Monday, July 15, 2019

हम बड़े हैं, यही तो!


हम बड़े हैं, हम बड़े हैं यही तो! फोर्ड गाडी का विज्ञापन देखा ही होगा। सदियों से हमारी रग-रग में बसा है कि हम बड़े हैं, कोई उम्र से बड़ा है, कोई ज्ञान से बड़ा है, कोई पैसे से बड़ा है और कोई जाति से बड़ा है। बड़े होने का बहाना हर किसी के पास है। इस दौर में राजनेता कहते हैं – हम बड़े हैं, इसपर कानून के पहरेदार कहते हैं कि हम बड़े हैं। इन सबको पीछे धकेलते हुए पत्रकार कहते हैं कि हम बड़े हैं। जनता तो सबसे बड़ी है ही। बड़े होने का दर्प सभी को है लेकिन बड़े होने का उत्तरदायित्व किसी के पास नहीं है। मैं टीवी पर डीडी समाचार के अतिरिक्त दूसरे समाचार नहीं देखती हूँ, जागते रहो जैसी सनसनी फैलाने वाले समाचार बरसाती नालों की तरह होते हैं। कुछ दिन उफनते हैं फिर मिट्टी में मिल जाते हैं। लेकिन अपनी गन्दगी का प्रभाव छोड़ जाते हैं। मीडिया हाऊस केवल यह सिद्ध करने में लगे हैं कि हम बड़े हैं, हमारे पास शक्ति है, हमारी गाडी बड़ी है, हमें सारे अधिकार प्राप्त हैं। दो-तीन दिन से जो थूका-फजीती चल रही है उसके विपरीत कल डीडी न्यूज में एक समाचार था। कुछ मीडिया पर्सन विदेशों में जाकर भारत की किरकिरी कर रहे हैं, झूठ का आडम्बर रच रहे हैं। प्रसार भारती के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश ने कल जमकर मीडिया कर्मियों को लताड़ा। देश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है, संघ का एजेण्डा चल रहा है, सुप्रीम कोर्ट के जज तक संघ से ट्रेनिंग लेते हैं, आदि आदि। सारी दुनिया में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और पत्रकार स्वयं को  बड़ा सिद्ध करने में लगे हैं। बड़ा होना क्या होता है, यह इन्हें नहीं मालूम!
सदियों से इस देश की सबसे बड़ी समस्या यही रही है, हर वर्ग में बड़े होने की होड़ मची है, कोई ना कोई किसी ना किसी से बड़ा बन रहा है और नीचा दिखाने की मारकाट मचाने की जिद पर अड़ा है। अब तो सोशल मीडिया भी बड़ा बनता जा रहा है, अपना बड़प्पन दिखाने के स्थान पर बड़े होने की जिद इसे भी सवार है। किस समाचार को कितना दिखाना, कितनी प्रतिक्रिया करना, सोशल मीडिया भी भूलता जा रहा है। लग रहा है कि दो गाडियों की रेस है, दोनों एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में है। एक गाडी दूसरी को कट मारकर आगे निकल जाती है तो दूसरे का बन्दा चिल्लाता है कि वह कैसे हमें कट मार गया, हम बड़े हैं, उसे तू ने कैसे आगे निकलने दिया? बस हम भी ऐसे ही लगे हैं। तभी दूसरा विज्ञापन आता है, गाडी वाला घायल व्यक्ति को उठाकर गाडी में बैठाता है। हम घायल को वही छोड़ रहे हैं, समाज की समस्या का समाधान कैसे हो, कोई नहीं सोच रहा है बस बड़ा कौन है, सब यही सिद्ध करने में लगे हैं।
आजादी के बाद कुछ लोगों ने बड़े  होने का सर्टिफिकेट जारी करवा लिया, धीरे-धीरे वे किनारे होने लगे और 2014 के बाद काफी हद तक किनारे हो गये, बस सारा उत्पात यही से शुरू हुआ। क्या देश और क्या विदेश एक ही राग गाया जा रहा है कि देश बर्बाद हो रहा है। 20 करोड़ अल्पसंख्यकों पर जुर्म हो रहे हैं! कल सूर्य प्रकाश कहते हैं कि 10 साल तक देश में एक अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री था और उन्हें चलाने वाला रिमोट भी अल्पसंख्यक ही था, फिर कैसे अत्याचार हो गया? वे आगे कहते हैं कि भारत में एक अल्पसंख्यक वर्ग के प्रति अत्याचार की बात करने वाले यह नहीं समझा पा रहे हैं कि दुनिया में इतने मुस्लिम देश होते हुए भी कैसे रोहिंग्या और बांगलादेशी भारत में ही शरण क्यों लेना चाह रहे हैं? यहाँ अत्याचार हैं तो शरण क्यों? हमने चूहों के लिये बिल्ली पाली, अब बिल्ली के लिये कुत्ता पाल रहे हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिये मी-लार्ड बिठाये, फिर मीडिया बनाया, लेकिन ना मी-लार्ड न्याय दे पाएं और ना ही मीडिया तटस्थ रह पायी। अब सोशल माडिया के रूप में एक और रक्षक तैनात किया है लेकिन वह भी अराजकता फैलाने में माहिर हो गया है। सब बड़े बन गये हैं, कोई बड़प्पन नहीं दिखा रहा है।   

Tuesday, July 2, 2019

कबीले ही कबीले खड़े क्यों नहीं करते?


घर में हम क्या करते हैं? या तो आपस में प्यार करते हैं या फिर लड़ते हैं। जब भी शान्त सा वातावरण होने लगता है, अजीब सी घुटन हो जाती है और हर व्यक्ति बोल उठता है कि बोर हो रहे हैं। हमारे देश का भी यही हाल है, कभी हम ईद-दीवाली मनाने लग जाते हैं और कभी हिन्दुस्थान-पाकिस्तान करने पर उतर आते हैं। दोनों स्थितियों में ही ठीकठाक सा लगता है लेकिन जैसे  ही शान्ति छाने लगती है, बस हम बोर होने लगते हैं। फिर कहते हैं कि कुछ और नहीं तो क्रिकेट ही करा दो। क्रिकेट करा दिया लेकिन हराना तो पाकिस्तान को है, कितनी बार हराएंगे! जैसे ही मौका मिला फिर से हरा दिया।
हम भारतीय भी अपनी ताकत भी दिखा देते हैं और सामने वाले को छोड़ भी देते हैं। हमारे अन्दर माफ करने का भाव कूट-कूटकर भरा है, दुश्मन को चारों खाने चित्त करके, उसके सीने पर तलवार रखकर, बोल देते हैं कि जा माफ किया। दुश्मन फिर आ टपकता है, हम फिर माफ कर देते हैं। समस्या को जड़ से खत्म नहीं करते। लेकिन जब कोई समस्या को उखाड़ने की कोशिश करता है तो अपनी नाराजी प्रगट कर देते हैं। हमारी क्रिकेट टीम ने कहा कि ना रहेगा बाँस और ना बजेगी बांसुरी, तो समस्या खत्म कर दी। अब हम सब कुलबुलाए जा रहे हैं कि मजा  ही नहीं आया। समस्या खत्म तो हम बोर!
हमने सारी बाते कर लीं, हर पहलू पर बात कर ली, लेकिन हमने इंग्लेण्ड को अपनी ताकत दिखाकर माफ कर दिया इसपर बात नहीं की। खेल ही खेल में कोई 300 रन कैसे बना सकता है! तीन-तीन मेडन ओवर डालकर, एक भी छक्का लगाए बिना 300 रन बनाना, हँसी खेल तो नहीं था! लेकिन हमने अंग्रेजों के सीने पर तलवार रख दी और कहा की माफ किया।
खेल दोनों के बीच चल रहा था लेकिन सफाया खरपतवार का हो गया। जब मैदान ही साफ हो गया तो हमारा बोर होना लाजिमी ही है ना! सुबह उठकर जब तक हम रोज दुश्मन को गाली ना दें लें, तब तक चाय तक हजम नहीं होती, अब बेकार में ही बोर हो रहे हैं। बोर होते-होते हम गलियों में ही डण्डे चलाने लगे, तोड़-फोड़ मचाने लगे। हमारे देश में तो खुद ही हिन्दुस्तान-पाकिस्तान मचा है, हमें सीमा पार जाने की जरूरत ही नहीं है, जब भी बोर होते हैं, यहाँ ही लठ्मलठ्ठा हो जाते हैं।
सरकारें कहती हैं कि छोटी-मोटी लड़ाई है, दो दिन में चुप बैठ जाएंगे लेकिन हम कहते हैं कि लड़ाई इस पार और उस पार की है, सरकारों को कुछ करना ही पड़ेगा। हम फेस बुक पर एक स्टेटस को कॉपी करते हैं और जाकर मन्दिर की लाइन में खड़े हो जाते हैं। हम वर्जिश तक नहीं करते कि कभी हमें भी लाठी उठाना पड़े तो तैयारी तो कर लें, लेकिन नहीं!
क्रिकेट टीम ने दरियादिली नहीं दिखायी तो हम रूठ गये, दरियादिली दिखाकर जीत जाते तो भी नाराज हो जाते, कहते कि क्या जरूरत थी? असल में हम प्यार करना तो भूल ही चुके हैं,  हम जब अपनों से ही प्यार नहीं कर पाते तो दूसरों से कहाँ कर पाएंगे! लड़ाई करने की  हिम्मत भी खो चुके हैं बस तू बचा तू  बचा का खेल खेलते हैं।
जब सरकार सेना को आदेश देकर सर्जिकल स्ट्राइक करा देती है तो ताली बजा लेते हैं, नहीं करा पाती तो बोर हो जाते हैं। बोर होते हैं तो गाली देने लगते हैं कि साले निकम्मे हैं। खुद कुछ नहीं करते। अभी देश में ऐसा ही माहौल है, राजनेता संसद में चीर फाड़ कर रहे हैं, सेना सीमा पर लेकिन हम यहाँ फेसबुक  पर चिल्ला रहे हैं कि सरकारें कुछ नहीं करती।
वे भीड़ बनकर निकल जाते हैं अपने घरों से और तुम दुबक जाते हों, अपने घरों में। कुछ ना कर सको तो कम से कम मौहल्ला समिति ही बना डालो, कुछ दण्ड पेल लो, वर्जिश कर लो। थोड़ा त्याग तो कर लो मेरे भाई। कमा-कमाकर क्यों कठफोड़वे जैसा आचरण कर रहे हो, कमाना बन्द करो और सुरक्षित रहना शुरू करो। कबीले ही कबीले खड़े कर दो, फिर देखना कौन तुम्हारे मन्दिर की ओर झांकने की हिम्मत करता है!

Monday, July 1, 2019

ना दीदी बची ना मैया, बाबा पड़े अकेले!

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आजकल अपने राहुल बाबा बड़े सकते में हैं, अकेले राहुल बाबा ही नहीं सारा परिवार ही सकते में आ गया है। पहले क्या था कि गांधी परिवार खेत में दो-चार दाने डालते थे और दानों की जगह तेजी से खरपतवार उग आती थी तो वे सोचते थे कि देखों हमारे खेत में कितना दम है! लेकिन इस बार क्या हुआ कि जैसे ही राहुल बाबा ने हार-थककर, अपनी नाकामी को छिपाने के लिये रूठने का ढोंग किया तो उनके चारों ओर खरपतवार सरीखे उनके कार्यकर्ता भी सांत्वना को नहीं आए! किसी बन्दे ने यह तक नहीं कहा कि बाबा आप नहीं तो दीदी ही सही और दीदी नहीं तो मइया ही सही, बस यही चोट खा गया परिवार और सकते में आ गया।
दो चार जो इस खानदान की बगल में दबे पड़े रहते हैं, वे भी झूठ-मूठ का ही नाटक करते रहे लेकिन मुखर होकर कोई नहीं बोला कि बाबा आपके बिना तो हम अनाथ हो जाएंगे, आपके बिना भी जीना, कोई जीना है, लो हम भी आपके साथ ही धूणी रमा लेंगे। दिन में ही तारों का जमावड़ा आँखों के सामने आ गया, चक्कर से आ गये और तीनों लोकों के दर्शन एक साथ ही हो गये। रोज पूरा परिवार एक ही छत के नीचे एकत्र होता है, समस्या का कोई हल नहीं निकल पाता है लेकिन समस्या का विकराल रूप सामने आ-आकर डराने लगता है।
आखिर तीन दिन पहले विचार आया कि क्यों ना एक बार धमकी और दी जाए। धमकी दी कि मैं रूठ गया और तुम मनाने भी नहीं आये, मैं वापस आ रहा हूँ! पूरी पार्टी में भूचाल सा आ गया, बाबा की वापसी? इद्दी-पिद्दी को कहा गया कि इस्तीफा दो और कचरे के ढेर सा इस्तीफे का पुलिन्दा इकठ्ठा हो गया। बाबा ने कहा कि इस कचरे के ढेर का करूँ तो क्या करूँ! फिर समस्या वहीं की वहीं।
बाबा अब दोराहे पर खड़े हैं, उन्हें थामने वाला कोई नहीं है। वापसी भी कर लेंगे तो इज्जत की वापसी कैसे होगी! पंजाब में तो मुझे पहले ही अमरिन्दर सिंह घुसने नहीं देता, अब तो राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी घुसने के लाले पड़ जाएंगे! इन दोनों को ही मैं बली का बकरा बनाना चाह रहा था लेकिन इन्होंने गर्दन को ऊपर-नीचे किया ही नहीं, बस पेण्डुलम की तरह चलाते रहे!
वैसे भी कमलनाथ तो डेढ़ स्याणा है, 1984 में जमकर खून खराबा भी करा दिया और अब मुख्यमंत्री भी बनकर बैठ गया। अपने बेटे को भी चुनाव जिता दिया, यह अब मेरे चाळे क्या लगेगा! और वह अशोक गहलोत! दिखने में ही मेमना लगता है लेकिन है बहुत घाघ, मैंने साफ-साफ कहा कि तेरे बेटे के कारण हम हारे हैं लेकिन बन्दा टस से मस नहीं हुआ!
बहना के नाम पर भी कोई आवाज नहीं उठी! एक बार में ही उसकी इज्जत का फलूदा निकल गया! थोथे चने जैसी पच करके फूट गयी! उसने भी हद ही कर दी थी, उसे मोदी को ऐसा नहीं बोलना चाहिये था! अब इतनी अक्ल तो उसमें होनी ही चाहिये थी कि मेरे देखा-देखी ना करे, मुझे तो सभी जानते हैं कि मैं एक नम्बर का गया गुजरा हूँ, लोग बस झेल रहे थे, लेकिन बहना को तो ध्यान रखना ही चाहिये था! जीजा के कारण लोग वैसे ही खाल उतारने को तैयार बैठे थे और इसने सूखी घास में तीली लगा दी!
लेकिन इतना बड़ा साम्राज्य ऐसे ही छोड़ा नहीं जा सकता है, इतने सारे इस्तीफों का जो ढेर लगा है, उसे ही बहाना बना लिया जाए कि लोग कितना प्यार करते हैं, मुझे! वापस लौट चलते हैं अपने सिंहासन पर। इज्जत की ऐसी-तैसी, वैसे भी कौन सी है! जेल में सड़ने से अच्छा है कि बे-गैरत होकर सिंहासन पर वापस बैठ जाता हूँ। ममा से भी नहीं पूछ सकता क्योंकि सत्ता जहर है, वह तो पहले ही यह बता चुकी हैं। उहापोह में पड़े हुए हैं बाबा! वापसी का कोई रास्ता दिखायी दे नहीं रहा है!
उधर से तस्वीरे आ रही हैं मोदी की! पुतिन उनको सुनने को उतावला हो रहा है, ट्रम्प भी कैसे बैठा था मोदी के सामने! शी जिनपिंग ने भी दोस्ती का हाथ थाम रखा था। मोदी जापान में ऐसे घूम रहा था जैसे सबका नेता वही हो! मैं तो चींटी बराबर भी नहीं हूँ इसके सामने, मुझे अब कोई भी मसल देगा! हे यीशू मसीह अब तू ही पार लगा। मैं जाऊँ तो कहाँ जाऊँ? तेरी तरह सूली पर लटकना नहीं चाहता, अफलातून सा घूमना चाहता हूँ। ना कोई जिम्मेवारी हो और ना ही जवाबदेही बस राज ऐसा हो। इसबार मुश्किल घड़ी है, दीदी का बुलावा नहीं है, मैया का भी नहीं है, बस मैं कुरुक्षेत्र में अकेला खड़ा हूँ! दया कर प्रभु!

Sunday, June 30, 2019

नेहरू - शेख अब्दुल्ला और कश्मीर?

किताबों के पन्ने पलटने का खेल बहुत खतरनाक है, वह भी इतिहास की किताबें। अब इतिहास तो तुम्हारे पुरखे ही लिख गये थे, तुम्हारे अपने लोग ही बता गये कि उनके काल में क्या घटा था! बस तुमने कभी पढ़ा नहीं और आज ये पढ़कर आ गये। जैसे-जैसे इतिहास के पन्ने पलटते गये, संसद में मौन पसरता गया। बेचारा मनीष तिवारी, कभी मणिशंकर, दिग्गी चाचा से भी बड़ा नाम हुआ करता था, आज मायूसी से घिरा था। एक कोन में अपने अधीर बाबू भी चुप लगाए बैठे थे। गाय-बछड़ा तो शायद जगंल की सैर पर गये थे। वैसे भी उन्हें भारत के इतिहास का पता नहीं, वे तो गाली देकर ही काम चलाया करते हैं तो भला ऐसी गम्भीर चर्चा के समय उनका काम भी नहीं था! कश्मीर के इतिहास पर प्रकाश डाल रहे थे अपने अमित जी, साथ में थे जितेन्द्र जी। कश्मीर की बात आएगी तो नेहरू सबसे पहले आएंगे ही, शेख अबदुल्ला का नाम भी लिया ही जाएगा। कैसे नेहरू ने हरिसिंह के हस्ताक्षर के बाद भी कश्मीर को विवाद का विषय बना दिया, यह बात तो बढ़-चढ़कर आएगी ही! जिस शेख अब्दुल्ला को नेहरू ने 16 वर्ष तक कैद रखा, उसे पलक झपकते ही उनकी बेटी इन्दिरा ने कैद से मुक्त कर दिया और मुख्यमंत्री भी बना दिया! आज संसद में शोर मचा रहे थे कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव क्यों नहीं करवाते? ये सोचते हैं कि लोकतंत्र के मायने कांग्रेस की जेब है, जब जेब से पर्चा निकाला और कभी फाड़ दिया और कभी अभय दे दिया!
हमारे अमित भाई शाह ने बताया कि तुम्हारे नेहरू ने क्योंकर युद्धविराम कराया था? तो हमारे नेता का नाम मत लो, नाम मत लो, का शोर मच गया। अभी दो दिन पहले ही शोर मचा था कि हमारे नेता का नाम क्यों नहीं लिया, क्यों नहीं लिया! भाई लोगों तय तो कर लो कि नेहरू का नाम लेना है या नहीं! देश का विभाजन नेहरू कराए, उसमें लाखों लोग का कत्ल हो जाए लेकिन नेहरू महान कहलाएं, यह तो अचम्भे की बात है! 563 रियासतों का भारत में विलीनीकरण सरदार पटेल कराए और कश्मीर नेहरू अपनी मुठ्ठी में रख ले फिर विवाद का विषय बना दे, लेकिन उनके वारिस कहें कि जिक्र मत करो, यह तो घोर अचम्भे की बात है! नेहरू की वंशावली का देश में जिक्र ना हो, हम विवाह भी करते हैं तो सप्तपदी के समय पण्डित जी सात पीढ़ियों का नाम पूछते हैं लेकिन यहाँ देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाता है और दो पीढ़ी का नाम भी पता नहीं! कैसे विश्वास कर लें हम की तुमने और तुम्हारे नेहरू ने आजादी के समय ही कश्मीर का सौदा भी नहीं किया हो! इतिहास के पन्नों की खुदाई होनी चाहिये, गम्भीरता से होनी चाहिये कि आखिर नेहरू कौन था और उसने क्या-क्या कारनामें किये थे? सुभाष बोस पर उनका व्यवहार संदेह के घेरे में हैं, आजादी के नाम पर बंटवारे का खेल संदेह के घेरे में है और कश्मीर का खेल संदेह के घेरे में है। ऐसे छोटे-मोटे अनेक खेल संदेह के घेरे में है। कैसे सरदार पटेल और राजेन्द्र बाबू जैसे विशाल व्यक्तित्व हमारे पास थे फिर भी नेहरू को देश सौंप दिया गया, इसकी गम्भीरता से पड़ताल होनी चाहिये। इन पाँच सालों में देश के सामने दूध का दूध और पानी का पानी होना ही चाहिये। नेहरू के नाम पर संसद में शोर मचाने वालों को मुँहतोड़ जवाब देना चाहिये। आज देश गम्भीर साम्प्रदायिक तनाव से गुजर रहा है और यह तनाव धर्म के आधार पर विभाजन से उपजा है, आज प्रत्येक भारतीय संकट में घिरा है। यदि इन प्रश्नों के उत्तर शीघ्र देश के सामने नहीं आए तो देश को एक ओर कुरुक्षेत्र के लिये तैयार होना होगा क्योंकि इस बार बँटवारा नहीं होगा अपितु विलीनीकरण होगा। संसद में शोर मचा लिया, कामकाज ठप कर दिया, इससे अब काम नहीं चलेगा। नेहरू का इतिहास समग्रता से सामने लाना ही होगा। खंगालनी पड़ेंगी फाइलें जिसमें दुरभिसंधियां चुपचाप पड़ी हैं क्योंकि प्रश्न केवल भारत को बचाने का नहीं है एक ऐसी संस्कृति को बचाने का है जिसने दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाया था। भारत कहाँ नहीं था, सम्पूर्ण दुनिया में इसके निशान मौजूद हैं अभी दो दिन पहले ही इरान में श्रीराम की मूर्ती निकली है। जब से हमने भारतीय संस्कृति को मिटाने का प्रयास किया है तभी से आतंक और हिंस का बोलबाला रहा है। इसलिये सच्चाई तो देश के सामने लानी ही होगी। इतिहास के पन्ने फड़फड़ा रहे हैं, बस इन्हें देश के सामने लाने की जरूरत है।

Saturday, June 29, 2019

मिट्टी पलीद करवा ली ना!


मिट्टी पलीद कराना किसे कहते हैं, यह देखना हो तो कल राज्यसभा में देखना चाहिये था। मोदीजी हेडमास्टर बने हुए थे और सामने फैल हो गयी कांग्रेस की क्लास थी। अब मोदीजी डाँट रहे थे कि तुमको इस आसान प्रश्न का भी उत्तर नहीं आया? सरदार वल्लभ भाई  पटेल भी याद नहीं रहे तुमको! क्लास में केवल हीही करने ही आते हो या कुछ ध्यान से भी सुनते हो, बस जो मास्टर कहे उसकी खिल्ली उड़ा देते हो! सरदार पटेल तुम्हारे ही नेता थे ना! हमने कहा था कि यदि ये देश के प्रथम प्रधानमंत्री होते तो आज कश्मीर समस्या नहीं होती लेकिन यह तो हमारी बात थी, तुम्हें याद नहीं रही तो कोई बात नहीं लेकिन तुम्हें तो यह भी याद नहीं रहा कि सरदार पटेल ने देश की 563 रियासतों का विलीनीकरण कराया था, बोलो कराया था या नहीं? यह तो तुम्हें याद है ना! वे तुम्हारे स्कूल के ही हेडमास्टर थे ना! तो तुम यह भी भूल  गये, परीक्षा में खाली कॉपी छोड़ आए! इसके बाद मोदीजी कुछ नरम पड़े, बोले कि जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब तो सरदार पटेल की स्टेच्यू ऑफ यूनिटी पर जाकर नमन कर आओ, क्या कहा कि पैसे नहीं हैं तो ऐसा करो कि वहाँ मीटिंग ही रख लो, लेकिन अपने नेता को याद तो कर आओ। कैमरामेन भी कैमरा घुमा नहीं पा रहा था, एक तरफ चिदम्बरम मुँह को गोड़े में छिपाये बैठे थे तो दूसरी तरफ गुलाम नबी आजाद और आनन्द शर्मा कई बार के फैल छात्र की तरह फी-फी करके हँस रहे थे।
मोदीजी ने आगे कहा कि खाली कॉपी छोड़कर आते हो और कहते हो कि नम्बरों की गणना ठीक नहीं हुई। बेचारी मशीन क्या करेगी? चिल्लाते हो कि देश हार गया, हिन्दुस्थान हार  गया! साफ-साफ क्यों नहीं बोलते कि पाकिस्तान हार गया! वायनाड़ में तो जीता ना! रायबरेली में भी जीता ना! हाँ तुम्हारे लिये अमेठी में जरूर हारा! भूल जाओ यह कहना कि हिन्दुस्तान ही कांग्रेस है और कांग्रेस ही हिन्दुस्तान है। यह स्कूल अब तुम्हारे नाम से नहीं जाना जाता बहुत सारे नये और होशियार छात्र यहाँ आ चुके हैं। इन छात्रों ने दुनिया में नाम ऊँचा किया है यहाँ का। बहुत मिट्टी पलीद की रे! जानते-बूझते भी क्यों ऊल-जुलूल बहस करते हैं और फिर सदन में जब डाँट पड़ती है तो मुँह लटकाकर बैठ जाते हैं! एकदम से फिसड्डी छात्र हैं, एक भी विषय में पास होने लायक नहीं बस हेराफेरी में माहिर, झूठ बोलने का कोर्स कर रखा है, गाली देने की तो माँ-बाप ने ही खुली छूट दे रखी है। ये कब तक छात्र कहलाएंगे? ऐसा ना हो कि इनके स्कूल से ही निकाल दिया जाए!
उच्च सदन याने कि राज्यसभा! कांग्रेस की सदस्य संख्या भाजपा से अधिक, लेकिन एक भी मुद्दे की बात नहीं। कहते हैं कि यह सदन विद्वानों के लिये बनाया है लेकिन यहाँ जो बैठे हैं वे तो केवल धूर्तों की जमात भर है। एक से एक धूर्त बात यहीं से आती है, ईवीएम का रोना भी यहीं से शुरू होता है, भाजपा जीत गयी और देश हार गया, यह कथन भी यहीं से आता है। हल्ला मचाना, सदन को चलने नहीं देना, कुछ भी बोल देना सब कुछ यहीं की देन है। क्या औचित्य है ऐसे सदन का? जो केवल नकारात्मक सोच के साथ चलते हों! कॉफी  हाऊस हुआ करते थे किसी जमाने में, वहाँ जमावड़ा रहता था तथाकथित बुद्धीजीवियों का। बस ऐसी की कुटिलता भरी बाते वहाँ होती थी, आज स्वरूप बदल गया है, मोटी पगार वाले हो गये हैं। लेकिन चरित्र वही है। मोदीजी ने यह भी कहा कि यह मत समझिये कि आपको कोई नहीं देख रहा है, आपके व्यवहार से चुनाव में हार-जीत नहीं होती है! जितना आप नकारात्मक बोलेंगे उतना ही हारेंगे। अब आपने तीन साल तक अपने नेता की तगारी उठाते  हुए फोटो का प्रचार किया, इससे देश का क्या भला हुआ लेकिन हमने कहा कि हाथ धोकर खाना खाना चाहिये तो आपने विरोध किया! जो शिक्षाप्रद विज्ञापन थे उनका विरोध और जो केवल प्रचार थे उनका समर्थन! यह आचरण आपको हराता है। खैर मोदीजी की क्लास बहुत लम्बी थी, लेकिन थी मजेदार। आईना भी दिखा दिया और बता भी दिया कि चेहरे पर धूल होने पर आईने को साफ नहीं किया जाता। लेकिन मैं दावे से कह सकती हूँ कि ये सारे इतने ठीट हैं कि इनकी खाल गैंडे की है, कोई असर नहीं। कोई बात नहीं, बार-बार होगी मिट्टी पलीद, हमारा क्या!  हम तो लिख्खाड़ है, फिर लिख देंगे।

Thursday, June 27, 2019

एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह

आपको चेहरे पर यह मायूसी! आपका चेहरा गमगीन! आपका चेहरा मुरझाया हुआ! आप तो मक्कारी के लिये जाने जाते हैं, आप तो आँख मारने के लिये पहचाने जाते हैं, आप तो नुक्कड़ के लौण्ड़ों-लपाड़ों जैसी हरकत के लिये जाने जाते हैं! फिर भला यह मक्कारी कहाँ गायब है? आपके चारों तरफ जो घेरा था, वह भी तो नदारद है! भला आप करें भी तो क्या करें! आपने एक नवीन गालीबाज को अखाड़े का उस्ताद बनाकर उतारा, लेकिन उसने तो आपके चेहरे से मक्कारी का नूर ही छीन लिया! पहले तो आप खुश हुए कि चेले ने शुरूआत गाली देकर ही की है, मणि, दिग्गी जैसे शातिर पास नहीं हैं तो क्या? नए उदय हो रहे हैं! भला भारत में विषधरों की कहाँ कमी हैं! लेकिन अभी आपको खुश होने को दो पल भी नहीं मिले थे कि इस नये दंगलबाज ने तो आपकी ही खटिया खड़ी कर दी। सीधे ही मी-लार्ड को चैलेंज कर दिया! हिम्मत हो तो हाथ लगाओ मेरे आकाओं पर? अरे बाबू मोशाय, सिपाही को ही उकसा रहा है कि चोर को पकड़कर दिखा! जैसे-तैसे करके जमानत पर छूटा हूँ और यह नासमझ चैलेन्ज दे रहा है!
पूरे चुनाव में मैंने विकास की कोई बात नहीं की, बस गाली देकर ही काम चलाया, चोर-चोर कहकर ही जनता का ध्यान बंटाया लेकिन यह मूर्खाधिराज काम गिनाने बैठ गया, कि हमने यह किया, हमने वो किया! यदि हमने किया होता तो ये आते क्या! यह मोदी तो चाहता ही यह है कि हम सीधे काम की बात पर आ जाएं और फिर आंकड़ों का खेल शुरू हो जाए! मुझे तो याद भी नहीं कि मैंने कौन सी डिग्री ली थी! क्योंकि मेरे मुँह से तो गाली के अतिरिक्त कुछ निकलता ही नहीं! गणित तो मेरे सपने में भी नहीं आती। लोग कहते रहे कि मोदी 50 करोड़ लोगों की रसोई और तिजोरी तक पहुँच गया है, अब मेरी गणित अच्छी होती तो समझ आता कि 50 करोड़ का मतलब क्या होता है! मेरे लिये तो काला अक्षर भैंस बराबर हो गया था। मुझे समझ ही नहीं आया कि कितने लोगों को गाली और चोर-चोर के खेल से भ्रमित कर लूंगा! मैं समझता रहा कि बस एक ही सम्प्रदाय है जो मेरी कस्ती को पार लगा देगी, लेकिन यह भूल गया था कि कि ऐसे कट्टरपंथी वोट अधिक से अधिक 10 करोड़ होंगे, मेरे चेले चपाटे कितने होंगे? 50 करोड़ में से मैं कितने काट लूंगा? 10 या 20! बाकि 30 तो मोदी के पास ही रहेंगे ना! गणित किसी की भी ठीक नहीं थी क्या? मनमोहन सिंह तो अर्थशास्त्री है, फिर उसने क्यों नहीं बताया? खैर वह तो मौन रहता है, मेरे कहने पर ही बोल पाता है, उसको क्या भला-बुरा कहूँ! मेरी बहन तो करोड़ो का खेल खेलती है, फिर उसने सावधान क्यों नहीं किया? जमीन हड़पने में और जमीनी हकीकत देखने में अन्तर होता है, अब मैं समझ पा रहा हूँ। त्याग-पत्र तो पहले ही दे चुका हूँ लेकिन दूसरा कोई तैयार नहीं हो रहा। तैयार होते ही चुपचाप कहीं निकल लूंगा, वैसे भी फिर माँ के पल्लू से लगकर बैठने का अवसर शायद ना मिले। मैं चुपचाप अपने ही नेता के शब्दों से निकले तीरों को झेल रहा था और कल्पना कर रहा था कि कितने बाण सामने से आएंगे? मैं छिपा रहा, बचता रहा, लेकिन उस जयन्त सिन्हा ने तो सीधे ही पूछ लिया कि अब अध्यक्ष रहे हैं या नहीं। लोगों ने भी कह दिया कि नहीं! मैं दम साध कर बैठा था कि अखाड़े का सबसे दबंग पहलवान आकर मुझे कैसी-कैसी पटकनी देगा लेकिन मुझे थोड़ी राहत मिली जब उसने कह दिया कि जमानत एनजॉय करो! सहिष्णुता, लिंचिंग आदि समस्याओं से मुझे धैला भर भी फर्क नहीं पड़ता, आपातकाल भी मेरी चिन्ता का विषय नहीं है बस चिन्ता एक ही है कि पासपोर्ट जब्त ना हो जाए. इस अधीर बने हुए नये नेता के कारण। पासपोर्ट में तो कितने राज छिपे हैं, तब क्या होगा! न्यायालय कह दे कि हमें चैलेंज कर रहे हैं तो लाओ फाइल, अब न्याय करते हैं। वैसे भी न्याय करने का इन्हें शौक चर्राया था, तो हम ही कर देते हैं। फिर भला जज भी हमारी आस में कब तक बैठे रहेंगे? वे भी तो अपने आकाओं का बदलाव कर सकते हैं ना! इसलिये मैं आज लुटा-पिटा सा बैठा हूँ, मेरे सामने प्रलय आ गयी है। अब आप कह लो कि - एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह! कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे! जो कभी अपनी महफिल हुआ करती थी, आज परायी क्यों हैं? मेरे चेहरे पर अब नूर नहीं बेचैनी ही रहेगी। मुझे माफ करना।

Monday, June 24, 2019

खानदान पुराना और खानसामा नया



मणि नाम का साँप वापस अपने बिल से निकला, चारों तरफ देखा कि बाढ़ का पानी उतर तो गया है ना? कहीं जंगल में मोर तो नाच नहीं रहें हैं ना? आश्वस्त हुआ फिर बिल से बाहर आया। नहीं, कोई खतरा नहीं। जैसे ही बिल से थोड़ा दूर ही चला था कि पता लगा, मालिक पर संकट गहराया है। मालिक सिंहासन खाली करने की जिद पर अड़े हैं। वह सरपट दौड़ लगाकर दरबार तक पहुँचा, देखा कि सन्नाटा पसरा है। सारे ही जीव फुसफुसा रहे हैं, सभी के मुँह पर चिन्ता पसरी है। मालिक ने एक माह का समय दिया था, वह पूरा होने में है। सारे देश में मुनादी फिरा दी गयी है कि मालिक के पैर की जूती सिंहासन के लिये चाहिये लेकिन लोग पैर की जूती बनकर भी सिंहासन पर बैठना नहीं चाहते! डरते हैं कि कहीं सीताराम केसरी जैसा हाल ना हो जाए! भला किसकी औकात है जो मालिक की बराबरी कर सके? आखिर कहा तो यही जाएगा ना कि मालिक की जगह ये बैठे हैं सिंहासन पर! नहीं बराबरी तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन मालिक है कि मान ही नहीं रहे हैं। असल में मालिक बोर हो गये हैं, कब तक एक ही मोदी को गाली देते रहें! वे हवा परिवर्तन को जाना चाहते हैं। मणि नाम के साँप को मालिक का उठाया हर कदम ऐसा ही लगता है जैसे प्रभु ने कदम उठाया हो! लेकिन मणि को गुस्सा भी बहुत  है कि मालिक के सिवाय किसी भी ऐरे-गैरे-नत्थू-गैरे को मालिक तो नहीं कहा जाएगा! वह सोच में पड़ गया, क्या बोले समझ नहीं आ रहा था। तभी दरबार से आवाज आयी, अरे देखो, अपना परम विषधर मणि साँप आ गया है! सारे दरबारी नाचने लगे, इसके जहर का तो तोड़ नहीं है तो बता मणि ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाए?
मणि बोला कि करना क्या है, याद करो, पहले मालिक के प्रति वफादारी किसने निभायी थी। एक ने कहा कि सर, नेहरू के बाद ऐसा ही संकट पैदा हुआ था, इन्दिरा जी सिंहासन  पर बैठने में झिझक रही थी तो एक बौने से नेता को हमारे पूर्वजों ने सिंहासन पर बिठा दिया था। अभी बात भी पूरी नहीं हुई थी कि चारों तरफ से शोर उठ गया, नाम मत लो, ऐसे .... का। वह तो इन्दिरा जी का ऐसा प्रताप था कि उनको दूसरे देश में भेजकर हमेशा के लिये सुला दिया गया था, नहीं तो उसने इस खानदान को ही उलटने की तैयारी कर ली थी! चारों तरफ खामोशी छा गयी। तभी एक ओर से आवाज आयी कि एक जमाने में हमारे मालिक के ही वंशज हमारे प्रदेश की यात्रा पर आए थे, हमारे मुख्यमंत्री ने अपना कंधा आगे कर दिया था कि हुकुम आप इसपर पैर रखकर नीचे उतरें! इतनी वफादारी निभायी थी हमारे प्रदेश ने। इसलिये हमें अवसर मिले और हम मालिक के वफादार बनकर सिंहासन की रक्षा कर सकें। मणि साँप ने कहा कि बात तो उचित है। हम किसी को सिंहासन पर बिठा तो सकते हैं लेकिन सिंहासन का स्थान 10, जनपथ ही रहेगा और इसकी डोरी हमारे मालिक के पास ही रहेगी। बोलो मंजूर है? हम जैसे पालतू लोगों के लिये एक ठिकाना होना ही चाहिये, हम ठोर नहीं बदल सकते। अब कोई मुझ से कहे कि मैं बिल की जगह खुले खेत में रहने लगूँ तो कितने दिन जीवित रह सकूंगा? इसलिये तलाश करिये किसी अमचे-चमचे की, जो सदैव भगोने में रहने को बाध्य रहे। साँस भी लेनी हो तो मालिक से पूछकर ले। बस कुछ दिनों की बात है, मालिक तफरी से लौट जाएंगे और फिर ड्यूटी खत्म। फटी जेब का कुर्ता पहनकर मालिक बोर हो चले हैं, उन्हें नया कुछ चाहिये। जाने दीजिए उन्हें बैंकाक या लन्दन, जहाँ उनका मन करे, बस तरोताजा होने दीजिए। जब वापस लौटेंगे तब देखना उनके पास गालियों का भरपूर भण्डार होगा। मैं भी मालिक के साथ ही रहूँगा, उन्हें रोज थोड़ा-थोड़ा विष का सेवन कराऊंगा, जिससे वे अधिक जहर उगल सके। आप लोग चिन्ता ना करें, अब मैं आ गया हूँ. सब ठीक कर दूंगा। बस ध्यान रहे कि भूलकर भी नये व्यक्ति को थोड़ी सी भी स्वतंत्रता मत देना। हमारे मालिक और हमारे मालिक का खानदान जब तक सूरज-चाँद रहेगा, तब तक रहना चाहिये। मैं साँप का वंशज, वचन देता हूँ कि मैं पृथ्वी पर अनादि काल से रहता आया हूँ, आगे भी रहूँगा, मेरे जहर से ना कोई बचा है और ना आगे भी बचेगा। लेकिन, लेकिन हकलाता सा एक कार्यकर्ता बोला कि आपके जहर से यह मोदी नामका नेता तो मरता नहीं हैं! आपके जहर में तो असर है ही नहीं, आप तो केवल फूंफकारते हो! मणि साँप धीरे से खिसक लिया, बोला कि मेरे विश्राम का समय हो गया है। जय मालिक, जय मालिक कहता हुआ वह वहीं अपने पुराने बिल में घुस गया। बस जाते-जाते कहता गया कि किसी को भी बिठा दो, लेकिन मालिक के खानदान पर आँच नहीं आनी चाहिये। बस खानदान पुराना और खानसामा नया।