Tuesday, January 18, 2011

लघुकथा – शाकाहारी हाथी – अजित गुप्‍ता

 घात, प्रतिघात, आक्रमण! कभी आपके मन पर और कभी आपके तन पर। लेकिन क्‍यों होते हैं घात? कभी शेर के पीछे सियारों को बोलते हुए सुना है? या बिल्‍ली के सामने चुहों को? आप सज्‍जन है और प्रतिघात नहीं करते तो आपके सामने हर कोई आक्रमण की मुद्रा में आ जाता है लेकिन यदि आप स्‍वयं आक्रामक हैं तो कोई नहीं आता आपके समझ पंगा लेने। कहावत है कि हाथी के पीछे कुत्ते भौंकते हैं लेकिन हाथी को परवाह नहीं होती। मुझे लगता है कि कुत्तों की हिम्‍मत इसीलिए है कि हाथी शाकाहारी है, कभी शेर के पीछे भौंककर दिखाएं। अपनी बात को लम्‍बी नहीं खेंचूंगी बस एक लघुकथा प्रस्‍तुत है -
लघुकथा - शाकाहारी हाथी

एक हाथी अपनी ही मस्ती में मगन चले जा रहा था। उसकी सूंड में गन्ना था, उसे वह मनोयोग से खा रहा था। उसके पीछे तीन-चार कुत्तों का दल चल रहा था। वे सब उसके पीछे-पीछे चलते हुए भौंक रहे थे। एक चिड़िया हाथी के कान के पास जाकर बैठ गयी।
चिड़िया ने हाथी से कहा कि ये कुत्ते क्यों भोंक रहे हैं?
हाथी बोला कि वैसे ही अपने आप में प्रसन्न हो रहे हैं कि हम हाथी जैसे विशाल जीव पर भी भौंक सकते हैं। ये सब जानते हैं कि मैं शाकाहारी हूँ।
विशेष नोट - दिनांक 20 जनवरी को दस दिनों के लिए नासिक, त्रम्‍बकेश्‍वर, शिरड़ी, पुणे, महाबलेश्‍वर जा रही हूँ इसलिए इसके बाद आपकी पोस्‍टों पर टिप्‍पणी करने में असमर्थ रहूंगी। क्षमा करेंगे। 

लघुकथा संग्रह‍ - प्रेम का पाठ – अजित गुप्‍ता

Monday, January 10, 2011

श्रद्धा और उपहास के बीच झूलता आदमी -अजित गुप्‍ता

पढ़ना और सुनना मेरे दोनों ही प्रिय विषय रहे हैं। परिवार में साहित्‍य पढ़ने का माहौल नहीं था,लेकिन साहित्‍य मेरी रगों मे कैसे घर कर गया मुझे ज्ञात नहीं। जैसी भी पुस्‍तक हाथ लगी, बस एक ही बैठकी में समाप्‍त करके ही चैन पड़ा। पुस्‍तकों का कहीं न कहीं से जुगाड़ हो ही जाता था। पुस्‍तकालय तो सबसे अच्‍छा स्रोत था ही। कभी विमल मित्र हाथ में होते तो कभी शरद चन्‍द्र, कभी बंकिम चन्‍द्र तो कभी ताराशंकर बंदोपाध्‍याय। कभी आशापूर्णा देवी तो कभी शिवानी। गुलशन नन्‍दा भी पढे जाते तो कर्नल रंजीत भी। बस पुस्‍तक मिलनी चाहिए थी। पत्रिकाओं में उन दिनों धर्मयुग और हिन्‍दुस्‍थान आता तो वे तो चट ही जाते थे। कुछ मनोंरंजन के नाम पर पढ़े जाते और कुछ ऐसे साहित्‍य के नाम पर जो दिल पर अपने हस्‍ताक्षर बना जाते। ऐसे कितने ही साहित्‍यकार होंगे जिनके लिए मन आज भी श्रद्धा से भरा हुआ है। कुछ साहित्‍यकार पूर्व परिचित नहीं होते थे लेकिन साहित्‍य हाथ लगा तो फिर यादों में हमेशा के लिए बस गये।
जब कुछ बड़े हुए तो घर से एक आवाज सुनायी दी कि आज फलां व्‍यक्ति का भाषण है और उसे सुनने जाना है। हम भी साथ चिपक लिए और फिर अच्‍छे व्‍यक्तियों को सुनने की भी लत लग गयी। कभी किसी राजनेता का भाषण तो कभी किसी समाज-सेवक का उद्बोधन तो कभी किसी संत का प्रवचन। बस पढ़ते और सुनते ही जीवन निकल गया। मन में अगाध श्रद्धा-भाव भर गया। ऐसे मनीषियों के विचार पर चिंतन भी होता और मनन भी। अपनाने की कोशिश भी यथासम्‍भव रहती। विमल मित्र की “खरीदी कौडि़यों के मौल” आप लोगों ने भी पढ़ी होगी, दो वोल्‍यूम में पूरा उपन्‍यास है। तीन-चार दिन में ही पूरा कर लिया और कई बार पढ़ा गया। लेकिन पन्‍ने पलटकर समाप्‍त करने वाली मानसिकता कभी नहीं बनी। ऐसे ही कभी एक घण्‍टे का भाषण सुना तो कभी तीन घण्‍टे तक भी सुना लेकिन आनन्‍द में कभी कमी नहीं आयी। ऐसे चिंतकों के प्रति मन के श्रद्धा-भाव में कभी कमी नहीं आयी।
शायद वह पीढ़ी श्रद्धा की ही थी। हम अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धा रखते थे, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा रखते थे और बड़ों के प्रति भी श्रद्धा रखते थे।  कई बार इस बात पर बहस भी होती थी कि प्रेम क्‍या है? प्‍यार क्‍या है और श्रद्धा क्‍या है? लेकिन आज सबकुछ बदल गया सा नजर आता है। श्रद्धा शब्‍द कहीं चुक सा गया है। आज के आराध्‍य भी बदल गये हैं। अब अभिनेता और खिलाड़ियों के पीछे लोग दौड़ रहे हैं। क्‍यों दौड़ रहे हैं मालूम नहीं? कभी दौड़ते-दौड़ते वे हाथ आ जाते हैं तो समझ नहीं आता कि अब क्‍या करें? तब लगता है कि प्रमाण के रूप में ऑटोग्राफ ही ले लिए जाए! या अधिक सुविधा मिल जाए तो आलिंगन की ईच्‍छा बलवती हो जाती है। लेकिन उनके विचारों को कोई अपनाता नहीं, क्‍योंकि वे विचारवान तो हैं ही नहीं।
अपनी-अपनी पीढ़ी का सत्‍य है। आज श्रद्धा हमारे जीवन से गायब होती जा रही है। बराबरी का जमाना आ गया है। टेलीविजन पर हमेशा देखती हूँ और मन में एक टीस सी उभरती है, जब किसी नौजवान पत्रकार को किसी विचारवान व्‍यक्तित्‍व का उपहास करते हुए देखती हूँ। कैसा भी व्‍यक्तित्‍व सामने हो, वे उसे बौना सिद्ध करने पर तुल जाते हैं। कभी लगता है कि कैसी शिक्षा है आज की, जो ज्ञानवान व्‍यक्ति का उपहास करना सिखाती है! आप कहेंगे कि पहले जैसे आदर्श व्‍यक्तित्‍व आज कहाँ? लेकिन हमारी पीढ़ी तो अशिक्षित माता-पिता का भी सम्‍मान करती थी, उनका उपहास तो कभी नहीं उड़ाती थी। फिर आज क्‍या हो गया? तर्क और वितर्क हमारे जीवन में भी रहे हैं लेकिन किसी विषय के साथ रहे हैं ना कि व्‍यक्ति के साथ। व्‍यक्ति के साथ तो हमेशा श्रद्धा या विश्‍वास ही रहा है। मुझे तो लगता है कि सर्वाधिक सुखी व्‍यक्ति वे ही हैं जिनके मन में श्रद्धा है। इसलिए मैं हमेशा कहती हूँ कि आज भक्ति-मार्गी सबसे अधिक सुखी हैं, क्‍योंकि वे श्रद्धा से लबालब भरे हैं उनमें अविश्‍वास घर करता ही नहीं। जब अविश्‍वास ही नहीं है तब वे कैसे उपहास को माध्‍यम बनाएंगे। इसलिए आज मुझे लगता है कि आज का आदमी श्रद्धा और उपहास के बीच में झूल रहा है। एक हमारी पीढ़ी है जिसके पास अगाध श्रद्धा है और एक आज की नवयुवा पीढ़ी, जिसके उपहास को हम झेल रहे हैं। आपका क्‍या विचार है?  

Thursday, January 6, 2011

सब पूछ रहे हैं कि धूप कब निकल रही? - अजित गुप्‍ता

राजस्‍थान में कड़कड़ाती ठण्‍ड ने सभी को पस्‍त कर रखा है। उदयपुर में जहाँ खुशनुमा सर्दी रहती है इस बार यहाँ भी 3.5 डिग्री तापमान रिकोर्ड किया गया। माउण्‍ट आबू जो राजस्‍थान का एकमात्र हिल-स्‍टेशन हैं वहाँ तो तापमान माइनस 6 डिग्री तक चले गया। सभी की इंतजार में है धूप। धूप निकले और बाहर बैठकर धूप का सेवन किया जाए। कम्‍प्‍यूटर पर की-बोर्ड चलाते हुए भी अंगुलियां ठण्‍डी पड़ जाती हैं और उन्‍हें बार-बार विश्राम देकर गर्म किया जाता है। ऐसे में एक कविता निकल आयी। हल्‍की-फुल्‍की सी, महज सर्दी को ध्‍यान में रखकर लिखी गयी कविता।

धूप कब निकल रही?
बर्फीली ठण्‍ड थी
हवा भी प्रचण्‍ड थी
थर-थर सी हो रही
धूप कब निकल रही?


पात ओस लिप्‍त थे
धुंध भरा व्‍योम था
सूरज को तक रही
धूप कब निकल रही?


चिड़िया भी मौन थी
सड़क तक उदास थी
बदली को कह रही
धूप कब निकल रही?


खेत में किसान था
हाथ में कुदाल था
आज भोर कह रही
धूप कब निकल रही?


छत पर मजदूर था
हाथ में तगार था
साँस भाप बन रही
धूप कब निकल रही? 

Saturday, January 1, 2011

कौन होगा जो सूरज के रथ को फिर से साधने का मन बनाएंगा? - अजित गुप्‍ता

समय दौड़ रहा है। आज सूरज ने भी अपनी रजाई फेंक दी है। किरणों ने वातायन पर दस्‍तक दी है। हमने भी खिड़की के पर्दे हटा दिए हैं। दरवाजे भी खोल दिए हैं। सुबह की धूप कक्ष में प्रवेश कर चुकी है। फोन की घण्‍टी चहकने लगी है। नव वर्ष की शुभकामनाएं ली और दी जा रही हैं। हम भारतीयों के जीवन में ऐसे अवसर वर्ष में कई बार आ ही जाते हैं। कभी दीवाली पर हम बेहतर जीवन की आशा लगाए दीप जला लेते हैं तो कभी होली पर रंगीन सपने सजाते हुए रंगों से सरोबार हो जाते हैं। कभी कोई पुरुष-हाथ भाई बनकर बहन के सामने रक्षा सूत्र की कामना से आगे बढ़ जाता है। कभी हम बुराइयों का रावण जला लेते हैं। कभी गणगौर की सवारी निकलाते हैं तो कभी शीतला माता को ठण्‍डा खिलाते हैं। ना जाने कितनी बार हम एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं?
बस उस पल में हम अपनों का स्‍मरण कर लेते हैं। न जाने कितने कुनबे बनाकर हम जीते हैं? सारी अला-बला से बचते हुए अपने-अपने सुरक्षा कवचों के साथ जीवन जीने का प्रयास करते रहते हैं। सब कुछ अच्‍छा ही हो इसकी सभी के लिए कामना भी करते रहते हैं। हमारी वाणी में शब्‍द-ब्रह्म आकर बैठ जाता है। सम्‍पूर्ण वर्ष हमें यही शब्‍द अनुप्राणित करते हैं, दिग-दिगन्‍त में गुंजायमान होते रहते हैं। सर्वे भवन्‍तु सुखिन: का दिग्‍घोष भारत की भूमि पर सर्वदा होता रहता है। हम दान को पुण्‍य मानकर ऐसे शुभ अवसरों पर बच्‍चों के हाथों से दान कराते हैं। हम उन्‍हें देना सिखाते हैं, मांगना नहीं। यदि मांगना है तो आशीष मांगते हैं। प्रभु के दर पर भी बस यही कहने जाते हैं कि तेरी कृपा चाहिए प्रभु। वहाँ अपना देय समर्पित करते हैं। बस केवल समर्पण और कोई आकांक्षा नहीं।
लेकिन आज रात को ही रोशनी हो गयी। कृत्रिम रोशनी। मन प्रफुल्लित नहीं हुआ अपितु मदहोश हो गया। सुबह के सूरज के समक्ष हमने आँखें नहीं खोली वरन सुप्रभात को बाय बाय करते हुए लम्‍बी तान कर सो गए। नये साल का सूरज निकला, गाने वाला कोई नहीं, बस सब तो नये साल का चाँद ढला गाने में ही मदहोश थे। मदहोशी के बहाने ढूंढते हुए हम, कैसे जीवन की नई राहों का सृजन करेंगे? कभी सूरज पूरब से निकला करता था लेकिन अब तो हम सूरज को ही भूल गए हैं। भोर क्‍या होती हैं, हमें मालूम नहीं। बस याद है तो रात के बारह बजे का बजर! कब टन हो और कब बोतल से झाग निकलकर वातावरण में फैल जाए? पता नहीं कौन होगा जो सूरज के रथ को फिर से साधने का मन बनाएंगा? हम भी इस मदहोशी से निकलकर नवनिर्माण की कल्‍पना कर सकेंगे? हम गाँवों में शहरों की कल्‍पना करते हैं, मोबाइल से लेकर टीवी तक सभी हमारी ईच्‍छाओं में बसे हैं। लेकिन इस नवीन दिन तो सारे ही शहर गाँवों की गलियों जैसे मदहोश हो जाते हैं। रास्‍ते में झूमते, लड़खड़ाते  लोग, घर जाकर बेसुध बिस्‍तर में पड़े लोग ! मोटर सायकिल पर चीखते-चिल्‍लाते लोगों को डराते लोग ! उत्‍सव में महिलाओं का चीर-हरण करते लोग !
फिर भी हम खुश हैं कि आज हमें एक दिन और मिल गया, मदहोशी में बिताने का। हम खुश हैं कि हम आगे बढ़ रहे हैं। हम खुश हैं कि देश प्रगति कर रहा है। लेकिन हम और भी खुश हैं कि हमें कुछ नहीं करना पड़ा। हमें तो चाहत है कि कोई सांता आए और हमें कुछ दे जाए। देश में सभी कुछ अच्‍छा हो, स्‍वत: ही हो। बस मैं भी देख रही हूँ कि सूरज कह रहा है कि मैं तुम्‍हें प्रकाश देता हूँ, तो बोलो तुम क्‍या देते हो? हवा मुझे झिंझोड़ रही है, पूछ रही है मैं तुम्‍हें जीने की साँस देती हूँ तो बताओ तुम क्‍या देते हो? मेरे घर के सामने का पेड़ भी झूम-झूम कर कह रहा है कि मैं तो तुम्‍हें फल-फूल देता हूँ तो बोलो तुम क्‍या देते हो? तब मैंने भी अपने आप से पूछा कि क्‍या मैं इस धरती को कुछ देती हूँ या केवल लेती ही हूँ? देने का भाव कब बिसरा दिया हमने? तारीखें बदलने से मन के भाव नहीं बदलते। मन के भाव बदलने के लिए सुबह की भोर में जीना सीखना होगा। जब लम्‍बी साँस अपने अन्‍दर लेकर प्राणवायु लेते समय मन में भाव आ ही जाता है कि इतनी अनुपम धरती पर हम क्‍या देकर जाएंगे?  

Tuesday, December 28, 2010

“दोहा” लेखन और उसकी बारीकियों पर एक नजर – अजित गुप्‍ता


ब्‍लाग लिखने से पूर्व नेट पर हिन्‍द-युग्‍म जैसी कुछ साइट की पाठक थी। हिन्‍द-युग्‍म पर कभी दोहे की और कभी गजल की कक्षाएं चलती थी। मैं इन दोनों विधाओं की बारीकियां समझने के लिए इन कक्षाओं के पाठ नियमित पढ़ने की कोशिश करती थी। लेकिन टिप्‍पणी नहीं करती थी। दोहे की कक्षा आचार्य संजीव सलिल जी लेते थे। एक दिन उन्‍होंने दुख के साथ लिखा कि ऐसा लगता है कि इस कक्षा में किसी की रुचि नहीं हैं तो क्‍या इसे बन्‍द कर देना चाहिए? मुझे लगा कि इतनी अच्‍छी कक्षा यदि छात्रों के अभाव में बन्‍द हो जाएगी तो यह सभी के लिए दुखकारी होगी। मैंने तब उन्‍हें पहली बार टिप्‍पणी की कि आपकी कक्षाओं से हम सभी लाभान्वित हो रहे हैं और आप इसे जारी रखिए। क्‍योंकि मैं समझ गयी थी कि किसी भी विधा के लिए जितना ज्ञान मिल सके उतना ही कम है। मुझे भी तब समझ आने लगा था कि दोहों में भी कितनी पेचीदगियां हैं। यह केवल 13-11 का ही मात्र खेल नहीं है। हम भी मात्रायें गिनते थे लेकिन कहीं न कहीं चूक हो ही जाती थी। लेकिन सलिल जी ने छोटी से छोटी बात को भी समझाया और हमारी प्रत्‍येक गलती पर ध्‍यान आकर्षित किया। मैं उनकी सदैव ॠणी रहूंगी। हमें लगता था कि हमने बहुत अच्‍छा दोहा लिखा है लेकिन उसमें कोई न कोई दोष रह ही जाता था और वे हमें बताते थे कि इसमें यह दोष रह गया है।
कक्षा के समापन के दिनों में उन्‍होंने कहा कि जो कुछ भी सार-संक्षेप हैं उसे आप लिखिए। तब मैंने दोहा-सार लिखा। मुझे लगता है कि शायद यह संक्षिप्‍त जानकारी आप सभी के लिए उपयोगी हो सकती है तो यहाँ आप सभी के लिए प्रस्‍तुत कर रही हूँ।
दोहा - कक्षा - सार
1- दोहे की दो पंक्तियों में चार चरण होते हैं।
2- प्रथम एवं तृतीय चरणों में 13-13 मात्राएं होती हैं ये विषम चरण हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में 11-11 मात्राएं होती हैं और ये सम चरण हैं।
3- द्वितीय और चतुर्थ चरण का अन्तिम शब्‍द गुरु-लघु होता है। जैसे – और, खूब, जाय आदि। साथ ही अन्तिम अक्षर समान होता है। जैसे द्वितीय चरण में अन्तिम अक्षर म है तो चतुर्थ चरण में भी म ही होना चाहिए। जैसे – काम-राम-धाम आदि।
4- गुरु या दीर्घ मात्रा के लिए 2 का प्रयोग करते हैं जबकि लघु मात्रा के लिए 1 का प्रयोग होता है।
5- दोहे में 8 गण होते हैं जिनका सूत्र है – यमाताराजभानसलगा। ये गण हैं-
य गण – यमाता – 122
म गण – मातारा – 222
त गण – ताराज – 221
र गण – राजभा – 212
ज गण – जभान – 121
भ गण – भानस – 211
न गण – नसल – 111
स गण – सलगा – 112
6- दोहे के सम चरणों के प्रथम शब्‍द में जगण अर्थात 121 मात्राओं का प्रयोग वर्जित है।
7- मात्राओं की गणना – अक्षर के उच्‍चारण में लगने वाले समय की द्योतक हैं मात्राएं। जैसे अ अक्षर में समय कम लगता है जबकि आ अक्षर में समय अधिक लगता है अत: अ अक्षर की मात्रा हुई एक अर्थात लघु और आ अक्षर की हो गयी दो अर्थात गुरु। जिन अक्षरों पर चन्‍द्र बिन्‍दु है वे भी लघु ही होंगे। तथा जिन अक्षरों के साथ र की मात्रा मिश्रित है वे भी लघु ही होंगे जैसे प्र, क्र, श्र आदि।  आधे अक्षर प्रथम अक्षर के साथ संयुक्‍त होकर दीर्घ मात्रा बनेंगी। जैसे – प्रकल्‍प में प्र की 1 और क और ल्‍ की मिलकर दो मात्रा होंगी।
8- जैसे गजल में बहर होती है वैसे ही दोहों के भी 23 प्रकार हैं। एक दोहे में कितनी गुरु और कितनी लघु मात्राएं हैं उन्‍हीं की गणना को विभिन्‍न प्रकारों में बाँटा गया है। जो निम्‍न प्रकार है - 
१. भ्रामर २२ ४ २६ ४८
२. सुभ्रामर २१ ६ २७ ४८
३. शरभ २० ८ २८ ४८
४. श्येन १९ १० २९ ४८
५. मंडूक १८ १२ ३० ४८
६. मर्कट १७ १४ ३१ ४८
७. करभ १६ १६ ३२ ४८
८. नर १५ १८ ३३ ४८
९. हंस १४ २० ३४ ४८
१०. गयंद १३ २२ ३५ ४८
११. पयोधर १२ २४ ३६ ४८
१२. बल ११ २६ ३८ ४८
१३. पान १० २८ ३८ ४८
१४. त्रिकल ९ ३० ३९ ४८
१५. कच्छप ८ ३२ ४० ४८
१६. मच्छ ७ ३४ ४२ ४८
१७. शार्दूल ६ ३६ ४४ ४८
१८. अहिवर ५ ३८ ४३ ४८
१९. व्याल ४ ४० ४४ ४८
२०. विडाल ३ ४२ ४५ ४८
२१. श्वान २ ४४ ४६ ४८
२२. उदर १ ४६ ४७ ४८
२३. सर्प ० ४८ ४८ ४८
दोहा छंद के अतिरिक्‍त रोला, सोरठा और कुण्‍डली के बारे में भी हमने जानकारी प्राप्‍त की है। इनका सार भी निम्‍न प्रकार से है -
रोला – यह भी दोहे की तरह ही 24-24 मात्राओं का छंद होता है। इसमें दोहे के विपरीत 11/13 की यति होती है। अर्थात प्रथम और तृतीय चरण में 11-11 मात्राएं तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं। दोहे में अन्‍त में गुरु लघु मात्रा होती है जबकि रोला में दो गुरु होते हैं। लेकिन कभी-कभी दो लघु भी होते हैं। (आचार्य जी मैंने एक पुस्‍तक में पढ़ा है कि रोला के अन्‍त में दो लघु होते हैं, इसको स्‍पष्‍ट करें।)
कुण्‍डली – कुण्‍डली में छ पद/चरण होते हैं अर्थात तीन छंद। जिनमें एक दोहा और दो रोला के छंद होते हैं। प्रथम छंद में दोहा होता है और दूसरे व तीसरे छंद में रोला होता है। लेकिन दोहे और रोले को जोड़ने के लिए दोहे के चतुर्थ पद को पुन: रोने के प्रथम पद में लिखते हैं। कुण्‍डली के पांचवे पद में कवि का नाम लिखने की प्रथा है, लेकिन यह आवश्‍यक नहीं है तथा अन्तिम पद का शब्‍द और दोहे का प्रथम या द्वितीय भी शब्‍द समान होना चाहिए। जैसे साँप जब कुण्‍डली मारे बैठा होता है तब उसकी पूँछ और मुँह एक समान दिखायी देते हैं।
उदाहरण –
लोकतन्‍त्र की गूँज है, लोक मिले ना खोज
राजतन्‍त्र ही रह गया, वोट बिके हैं रोज
वोट बिके हैं रोज, देश की चिन्‍ता किसको
भाषण पढ़ते आज, बोलते नेता इनको
हाथ हिलाते देख, यह मनसा राजतन्‍त्र की
लोक कहाँ हैं सोच, हार है लोकतन्‍त्र की।

दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान.
चंचल जल दिन चारि को, ठाऊँ न रहत निदान.
ठाऊँ न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै.
मीठे बचन सुने, बिनय सब ही की कीजै.
कह गिरिधर कविराय, अरे! यह सब घट तौलत.
पाहून निशि-दिन चारि, रहत सब ही के दौलत.

सोरठा – सोरठा में भी 11/13 पर यति। लेकिन पदांत बंधन विषम चरण अर्थात प्रथम और तृतीय चरण में होता है। दोहे को उल्‍टा करने पर सोरठा बनता है।
जैसे - 
दोहा: काल ग्रन्थ का पृष्ठ नव, दे सुख-यश-उत्कर्ष.
करनी के हस्ताक्षर, अंकित करें सहर्ष.

सोरठा- दे सुख-यश-उत्कर्ष, काल-ग्रन्थ का पृष्ठ नव.
अंकित करे सहर्ष, करनी के हस्ताक्षर.

सोरठा- जो काबिल फनकार, जो अच्छे इन्सान.
है उनकी दरकार, ऊपरवाले तुझे क्यों?

दोहा- जो अच्छे इन्सान है, जो काबिल फनकार.
ऊपरवाले तुझे क्यों, है उनकी दरकार?



Sunday, December 26, 2010

बड़े लोग अपनी चलाते हैं, वे बदमिजाज होते हैं – अजित गुप्‍ता

एक वाकया याद आ रहा है। मेरे विवाह का अवसर था और मेरे पिताजी एक युवा डॉक्‍टर बराती से बहस कर रहे थे।
पिताजी – मैं कहता हूँ कि बड़े लोग ज्‍यादा बदमिजाज होते हैं, छोटों के मुकाबले।
डॉक्‍टर – नहीं, नहीं, आप यह क्‍या कह रहे हैं? बड़े तो बड़े हैं।
कुछ देर ऐसी ही बहस चलती रही। फिर अचानक ही पिताजी गरजे और गरजकर बोले कि “मैं कह रहा हूँ ना कि बड़े लोग बदमिजाज होते हैं”
एक मिनट का मौन छा गया, डॉक्‍टर चुप हो गया। फिर धीरे से पिताजी बोले कि मैंने क्‍या कहा था? अब समझ आया?।
कल से ही यह घटना मुझे बारबार याद आ रही है। भारत में बड़ों को बहुत सम्‍मान दिया जाता है इसलिए वे अपना अधिकार समझ लेते हैं छोटों को टोकाटोकी करने का। जहाँ भी गड़बड़ी देखी नहीं कि फटाक से टोक देंगे कि नहीं ऐसा मत करो। आज के दस पंद्रह वर्ष तक तो यह टोकाटोकी और बड़ों की बात मानने की परम्‍परा जायज थी लेकिन आज बदल गयी है।
दुनिया के ऐसे देश जिनसे नवीन पीढ़ी अनुप्राणित होती हैं वहाँ छोट-बड़े की परम्‍परा नहीं है। ऑफिस में 60 वर्ष के बॉस को भी नवयुवा कर्मचारी नाम लेकर ही पुकारता है। सभी की बात एक समान ही सुनी जाती है और वहाँ के बड़े, युवाओं की किसी भी बात पर टांग नहीं अड़ाते हैं। यही परम्‍परा आज भारत में भी आ गयी है। जब मेरी बेटी फोन पर अपने बॉस से बात कर रही थी और उसे नाम लेकर बुला रही थी तब मैं सन्‍न रह गयी थी। घर में भी यह अन्‍तर स्‍पष्‍ट दिखायी देता है। आज की युवा पीढ़ी से जब बात करते हैं तो वे बराबर की बहस करते हुए आपकी बात को खारिज कर देते हैं। उनकी मानसिकता में कहीं नहीं है कि आपकी बात मानेंगे। बल्कि हमेशा यही दृष्टिगोचर होता है कि वे आपकी बात कभी नहीं मानेंगे।
मैंने इस विषय पर कल बहुत मनन किया। मुझे लगा कि हम दोहरी जिन्‍दगी जी रहे हैं। एक तरफ अपने संस्‍कारों से लड़ रहे हैं जो हमारे अन्‍दर कूट-कूटकर भरे हैं और दूसरी तरफ उस पीढ़ी को अनावश्‍यक परेशान कर रहे हैं जिसने छोटे और बड़े का भेद मिटा दिया है। हमें अब विदेशी जीवन शैली का अध्‍ययन करना चाहिए और उसे ही अपने जीवन का अंग बना लेना चाहिए। यदि सुखी रहना है तो। पुराने जमाने में भी भारत में ॠषि-मुनियों ने यही कहा था कि पचास वर्ष के बाद वानप्रस्‍थी बन जाना चाहिए। अर्थात समाज की सेवा करो और परिवार में सारे अधिकार युवा पीढ़ी को दे दो। 75 वर्ष बाद तो संन्‍यास लेकर एकदम ही मोह माया छोड़ दो।
यहाँ ब्‍लाग जगत में हम जैसे लोग भी आ जुटे हैं। अपने बड़े होने का नाजायज फायदा उठाते रहते हैं और लोगों को टोकाटोकी कर देते हैं। किसी की भी रचना पर टिप्‍पणी कर देते हैं कि यह ठीक नहीं है, वह ठीक नहीं है। इसे ऐसे सुधार लो उसे वैसे सुधार लो। कहने का तात्‍पर्य यह है कि हम जैसे लोग अपनी राय का टोकरा लेकर ही बैठे रहते हैं। व्‍यक्तिगत जीवन में भी हस्‍तक्षेप कर देते हैं कि ऐसा मत करो, वैसा करो। जब सामने वाला पूछता है कि आप कौन? तब ध्‍यान आता है कि अरे काहे को पुरातनपंथी सोच को घुसाएं जा रहे हैं? इसलिए मित्रों फालतू की टोकाटोकी नहीं, सब स्‍वतंत्र हैं। अपने परिवार में सुखी रहना है तो अपने काम से काम रखो। पचास की आयु के बाद युवा पीढ़ी को स्‍वतंत्रता दो और अपना अधिकतर समय घर के बाहर निकालो। वे क्‍या पहनते हैं, क्‍या खाते-पीते हैं, ये उनका मामला है, तुम्‍हें इससे कोई लेना देना नहीं रखना चाहिए।
मैं तो मानती हूँ कि आज की पीढ़ी फिर भी बहुत शरीफ है जो आपको तमीज से उत्तर दे रही है। कल को ऐसा बोले कि रे बुढें/बुढियाओं अपना काम करो, हम क्‍या कर रहे हैं और क्‍या लिख रहे हैं इसपर हमें सीख मत दो। आदि आदि। इसलिए आज पचास के पार लोगों को अपनी हद में रहना सीखना चाहिए। उन्‍हें युवापीढ़ी के साथ रहना है तो उनके तौर तरीके सीखने ही होंगे नहीं तो उन्‍हें उपहास का पात्र बनकर किसी कूड़े के ढेर में डाल दिया जाएंगा। तो मित्रों मैं तो अब सीखने में लगी हूँ। आपका क्‍या ख्‍याल है, सीखेंगे या अपना अड़ियल रवैया जारी रखेंगे?  

Thursday, December 23, 2010

लघु कथा के वर्तमान दौर में कैसे करे लेखन? – अजित गुप्‍ता


वर्तमान दौर लघुकथा लेखन का है। पूर्व में किसी भी पत्रिका में सद-विचार या चुटकुले प्राथमिकता से पठनीय होते थे। लेकिन आज इनका स्‍थान लघुकथाओं ने ले लिया है। लघुकथाएं जहाँ भारत में भी अपना स्‍थान बना रही है वहीं विदेशों में प्रतिष्‍ठापित हो चुकी है। आज इन्‍टरनेट पर विदेशी लघुकथाओं के अनुवाद प्रतिदिन पढ़ने को मिलते हैं। एक से एक बढि़या और नायाब। लेकिन जब भारत की स्थिति पर दृष्टि डालते हैं तब मायूसी ही हाथ लगती है। आज का लेखक लघुकथा का शिल्‍प जाने बिना ही लघुकथा लिख रहा है। इस कारण पाठक पर अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखायी देता है। मैंने लघुकथा पर विद्वानों से परामर्श किया, उनके आलेख पढे और कार्यशाला भी आयोजित की। इस कार्यशाला का उल्‍लेख विकीपीडिया पर भी है।
मैं यहाँ अपनी बात सरल शब्‍दों में लिखने का प्रयास कर रही हूँ, जिससे पाठक और लेखक लघुकथा के बारे में आसानी से समझ सके। साहित्‍य में लघुकथा को परिभाषित करने के लिए मैंने गद्य में चुटकुले और पद्य में दोहे और शेर का प्रयोग किया है। यदि आप दोहे और गजल के एक शेर को देखेंगे तो पाएंगे कि एक दोहा और एक शेर अपने आपमें परिपूर्ण होता है। दोहे और शेर में चार चरण होते हैं लेकिन अन्तिम चरण सबसे उपयोगी होता है। कवि या शायर की बात अन्तिम चरण से ही स्‍पष्‍ट होती है और हमें चमत्‍कृत कर देती है। यदि दोह और शेर में चमत्‍कृत करने की क्षमता नहीं है तो फिर वह खारिज कर दिया जाता है। इसी प्रकार गद्य में हम अपनी बात चुटकुले के रूप में जब कहते हैं तब अन्तिम पंक्ति में हास्‍य उत्‍पन्‍न होता है। चुटकुले और लघुकथा में बस यही अंतर है कि चुटकुले के अन्‍त में हास्‍य पैदा होता है लेकिन लघुकथा के दर्शन से व्‍यक्ति चमत्‍कृत होता है जैसा कि दोहे और शेर में होता है।
लघुकथा में वर्णन की गुंजाइश नहीं है, जैसे चुटकुले में नहीं होती, सीधी ही केन्द्रित बात कहनी होती है। कहानी विधा में उपन्‍यास और कहानी के बाद लघुकथा प्रचलन में आयी है। उपन्‍यास में सामाजिक परिदृश्‍य विस्‍तार लिए होता है ज‍बकि कहानी में व्‍यक्ति, चरित्र, घटना जैसा कोई भी एक बिन्‍दु केन्द्रित विषय रहता है जिसमें वर्णन की प्रधानता भी रहती है लेकिन लघुकथा में दर्शन प्रमुख रहता है। लघुकथा का प्रारम्‍भ किसी व्‍यक्ति के चरित्र या घटना से होता है लेकिन अन्‍त पलट जाता है और अधिकतर सुखान्‍त होता है। व्‍यक्ति का जो चरित्र हम समझ रहे थे वह परिवर्तित हो जाता है और पाठक चमत्‍कृत हो जाता है कि इस व्‍यक्ति या समाज के चरित्र का यह एक रूप भी और विद्यमान है।  कभी-कभी लघुकथा का समापन व्‍यंग्‍य में भी होता है लेकिन इसे हास्‍य से पृथक स्‍थापित करना होगा।
मैंने कुछ उपयोगी बिन्‍दु आप सभी के लिए यहाँ प्रस्‍तुत किये हैं। लघुकथा मुझे हमेशा से ही प्रभावित करती रही हैं इसलिए जब मैंने इस विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया तब संयोजक ने सभी को एक पेपर दे दिया और कहा कि अभी दस मिनट के अन्‍दर एक लघुकथा लिखनी है। मैंने इससे पूर्व कोई भी लघुकथा नहीं लिखी थी। मैं चाहती तो नहीं भी लिखती लेकिन मैंने सोचा कि इस कार्यशाला का उद्देश्‍य तभी पूर्ण होगा जब मैं भी इसमें एक लघुकथा लिखू। एकदम से कोई कथानक ध्‍यान में आना बड़ा ही कठिन विषय है। मैंने उस सुबह का चिन्‍तन किया कि सुबह क्‍या हुआ था और मुझे लघुकथा का विषय मिल गया। मैंने अपनी पहली लघुकथा लिख दी थी लेकिन डर था कि वह कही मापदण्‍डों पर खरी नहीं उतरी तो प्रतिष्‍ठा दांव पर लग जाएगी। मुझे तत्‍काल ही दूसरे कार्यक्रम में जाना था तो मैं बिना परिणाम जाने ही वहाँ से रवाना हो गयी। लेकिन मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ कि मेरी लघुकथा प्रथम आयी। एक बार तो मैंने समझा कि मेरे पद के कारण ऐसा हुआ है लेकिन जब मैंने अन्‍य लघुकथाएं देखी तो समझा कि नहीं पद के कारण ऐसा नहीं हुआ है। मुझे संतोष हुआ और फिर मैंने लघुकथा लिखना प्रारम्‍भ किया। उसी का परिणाम है कि मैं अपना लघुकथा संग्रह प्रकाशित करा सकी।
इसी संग्रह से एक लघुकथा प्रस्‍तुत है -
किसका नरक बड़ा

मोहन काका कच्ची बस्ती में घूम रहे हैं। वे एक घर के बाहर कुछ देर बैठ जाते हैं। घर के बाहर गन्दी नाली बह रही है, उसमें सूअर लौट रहे हैं। पास ही दो कुत्ते लड़ रहे हैं। अन्दर से औरतों के झगड़ने की आवाजें आ रही हैं। एक बूढ़ा व्यक्ति खाट पर लेटा है, वह चिल्ला रहा है ‘अरे मुझे भी तो रोटी दे दो, सुबह से शाम हो गयी, अभी तक पेट में दाना भी नहीं गया है।
तभी सुरेश सायकिल चलाता हुआ मोहन काका के पास चला आता है। उन्हें देखते ही बोलता है कि ‘काका आप यहाँ क्या कर रहे हैं? गन्दी बस्ती में घूम रहे हैं। क्या आप पागल हो गए हैं?’
नहीं रे वापस अपनी कोठी जाने पर मुझे वहाँ का नरक भी अच्छा लगने लगे इसीलिए ही घूम रहा हूँ।