अजित गुप्‍ता का कोना

श्रीमती अजित गुप्‍ता प्रकाशित पुस्‍तकें - शब्‍द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्‍ध संग्रह) सैलाबी तटबन्‍ध (उपन्‍यास), अरण्‍य में सूरज (उपन्‍यास) हम गुलेलची (व्‍यंग्‍य संग्रह), बौर तो आए (निबन्‍ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं (संस्‍मरणात्‍मक यात्रा वृतान्‍त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।

Wednesday, March 16, 2016

तेरा सूरज अलग और मेरा सूरज अलग

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अब बिसर जाने दो – सम्मान का मोह, अब परे धकेल दो मेरेपन का भाव, अब मत सोचो किसी को संस्कार देने की बात। अब तो बस स्वयं में ही जीवन की तलाश क...
Saturday, March 12, 2016

इन्वेस्टमेंट

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Tuesday, March 8, 2016

मुझमें ही जीवन अमृत हैं

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क्या-क्या नहीं हूँ मैं! मैं सृष्टि की जननी हूँ, मैं कोमलता का सरल प्रवाह हूँ। मुझसे ही होकर प्रेम निकलता हैं, मैं ही आनन्द की जननी हूँ। पोस...
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Saturday, March 5, 2016

आजाद तो प्रकृति भी नहीं है

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जब आँधी चलती है तब धूल का गुबार उठता ही है. पेड़ से पत्ते झड़ते ही हैं। जब भूकम्प आता है तब समुद की लहरे तूफानी हो ही जाती है, जब मेघ गरज...
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Tuesday, March 1, 2016

कभी घर का मन भी रूठ जाता है

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जब हम घर की चाहत रखते हैं तब घर हमारे सामने आ खड़ा होता है लेकिन जब हम घर से दूर भागते हैं तो घर भी हमारी आँखों से ओझल हो जाता है।  पोस्ट ...
Saturday, February 20, 2016

आग का दरिया है और डूब के जाना है

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कुछ लोगों का जीवन अपने परिवार तक सीमित होता है, उनके लिये ही सारा खटराग रहता है। लेकिन कुछ लोग अपने मन को भी टटोलते रहते है और वे कभी परिवा...
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Saturday, January 16, 2016

सच से भागते हम

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हमने अच्छाई के प्रतिमान गढ़ रखे हैं। मनुष्य के आदर्श को स्वयं में तलाशते हैं। आदर्श का प्रकटीकरण अपने परिवार में मानते हैं। अपने समाज को भी...
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