कल मेरा याहू अकाउण्ट हैक हो गया परिणाम स्वरूप मेरे सारे ही कांटेक्टस समाप्त हो गए। यह तो किसी हैकर का कमाल था लेकिन हमारी सरकार द्वारा तो गूगल को प्रतिदिन चेतावनी दी जा रही है कि हम गूगल की सर्विस को बन्द कर देंगे। इसलिए मैंने भी एक परिवर्तन करने का निश्चय कर लिया। मैंने एक वेबसाइट प्रारम्भ की है – www.sahityakar.com इसी पर वर्ड-प्रेस के माध्यम से अपना ब्लाग वहाँ शिफ्ट किया है। अभी ब्लागस्पाट पर भी मेरा ब्लाग रहेगा लेकिन धीरे-धीरे मैं पूर्णतया अपनी वेबसाइट पर ही आ जाऊँगी। अत: आप सभी से निवेदन है कि आप मेरी साइट पर जाकर मुझे सबस्क्राइब करें। जिससे आप मेरी पोस्ट पढ़ सकें और हम एक दूसरे से सम्पर्क में रह सकें। आभार।
श्रीमती अजित गुप्ता प्रकाशित पुस्तकें - शब्द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्ध संग्रह) सैलाबी तटबन्ध (उपन्यास), अरण्य में सूरज (उपन्यास) हम गुलेलची (व्यंग्य संग्रह), बौर तो आए (निबन्ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं (संस्मरणात्मक यात्रा वृतान्त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।
Tuesday, January 31, 2012
Wednesday, January 18, 2012
अतीत हमें वर्तमान में जीने नहीं देता
जिस किसी भी व्यक्ति के पास या देश के पास अपना अतीत नहीं होता वह वर्तमान में ही जीता है और भविष्य की कल्पना करता है लेकिन जिसके पास अतीत होता है वह अतीत में ही डूबा रहता है। वह वर्तमान में भी नहीं जी पाता और ना ही अपना भविष्य बना पाता है। एक बच्चे के पास उसका अतीत नहीं होता, वह वर्तमान को पूरी तरह से जीना चाहता है। प्रत्येक नयी वस्तु को पाना चाहता है। उसे पता नहीं होता कि अतीत क्या होता है? लेकिन इसके विपरीत एक प्रौढ़ व्यक्ति के पास उसका अतीत होता है इसी कारण वह अतीत में ही डूबा रहता है। अतीत के अनुभव उसे भविष्य की कल्पना भी नहीं करने देते। बच्चे के सामने एक नयी चमचमाती कार है, वह उसे पाने की कोशिश करता है। उसे पता नहीं कार के पहले भी कुछ था क्या। लेकिन इसके विपरीत उसके पिता ने कार के पहले का जीवन भी देखा है, कार से होने वाली दुर्घटनाएं भी देखी हैं तो वह अपने अतीत में चले जाता है और किशोरवय पुत्र को कार से दूर रहने को कहता है। किशोर अवस्था से युवावस्था में कदम ही रखा होता है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण पैदा हो जाता है। बस उसे आकर्षण का मालूम है उसका इतिहास मालूम नहीं। लेकिन उसके माता-पिता को मालूम है। वह अतीत का भय उसे दिखाते हैं। सोच समझकर कदम रखने की सलाह देते हैं। ऐसे ही कितने उदाहरण है। इसी अतीत के कारण नए और पुराने का द्वंद्व बना रहता है।
ऐसा ही देशों के साथ भी होता है। सम्प्रदायों के साथ भी होता है। भारत देश का स्वर्णिम अतीत रहा है इसलिए यहाँ के लोग केवल अतीत में ही जीते हैं। वे वर्तमान को भी उसी तराजू में तौलते हैं और भविष्य की कल्पना में भी अतीत को ही ले आते हैं। इसके विपरीत जिन देशों का अतीत नहीं है वे केवल वर्तमान में जीते हैं और भविष्य को कैसे सुखी रखे बस इसकी कल्पना करते हैं। लेकिन अतीत हमेशा हानिकारक ही नहीं होता। अतीत से अनुभव आता है और हमें सही मार्ग चुनने का रास्ता मिलता है। इसलिए दोनों पीढियां एक दूसरे का सम्मान करते हुए अपना मार्ग तय करें तो शायद हम सभी का भविष्य ज्यादा सुरक्षित रह सकता है। भारत भी यदि दूसरे देशों से वर्तमान में जीना सीख लें तो भारत का भविष्य भी ज्यादा सुखी हो सकता है। इस विषय के अनेक पहलु हैं, जब आप पढ़ेंगे तो लगेगा कि बहुत कुछ छूट गया है। मैंने चलाकर ही छोड़ा है, जिससे आप सभी अपने अनुभवों से इसे पूरा कर सकें।
( विशेष – बहुत दिनों से कोई पोस्ट नहीं लिखी थी, इसलिए यह संक्षिप्त सी पोस्ट प्रेषित कर रही हूँ )
Thursday, December 29, 2011
तो विदा 2011, क्या करें तुझे सर्दी में ही विदा करना पड़ रहा है!
बहुत दिनों से कोई पोस्ट नहीं लिखी गयी और इस साल ने भी अपने बोरिये-बिस्तर बाँध लिए। सोचा कि जाते-जाते साल में उसकी पेटी में एक कागज अपना भी और रख दिया जाए। टाइप करते हुए हाथ ठण्डे पड़ रहे हैं, उन्हें बार-बार सहलाना पड़ता है। इन दिनों बाहर बहुत रहना हुआ इस कारण कुछ नहीं लिखा गया और फिर अब ठण्ड ने अपना असर दिखा दिया है। आप सभी लोग भी श्री राज भाटिया जी के बुलावे पर साँपला जा आए। गन्ने खूब खाए गये, पिकनिक का सा अहसास हो रहा था, फोटो देखकर। गन्नों की मिठास हम तक भी पहुंच गयी है। जब आप लोग साँपला में मिलन कर रहे थे तब मैं भी चण्डीगढ़ में ही थी। बर्फ जमा देने वाली ठण्ड का मुकाबला कर के आ रही हूँ।
2011 अपनी अन्तिम घड़िया गिन रहा है। 2012 ने अपने नए कपड़े सिलवा लिए हैं। सारी दुनिया इस नए साल का स्वागत करने के लिए होटलों में जुट गयी है। परिवार से दूर, होटल की छाँव में। नए साल का स्वागत करने के लिए स्वयं को खुमारी में डुबोने का भी पूरा प्रबंध कर लिया गया है। ऐसा लग रहा है जैसे हमने अपने घर के दरवाजे खोल दिए हों और खुद सुध-बुध खोकर कहीं लुढ़क गए हों। कह रहे हों, कि भाई आना है तो आ जाओ, हम तुम्हारे स्वागत में होश खो बैठे हैं। बेचारा नया साल आपके घर पर दस्तक दे रहा है और उसे पता लगा कि अरे सारे ही परिवारजन तो होटल में हैं। तो यह परिवार का नया साल नहीं है क्या? नहीं जी यह तो बाजार का नया साल है, इसलिए बाजार में ही मनेगा। अभी एक संत का प्रवचन सुना, वे कह रहे थे कि रात को 12 बजे हम कहते है कि बधाई हो, नये साल की। फिर सो जाते हैं, तभी रात को एक बजे किसी का फोन आ जाता है तो उससे गुस्से में कहते हैं कि आधी रात को क्यों फोन कर रहा है? बर्फ गिर रही है, सर्दी की मार पड़ रही है, सारी दुनिया अपने खोल में सिमटी है और हम कह रहे हैं कि नया साल आ गया!
बचपन में एक दिन आता था, जब चारों तरफ फूल खिले होते थे, मन चहक रहा होता था। प्रकृति ने मानो नए वस्त्र धारण किये हो। सुबह-सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही मिश्री और नीम की कोपल प्रसाद रूप में मिल जाती थी और कहा जाता था कि नया साल आ गया है। परिवार में ही मिठाई बनती थी और सारे ही परिवारजन एकत्र होकर नये साल की खुशियां मनाते थे। होटल नहीं थे, बाजार नहीं थे बस था तो परिवार था, अपना समाज था। मदहोशी नहीं थी, थी तो जागरूकता थी। प्रकृति को परिवर्तन का जरिया मानते थे। प्रकृति के अनुरूप ही तिथियों का निर्धारण करते थे। तब शायद हम शिक्षित नहीं थे, आज है। मुझे लगता है कि तब हम ज्ञानवान थे लेकिन आज नहीं हैं। क्या शिक्षित होने से केवल एक ही सोच पर चला जाता है? क्या अपना विवेक प्रयोग में नहीं लिया जाता? क्या अब परिवारों का स्थान होटल ले लेंगे? हम ऐसा कार्य क्यों नहीं कर पाते जिसमें अपना विवेक जागृत रहे। क्यों हम प्रत्येक कार्य में मदहोशी ही चाहते हैं। क्यों हम अपने होश खो देना चाहते हैं? क्या जीवन में इतनी निराशा है? क्या जीवन में इतनी कटुता है? जो सबकुछ भुला देना चाहते हैं। खुशियां जागृत अवस्था में मनायी जाती हैं या मदहोशी में? ऐसे कई प्रश्न हैं जो मुझे परेशान करते हैं, आप के पास इनके उत्तर होंगे? तारीख के अनुसार यह मेरी इस वर्ष की अन्तिम पोस्ट हैं लेकिन नव-वर्ष के अनुसार अभी मार्च तक और पोस्ट आएंगी। जब प्रकृति गुनगुनाएगी तब हम भी गुनगुनाएंगे कि नव वर्ष आप सभी के लिए नव-प्रेरणा लेकर आए। अभी तो प्रकृति सिकुड़ी हुई है तो हम कैसे कहें कि नव-वर्ष मुबारक। खैर आप धुंध में लिपटे, बिस्तरों में दुबके होकर, होटल में नाच-गान के साथ ही जबरन नयेपन को आमंत्रण देंगे तो हम भी कह देंगे कि आपका जीवन ऐसे ही संघर्षों में बीते जैसे आज प्रकृति संघर्ष कर रही है। तो विदा 2011, क्या करें तुझे सर्दी में ही विदा करना पड़ रहा है। भारत का ज्ञान आज साथ होता तो तुझे हम बसन्त में विदा करते और 2012 को भी बसन्त में ही अपने घर भोर की बेला में घर ले आते। लेकिन अब तो क्या करें?
Wednesday, December 7, 2011
मन को जानना सबसे बड़ी साधना है, क्या आप यह कर पाए?
दुनिया को जानने का दम्भ रखने वाले हम, क्या स्वयं को भी जान पाते हैं? कभी आत्मा को जानने का प्रयास तो कभी परमात्मा को खोजने का प्रयास, कभी सृष्टि को समझने का प्रयास तो कभी मानवीय जगत को परखने का प्रयास करते हुए महर्षि भी कभी बोध तो कभी ज्ञान तो कभी केवल ज्ञान प्राप्त करने के क्रम में जीवन समर्पित कर देते हैं। लेकिन फिर भी स्वयं को परखने का कार्य अधूरा ही रह जाता है। हम आध्यात्म की बात करते हैं अर्थात् अपनी आत्मा को पहचानने की बात। लेकिन हमारे मन में किसकी चाहत है, हम क्या करना चाहते हैं शायद कभी समझ ही नहीं पाते। शरीर तो जैसे तैसे सध जाता है, कभी गरीबी में और कभी अमीरी में भी स्वयं को ढाल ही लेता है लेकिन यह जो मन है वह कभी सधता नहीं है। क्यों नहीं सध पाता? क्योंकि इसका हमें बोध ही नहीं है, बस भागता है, कभी इधर तो कभी उधर। हम बस सागर में गोते खा रहे हैं। मन को साधने के लिए प्रत्येक रिश्ते में बस मित्रता ही ढूंढते हैं। कहते हैं कि माँ हो तो मित्रवत, पिता हो तो मित्रवत, भाई बहन सभी मित्रवत होने चाहिए और मित्र? जब मित्र तलाशते हैं तो उनके अन्दर अपने मन को ढूंढते हैं। न जाने कौन सी ध्वनी तरंगे मन से निकल आती हैं और मन को मन से राहत मिल जाती है। मित्र बन जाते हैं। लगता है हमें सब कुछ मिल गया। लेकिन बोध की प्यास नहीं बुझती। मित्र तो मिल गया लेकिन अपने मन सा सारा ही कच्चा चिठ्ठा उड़ेलने का साहस तो अभी नहीं आया ना? बहुत कुछ भर रखा है मन ने, ना जाने कितने कलुष, कितने राग और कितने द्वेष। एक मित्र कहता है कि मुझे रिक्त होने दो तो दूसरा कहता है कि नाहक ही मुझे मत भरो। इस रिक्त होने और भरने की प्रक्रिया में मित्रता कहीं पीछे छूट जाती है। तब आपका बोध वहीं रह जाता है। जब तक मन रिक्त नहीं होगा तब तक बोध नहीं आ पाएंगा, ज्ञान नहीं आ पाएंगा।
स्वयं की जानने की प्रक्रिया वास्तव में बड़ी पेचीदा है, हम स्वयं के बारे में न जाने कितने श्रेष्ठ विचार रखते हैं लेकिन दुनिया हमारे बारे में एकदम विपरीत विचार रखती है। तब क्या करें? हमें हमारी एक भूल बहुत छोटी सी दिखायी देती है लेकिन दुनिया को वही भूल चावल का एक दाना समझ आता है। लेकिन मित्र की आँखों मे सत्यता होती है। हम सब चाहत रखते हैं मित्र की, लेकिन सच्चाई यह है कि हम मित्र तो चाहते हैं केवल स्वयं को रिक्त करने के लिए लेकिन सच्चाई को जानने से डरते हैं। जैसे अकस्मात मुसीबत आने पर आपके मुँह से आपकी मातृभाषा में ही शब्द निकलते हैं वैसे ही आपके अन्दर का छिपा हुआ गुण भी संकट के समय बाहर निकल आता है। हम स्वयं को निर्भीक समझते हैं लेकिन सामने सर्प आ जाने पर ही आपके साहस को पता लगता है। ऐसे ही हम समझते हैं कि हम बहुत ही विनम्र हैं लेकिन जब एक दुर्जन व्यक्ति आपके समक्ष हो तब आपकी परीक्षा होती है। ऐसे ही कितने बोध हैं जो नित्य प्रति आपको आपसे परिचय कराते हैं लेकिन हम उन्हें नजर अंदाज कर देते हैं। हम प्रतिदिन लोगों से सर्टिफिकेट लेने के फेर में रहते हैं। बस कोई हमारी तारीफ कर दे। इसलिए कभी मुझे लगता है कि हम चाहे सारी दुनिया की समझ रखते हों लेकिन यदि स्वयं के बारे में अन्जान हैं तो हमेशा धोखा ही खाते हैं। जीवन में कभी सुख और शान्ति का अनुभव नहीं करते।
स्वयं को पहचाने बिना कुछ लोग अपना कार्य क्षेत्र चुन लेते हैं। ऐसे कितने ही लोग हैं जो लेखन को अपना विषय चुनते हैं लेकिन उनके अन्दर लेखन के तत्व नहीं हैं। बस धोखा खाते हैं और असफलता का दंश भोगते हैं। कुछ सामाजिक कार्य करने का दम्भ रखते हैं और किसी गरीब की झोपड़ी में जाकर जब उसके टूटे प्याले से चाय पीनी पड़ती है तब? कुछ राजनीति में जाने की चाहत रखते हैं और जब चारों दिशाओं से प्रहार होते हैं तब आपका मन भाग खड़ा होता है। इसलिए मन की पहचान या उसका बोध करना भी एक साधना है। ले जाओ इस मन को जीवन के हर प्रसंग में, तब देखो कि वह कहाँ खुश होता है? मत डालो उस पर कोई भी बंधन। मत आडम्बर रचकर स्वयं को गुमराह करो, कि हम ऐसे हैं या वैसे हैं। हम जैसे भी हैं उस सच को सामने आने दो। जिस दिन सच सामने आ जाएगा आप जो चाहते हैं वैसे ही बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसलिए मित्रों स्वयं को जानने का प्रारम्भ करो तो दुनिया को भी जान जाओगे नहीं तो केवल अपनी ही नजर से दुनिया को देखते रहोंगे और फिर कहोगे कि यह दुनिया मेरे काम की नहीं। आप जैसे लाखों लोग इस दुनिया में हैं लेकिन हम नहीं खोज पा रहे हैं उन्हें। क्योंकि उस खोज का हमें ही पता नहीं। केवल आदर्श में जीना चाह रहे हैं। जो दुनिया ने आदर्श बनाए हैं बस उन्हें ही अपने अन्दर का सच समझ बैठे हैं। नहीं यह आपके अन्दर का सच नहीं है, आपके अन्दर का सच तो आपको ही खोजना है। साँप जहरीला है इसका उसे बोध है, इसलिए वह केवल दुश्मन पर आक्रमण करता है, कोयल मीठा बोलती है इसलिए वह बसन्त के आगमन पर ही कुहकती है। हम मनुष्य स्वयं को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं लेकिन दुनिया के सारे ही जीवों से अधिक अज्ञानी है। सभी को स्वयं का ज्ञान है बस नहीं है तो हमें ही नहीं है। हमारे अन्दर भी विष है, हमारे अन्दर भी अमृत है। लेकिन प्रयोग नहीं आता। कभी सज्जन को विष दे देते हैं और कभी दुर्जन को अमृत। यह प्रयोग इसलिए नहीं आता कि हम स्वयं को नहीं जानते हैं और जो स्वयं को नहीं जानता है वह भला दूसरों को कैसे जान सकता है? मुझे कौन हानि देगा और कौन लाभ, यह तभी सम्भव होगा जब हम स्वयं के मन को जानेंगे। हम केवल प्रतिक्रिया करते हैं। दूसरे की क्रिया पर प्रतिक्रिया। केवल क्रिया करके देखिए, करने दीजिए दूसरों को प्रतिक्रिया। दुनिया अच्छी ही लगने लगेगी। मन में आवेग आता है, हम श्रेष्ठ बनने के चक्कर में उसे दबा लेते हैं तब स्वस्थ क्रिया नहीं होती तो उस आवेग जैसा ही प्रसंग उपस्थित होने पर प्रतिक्रिया स्वत: बाहर आ जाती है। प्रतिक्रिया तब ही अपना वजूद स्थापित करती है जब आप क्रिया नहीं कर पाते। इसलिए जैसा आपका मन है वैसी ही क्रिया करिए। धीरे-धीरे स्वत: ही आपको आपका मन समझ आने लगेगा। अच्छी है या बुरी है इस पर मत जाइए, बुरी है तब भी आपकी ही है, तो उसे बाहर आने दीजिए। हमने अपने अन्दर बहुत कुछ समेट रखा है, उसके कारण हमारा सत्य कहीं छिप गया है। इसलिए स्वयं के बोध के लिए अंधेरों के बादल छटने जरूरी हैं। बोध होने पर ही प्रकाश होगा और प्रकाश से ही हम दुनिया को प्रकाशित कर पाएंगे। इसलिए दुनिया को जानने से पहले स्वयं को जानने का प्रयास ही सुख का मार्ग प्रशस्त करता है। स्वयं को स्वीकारने से ही मन में दूसरे ज्ञान के लिए स्थान बन पाएगा। इसलिए आध्यात्म की पहली सीढ़ी है स्वयं को पहचानो। अपने गुण को पहचानो, अपने स्वार्थ को पहचानो, अपनी विलासिता को पहचानो और अपने वैराग्य को पहचानो। बस धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कल्पना साकार हो जाएगी।
Monday, November 28, 2011
क्या भगवान की उपाधि किसी सामान्य मनुष्य को दी जानी चाहिए?
समाचार पत्र में हम जैसे सामाजिक प्राणियों के लिए सबसे अधिक उपयोगी पेज- होता है- पेज चार। समाचार पत्र आते ही मुख्य पृष्ठ से भी अधिक उसे वरीयता मिलती है। क्यों? इसलिए कि उसमें शोक-संदेश होते हैं। कल ऐसे ही एक शोक-संदेश पर निगाह पड़ी, कुछ अटपटा सा लगा। बहुत देर तक मन में चिन्तन चलता रहा कि ऐसा लिखना कितना तार्किक है? किसी महिला का शोक-संदेश था और महिला की फोटो के नीचे लिखा था – अवतरण दिनांक ---- और निर्वाण दिनांक -----। अवतरण और निर्वाण शब्दों का प्रयोग हम ऐसे महापुरुषों के लिए करते हैं जिनको हम कहते हैं कि ये साक्षात ईश्वर के अवतार हैं। इसलिए इनका धरती पर अवतरण हुआ और मृत्यु के स्थान पर निर्वाण अर्थात मोक्ष की कल्पना करते हैं। भारत भूमि में राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध आदि इसी श्रेणी में आते हैं। इन्हें हम भगवान का अवतार मानते हैं। पृथ्वी पर भगवान के रूप में साक्षात अनुभूति के लिए महापुरुषों के रूप में अवतरण होता है, ऐसी मान्यता है।
हम यह भी कह सकते हैं कि प्रत्येक परिवार के लिए माँ का रूप भगवान के समान होता है और इसी कारण अवतरण एवं निर्वाण शब्द का प्रयोग किया गया होगा। इसी संदर्भ में एक अन्य प्रसंग भी ध्यान में आता है। क्रिकेट के खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को पत्रकार भगवान कहते हैं और क्रिकेट के भगवान सचिन ऐसी उपाधि देते है। इसी प्रकार कई बार अमिताभ बच्चन को भी उनके प्रशंसक भगवान की उपाधि देते हैं। दक्षिणी प्रांतों के कई अभिनेताओं के तो मन्दिर भी हैं और बकायदा उनकी पूजा भी होती है। भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि हम सब प्राणी भगवान का ही अंश हैं। लेकिन भगवान नहीं है। भगवान सृष्टि का निर्माता है, सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन उसी के अनुरूप होता है। सृष्टि के सम्पूर्ण तत्वों का वह नियन्ता है। मनुष्य के सुख-दुख भी भगवान द्वारा ही नियन्त्रित होते हैं। जब व्यक्ति थक जाता है, हार जाता है, दुख में डूब जाता है, तब उसके पास भगवान के समक्ष प्रार्थना करने के अतिरिक्त कोई आशा शेष नहीं रहती। यह भी अकाट्य सत्य है कि लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, उनके दुख दूर होते हैं। उनके मन में नवीन आशा का संचार होता है।
बच्चों के लिए माता, भगवान का रूप हो सकती है लेकिन समाज के लिए नहीं। यदि हमने सभी को यह उपाधि देना प्रारम्भ कर दिया तो भगवान का स्वरूप ही विकृत हो जाएगा। आप कल्पना कीजिए, एक बच्चे को भूख लगी है, वह माँ से भोजन प्राप्त करता है। लेकिन यदि उसके प्राणों की रक्षा की बात है तब उसे माँ के स्थान पर भगवान से प्रार्थना करनी पड़ेगी। इस उदाहरण में तो केवल कुछ शब्दों का ही उल्लेख है। अभी कुछ दिन पूर्व एक समाचार पढ़कर तो आश्चर्य की सीमा ही नहीं रही। समाचार था – एक पुरुष ने संन्यास धारण किया और संन्यासी बनते ही उसने प्राण त्याग दिए। पहले तो मैं इसका अर्थ नहीं समझी, लेकिन फिर समझ आया कि संन्यासी बनकर मृत्यु की कामना करना भी समाज में उत्पन्न हो गया है। अन्त समय में संन्यासी बनने की ईच्छा व्यक्त करना और फिर संन्यासियों की तरह दाह-संस्कार करना। जैसे हमारे राजनेताओं की ईच्छा रहती है कि हम तिरंगे में ही श्मशान जाएं वैसे ही संन्यासी वेश में मृत्यु की ईच्छा रहती है। यह कृत्य भी क्या संन्यासियों की तपस्या को धूमिल करने वाला नहीं है?
क्या कोई भी खिलाड़ी अपने खेल में उत्कृष्टता के लिए सचिन से प्रार्थना करता है? या अन्य सामान्य व्यक्ति अपने सुख-दुख के लिए सचिन से प्रार्थना करता है। वे सब भी प्रभु के दरबार में जाते हैं। किसी अभिनेता का प्रदर्शन अच्छा हो इसके लिए अमिताभ बच्चन आशीर्वाद दे सकते हैं? कह सकते हैं कि वत्स तथास्तु। तब हम क्यों एक सामान्य व्यक्ति की तुलना भगवान से करने लगते हैं? एक मनोरंजन करने वाला व्यक्ति कैसे भगवान की उपाधि पा सकता है? गुरु नानक, दयानन्द सरस्वती, शिरड़ी बाबा आदि जिन्होंने समाज के लिए अवर्णनीय कार्य किए उन्हें हम भगवान की तरह पूजते हैं। लेकिन जो केवल मनोरंजन जगत के व्यक्ति हैं उन्हें भी हम भगवान के समकक्ष स्थापित कर दें तो क्या यह उस ईश्वर का अपमान नहीं है जिसे हम सृष्टि का रचयिता कहते हैं? इसलिए समाज को और पत्रकार जगत को गरिमा बनाकर रखनी चाहिए। सामान्य व्यक्ति को भगवान की उपाधि देना मुझे तो उचित कृत्य नहीं लगता, हो सकता है मेरा कथन सही नहीं हो। इस संदर्भ में आप सभी की मान्यताएं कुछ और हो। इसलिए मैंने यह विषय उठाया है कि मैं भी समाज में फैल रही इस मनोवृत्ति का कारण जान सकूं और स्वयं में सुधार कर सकूं। आप सभी के विचार आमन्त्रित हैं।
Sunday, November 13, 2011
कौन है हमारा idol ( आदर्श ) व्यक्ति?
एक पोस्ट मैंने लिखी थी बाघदड़ा नेचर पार्क पर। जहाँ हम पूर्णिमा की रात में एक नेचर पार्क में थे। (पूर्ण चन्द्र की रात में जंगल का राग सुनो ) वहाँ बातचीत करते हुए एक प्रश्न आया था कि आपका आयडल कौन है? कई लोगों ने उत्तर दिया और किसी ने यह भी कहा कि हम अपने जीवन में कोई आयडल नहीं बना पाए हैं। मेरे मन में एक उत्तर था लेकिन मैंने उस समय कुछ नहीं बोला क्योंकि मेरा उत्तर कुछ लम्बा था और उस स्थान पर कम बोलने को कहा गया था। इसलिए आज अपनी बात कहने के लिए और आप सब की राय जानने के लिए यहाँ लिख रही हूँ।
मेरा आयडल कौन यह प्रश्न के उत्तर के लिए मैंने कई व्यक्तियों के बारे में चिंतन किया लेकिन उनका एक या अनेक विचार आपके मन में प्रेरणा जगाते हैं लेकिन दूसरे कुछ विचार निराशा का भाव जगाते हैं इसलिए मन ने उन सारे नामों को नकार दिया। मैं दुनिया के कई लोगों से प्रभावित होती हूँ, या यूँ कहना सार्थक होगा कि लोगों के कृतित्व या विचार से प्रभावित होती हूँ। उस कृतित्व या विचार को अपने अन्दर धारण करने का प्रयास करती हूँ। सारे ही विचार या कार्य मैं अपने जीवन में नहीं उतार पाती लेकिन वे विचार मेरे जीवन के आसपास जरूर बने रहते हैं और उन विचारों के अनुकूल ना सही लेकिन प्रतिकूल जाने से अवश्य रोकते हैं। शायद आपके साथ भी ऐसा होता हो। कई बार बहुत छोटी सी घटनाएं मन में अंकित हो जाती है, उस घटना में छिपा दर्शन हमारे जीवन का अंग बन जाता है। इसलिए विचारों और कार्यों का समूह मन में दस्तक देते हैं और वे ही हमारे आदर्श बनते हैं। जब भी हम किसी एक कृतित्व से किसी व्यक्ति को आदर्श मान लेते हैं तब वह व्यक्ति आवश्यक नहीं कि हमेशा आपका आदर्श बना रहे। वर्तमान में अन्ना हजारे इसका उदाहरण है। उनके एक कृतित्व ने उन्हें करोड़ों लोगों का आयडल बना दिया। इसीकारण उनके विरोधी इस छवि को धूमिल करने में लगे हैं। इस कारण कोई एक व्यक्ति आयडल ना होकर यदि विचारों को हम आदर्श माने तब उस विचार पर हमारा विश्वास बना रहेगा नहीं तो जैसे ही उस व्यक्ति का धूमिल चेहरा आपके समक्ष आएगा वह आदर्श विचार भी हवा हो जाएंगे।
आप या मैं किन विचारों से प्रेरित होते हैं? जिन विचारों के साथ वक्ता का कृतित्व जुड़ा होता है। फिर वह व्यक्ति कोई अदना सा है या विशाल व्यक्तित्व का धनी इससे अन्तर नहीं पड़ता है। कई उदाहरण मेरे सामने हैं। उनसे मुझे प्रेरणा मिली। एक बार का वाकया है मैं एक जनजातीय गाँव में गयी। वह गाँव शहरी विकास से कोसो दूर था। प्रकृति के साथ जीना ही वहाँ के व्यक्तियों को रास आया हुआ था और वे शायद विकास के स्वरूप को देख भी नहीं पाए थे। एक बुजुर्ग व्यक्ति एक खाट पर बैठे थे। मैंने प्रश्न किया कि बाबा आपको यहाँ क्या कमी लगती है? उस व्यक्ति ने चारों तरफ देखा और कहा कि यहाँ सब कुछ ही तो है। उसका संतोष मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत बना। अब वह व्यक्ति मेरे आयडल नहीं हो सकते लेकिन वह विचार मेरे लिए आदर्श है। हमारे पास सबकुछ है लेकिन मन कहता है कि कुछ नहीं है और उस बुजुर्ग के पास कुछ नहीं था लेकिन वह कह रहा था कि सबकुछ है।
एक और घटना सुनाती हूँ, मेवाड़ में अकाल के दिन थे। पानी की बहुत ही तंगी थी। मैं पानी की तंगी के कारण पेरशान थी और इसी समय मेरी सफाई कर्मचारी ने घण्टी बजा दी। पानी की कमी पर उसने कहा कि हमें तो इस कमी से कोई फरक नहीं पड़ता है। क्योंकि हम सुबह तालाब पर जाते हैं, वहीं स्नान करते हैं, कपड़े धोते हैं और एक घड़ा पानी पीने के लिए ले आते हैं। मेरे हाथ वाशबेसन में बहते हुए पानी को अब रोक रहे थे। ऐसे ही मेरा एक नौकर था। सुबह नौ बजे आता था और शाम को पाँच बजे चला जाता था। हम लोग दिन में दो बजे भोजन करते थे तब उससे मैं कहती थी कि तू भी खाना खा ले। लेकिन उसने कभी खाना नहीं खाया। वह कहता था कि मैं घर से खाना खाकर आता हूँ और शाम को घर जाकर ही खाऊँगा। यदि आपके यहाँ दिन में खाने लगा तो मेरी आदत बिगड़ जाएगी। एक किस्सा और सुनाती हूँ, हमने जनजातीय क्षेत्र में अकाल के समय कुएँ गहरे कराने का काम किया। वनवासी से भी 25 प्रतिशत हिस्सा लिया गया। कुछ लोगों ने अग्रिम पैसा जमा करा दिया। लेकिन तभी वर्षा आ गयी और कुओं में पानी आ गया। हमने एक वनवासी को पैसे लौटाए तो उसने लेने से मना कर दिया। कहा कि मेरे कुए में तो पानी आ गया है अब मैं पैसे का क्या करूंगा आप लोग इससे परसादी कर लो।
यह सारे उदाहरण नामचीन व्यक्तियों के नहीं है। उन लोगों के हैं जिनका समाज में कोई स्थान नहीं है। लेकिन वे मेरे मानस में हमेशा बने रहते हैं। मैं इनका बार-बार उल्लेख भी इसीलिए करती हूँ कि इनके विचारों से मैं प्रेरित हो सकूं। इन जैसे ढेर सारे उदाहरण है जिनने मेरे मस्तिष्क पर दस्तक दी। मैंने अपनी लघुकथा संग्रह में इनपर लिखा भी है। इसके विपरीत कई ऐसे बड़े नाम भी हैं जिनका कृतित्व निश्चित ही प्रभावित करता है लेकिन वे प्रभावित नहीं कर पाते और ना ही दिल में अंकित हो पाते हैं। क्योंकि आज जितने भी बड़े नाम हैं उनके विचारों और कृतित्व में कहीं अन्तर दिखायी देता है जबकि इन गरीब लोगों के विचार और आचरण में कोई अन्तर नहीं है। ये विचार ही उनकी जीवन शैली है। इसलिए जब भी यह प्रश्न मेरे समक्ष यक्ष प्रश्न सा उपस्थित होता है, मेरे समक्ष न जाने कितने चेहरे जो समाज में कहीं नहीं हैं, वे ही दिखायी दे जाते हैं। सारे ही बड़े नाम मेरे सामने गौण हो जाते हैं। प्रतिदिन ही कोई न कोई विचार हमें प्रभावित कर जाता है और हम उसे अपने मन और मस्तिष्क दोनों में अंकित कर लेते हैं। जब ये विचार मन में अंकित हो जाते हैं तब वे हमारी पूंजी बन जाते हैं। जैसे पूंजी को हम प्रतिदिन उपयोग में नहीं लाते हैं लेकिन वे हमारे साथ रहती है। इसलिए मेरे पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि मेरा आयडल कौन है? या मेरा गुरू कौन है? क्योंकि गुरू भी ऐसा ही व्यक्तित्व है जो कभी एक नहीं हो सकता। न जाने हम कितने लोगों से सीखते हैं। इसलिए इन लोगों को जिनसे मुझे प्रेरणा मिलती है उन्हें गुरु मानूं या आयडल समझ नहीं आता है। हो सकता है कि मेरे इन विचारों से आप सहमत नहीं हों और इससे इतर आपके अन्य विचार हों। इसलिए इस विषय की व्यापक चर्चा हो सके, मैंने इसे यहाँ लिखना उपयोगी लगा। आपकी क्या राय है? आपका आयडल कौन है?
Sunday, November 6, 2011
साठ वर्ष का सफर कितना सुन्दर कितना मधुर
जीवन का फलसफा भी कुछ अजीब ही है। कभी लगता है कि जीवन हमारी मुठ्ठी में उन रेत-कणों की तरह है जो प्रतिपल फिसल रहे हैं। साल दर साल हमारी मुठ्ठी रीतती जा रही है। लेकिन आज लग रहा है कि जीवन कदम दर कदम हर एक पड़ाव को पार करते रहने का नाम हैं। हम अपनी चाही हुई मंजिल तक जा पहुंचते हैं। एक-एक सीढ़ी चढ़कर हम पर्वत को लांघ लेते हैं। आज मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा है। साठ वर्ष जीवन में बहुत मायने रखते हैं। कोई कहता है कि हम बस अब थक गए हैं, दुनिया भी कहती है कि तुम अब चुक गए हो, बस आराम करो। लेकिन कैसा आराम? मुझे लग रहा है कि सफर तो अब प्रारम्भ हुआ है। अभी तक तो सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए एक मंजिल तक पहुंचे हैं। जैसे एक पर्वतारोही पर्वत पर जाकर चैन की सांस लेता है और वहाँ से दुनिया को देखने की कोशिश करता है बस वैसे ही आज लग रहा है कि साठ वर्ष पूर्ण हो गए, मैं पर्वतनुमा अपनी मंजिल तक पहुंच गयी और यहाँ से अब दुनिया को निहारना है। सारी दुनिया अब स्पष्ट दिखायी दे रही है। तलहटी में बचपन बसा है, कुछ धुंधला सा ही दिखायी दे रहा है लेकिन सबसे मनोरम शायद वही लग रहा है।
ऊँचे पर्वत पर आकर या उम्र के इस पड़ाव पर आकर सब कुछ तो साफ दिखने लगता है। सारे ही नाते-रिश्ते, मित्र-साथी, वफा-बेवफा सभी कुछ। तलहटी पर बसा बचपन, दूब की तरह होता है। जरा सा ही स्नेह का पानी मिल जाए, लहलहा जाता है। दूब की तरह ही कभी समाप्त नहीं होता। हमेशा यादों में बसा रहता है। बचपन में दूब की तरह ही जब हर कोई अपने पैरों से हमें रौंदता है तो लगता है कि हम कब इस पेड़ की तरह बड़े होंगे? कब हम पर भी फल लगेंगे? कब हम भी उपयोगी बनेंगे? लेकिन आज वही दूब सा बचपन प्यारा लगने लगता है, उसकी यादों में खो जाने का मन करता है। बचपन खेलते-कूदते, डाँट-फटकार खाते, सपने देखते चुटकी बजाते ही बीत गया। हर कोई कहने लगा कि अब तुम बच्चे नहीं रहे, बड़े हो गए हो। हम भी सपने देखते बड़े होने के, घण्टों-घण्टों नींद नहीं आती, बस जीवन के सपने ही आँखों में तैरते रहते थे। हम क्या बनेंगे, यह सपने हमारे पास नहीं थे। क्योंकि शायद हमारी पीढ़ी में ऐसे सपने हमारे माता-पिता देखा करते थे। इसलिए कुरेदते भी नहीं थे अपने मन को, कि तुझे किधर जाना है? कभी कुरेद भी लिया तो दुख ही हाथ आता था। क्योंकि पिता का हुक्म सुनायी पड़ जाता था कि तुम्हें यह करना है। बस मुझे तो यही संतोष है कि मेरे पिता ने हमें शिक्षा दिलाने का सपना देखा, हमें बुद्धिमान बनाने का सपना देखा। यदि वे यह सपना नहीं देखते तो हम भी आज न जाने किस मुकाम पर जा पहुंचते? कौन से पर्वत पर मैं खड़ी होती? पति के सहारे? या बच्चों के सहारे? आज शिक्षा के सहारे ना केवल मजबूती से उम्र के इस पड़ाव पर पैर सीधे खड़े हैं अपितु सारे परिवार को भी थामने का साहस इन पैरों में आ बसा है।
पर्वत से झांकते हुए युवावस्था के फलदार वृक्ष दिखायी दे रहे हैं। कभी इसी वृक्ष को कोई निर्ममता से काट देता था तो कोई ममता से पानी पिला देता था। जीवन पेड़ की तरह बड़ा होता है, कटता भी है, छंटता भी है, तो कोई पानी भी डालता है और कोई खाद भी बनता है। फल और फूल भी आते है तो पतझड़ और बसन्त भी खिलते हैं। लेकिन पेड़ के फल कैसे हैं बस इसी से पेड़ की ख्याति होती है। मीठे फल लगे हैं तो दूर-दूर तक लोग कहते हैं कि फलां पेड़ के फल बहुत मीठे हैं। यदि फल मीठे नहीं हैं तो लोग उस तरफ झांकते भी नहीं। लेकिन माँ के रूप में विकसित इस छायादार पेड़ में जब फल लगते हैं तब उस माँ को अपने फल बहुत ही मीठे और सुगन्धित प्रतीत होते हैं। लेकिन फलों से विरल कभी पेड़ की भी अपनी खुशबू होती है, जैसे चन्दन की। देवदार से पेड़, पर्वतों को जब छूते हैं तब भला किसे नहीं लुभाते? कभी झांककर देखा है इन देवदार के पेड़ों की जड़ों को? कहाँ उनकी जड़ होती है और कहाँ उनका अन्तिम छोर होता है? बस जीवन देवदार जैसा ही बन जाए!
पर्वतों के ऊपर भी समतल होता है। बहुत सारा स्थान। वातावरण एकदम शुद्ध। गहरी सांस लेकर उस प्राण वायु को अपने अन्दर समेट लेने की प्रतिपल इच्छा होती है। दूर दूर से आकर पक्षी भी यहाँ गुटरगूं करते हैं। पैरों की धरती के नीचे दबा होता है बेशकीमती खजाना, बस थोड़ा सा खोदों तो न जाने जीवन के कितने रत्न यहाँ दबे मिल जाते हैं। जीवन का सबसे मधुर पल, जहाँ अब और ऊपर जाने की चाहत नहीं रहती। अब और परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं रहती। अब और फल और फूल बिखरने की जरूरत नहीं होती। बस संघर्ष के दिन समाप्त, अब तो केवल प्रकृति को निहारना है। देखनी है अठखेलियां वृक्षों पर बैठे नन्हें पक्षियों की। देखने हैं बस रहे घौंसलों को और ममताभरी आँखों से उस रस को पीना है जो चिड़िया अपनी चोंच से अपने नवजात को चुग्गे के रूप में देती है। सब दूर से देखना है, आनन्दित होना है। आगे बढ़कर, दोनों बाहों को फैलाकर इस प्रकृति को अपने पाश में भर लेना है। कितने मधुर क्षण हैं, कितने अपने से पल हैं? साठ वर्ष पार कर लेने पर ठहराव की प्रतीति हो रही है। मन के आनन्द को बाहर निकालकर उससे साक्षात्कार करने की चाहत जन्म ले रही है। अनुभवों के निचोड़ से जीवन को सींचने का मन हो रहा है। खुले आसमान के नीचे, अपने ही बनाए पर्वत पर बैठकर जीवन की पुस्तिका के पृष्ठ उलट-पुलटकर पढ़ने का मन हो रहा है। कभी-कभी इन पर्वतों पर कंदराएं भी दिख जाती हैं, ये कंदराएं एकान्त में ले जाती हैं। तब हाथों में कूंची लेकर जीवन के रंगों से इन कंदराओं को रंगने का अपना शौक शायद पूरा हो सके। अब तो जीवन स्पष्ट है, सभी कुछ स्पष्ट दिख भी रहा है। बस इसके आनन्द में उतर जाना है। बहुत कुछ पाया है इस जीवन से। खोया क्या है? अक्सर लोग प्रश्न करते हैं। लेकिन खोने को कुछ था ही नहीं, इसलिए पाया ही पाया है। ना तो बचपन में चाँदी की चम्मच मुँह में थी और ना ही जहाँ इस पौधे को रोपा गया था वहाँ कोई बड़ा बगीचा था, तो खोने को क्या था? समुद्र मन्थन में विष भी था तो अमृत भी, इसी प्रकार जीवन मन्थन में विष भी था और अमृत भी। विष को औषधि मान लिया और अमृत को जीवन। बस कदम दर कदम बढ़ाते हुए पहुंच गए इस साठ वर्ष के पहाड़ पर। मन में संतोष है कि यह पहाड़ हमारा अपना बनाया हुआ है, यहाँ अब शान्तचित्त होकर दुनिया को अपनी दृष्टि से देखेंगे। पहाड़ के समतल पर एक बगीचा लगाएंगे, उस बगीचे में दुनिया जहान के पक्षियों को बुलाएंगे और उनकी चहचहाट से अपने मन को तृप्त करेंगे।
( अपने ही जन्मदिन 9 नवम्बर के अवसर पर, जो मुझे साठ वर्ष पूर्ण करने पर खुशी दे रहा है। इसे आज देव उठनी एकादशी पर लिखा गया है क्योंकि तिथि के अनुसार आज ही पूर्ण हो रहे हैं जीवन के अनमोल साठ वर्ष)
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