Tuesday, September 17, 2013

Tuesday, September 10, 2013

कुछ गर्द उड़ी कुछ सीलन थी

 जिन अध्‍यायों को मन बिसरा बैठा था, वे एक-एक कर निकल आए। कहीं गर्द थी और कही सीलन थी। कहीं प्रकाश था तो कहीं उल्‍लास भी था। लेकिन अब रेत हाथ से फिसलने लगी है, संचय का अर्थ दिखायी नहीं देता।
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Friday, September 6, 2013

छोटे कस्‍बे का बड़ा संघर्ष - श्रीमती संतोष अरोड़ा

छोटे कस्‍बे का बड़ा संघर्ष - श्रीमती संतोष अरोड़ा
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Wednesday, August 28, 2013

बिना अभिव्‍यक्ति, व्‍यक्ति बौना

 मन मन की संतुष्टि के लिए अभिव्‍यक्ति आवश्‍यक है। समाज में सौहार्द के लिए मन की संतुष्टि आवश्‍यक है। अभी भी देर नहीं हुई है, बस टटोलिए अपने मन को और उसे अभिव्‍यक्‍त करने के अवसर तलाशिए। अभिव्‍यक्ति में ही परम शान्ति है।http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D/

Wednesday, August 7, 2013

मृत्‍यु का सैलाब और अपनों के हाथ में तराजू

भाई नहीं रहा ! यह सूचना है या फिर काल जलधि की हलचल। मन के अनन्‍त में एक लहर सी उठती है, एक शून्‍य बन जाता है। मन का एक कोना टूटकर बिखर जाता है। मन हाहाकार कर उठता है। टूटे हुए कोने को जोड़ने में लग जाता है मन। अपने सगे सम्‍बन्धियों की बाहों में लिपटकर बह जाना चाहता है पीड़ा का सैलाब और भर लेना चाहता है कुछ बूंद प्रेम-रस की।
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Wednesday, July 31, 2013

कलाकार और सम्‍मान

यदि आज ये कलाकार नहीं होते तो हमारा जीवन कैसा होता? हम प्रकृति के समक्ष खड़े होते, निहत्‍थे बनकर। लेकिन मनुष्‍य ने प्रकृति को संवार दिया, उसे सुसंस्‍कारित कर दिया। आज सृष्टि का जो स्‍वरूप हमें दिखायी देता है, वह स्‍वरूप इन कलाकरों के कारण ही है। इनके लिए जितने भी शब्‍द लिखे जाएं, वे कम हैं।