Thursday, June 25, 2009

पुस्‍तकों का प्रकाशन

आदरणीय
विगत तीन माह में मेरी चार पुस्‍तकों का प्रकाशन हुआ है। अरण्‍य में सूरज ( उपन्‍यास) - सामयिक प्रकाशन दिल्‍ली, सोने का पिंजर.. अमेरिका और मैं (यात्रा वृतान्‍त) - साहित्‍यागार प्रकाशन जयपुर, सांस्‍कृतिक निबन्‍ध (मधुमती के सम्‍पादकीयों का संकलन) - साहित्‍यागार, हम गुलेलची (व्‍यंग्‍य संग्रह) साहित्‍यागार। यदि आपको आपके शहर के किसी भी पुस्‍तक विक्रेता से उपलब्‍ध हो सके तो अवश्‍य पढे।

Friday, May 8, 2009

कविता - ऐसी थी मेरी अम्मा

मातृ दिवस पर माँ का स्‍मरण। जब माँ पास थी तब उसका देय स्‍वाभाविक लगता था लेकिन आज जब वह नहीं है तब लगता है कि विपरीत परिस्थितियों में देना कितना अस्‍वाभाविक होता है। उसने हमें जो भी दिया उसको नमन। काश हममें भी उसकी जितनी हिम्‍मत हो। उसी को समर्पित एक कविता -
तूफानी काली रातों में
जैसे जलता एक दिया
हाँ ऐसी थी मेरी अम्मा।

दुर्वासा के रौद्र रूप से
काली पीली आँधी आती
तिनके-तिनके घर को करती
आनन-फानन बिखरा जाती
उसकी आँखे हम से कहती
थमने दो, मत धीरज खोओ
वो टुकड़ों को बीन-बीन के
फिर वापस एक बना देती

शिव के नर्तन, रौद्ररूप में
जैसे स्थिर रहती हिमजा
हाँ ऐसी थी मेरी अम्मा।

घर में तूफान सुनामी सा
कुछ भी शान्त नहीं रहता
गर्जन-तर्जन कितना होता
आँखों से नीर नहीं बहता
लहरों के वापस जाने तक
आँचल उसका सिमटा रहता
मंथन से निकले गरलों को
फिर वह झट से बिसरा देती

सागर के ज्वारों में जैसे
स्थिर रहती पाषाण शिला
हाँ ऐसी थी मेरी अम्मा।

न माथे पर मोटी बिंदिया
न पाँवों में पायल, बिछियां
बस चूड़ी वाले से कहती
एक सुहाग की दे भइया
रही सुहागन मेरी अम्मा
सुन तो लो उसकी बतियां
मेरे श्रीराम गए कहकर
उसने बंद करी अँखियां

सतयुग जैसे कलिकाल में
कस्तूर बनी बापू की बा
हाँ वैसी थी मेरी अम्मा।

Tuesday, April 28, 2009

सफलता का मापदण्‍ड क्‍या?

हम अक्‍सर कहते हैं कि हम सफल हुए या असफल ह‍ुए। लेकिन क्‍या है इस सफलता का पैमाना? धन-दौलत का अम्‍बार या पारिवारिक सुख। शिक्षा से मण्डित या अशिक्षित लेकिन ज्ञानवान। हम यदि श्रेणियों में विभक्‍त करेंगे तो नाना प्रकार मिलेंगे सफलता के फिर भी हम खुश नहीं रहते। हमारी चा‍ही एक सफलता हमें मिल जाती है तो हम दूसरी की ओर दौड़ने लगते हैं। अब आप ही बताइए कि हम एक आम व्‍यक्ति को सफलता के किस तराजू में तौले?

Tuesday, April 14, 2009

लघुकथाएं - महादान, रिश्‍ते और आदत

महादान
कुछ वर्ष पूर्व राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में अकाल पड़ा हुआ था। हमने अपनी संस्था के माध्यम से गाँवों में कुएं गहरे कराने का कार्य प्रारम्भ किया। किसान के पास इतना पैसा नहीं था कि वह स्वयं अपने कुओं को गहरा करा सके। जनजाति समाज के स्वाभिमान को देखते हुए रूपए में से पच्चीस पैसे किसान से भी लिए गए। किसानों के अपना हिस्सा अग्रिम रूप से जमा करा दिया। बारी-बारी से सभी के कुएं गहरे कराने का काम प्रगति पर था। कुएं अधिक थे और समय कम। मनुष्य जब प्रयास करता है तब प्रकृति भी उसका साथ देती है, इसी कारण काम पूरा होने से पूर्व ही वर्षा ने अपनी दस्तक दे दी और रामदीन के कुएं में भी पानी की आवक हो गयी। रामदीन उस दिन बहुत खुश था। क्योंंकि उसके कुएं में पानी आ गया था। अकाल के समय कैसे पाई-पाई जोड़कर उसने पैसे एकत्र किए थे? भगवान ने उसकी सुन ली थी। हमारा काम भी बंद हो गया था। हम उसे पैसे वापस करने के लिए गए।
उसने कहा कि मुझे पानी चाहिए था और प्रभु ने मेरा काम कर दिया। अब मैं इस पैसे का क्या करूंगा? आप इसे कहीं और लगा दे, और उसने पैसे वापस लेने से मना कर दिया।

रिश्ते
एक दिन उदयपुर से आबूरोड की यात्रा बस से कर रही थी। जनजातीय क्षेत्र प्रारम्भ हुआ और एक बीस वर्षीय जनजातीय युवती मेरे पास आकर बैठ गयी। मेरा मन कहीं भटक रहा था, टूटते रिश्तों को तलाश रहा था। मैं सोच रही थी कि क्या जमाना आ गया है कि किसी के घर जाने पर मुझे आत्मीय रिश्तों की जगह औपचारिकता मिलती है और सुनने को मिलता है एक सम्बोधन - आण्टी। इस सम्बोधन से ‘हम एक परिवार नहीं है’ का स्पष्ट बोध होता है। मुझे बीता बचपन याद आता, कभी भौजाईजी, कभी काकीजी, कभी ताईजी, कभी बुआजी, कभी जीजीबाई आदि सम्बोधन मेरे दिल को हमेशा दस्तक देते हैं। लेकिन आज मेरे आसपास नहीं थे ये सारे ही। मेरे समीप तो रह गया था शब्द, केवल आण्टी। इन शब्दों के सहारे हमने दिलों में दूरियां बना ली थी।
मैं किसी कार्यक्रम में भाग लेने जा रही थी और मुझे वहाँ क्या बोलना है इस बात का ओर-छोर दिखायी नहीं दे रहा था। इतने में ही झटके के साथ बस रुकी। एक गाँव आ गया था। नवम्बर का महिना था और उस पहाड़ी क्षेत्र में इस महिने बहुतायत से सीताफल पकते थे। अतः बाहर टोकरे के टोकरे सीताफल बिक रहे थे। मेरे पास बैठी युवती बस से उतरी और हाथ में सीताफल लेकर बस में वापस चढ़ गयी। उसने एक सीताफल तोड़ा और मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली कि ‘बुआजी सीताफल खाएंगी’?

आदत
मेरा नौकर नारायण जनजातीय समाज का था। इस समाज में सुबह काम पर निकलते समय और शाम को काम से वापस आने के बाद ही भोजन करने की आदत है। ऐसी ही आदत नारायण की भी थी। मेरे यहाँ वह सुबह नौ बजे आता और शाम को चार बजे जाता। दिन में हम सब को वह भोजन कराता, लेकिन स्वयं नहीं खाता। मैं उससे हमेशा कहती कि खाना खाले, लेकिन नहीं खाता। एक दिन मैंने डाँटकर उसे कहा कि खाना क्यों नहीं खाता? सारा दिन यहाँ काम करता है और मुँह में दाना भी नहीं डालता, कैसे काम चलेगा?
तब वह बोला कि हम लोग दो समय ही खाना खाते हैं, एक सुबह और एक शाम। सुबह मैं खाना खाकर आता हूँ और शाम को जाकर खाऊँगा। यदि दिन में आपके यहाँ खाना खाने लगा तो मेरी आदत बिगड़ जाएगी।

Tuesday, April 7, 2009

लघुकथाएं - छिलके, अपना प्राप्‍य, फिजूलखर्ची

छिलके

शहर से 10 किलोमीटर की दूरी पर बसा एक जनजातीय गाँव। अधिकांश लोग या तो खेती करते या फिर शहर में मजदूरी करने आते। एक दिन वहाँ एक कार्यक्रम के निमित्त जाना था। जाते समय, साथ में बच्चों के लिए केले ले लिए। छोटा सा कार्यक्रम रखा हुआ था गाँव वालों के लिए, सारे ही गाँव वाले एकत्र हुए। कार्यक्रम के बाद हमने बच्चों को केले बाँटे। बच्चों ने केले खाए और छिलके वहीं फेंक दिए।
मैंने बच्चों से कहा कि बेटा ये छिलके उठाओ और पास बैठी गाय के सामने डाल दो।
एक वृद्ध व्यंग्यात्मक रूप से बोला कि गायें केले के छिलके नहीं खाएंगी।
मैंने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है? बच्चों तुम ये छिलके गाय के सामने डाल दो।
उन्होंने ऐसा ही किया, लेकिन गाय ने छिलकों की तरफ देखा ही नहीं।
मैं अचम्भित थी, मैंने बच्चों से कहा कि ऐसा करो कि जो वहाँ बकरी बैठी है, उसे डाल दो।
बकरी ने छिलके देखकर मुँह घुमा लिया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यूँ हो रहा है?
वृद्ध बोला कि गाय छिलकों को पहचानती नहीं हैं।

अपना प्राप्य

सुबह उठकर जैसे ही मैंने वाशबेसिन का नल खोला, देखा कि वहाँ से नन्हीं-नन्हीं चीटियां कतार बनाकर कहीं चली जा रही हैं, उनकी दो कतारे बनी हुई थीं, एक जा रही थी और एक वापस लौट रही थीं। वापस लौटने वाली चीटियों के मुँह में एक दाना था। मेरी निगाहों ने उनका पीछा किया। निगाहें चीटियों के साथ-साथ चल रही थीं। एक जगह जाकर चीटियां रुक गयीं थी, निगाहें भी रुकी। देखा एक छोटा सा मिठाई का टुकड़ा भोजन की टेबल पर पड़ा था, वे सारी चीटियां कतारबद्ध होकर उसका एक-एक कण अपने मुँह से पकड़कर वापस लौट रही थीं। कहीं कोई बदहवासी नहीं, रेलमपेल नहीं, बस था तो एक अनुशासन। तभी घर के बाहर शोर सुनायी दिया। बाहर आकर देखा, एक सेठजी के हाथ में मिठाई का डिब्बा था, उनके चारों तरफ मांगने वालों की भीड़ थी और कुछ बच्चे उनसे छीना-झपटी कर रहे थे। इसी छीना-झपटी में मिठाई का डिब्बा हाथ से छूट गया और सारी मिठाई सड़क पर गिर कर बेकार हो गयी। सेठजी नाराज हो रहे थे और बच्चों पर चिल्ला रहे थे। तभी चीटियों पर नजर पड़ी, मिठाई के टुकड़े का अस्तित्व समाप्त हो चुका था और चीटियां वैसे ही कतारबद्ध लौट रही थीं।

फिजूलखर्ची

पानी की समस्या मेरे शहर में विकराल रूप ले चुकी थी। सरकारी नलों में दो दिन में एक बार, एक घण्टे के लिए पानी आता था वह भी कम दवाब से। घरों के बोरिंग भी सूख चले थे। घर में नजर घुमाती तो चारों तरफ लगे नल मुझे चिढ़ाते। आदतों से लाचार हमें वाशबेसन के नल या टायलेट के नल फिजूलखर्ची करते बच्चे से लगते। लेकिन वे भी हमारी जरूरत थे, हम उन्हें बंद नहीं कर सकते थे। ऐसे ही एक दिन मैं, पानी की समस्या से जूझ रही थी। मुँह में ब्रश का झाग भरा था और वाशबेसन से पानी नदारत। मैं झुंझला उठी। इतने में ही दरवाजे की घण्टी चहक उठी। मैं दरवाजे की तरफ देखती हूँ, बाहर सफाई कर्मचारी खड़ी है। मैं वैसे ही दरवाजा खोल देती हूँ।
वह पूछती है कि क्या पानी गया?
मैं कहती हूँ कि हाँ गया।
वह हँसती है, कहती है कि पानी की समस्या केवल आप लोगों की बनायी हुई है, हम तो इस समस्या से ग्रसित नहीं हैं।
मैं पूछती हूँ कि कैसे?
हम सुबह उठते हैं, पास के तालाब में जाते हैं, वहाँ स्नान करते हैं, कपड़े भी धोते हैं और पास लगे हैण्डपम्प से एक घड़ा पानी पीने के लिए ले आते हैं। न हमारे यहाँ वाशबेसन का चक्कर, ना लेट्रीन का चक्कर।

Thursday, April 2, 2009

लघुकथाएं : प्रभु की पूजा, बाबा और आम

लघु कथाएं गद्य की वो विधा है जो अपनी बात को संक्षिप्‍त रूप में कह देती है। लीजिए लघुकथाएं नियमित रूप से पढ़िए और अपनी टिप्‍पणी भी दीजिए।

प्रभु की पूजा

अपने घर में बने भगवान के आले में अगरबत्ती जलाकर भगवान को प्रणाम करने के लिए मेरे कदम कक्ष पहुंच जाते हैं। सामने भगवान की मूरत है, भगवान हँस रहे हैं। मैं उन्हें देख ठिठक जाती हूँ, अगरबत्ती की ओर बढ़े मेरे हाथ रुक जाते हैं। मैं क्यों पूजा कर रही हूँ? मन प्रश्न करता है। क्यों इस नन्हें कृष्ण को नहलाती हूँ? क्यों इसे लड्डू का भोग लगाती हूँ? क्यों इसका शृंगार करती हूँ? एक दिन मेरा मन भी इस नन्हें कृष्ण को पुत्र रूप में पाने के लिए नहीं मचल उठेगा? क्या मेरा मन नहीं करेगा कि इसे छू लूँ, इससे बातें कर लूँ? जब भी मन ने किसी रिश्ते को पकड़ना चाहा क्या वह मेरे हाथ लगा? मन उन रिश्तों की टूटन से कितना द्रवित हुआ था तो एक अपेक्षा फिर क्यूँ। मैं केवल प्रभु को मेरे मन के अंदर ही रखूंगी, उनको किसी भी रूप में कैद नहीं करूंगी। पट बंद हो गए और साक्षात दर्शन भी, अब केवल मन की आँखें खुली थीं।

बाबा

बड़े दिनों बाद सपना अपने मैके गयी है, भाई के चेहरे पर प्रसन्नता नहीं है, भाभी के चेहरे पर भी नहीं। वह कारण जानना चाहती है, पूछती है कि कोई विशेष बात हुई है? भाई कुछ नहीं बोलता लेकिन भाभी बताती है कि इन दिनों तुम्हारे पिताजी को न जाने क्या हो रहा है? सपना प्रश्नवाचक चिन्ह सा मुँह बनाकर भाभी की ओर देखती है। भाभी बताती है कि उनके गाँव से उनके एक भतीजे का बेटा आता है, उसे हम जानते हैं कि वह बड़ा चालबाज है। तुम्हारे पिता जो कभी किसी को भी एक पैसा नहीं देते, पता नहीं उसने ऐसा क्या जादू किया है कि वे उसे पैसा दे रहे हैं। सपना पिता के पास जाती है, उनसे पूछती है कि क्या प्रकाश आया था और क्या आपने उसे पैसे दिए हैं? वह कहते हैं कि हाँ दिए हैं। वह पूछती है कि आप तो कभी किसी को भी एक पैसा नहीं देते फिर प्रकाश को क्यों? वे बोलते हैं कि वह आकर मुझे बड़े प्यार से ‘बाबा’ कहकर बुलाता है, मेरे पास आकर बैठता है।

आम

सुनीता के घर नौकर के रूप में एक गाँव का लड़का काम करता है। वह वहीं रहता भी है। गर्मियों का मौसम है, इस बार आम की फसल बहुत अच्छी हुई है। रोज ही फ्रिज आम से भरा रहता। कई बार कुछ आम खराब भी हो जाते। कई बार सुनीता का मन होता कि एक आम लड़के को भी दे दे। लेकिन उसकी सास उसका हाथ पकड़ लेती, बोलती कि कहीं नौकरों को आम खिलाए जाते हैं? लड़का आम की तरफ देखता भी नहीं। एक दिन उसे छुट्टी चाहिए थी, बोला कि गाँव जाना है, सुबह वापस आ जाऊँगा। सुनीता ने उसे छुट्टी दे दी। दूसरे दिन लड़का आ गया, हाथ में उसके एक छोटा थैला था। सुनीता ने पूछा कि इसमें क्या है? वह बोला कि मेरे खेत में एक आम का पेड़ है, उसमें केरियां पकने लगी थी, इसलिए मैं दीदी के लिए कुछ चूसने वाले आम लेकर आया हूँ। दीदी को चूसने वाले आम पसन्द है न?

Thursday, March 19, 2009

पुरुष विमर्श - आनन्द खोने का डर

पीहर से आते हुए मेरी माँ की मुट्ठी में मेरे मामा चंद रूपए रख देते थे। इसे अनमोल खजाना समझ वह फूली नहीं समाती थी। घर आते ही सहजता और गर्व मिश्रित भाव से पिताजी को बता देती कि भाई ने क्या दिया है। पिताजी कुछ क्षण चुप रहते लेकिन दूसरे ही क्षण फरमान जारी कर देते, जितना पैसा है, मुझको दे दो। माँ समझ नहीं पाती कि क्या मुट्ठी भर पैसा भी मुझे अपने पास रखने का अधिकार नहीं? जीत अंत में पिताजी की ही होती। घर में क्लेश न हो यही भाव माँ का बना रहता। तब की एक पीढ़ी गुजर गई, दूसरी पीढ़ी भी गुजरने की तैयारी में है लेकिन मुट्ठी में पैसा रखने की मानसिकता नहीं बदली। हाँ समर्पण की भावना बदल गई परन्तु एक बहस चालू हो गई। पुरुष और स्त्री के अधिकारों की बहस।
सत्ता, समर्पण और डर - आज सत्ता को अपने हाथ में रखने की जद्दो-जेहद परिवारों में नजर आ रही है। मेरे पिता की पीढ़ी में, पिता के हाथ में सत्ता थी और माँ के पास समर्पण भाव। लेकिन तब की ओर गहराई से देखे और सोचे कि क्या यह सहज प्रक्रिया थी? मेरी माँ की पीढ़ी चंद जमात पढ़ी हुई, पति को ही सर्वस्व मानने वाले सदियों के संस्कार, एक जन्म नहीं सात जन्मों का बंधन मानने वाली अर्थात पत्नी का सहज समर्पण। फिर भी चंद रूपए भी उसके हाथ में नहीं रह सकते, यह पिता की पीढ़ी का भाव क्या संकेत देता है? यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह मानसिक कमजोरी की निशानी है। वह इस डर से डरा हुआ है कि जो कुछ भी मेरे पास है, वह कहीं खिसक नहीं जाए। यही डर उसे हिंसक बनाता है। आज तक यही डर, पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में सभी को मिलता रहा है। एक तरह नारी का सहज समर्पण फिर भी पुरुष के मन में बसा डर! हमें सोचने पर मजबूर करता है कि यह डर क्यों है?
आज के परिपेक्ष्य में नारी के हाथ में पैसा और सत्ता दोनों ही हैं तो समर्पण का भाव तिरोहित होता जा रहा है। पुरुष को अपनी सत्ता खिसकती दिखाई दे रही है। ऐसे में हिंसा की अभिवृद्धि भी लाजमी है। जब पूर्ण समर्पण था, पति परमेश्वर था तब भी पुरुष अनजाने भय के कारण हिंसक हो उठता था तो आज साक्षात परिवर्तन को देखते हुए वह कैसे हिंसक नहीं बने? आज स्त्री और पुरुष के अधिकारों की बहस में परिवार कहीं छूट गया है। जब सम्पूर्ण सत्ता हाथ में थी तब भी डर था और आज सत्ता छिनती जा रही है तो यह डर कम होगा या बढ़ेगा? आज का प्रश्न यह है। समाज को देखें तो महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव कम हुआ है, प्रतिद्वंद्विता बढ़ी है, हिंसा बढ़ी है अर्थात पुरुष का डर बढ़ा है। इस बढ़ते डर के साथ क्या हम स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज की कल्पना कर सकते है? तो क्या हो? क्या महिला पूर्व की भांति समर्पण कर दे? क्या तब यह डर कम हो जाएगा? नहीं! इसका उत्तर सम्पूर्ण समाज को खोजना होगा। पुरुष के इस डर को निकालना होगा। जब तक यह डर उसके मन में घर कर के बैठा रहेगा समाज से हिंसा नहीं थमेंगी। नारी यदि पहले से भी अधिक समर्पण कर दे तो भी पुरुष की हिंसा नहीं थमेगी। हिंसा थमेगी केवल डर के भाव के मन से निकलने पर।
एक प्रश्न यह डर क्यों? दूसरा प्रश्न डर कैसे छूटे?
किसी विद्वान ने कहा था कि व्यक्ति मृत्यु से नहीं जीवन के समाप्त होने से डरता है। अर्थात हमारा सुख छूट जाएगा यह डर व्यक्ति को मृत्यु से डराता है। इसी प्रकार पुरुष अपना आनन्द महिला के साहचर्य में ढूंढता है, बस यही डर का कारण है। मेरा आनन्द समाप्त ना हो जाए उसकी सोच का प्रमुख विषय यही है। इसलिए ही विवाह पद्धति में पत्नी छोटी हो, कम आयु वाली हो तथा कम पढ़ी-लिखी हो आदि बातें प्रमुख रहती हैं। येन-केन-प्रकारेण अपनी मुट्ठी में अपने आनन्द को रखने का जतन। अब प्रश्न है डर कैसे छूटे? क्या पुरुष के चाहने मात्र से उसका डर कम होगा? क्या महिला के अधिकार सम्पन्न होने से पुरुष का डर कम होगा? क्या महिला के समर्पण से डर कम होगा? ये सारे ही समाधान समाज खोज चुका है। लेकिन पुरुष का डर समाप्त नहीं हुआ। तो फिर कैसे दूर होगा डर? शायद इस डर को एक माँ निकाल सकती है। क्योंकि माँ ने ही बच्चे का सृजन किया है उसका संवर्द्धन किया है। पिता की भूमिका भी शिक्षक की रह सकती है। अतः आज अधिकारों की बात ना करते हुए इस डर को निकालने में सहयोग करना चाहिए। विवाह पद्धति इस डर को बहुत कम करती थी लेकिन आज टूटती विवाह पद्धति इस डर को फिर बढ़ा रही है और हिंसा को जन्म दे रही है। इसलिए मेरी माँ की पीढ़ी को देखें तो उस पीढ़ी में कितना डर था या हिंसा थी और आज की पीढ़ी को देखे तो कितना डर है या हिंसा है? निःसंदेह पहले की पीढ़ी में कम हिंसा थी तथा कम डर था। आज यह डर पुरुष से निकलकर महिला तक में समा गया है। पहले कोई तलाक का डर नहीं था आज तो सम्बंध विच्छेद आम बात है। इसलिए विवाह पद्धति के सुदृढी़करण की आवश्यकता है। आप कह सकते है कि पहले महिलाओं पर अत्याचार अधिक थे लेकिन केवल कह देने से मान्यता नहीं मिलती। साक्षात अपने परिवारों में झांकना होगा कि सच क्या था? जहाँ डर अधिक हावी था वहीं अत्याचार था। जहाँ आनन्द के अतिरेक की चाहत थी वहीं अत्याचार था, जहाँ आनन्द को घर के बाहर भी खोजा जा रहा था वहीं अत्याचार था। सात्विक पुरुष ने कभी अत्याचार नहीं किया। अतः सभी को एक तराजू में तौल देने से समाज सुदृढ़ नहीं होता। अतः विवाह पद्धति को सुदृढ़ करना पहली और व्यभिचार को कम करना दूसरी आवश्यकता है।
व्यभिचार का भाव जन्मजात ही होता है अतः संस्कार ही इस अवगुण को कम कर सकते हैं। ऐसी पीढ़ी को मानसिक रोगी की तरह देखना चाहिए और सम्पूर्ण परिवार व समाज को उत्तरदायित्व लेना चाहिए कि वे ऐसे नवयुवकों को संस्कारित करे। उनका उपाय खोजें। दूरदर्शन पर घर बैठे ही सुलभ हो रहे नारी देह प्रदर्शन, व्यभिचारी पुरुष का व्यभिचार बढ़ाने में योगदान कर रहे हैं। परिणाम बलात्कार के रूप में सामने हैं। अतः संयमित आनन्द की ओर पुरुष को ले जाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। आज आनन्द को बढ़ावा देना हमारी प्राथमिकता बनती जा रही है। सिनेमा, दूरदर्शन, फैशन शो आदि अनेक उपक्रम केवल आनन्द के लिए ही हैं। अतः आनन्द की खोज की जगह कार्य की खोज होनी चाहिए। व्यक्ति श्रम में आनन्द ढूंढे, पठन-पाठन में आनन्द ढूंढे, खेल में आनन्द ढूंढे, अपने परिवार में आनन्द ढूंढे। अतः अकेले होते जा रहे व्यक्ति को परिवार की आवश्यकता है। जब वह विभिन्न रिश्तों की महक जानेगा तभी दैहिक आनन्द को प्राप्त करने की भूख कम होगी। अतः तीसरी आवयकता है परिवार। यदि परिवार और विवाह पद्धति को हमने सुदृढ़ कर लिया तो पुरुष का डर निकलेगा उसका व्यभिचारी मन संस्कारित होगा और वह निर्माण की और प्रवृत्त होगा।