अजित गुप्‍ता का कोना

श्रीमती अजित गुप्‍ता प्रकाशित पुस्‍तकें - शब्‍द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्‍ध संग्रह) सैलाबी तटबन्‍ध (उपन्‍यास), अरण्‍य में सूरज (उपन्‍यास) हम गुलेलची (व्‍यंग्‍य संग्रह), बौर तो आए (निबन्‍ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं (संस्‍मरणात्‍मक यात्रा वृतान्‍त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।

Tuesday, December 28, 2010

“दोहा” लेखन और उसकी बारीकियों पर एक नजर – अजित गुप्‍ता

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ब्‍लाग लिखने से पूर्व नेट पर हिन्‍द-युग्‍म जैसी कुछ साइट की पाठक थी। हिन्‍द-युग्‍म पर कभी दोहे की और कभी गजल की कक्षाएं चलती थी। मैं इन दोन...
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Sunday, December 26, 2010

बड़े लोग अपनी चलाते हैं, वे बदमिजाज होते हैं – अजित गुप्‍ता

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एक वाकया याद आ रहा है। मेरे विवाह का अवसर था और मेरे पिताजी एक युवा डॉक्‍टर बराती से बहस कर रहे थे। पिताजी – मैं कहता हूँ कि बड़े लोग ज्‍या...
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Thursday, December 23, 2010

लघु कथा के वर्तमान दौर में कैसे करे लेखन? – अजित गुप्‍ता

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वर्तमान दौर लघुकथा लेखन का है। पूर्व में किसी भी पत्रिका में सद-विचार या चुटकुले प्राथमिकता से पठनीय होते थे। लेकिन आज इनका स्‍थान लघुकथाओं...
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Saturday, December 18, 2010

यादों के भँवर जब बनते हैं तो शब्‍द कहाँ-कहाँ टकराते हैं? - अजित गुप्‍ता

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आज सुबह से ही मन में भँवर सा उमड़ रहा है। भावनाओं के तूफान में बेचारे शब्‍द तेजी से घूम रहे हैं। उन्‍हें कहीं कोई मार्ग ही नहीं मिल रहा कि ...
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Saturday, December 11, 2010

व्यंग्य - सतयुग का आगमन अर्थात कलियुग का अन्‍त - अजित गुप्‍ता

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बड़े-बूढे़ कहते हैं कि कलियुग चल रहा है। लेकिन मुझे लगने लगा है कि हम सतयुग की दहलीज पर खड़े हैं। आपको विश्वास नहीं होता न ? कैसे होगा ? जब ...
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Wednesday, December 8, 2010

राजस्‍थान को मेरी आँखों से देखो, हमें मालूम है प्रेम के मायने – अजित गुप्‍ता

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  राजस्‍थान की जब बात आती है तब लोगों के मन में एक दृश्‍य उभरता है, बस बालू ही बालू। बालू के टीले, अंधड़, भँवर, कहीं कहीं उग आए केक्‍टस। ऊँट...
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Sunday, December 5, 2010

एक और लघुकथा - घर - अजित गुप्‍ता

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आज किसी भी घर में दस्‍तक दीजिए, एक साफ-सुथरा सा बैठक खाना एकान्‍त में उदास सा बैठा हुआ मिलेगा। उसके सोफे को पता नहीं कि उस पर कितने दिन पहले...
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