजन के अन्‍त में मीठा ना हो तो? सारे ही रस अपने-अपने स्‍वादों की प्रधानता को स्‍थापित करते रहेंगे। जैसे हम अपने विचारों को स्‍थापित करते रहते हैं। परिवार में सारे ही सदस्‍य भोजन की टेबल पर बैठे हैं, बच्‍चा सबसे पहले करेले जैसी सब्‍जी को बाहर निकालता है, गुस्‍से में बोलता है कि मुझे नहीं खाना करेला। तभी दादाजी घुड़का देते हैं, क्‍यों नहीं खाना करेला? लेकिन अगले ही पल वे भी बोल उठते हैं कि मुझे नहीं खाना आलू-बेसन। सभी के अपने स्‍वाद हैं, सभी की जरूरतें। मत खाइए जो आपको पसन्‍द ना हो, लेकिन दूसरे के खाने को बुरा मत कहिए। आज जो मुझे पसन्‍द नहीं, हो सकता है वही कल मेरी जरूरत बन जाए। इसलिए मित्रों हमें भी सभी की जरूरत है। बस यही कहते रहिए कि सभी मित्र, सभी व्‍यक्ति जरूरी होते हैं।  इस धरती की खूबसूरती बनाए रखने के लिए प्रत्‍येक रंग जरूरी है, कहीं काला फबता है तो कहीं सफेद, कही हरा तो कहीं लाल। कभी कौवा आवश्‍यक होता है तो कभी कोयल का मधुर राग अच्‍छा लगता है। विचित्रता में ही आनन्‍द है। लड़ाई-झगड़े भी हमारे मन के कलुष को निकालने के लिए आवश्‍यक है। सभी का सम्‍मान कीजिए, सभी को जीने का अवसर दीजिए। बस हमेशा कहते रहिए – सभी प्राणी जरूरी हैं।