Friday, April 27, 2012

हम अक्‍सर “यूज” होते हैं


हम अक्‍सर “यूज” होते हैं 
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Thursday, March 29, 2012

रिश्‍तों में एक खुशबू होती है, बस उसे मुठ्ठी में भरने की जरूरत है

रिश्‍तों में एक खुशबू होती है, बस उसे मुठ्ठी में भरने की जरूरत है 
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Friday, March 9, 2012

कविता के नाम पर फूहड़बाजी को कब तक बर्दास्‍त करें?

कविता के नाम पर फूहड़बाजी को कब तक बर्दास्‍त करें?
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Tuesday, February 21, 2012

रेलवे, सीनियर सि‍टीजन के लिए लोअर-बर्थ आवश्‍यक करे


भारतीय रेल, दुनिया की सबसे विशाल परियोजना है। लाखों यात्री प्रतिदिन एक शहर से दूसरे शहर और छोटे-छोटे गाँवों तक रेल के द्वारा ही यात्रा करते हैं। वर्तमान में महिलाओं के लिए 58 और पुरुषों के लिए 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के व्‍यक्तियों के लिए रियायती दरों पर यात्रा का प्रावधान है। कुछ वर्ष पूर्व घोषणा हुई थी कि पचास वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को शयनयान डिब्‍बों में नीचे की शय्‍या मिलेगी। लेकिन यह घोषणा पूर्णतया लागू नहीं हो सकी।  इस माह मुझे कई बार रेल-यात्रा का अवसर मिला, कई बुजुर्गों को कठिनाई का सामना करते हुए देखा।
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Tuesday, January 31, 2012

एक आवश्‍यक परिवर्तन, शायद यही समय की मांग है।



कल मेरा याहू अकाउण्‍ट हैक हो गया परिणाम स्‍वरूप मेरे सारे ही कांटेक्‍टस समाप्‍त हो गए। यह तो किसी हैकर का कमाल था लेकिन हमारी सरकार द्वारा तो गूगल को प्रतिदिन चेतावनी दी जा रही है कि हम गूगल की सर्विस को बन्‍द कर देंगे। इसलिए मैंने भी एक परिवर्तन करने का निश्‍चय कर लिया। मैंने एक वेबसाइट प्रारम्‍भ की है – www.sahityakar.com  इसी पर वर्ड-प्रेस के माध्‍यम से अपना ब्‍लाग वहाँ शिफ्‍ट किया है। अभी ब्‍लागस्‍पाट पर भी मेरा ब्‍लाग रहेगा लेकिन धीरे-धीरे मैं पूर्णतया अपनी वेबसाइट पर ही आ जाऊँगी। अत: आप सभी से निवेदन है कि आप मेरी साइट पर जाकर मुझे सबस्‍क्राइब करें। जिससे आप मेरी पोस्‍ट पढ़ सकें और हम एक दूसरे से सम्‍पर्क में रह सकें। आभार।  

Wednesday, January 18, 2012

अतीत हमें वर्तमान में जीने नहीं देता



जिस किसी भी व्‍यक्ति के पास या देश के पास अपना अतीत नहीं होता वह वर्तमान में ही जीता है और भविष्‍य की कल्‍पना करता है लेकिन जिसके पास अतीत होता है वह अतीत में ही डूबा रहता है। वह वर्तमान में भी नहीं जी पाता और ना ही अपना भविष्‍य बना पाता है। एक बच्‍चे के पास उसका अतीत नहीं होता, वह वर्तमान को पूरी तरह से जीना चाहता है। प्रत्‍येक नयी वस्‍तु को पाना चाहता है। उसे पता नहीं होता कि अतीत क्‍या होता है? लेकिन इसके विपरीत एक प्रौढ़ व्‍यक्ति के पास उसका अतीत होता है इसी कारण वह अतीत में ही डूबा रहता है। अतीत के अनुभव उसे भविष्‍य की कल्‍पना भी नहीं करने देते। बच्‍चे के सामने एक नयी चमचमाती कार है, वह उसे पाने की कोशिश करता है। उसे पता नहीं कार के पहले भी कुछ था क्‍या। लेकिन इसके विपरीत उसके पिता ने कार के पहले का जीवन भी देखा है, कार से होने वाली दुर्घटनाएं भी देखी हैं तो वह अपने अतीत में चले जाता है और किशोरवय पुत्र को कार से दूर रहने को कहता है। किशोर अवस्‍था से युवावस्‍था में कदम ही रखा होता है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण पैदा हो जाता है। बस उसे आकर्षण का मालूम है उसका इतिहास मालूम नहीं। लेकिन उसके माता-पिता को मालूम है। वह अतीत का भय उसे दिखाते हैं। सोच समझकर कदम रखने की सलाह देते हैं। ऐसे ही कितने उदाहरण है। इसी अतीत के कारण नए और पुराने का द्वंद्व बना रहता है।
ऐसा ही देशों के साथ भी होता है। सम्‍प्रदायों के साथ भी होता है। भारत देश का स्‍वर्णिम अतीत रहा है इसलिए यहाँ के लोग केवल अतीत में ही जीते हैं। वे वर्तमान को भी उसी तराजू में तौलते हैं और भविष्‍य की कल्‍पना में भी अतीत को ही ले आते हैं। इसके विपरीत जिन देशों का अतीत नहीं है वे केवल वर्तमान में जीते हैं और भविष्‍य को कैसे सुखी रखे बस इसकी कल्‍पना करते हैं। लेकिन अतीत हमेशा हानिकारक ही नहीं होता। अतीत से अनुभव आता है और हमें सही मार्ग चुनने का रास्‍ता मिलता है। इसलिए दोनों पीढियां एक दूसरे का सम्‍मान करते हुए अपना मार्ग तय करें तो शायद हम सभी का भविष्‍य ज्‍यादा सुरक्षित रह सकता है। भारत भी यदि दूसरे देशों से वर्तमान में जीना सीख लें तो भारत का भविष्‍य भी ज्‍यादा सुखी हो सकता है। इस विषय के अनेक पहलु हैं, जब आप पढ़ेंगे तो लगेगा कि बहुत कुछ छूट गया है। मैंने चलाकर ही छोड़ा है, जिससे आप सभी अपने अनुभवों से इसे पूरा कर सकें।
( विशेष – बहुत दिनों से कोई पोस्‍ट नहीं लिखी थी, इसलिए यह संक्षिप्‍त सी पोस्‍ट प्रेषित कर रही हूँ ) 

Thursday, December 29, 2011

तो विदा 2011, क्‍या करें तुझे सर्दी में ही विदा करना पड़ रहा है!



बहुत दिनों से कोई पोस्‍ट नहीं लिखी गयी और इस साल ने भी अपने बोरिये-बिस्‍तर बाँध लिए। सोचा कि जाते-जाते साल में उसकी पेटी में एक कागज अपना भी और रख दिया जाए। टाइप करते हुए हाथ ठण्‍डे पड़ रहे हैं, उन्‍हें बार-बार सहलाना पड़ता है। इन दिनों बाहर बहुत रहना हुआ इस कारण कुछ नहीं लिखा गया और फिर अब ठण्‍ड ने अपना असर दिखा दिया है। आप सभी लोग भी श्री राज भाटिया जी के बुलावे पर साँपला जा आए। गन्‍ने खूब खाए गये, पिकनिक का सा अहसास हो रहा था, फोटो देखकर। गन्‍नों की मिठास हम तक भी पहुंच गयी है। जब आप लोग साँपला में मिलन कर रहे थे तब मैं भी चण्‍डीगढ़ में ही थी। बर्फ जमा देने वाली ठण्‍ड का मुकाबला कर के आ रही हूँ।
2011 अपनी अन्तिम घड़िया गिन रहा है। 2012 ने अपने नए कपड़े सिलवा लिए हैं। सारी दुनिया इस नए साल का स्‍वागत करने के‍ लिए होटलों में जुट गयी है। परिवार से दूर, होटल की छाँव में। नए साल का स्‍वागत करने के लिए स्‍वयं को खुमारी में डुबोने का भी पूरा प्रबंध कर लिया गया है। ऐसा लग रहा है जैसे हमने अपने घर के दरवाजे खोल दिए हों और खुद सुध-बुध खोकर कहीं लुढ़क गए हों। कह रहे हों, कि भाई आना है तो आ जाओ, हम तुम्‍हारे स्‍वागत में होश खो बैठे हैं। बेचारा नया साल आपके घर पर दस्‍तक दे रहा है और उसे पता लगा कि अरे सारे ही परिवारजन तो होटल में हैं। तो यह परिवार का नया साल नहीं है क्‍या? नहीं जी यह तो बाजार का नया साल है, इसलिए बाजार में ही मनेगा। अभी एक संत का प्रवचन सुना, वे कह रहे थे कि रात को 12 बजे हम कहते है कि बधाई हो, नये साल की। फिर सो जाते हैं, तभी रात को एक बजे किसी का फोन आ जाता है तो उससे गुस्‍से में कहते हैं कि आधी रात को क्‍यों फोन कर रहा है? बर्फ गिर रही है, सर्दी की मार पड़ रही है, सारी दुनिया अपने खोल में सिमटी है और हम कह रहे हैं कि नया साल आ गया!
बचपन में एक दिन आता था, जब चारों तरफ फूल खिले होते थे, मन चहक रहा होता था। प्रकृति ने मानो नए वस्‍त्र धारण किये हो। सुबह-सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही मिश्री और नीम की कोपल प्रसाद रूप में मिल जाती थी और कहा जाता था कि नया साल आ गया है। परिवार में ही मिठाई बनती थी और सारे ही परिवारजन एकत्र होकर नये साल की खुशियां मनाते थे। होटल नहीं थे, बाजार नहीं थे बस था तो परिवार था, अपना समाज था। मदहोशी नहीं थी, थी तो जागरूकता थी। प्रकृति को परिवर्तन का जरिया मानते थे। प्रकृति के अनुरूप ही तिथियों का निर्धारण करते थे। तब शायद हम शिक्षित नहीं थे, आज है। मुझे लगता है कि तब हम ज्ञानवान थे लेकिन आज नहीं हैं। क्‍या शिक्षित होने से केवल एक ही सोच पर चला जाता है? क्‍या अपना विवेक प्रयोग में नहीं लिया जाता? क्‍या अब परिवारों का स्‍थान होटल ले लेंगे? हम ऐसा कार्य क्‍यों नहीं कर पाते जिसमें अपना विवेक जागृत रहे। क्‍यों हम प्रत्‍येक कार्य में मदहोशी ही चाहते हैं। क्‍यों ह‍म अपने होश खो देना चाहते हैं? क्‍या जीवन में इतनी निराशा है? क्‍या जीवन में इतनी कटुता है? जो सबकुछ भुला देना चाहते हैं। खुशियां जागृत अवस्‍था में मनायी जाती हैं या मदहोशी में? ऐसे कई प्रश्‍न हैं जो मुझे परेशान करते हैं, आप के पास इनके उत्तर होंगे? तारीख के अनुसार यह मेरी इस वर्ष की अन्तिम पोस्‍ट हैं लेकिन नव-वर्ष के अनुसार अभी मार्च तक और पोस्‍ट आएंगी। जब प्रकृति गुनगुनाएगी तब हम भी गुनगुनाएंगे कि नव वर्ष आप सभी के लिए नव-प्रेरणा लेकर आए। अभी तो प्रकृति सिकुड़ी हुई है तो हम कैसे कहें कि नव-वर्ष मुबारक। खैर आप धुंध में लिपटे, बिस्‍तरों में दुबके होकर, होटल में नाच-गान के साथ ही जबरन नयेपन को आमंत्रण देंगे तो हम भी कह देंगे कि आपका जीवन ऐसे ही संघर्षों में बीते जैसे आज प्रकृति संघर्ष कर रही है। तो विदा 2011, क्‍या करें तुझे सर्दी में ही विदा करना पड़ रहा है। भारत का ज्ञान आज साथ होता तो तुझे हम बसन्‍त में विदा करते और 2012 को भी बसन्‍त में ही अपने घर भोर की बेला में घर ले आते। लेकिन अब तो क्‍या करें?