अजित गुप्‍ता का कोना

श्रीमती अजित गुप्‍ता प्रकाशित पुस्‍तकें - शब्‍द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्‍ध संग्रह) सैलाबी तटबन्‍ध (उपन्‍यास), अरण्‍य में सूरज (उपन्‍यास) हम गुलेलची (व्‍यंग्‍य संग्रह), बौर तो आए (निबन्‍ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं (संस्‍मरणात्‍मक यात्रा वृतान्‍त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।

Wednesday, July 22, 2015

जीवन के अन्‍तरालों को खोजने की चाहत

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हम रोज अपने अन्‍दर कुछ न कुछ तलाशते हैं, हम कौन हैं, हमें क्‍या अच्‍छा लगता है, हमें क्‍या करना चाहिए। रोज अपनी आदतों को खोजते हैं, रोज अपन...
Tuesday, July 7, 2015

2 जी के जीवन को 4 जी के युग में चलाने की मुहीम

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लोग कहते हैं जीवो, हमारा मन भी कहता है कि जिन्‍दगी ना मिलेगी दोबारा। लेकिन दुनिया कदम कदम पर आपको बता देती है कि आपका उपयोग समाप्‍त हो गया ...
Wednesday, June 17, 2015

लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गीत प्रेम के गाता चल

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मुझे लगता है जब आप एक स्‍थान पर हैं और वहाँ से आप अपने ध्‍येय की पूर्ति करने में सक्षम नहीं हो पाते तब उस स्‍थान को जितनी जल्‍दी हो छोड़ ही...
Monday, June 15, 2015

यह दो मिनट का लेखन और पठन धीमा जहर ही है

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मुझे लग रहा है कि फेसबुक से दूर हो जाना चाहिए। या फिर उन लोगों से तो अवश्‍य ही दूरी बना लेनी चाहिए जो असभ्‍य और अमर्यादित भाषा का प्रयोग क...
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Friday, May 15, 2015

सुन्‍दरता तू दुखी क्‍यूं है?

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सुन्‍दरता के ही सपने होते हैं। न जाने सुन्‍दरता में ऐसी क्‍या बात है जो सपने देखने लगती है और जो सुन्‍दर नहीं है वे तो सपने भी नहीं देखते। ...
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Saturday, April 18, 2015

स्‍लेट जब रिक्‍त हो जाए तब अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है

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हमारे पास अधिकार के कुछ नम्‍बर होते हैं, रात 2 बजे भी उन्‍हीं नम्‍बरों पर हम डायल करके उनकी बाँहों को आमन्त्रित कर लेते हैं। वे भी तुरन्‍त ...
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Monday, March 30, 2015

बाहर के दायरों से घर तक

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घर की दुनिया कितनी अपनी सी है। घर का कोना-कोना आपका होता है, दीवारें लगता है जैसे आपको बाहों में लेने के लिए आतुर हों। इस अपने घर में पूर्ण...
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