Thursday, October 31, 2013

कहां गयी वो गरमा-गरम बहसें?

कहां गयी वो गरमा-गरम बहसें?
कभी नारीवाद के नाम पर, कभी राष्‍ट्रवाद के नाम पर, कभी सत्ता की नजदीकियों के कारण, कभी अन्‍ना हजारे और रामदेव आन्‍दोलन के कारण ऐसे ही न जाने कितनी बहसें हम ब्‍लाग पर करते आए थे। लेकिन आज सभी खामोश हैं। क्‍या बहस चुक गयी या फिर उसे निरर्थक मान लिया गया?

Wednesday, October 23, 2013

पृथकता और सत्ता की चाहत

प्रत्‍येक व्‍यक्ति पृथक होकर स्‍वतंत्र होना चाहता है क्‍यों? शायद वह स्‍वयं की सत्ता चाहता है। किसी का प्रतिबंध नहीं, किसी का अनुशासन नहीं, किसी की दखलंदाजी नहीं, बस स्‍वयं की सत्ता। देश से लेकर समाज और समाज से लेकर परिवारों में स्‍वतंत्रता और सत्ता की चाहत दिखायी देती है।
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Thursday, October 17, 2013

आपके जीवन में मैं हूँ

आपके जीवन में मैं हूँ
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Tuesday, September 17, 2013

Tuesday, September 10, 2013

कुछ गर्द उड़ी कुछ सीलन थी

 जिन अध्‍यायों को मन बिसरा बैठा था, वे एक-एक कर निकल आए। कहीं गर्द थी और कही सीलन थी। कहीं प्रकाश था तो कहीं उल्‍लास भी था। लेकिन अब रेत हाथ से फिसलने लगी है, संचय का अर्थ दिखायी नहीं देता।
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Friday, September 6, 2013

छोटे कस्‍बे का बड़ा संघर्ष - श्रीमती संतोष अरोड़ा

छोटे कस्‍बे का बड़ा संघर्ष - श्रीमती संतोष अरोड़ा
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Wednesday, August 28, 2013

बिना अभिव्‍यक्ति, व्‍यक्ति बौना

 मन मन की संतुष्टि के लिए अभिव्‍यक्ति आवश्‍यक है। समाज में सौहार्द के लिए मन की संतुष्टि आवश्‍यक है। अभी भी देर नहीं हुई है, बस टटोलिए अपने मन को और उसे अभिव्‍यक्‍त करने के अवसर तलाशिए। अभिव्‍यक्ति में ही परम शान्ति है।http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D/