अजित गुप्‍ता का कोना

श्रीमती अजित गुप्‍ता प्रकाशित पुस्‍तकें - शब्‍द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्‍ध संग्रह) सैलाबी तटबन्‍ध (उपन्‍यास), अरण्‍य में सूरज (उपन्‍यास) हम गुलेलची (व्‍यंग्‍य संग्रह), बौर तो आए (निबन्‍ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं (संस्‍मरणात्‍मक यात्रा वृतान्‍त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।

Friday, October 30, 2009

जीवन में सपने मत देखो

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कई बार मन उदास हो जाता है। जीवन में अघटित सा होने लगता है। ऐसे ही क्षणों में कुछ शब्‍द आकर कहते हैं कि जीवन में सपने मत देखो, इनके अन्‍दर सत...
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Saturday, October 24, 2009

कविता - तुम ही दीप जला जाती हो

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गीला-गीला मन होता जब तुम आकर बस जाती हो रीता-रीता मन होता जब झोंका बन छू जाती हो। मेरी चौखट, तेरे चावल मुट्ठी भर से सज जाती है अपने पी के धा...
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Friday, October 16, 2009

दीवाली पर एक कविता - शब्‍द तुम्‍हारे दीप बनेंगे

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शब्द तुम्हारे दीप बनेंगे अन्तर्मन के कलुष हरेंगे शब्द-शब्द हो प्रेम भरा कैसे मन में द्वेष रहेंगे? शब्द साधना राह कठिन शब्द-शब्द से दीप बनेंग...
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Saturday, October 10, 2009

कविता - सुन शब्द राम के

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दीपावली को हम रोशनी का त्‍योहार कहते हैं। लेकिन जिन रामजी के लिए यह दीपमालाएं सजायी गयी थीं उनके त्‍याग का कोई भी स्‍मरण नहीं करता है। दीपाव...
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Wednesday, September 23, 2009

जनजातीय गाँव - 2

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मौसम कुछ-कुछ खुशगवार था, सोचा कि किसी गाँव में घूम आया जाए। अभी भुटटो का भी मौसम था तो सोचा गया कि किसी के खेत पर जाकर ताजे भुट्टो का मजा लि...
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Monday, September 21, 2009

एक जनजातीय गाँव

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उदयपुर से तीस किलोमीटर दूर बसा एक गाँव – अलसीगढ़। आज यहाँ गवरी का समापन है। रक्षाबंधन के बाद से पूरे सवा महिने तक चलने वाला पर्व है गवरी। इसम...
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Monday, September 14, 2009

नवगीत - बिखर पड़ा मन

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सिमट गए दायरे बिखर पड़ा मन बगियाँ के सामने ठिठक खड़ा वन। बरगद है गमले में कुण्‍डी में जामुन सुआ है पिंजरे में बिल्‍ली है आँगन छाँव गंध नायरे प...
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