Saturday, January 28, 2017

वे जड़े ढूंढ रहे हैं

गणतंत्र दिवस अपनी उपादेयता बताकर चले गया, मेरे अंदर कई पात्र खलबली मचाने लगे हैं। देश के गण का तन्त्र और देश के मन की जड़े दोनों को खोद-खोदकर ढूंढने का ढोंग कर रही हूँ। जी हाँ हम ढोंग ही करते हैं। देश के प्रतीक के रूप में अपने ध्वज के समक्ष जब सल्यूट करने को  हाथ उठते हैं तब उसके तंत्र की ओर ध्यान  ही नहीं जाता। ना तो उस तंत्र को अंगीकार कर पाते हैं और ना ही अपने मन की जड़े कहाँ है, उन्हें ही देख पाते हैं। गाँव में कल गणतंत्र दिवस मनाते हुये एक व्यक्तित्व से परिचय हुआ, अमेरिका में रहकर भारत में अपनी जड़े ढूंढ रहे थे। मन में  भारत बसा था लेकिन खुद अमेरिका में बस गये थे, अब वे भारत को भी सम्पन्न बनाना चाह रहे हैं जिससे अपनी जड़ों को वापस लहलहा सके। वे जब से गये हैं भारत को भूल नहीं पाते और बार-बार यहाँ आकर जमीन खोदकर देखते रहते हैं कि मेरी जड़े सुरक्षित तो हैं ना। जिस देश की जड़ों में भौतिकता के अंश ही ना हो, जहाँ के गाँव आज भी प्रकृति के साथ ही जीना चाहते हों, भला वहाँ कैसे देश के तंत्र को विकसित किया जाये?
घर आकर बेटे और पोते से बात होती है, गणतंत्र की बधाई स्वीकार करती हूँ लेकिन साथ ही ढूंढ नहीं पाती अमेरिका के गणतंत्र दिवस को। तो स्वतंत्रता दिवस का ही स्मरण करा देती हूँ। बेटा कहता है कि हम लाख यहाँ के हो जाये लेकिन हमारा गणतंत्र तो भारत में ही है। सुनकर अच्छा भी लगा लेकिन तभी अमेरिका से आये सज्जन याद आ गये। तो क्या अपने देश की जड़े सभी तलाश रहे हैं? लेकिन क्यों तलाश रहे हैं? हम तो भूल बैठे हैं अपनी जड़ों को! हमारी जड़ों में कौन सा खाद पानी है, यह हमें पता ही नहीं। हमारी जड़े कितनी गहरी हैं, वे कहाँ-कहाँ तक अपनी पैठ बनाये हुए  हैं, उनका विस्तार कहाँ तक था, हम कुछ ढूंढ ही नहीं पा रहे हैं, बस हमारे तनों में सुन्दर फूल लगे और मीठे फल आयें बस यही प्रयत्न करते रहते हैं।

बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आने लगी है – भारत के बँटवारे के बाद शरणार्थी बनकर  रह रहे एक व्यक्ति की कहानी – वतन। हर साल पागल का वेश धरकर जा पहुँचना अपनी जड़ों को ढूंढने। उसकी कठिनाई यह थी कि वह जबरन धकियाये गये थे और अभी की कठिनाई यह है कि सहूलते देखकर मन से गये हैं। लेकिन जड़ों की तलाश दोनों में ही है। इसलिये मुझे बैचेनी सी लगती है गणतंत्र की सामाओं से। नियमों से बंधकर हमारा जीवन हो यह तो अच्छा लगता है लेकिन देश की सीमाएं भी बाड़ बंदी में बंध जाये तो बस जड़ों की ही तलाश बनी रहती है। कुछ लोग तलवार लेकर निकले और उन्होंने रेखाये खींचना शुरू किया, यह तेरा और यह मेरा। बाड़बंदी बढ़ती गयी और सभी देश चाक-चौबन्द हो गये। इसलिये ही कहती हूँ कि तंत्र से लिपटकर हम अपनी जड़ों को ढूंढने का ढोंग करते हैं। जड़े  तो अपने मन से विस्तार लेती हैं, जहाँ खाद-पानी मिलता है, वहीं पहुँच जाती है। लेकिन जब पहरे लगा दिये जाएं कि अपनी जड़ों को वहीं छोड़ दो तब तलाश ऐसे ही जारी रहती  है। लोग जाते रहेंगे और यहाँ आकर जड़ों को ढूंढते रहेंगे और हमें  बताते रहेंगे कि हम तनों पर फूल खिलाने आयें हैं। सच तो यह है कि वे जड़े ढूंढ रहे  हैं और हम उनकी आँखों में इस देश को देख रहे हैं। लेकिन हम किसे ढूंढ रहे हैं? यह प्रश्न किसी के मन में आता ही नहीं! वे अपनी जड़ों से अलग हुए, विचलित हो रहे हैं। हम अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी जड़ों के बारे में जानना ही नहीं चाहते!

Sunday, January 22, 2017

ना नौलखा हार और ना ही बगीचा!

ना नौलखा हार और ना ही बगीचा!

नौलखा हार की कहानी तो सभी को पता है, कैसे एक माँ ने नकली हार के सहारे अपना बुढ़ापा काटा और उसकी  संतान इसी आशा में सेवा करती रही कि माँ के पास नौलखा हार है। यह कहानी संतान की मानसिकता को दर्शाती है लेकिन एक और कहानी है जो समाज की मानसिकता को बताती है। सुनो – एक गरीब किसान था, उसके पास एक बगीचा था। किसान  के कोई संतान नहीं थी और वह बीमार रहने लगा था। किसान के बगीचे पर जमींदार की नजर थी। एक दिन जमींदार ने किसान से कहा कि तुम अपना बगीचा मेरे नाम कर दो, मैं तुम्हें इसके बदले में आजीवन एकमुश्त पैसे दूंगा। तुम जब तक जीवित हो, तुम्हारा खर्चा मैं उठाऊंगा और मरने के बाद यह बगीचा मेरा हो जाएगा। किसान ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जब किसान को जमींदार से मासिक पैसे की बात पता लगी तो उसके दूर के रिश्तेदार का बेटा-बहु उसकी सेवा के लिये आ गये। जमींदार तो पल-पल किसान के मरने की बाँट जोहे और बेटा-बहु उसकी खूब सेवा करे। जमींदार हर महिने पैसा देने के बहाने देखने आए कि किसान के कितने दिन बाकी हैं? महिने दर महिने गुजर गये, साल गुजरने लगे, किसान स्वस्थ होने लगा और एक दिन धोती-कुर्ता पहनकर, ऊपर से शॉल डालकर, छड़ी घुमाता हुआ जमींदार के पास पहुंच गया।
हमारे समाज में पुत्र-मोह क्यों है, यह बात लोग अलग-अलग दृष्टिकोण से बताते हैं, मुझे भी सच्चा ज्ञान अभी ही प्राप्त हुआ है। तो सोचा कि आप को भी बताती चलूं कि पुत्र क्यों जरूरी  है? पुत्र हमारे जीवन में नौलखा हार के समान है या किसान के बगीचे के समान। हमारे पास नौलखा हार है फिर वह नकली ही क्यों ना हो लेकिन बैंक में रखा हुआ या संदूक में रखा हुआ संतानों को भ्रमित करता है कि माता-पिता के पास धन है और इसी कारण वे उनकी सेवा करते हैं। रिश्तेदार भी बगीचे के कारण रिश्तेदार की सेवा करते हैं। हमेशा से ही यह चलन  रहा है कि बेटा ना हो तो गोद ले लो लेकिन बेटा होना जरूर चाहिये। मैं इस ज्ञान को समझ नहीं पाती थी और ना  ही किसी ने सत्य के दर्शन कराये थे लेकिन सत्य तो होता ही प्रगट होने के लिये है तो मेरे सम्मुख भी प्रगट हो गया। सत्य ने कहा कि बेटा वंश बढ़ाने से अधिक आपकी सेवा में सहयोग कराता है। किसान को जैसे ही जमींदार से पैसे मिलने लगे रिश्तेदार आ गये, ऐसे ही बेटा है तो लोग कहते हैं कि सेवा करने वाला है। गोद लिया है तो भी बेटा है, गाली देता है तो भी बेटा है, क्योंकि रिश्तेदारों को पता है कि यह हुण्डी है। जब हमारे काम पड़ेगा तो भी खड़ा होगा और खुद के लिये भी खड़ा रहेगा ही। लेकिन बेटा है ही नहीं, असली या नौलखा हार जैसा नकली या गोद लिया हुआ तो रिश्तेदार कहते हैं कि हम क्यों सेवा करें इन बूढ़ों की।

सबसे खराब स्थिति तो अब पैदा हुई है, हमने असली नौलखा हार बनाया, उसमें हीरे जड़ा दिये और उसे करोड़ों का बना दिया। करोड़ों का बनते  ही वह हीरा रानी विक्टेरिया के मुकुट का श्रृंगार बन गया या अमेरिका की शोभा बढ़ाने लगा। रिश्तेदारों के पुत्र ताने खाने लगे कि देखो उसे और तुम? लेकिन बारी अब उनकी थी, वह विदेशी बने इस हीरे के माता-पिता की तरफ झांकने से भी कटने लगे। जब उनका बेटा हमारे काम का नहीं तो हम क्यों सेवा-टहल करें? जो कान हरदम आवाजें सुनते थे अब वहाँ सन्नाटा पसर गया। ना कोई आवाज आती है कि चाची कैसी हो, ना ताई कैसी हो, मामी-बुआ सारे ही सम्बोधन दुर्लभ हो गये। होली-दीवाली भी दुआ-सलाम नहीं होती। आस-पड़ोस वाले ही हैं जो तरस खाते हैं और अपने बेटे से कहते हैं कि बेचारे अकेले हैं, वार-त्योंहार कभी जा आया कर। पुत्र क्या होता है, आज हमारी समझ में आने लगा  है. यह ऐसा बगीचा है जिसके लालच में कोई भी जमींदार आपको मासिक धन दे देता है और कोई भी दूर का रिश्तेदार आपकी सेवा-टहल कर देता  है। पुत्र हो और वह भी कीमती लेकिन आपके रिश्तेदारों के किसी काम का नहीं तो वह बगीचे में खड़े बिजूका जैसा भी आश्वस्त नहीं करता, उल्टा आपके लिये मखौल का वातावरण बनाने में सहायक हो जाता है। हर घर में सन्नाटा पसरा है, माता-पिता ने अपने लाल को करोड़ों का  बना दिया है और वह विदेश में बैठकर माता-पिता के सारे रिश्तों को दूर करने में तुले हैं। उन्हें इतना असहाय बना दिया है कि हार कर बेचारे माता-पिता बिना पतवार की नाव के समान नदी में गोते खाने को मजबूर हो गये हैं। ना नौलखा हार अपने पास रहा और ना ही बगीचा! 

Friday, January 20, 2017

तेरे बिना मेरा नहीं सरता रे


हमेशा कहानी से अपनी बात कहना सुगम रहता है। एक धनवान व्यक्ति था, वह अपने रिश्तेदारों और जरूरतमंदों की हमेशा मदद करता था। लेकिन वह अनुभव करता था कि कोई भी उसका अहसान नहीं मानता है, इस बात से वह दुखी रहता था। एक बार उसके नगर में एक संन्यासी आए, उसने अपनी समस्या संन्यासी को बतायी। संन्यासी ने पूछा – क्या तुमने भी कभी उनकी मदद ली है? व्यक्ति ने कहा कि नहीं मैंने कभी मदद नहीं ली। तब संन्यासी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के लिये उपयोगी बनना चाहता है, किसी के लिये उपयोगी बनने पर ही उसे गौरव की अनुभूति होती है। एकतरफा सहयोग, एक व्यक्ति को बड़ा और दूसरे को छोटा सिद्ध करता है, इसलिये तुम्हारी सहायता पाकर भी कोई खुश नहीं होता। तुम जब तक दूसरों को उपयोगी नहीं मानोंगे तब तक कोई भी तुम्हारी इज्जत नहीं करेगा।

मन की भी यही दशा है, मन चाहता है कि दूसरों पर अपना नियंत्रण बनाकर रखूं। अपनी सत्ता और सम्मान सभी के मन में स्थापित कर दूं। लेकिन जब हम अपने मन को दूसरे के नियंत्रण में जाने देते हैं तब हमें सुख मिलता है। हमारी सत्ता हमारा मन  भी नहीं मानता तो हम दूसरों पर अपनी सत्ता कैसे स्थापित कर सकते हैं! हम यदि स्वयं को ही कर्ता मानते रहेंगे तो कभी सुखी नहीं हो सकते। माता-पिता कहते हैं कि हमारे अस्तित्व को मानो, संतान कहती है कि हमारा भी अस्तित्व है। अन्य रिश्तों में भी यही है। जब तक हम एक-दूसरे की जरूरत नहीं बनते तब तक खुशी हमारे पास नहीं आती। स्वयं को स्वयंभू बनाने के चक्कर में हम भाग रहे हैं, एक-दूसरे से भाग  रहे हैं। किसी के अधीन रहना हमें पसन्द नहीं, इसलिये हम अपनी सत्ता के लिये भाग रहे  हैं। जिस दिन हम दूसरों को अपनी जरूरत समझेंगे उस दिन शायद हम एक-दूसरे के साथ के लिये भागेंगे। दूसरों की जरूरतों को पूरा करने का हम दम्भ रखते हैं लेकिन अपने मन की जरूरतों को ही पूरा नहीं कर पाते, मन तो हमारा दूसरों के लिये तड़पता है लेकिन हम ही दाता है, यह भावना हमें सुखी नहीं रहने देती। मेरे लिये मेरे नजदीकी बहुत उपयोगी हैं, बस यही भावना  हमें पूरक बनाती है। जिस दिन हम किसी पराये को भी यह कह देते हैं कि – तेरे बिना मेरा नहीं सरता रे, तो वह पराया भी अपनों से अधिक हो जाता है। फिर अपनों से ऐसा बोलने में हमारी जुबान अटक क्यों जाती है!

Monday, December 19, 2016

कस्तूरी-सुगंध को हर दम महसूस करूंगी


बहुत खो दिया मैंने, ऐसे सुख को, जिसमें अपार सृजन और कला का वास है। जिसमें प्रेम-प्यार-आत्मीयता को एक ही शब्द में समेटने का जन्मजात गुण है। जिसमें बाहुबल के स्थान पर अपने आँचल में परिवार को समेटने की असीमित शक्ति है। जिसके एक इशारे पर दुनिया का चलन बदल जाता है। जो माँ के रूप में ममतामयी है, पत्नी के रूप में भी प्रेममयी है, बहिन के रूप में भी स्नेहमयी है, बेटी के रूप में भी प्यारभरी है। जो जन्म से लेकर मृत्यु तक परिवार को बांधकर रखती है, ऐसा सुख दुनिया का सबसे बड़ा सुख है। महिला होने का सुख महिला को जी कर  ही जाना जा सकता है।
बचपन से पिता ने पुरुष बनाने की दौड़ में शामिल करा दिया, बहुत सारे सुख अनजाने ही  रह गये। उम्र के इस पड़ाव पर पूरे जतन से महिला बनने का प्रयास कर रही  हूँ, जैसे-जैसे महिला होने के करीब जाती हूँ, मेरा सुख बढ़ता जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा सृजन महिला के पास ही है। कला का प्रगटीकरण तो हर क्षण ही होता है, दरवाजे के बाहर रंगोली दिख जाती है तो हाथ में मेंहदी रच जाती है। रसोई से आती सुगंध टेबल पर नाना रूप में सज जाती है। शरीर का आकर्षण कभी वस्त्रों सें झलकता है तो कभी गहनों में खनकता है। बस सृजन ही सृजन और कला ही कला।
साधारण सी दिखने वाली महिला भी असाधारण बनकर सामने खड़ी हो जाती है। तभी तो अच्छे से अच्छे धुरंधर भी उनके समक्ष नतमस्तक से खड़े दिखायी देते हैं। ममता की सत्ता – प्रेम-प्यार-आत्मीयता से बड़ी बन जाती है। परिवार उसका साम्राज्य बन जाता है और साम्राज्यों के अधिपति परिवार के इस साम्राज्य के समक्ष बौने हो जाते हैं। सारी ही भाषाओं के ज्ञान को मन की भाषा निरूत्तर कर देती है। तभी तो शंकराचार्य से उभय भारती जीत जाती है।

सब गड्डमड्ड कर दिया हैं हमने। अपना सुख खुद ने ही छीन लिया है हमने। अपने आकाश को मोदी की तरह विस्तार चाहे कितना ही दे दो लेकिन एक कोना ममतामयी सी सुषमा के जैसा भी रहने दो। मोदी भी मोदी बनकर सफल तब होते हैं जब उनकी आँखों से ममता टपकने लगती है, जब वे अपने अंदर ममता का वास रखते हैं तो भला हम अपनी ममता से कैसे किनारा कर लें। दृढ़ता की कितनी ही प्राचीर बन जाओ लेकिन उस प्राचीर के हर छिद्र में स्नेह की आपूर्ति हमेशा रहनी चाहिये। जो महिला होकर भी इस सुख से अनजान हैं वे ऐसे ही हैं जैसे फूल बनकर भी सुगंध से कोसों दूर हों। अपनी मुठ्ठी में अब अपने आपको रखूंगी, अपने अन्दर इस आनन्द को समेट कर रखूंगी और कस्तूरी मृग के समान कहीं नहीं भटकूंगी बस अपने अन्दर की कस्तूरी-सुगंध को हर दम महसूस करूंगी।

Friday, December 16, 2016

काहे को टेन्शन मौल लेना?


कमाने से ज्यादा खर्च करने का संकट हैं। कभी सोचा है कि - आपने बहुत ज्ञान प्राप्त कर लिया, आप इसका उपयोग करना चाहते हैं लेकिन कैसे उपयोग करें, मार्ग सूझता नहीं। सारा दिन बस इसी उधेड़-बुन में लगे रहते हैं कि कैसे अपना ज्ञान लोगों तक पहुंचे? यहाँ सोशल मीडिया पर भी यही मारकाट मची रहती है कि मेरी बात अधिकतम लोगों तक कैसे पहुंचे? घर में भी अपने ज्ञान को देने के लिये बीबी-बच्चों को पकड़ते रहते हैं, लेकिन सफलता दूर  की कौड़ी दिखायी देती है। बस यही हाल आपके धन का भी है। एक फिल्म आयी थी – मालामाल, कल भी किसी चैनल पर प्रसारित हो रही थी। उस में नायक को तीस दिन में 30 करोड़ रूपये खर्च करने की चुनौती मिलती है, यदि उसने यह कर लिया तो वह 300 करोड़ का मालिक होगा, नहीं तो जय राम जी की। शर्त यह है कि वह अपने नाम से एक पैसे की भी सम्पत्ती नहीं खरीद सकता।
अब आज के परिपेक्ष्य में देखते हैं, एक अधिकारी या व्यापारी प्रति माह लाखों रूपये रिश्वत, टेक्स चोरी आदि से एकत्र करता है, लेकिन यहाँ भी शर्त लगा दी गयी है कि इस धन से सम्पत्ती नहीं खरीद सकते। जमीन, सोना आदि अचल सम्पत्ती के लिये पेन कार्ड चाहिये या चेक से भुगतान करना है। हर माह जमा होने वाले इन लाखों-करोड़ों रूपयों को कैसे खर्च करें, यह कमाने से भी बड़ी समस्या हो जाती है! रात-दिन देश-विदेश का पर्यटन करने लगते हैं, मंहगे कपड़े पहनने लगते हैं, होटलों में पार्टी करने लगते हैं, शादियों में बेहिसाब पैसा बहाने लगते हैं। फिर भी इस कुएं का पानी रीतता नहीं, जितना निकालते हैं, उतनी तेजी से वापस भर जाता है। दिन का चैन और रात की नींद उड़ जाती है, दिल धडकते-धड़कते बन्द होने की कगार पर पहुंच जाता है। लेकिन आदत छूटती नहीं, पैसा एकत्र करने की लालसा समाप्त होती ही नहीं।

आप भूलभुलैय्या में फंस चुके हैं, बाहर निकलने का एक ही रास्ता है, वह बैंक होकर जाता है। अपनी  कमाई को बैंक में जमा कराओ और आसानी से इस भूलभुलैय्या से बाहर निकल जाओ। खर्च करने का तनाव शरीर और मन को मत दो। भ्रष्टाचार के बिना भी आप इतना कमा रहे हैं कि उसे भी खर्च नहीं कर सकते, तो फिर काहे को टेन्शन मौल लेना?

Thursday, December 8, 2016

ज्यादा बाराती नहीं चलेंगे


हमें आपकी लड़की पसन्द है, विवाह की तिथि निश्चित कीजिये, लेकिन एक शर्त है विवाह हमारे शहर में ही होगा। वर पक्ष का स्वर सुनाई देता  है। राम-कृष्ण-शिव को अपना आदर्श मानने वाले समाज में यह परिवर्तन कैसे आ गया! स्वंयवर की परम्परा रही है भारत में। कन्या स्वंयवर रचाती थी और अपनी पसन्द के वर को वरण कर जयमाल उसके गले में डालती थी। इसके बाद ही वर जयमाल वधु के गले में डालता था। यहीं से प्रारम्भ हुआ बारात का प्रचलन। हमारी परम्परा में कन्या वर का चयन करती है लेकिन वर्तमान में वर, वधु का चयन कर रहा है और उसे ही आदेशित कर रहा है कि मेरे शहर में आकर विवाह सम्पन्न करो। विवाह में वर पक्ष के सैकड़ों और कभी-कभी हजारों बाराती कन्या के द्वार पर बारात लेकर आते हैं। कन्या पक्ष के लिये इतना बड़ा खर्च करना कठिन हो जाता है लेकिन विवाह की पहली शर्त तो यही है। न जाने किसने प्रारम्भ की थी यह परम्परा लेकिन अब तो रिवाज ही बन गया है।
कल याने 9 दिसम्बर की अनेक शादियां हैं, मेरे पास भी कई निमंत्रण हैं, लेकिन आश्चर्य का विषय यह है कि इस बार बारात का एक भी निमंत्रण नहीं है। सभी लोग संगीत में निमंत्रित कर रहे हैं, बारात में तो केवल घर वाले ही रहेंगे। सुखद परिवर्तन है। परिवर्तन का कारण बना है – नोट बंदी और कालाधन। कन्या पक्ष को अपनी बात कहने का अवसर मिला है, उन्होंने दृढ़ता से कहा है कि ज्यादा बाराती नहीं चलेंगे।

शादियों में पहले कन्या पक्ष को सहयोग करने के लिये समाज आर्थिक सहयोग  करता था और समाज के लोग एक निश्चित राशि कन्या को देते थे, जिसे किसी मुखिया द्वारा लिखा जाता था, लेकिन अब लिफाफे में बंद राशि का प्रचलन चल गया है। नोटबंदी पर इस प्रथा में भी बदलाव आएगा और एक निश्चित राशि ही देने की परम्परा पुन: बनेगी। अभी लोहा गर्म है इसलिये चोट अभी ही करनी चाहिये, परम्पाराएं बदलने का सुनहरा अवसर है, बस कन्या पक्ष को दृढ़ रहने की आवश्यकता है।

Wednesday, December 7, 2016

यौन कुण्ठा से उपजा वहशीपन


जिस के फटी ना पैर बिवाई, वो क्या जाने पीर परायी। पुरुष-युवा मन की यौन कुण्ठा क्या है? भला मैं महिला होकर  कैसे जान सकती हूँ? क्या यह प्यास से भी भयंकर है? क्या यह भूख से भी अधिक मारक है? प्यास और भूख में तड़पता इंसान धीरे-धीरे शक्तिहीन होता जाता है लेकिन यौन पीड़ा से तड़पता पुरुष मारक होता जाता है। वह वहशी बनता जाता है और अपनी भूख समाप्त करने के लिये कुछ भी कर गुजरता है। ऐसा ही कुछ अभी उदयपुर में हुआ। 22 साल का लड़का यौन-कुण्ठा में इतना वहशी हो गया कि दो बच्चों की माँ को बेरहमी से खत्म कर दिया।
जैसे ही यौवन फूटने लगता है, मन के जज्बात निकलने के लिये कितने ही मार्ग तलाश लेते हैं। कभी माँ का सहलाना काम आ जाता है तो कभी घर की भाभी, चाची या अन्य रिश्तेदार का स्पर्श उसे राहत दे देता है। लेकिन जब परिवार में कोई ना हो, पढ़ाई की दीवार चारों तरफ खेंच दी गयी हो तब लावा एकत्र होने लगता है और कोई ना कोई विस्फोटक घटना को जन्म देता है। युवा या किशोर मन अक्सर आसान शिकार की खोज करता है, वह घर की या आसपास की उस महिला को चुनता है जहाँ महिला  पर आरोप लगाना सरल हो। सामूहिक परिवारों में यह समस्या रोज सामने रहती है, युवा मन की यौन कुण्ठा को निकलने का कोई ना कोई मार्ग मिल ही जाता है लेकिन एकल परिवारों में पढ़ाई के बोझ तले युवा कुण्ठा का शिकार हो जाते हैं।

उदयपुर की एक अघिवक्ता जो दो बच्चों की माँ थी, अपने कॉम्पलेक्स में पति के साथ रह  रही थी, थोड़ी अनबन दोनों के मध्य थी। उसी कॉम्प्लेक्स में रहने  वाला 22 वर्षीय युवक अपनी यौन कुण्ठा को लेकर सुबह 9.30 पर ही महिला के घर जा पहुँचा। वहाँ उसने महिला की चोटी पकड़कर दीवार पर सर पटक-पटक कर उसे मार दिया। इतनी भयंकर यौन कुण्ठा एक युवा को वहशी बना गयी और पूरे समाज पर एक प्रश्नचिह्न लगा गयी कि हम किस दिशा में अपने बच्चों को ले जा रहे हैं! अपने परिवार के युवाओं पर विचार कीजिये और उनकी यौन कुण्ठा निकालने के लिये परिवार में सहज वातावरण बनाइये। स्वाभाविक प्रेम यौन कुण्ठा को पीछे धकलेता है, खेलकूद शरीर की ऊर्जा को बाहर निकालता है। इसलिये युवक को घर घुस्सू मत बनाइये अपितु उसे अपनी बात निकालने का मौका दीजिये। घर में जितना हो सके बाते कीजिये, खुलकर हँसने की परम्परा बनाइये। चुप रहने से कुण्ठा का जन्म होता है और बोलने से कुण्ठा पनप नहीं पाती।