Friday, November 23, 2012

केरियर, बॉस और विदेश के कारण विस्‍मृत पिता और परिवार

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Saturday, November 17, 2012

सफल व्‍यक्तित्‍व (Success histories) के संघर्ष देखिये ना कि उनका छिद्रान्‍वेषण करिए

सफलता का मंत्र यदि बाजार में बिकता तो शायद हम सभी खरीद लेते लेकिन यह बाजार में नहीं हमारे अन्‍दर की बुनावट में ही निहित होता है। हमारे जीवन का आग्रह किसी एक बिन्‍दु पर दृढ़ होता जाता है जिसे हम कई बार जुनून की संज्ञा भी देते हैं, तब ही व्‍यक्ति उस क्षेत्र में सफल हो पाता है। शेष पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - 
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Saturday, November 10, 2012

जन्‍मदिन पर स्‍वयं की पड़ताल - सामाजिक कार्यकर्ता की विडम्‍बना

जन्‍मदिन पर स्‍वयं की पड़ताल - सामाजिक कार्यकर्ता की विडम्‍बना
सार्वजनिक जीवन में सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका कुछ ऐसी है, जैसे तलवार की धार पर चलना, जिसमें केवल घाव ही घाव है। या फिर तालाब के ऊपर बंधी रस्‍सी पर बांस के सहारे एक छोर से दूसरे छोर पर जाना। इस जीवन का मेरा अनुभव लगभग 22-23 वर्षों का है और कल ही याने 9 नवम्‍बर 2012 को अपने जीवन के 61 वर्ष पूर्ण किए हैं तो उस जीवन का सफर कैसा रहा, उस पुरानी सड़क पर भी मन दौड़ना चाह रहा है।
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Friday, October 12, 2012

दुनिया के किसी भी आश्‍चर्य से कम नहीं – अजन्‍ता और एलोरा की गुफाएं

औरंगाबाद से 120 किमी की दूरी पर स्थित अजन्‍ता गुफाएं भारतीय कला और संस्‍कृति की अनूठी मिसाल है। यह अद्भुत ही नहीं अपितु आश्‍चर्यचकित करने वाली हैं। दो किलोमीटर के दायरे में फैले पहाड़ के गर्भ में अनेक गुफाओं को कलाकारों ने इस प्रकार से तराशा है कि वे विश्‍व के आश्‍चर्यों में चाहे शामिल नहीं की गयी हो लेकिन वे किसी भी आश्‍चर्य से कम नहीं हैं। लेकिन इन्‍हें भारत के सात आश्‍चर्यो में अवश्‍य गिना जाता है। शेष पोस्‍ट को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - 
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Friday, October 5, 2012

समापन खण्‍ड – विवेकानन्‍द ने अमेरिका में 11 सितम्‍बर 1893 को भारतीय संस्‍कृति को स्‍थापित किया

खेतड़ी नरेश राजा अजीत सिंह‍ को पुत्र प्राप्ति हुई और तब उन्‍हें स्‍वामीजी का ध्‍यान आया। वे बेचैन हो गए, उन्‍होंने दीवान जी को कहा कि दीवान जी बहुत बड़ी भूल हो गयी है। मैं स्‍वामी जी को ही विस्‍मृत कर बैठा। लेकिन अब पुत्र जन्‍मोत्‍सव तभी मनाऊँगा जब स्‍वामी यहाँ आएंगे। 
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Friday, September 28, 2012

चतुर्थ खण्‍ड – स्‍वामी विवेकानन्‍द कन्‍याकुमारी स्थित श्रीपाद शिला पर

सेतुपति से मिलने से पूर्व मद्रास के मन्‍मथ बाबू के साथ स्‍वामी रामेश्‍वरम् की यात्रा के लिए निकले लेकिन मन्‍मथ बाबू को सरकारी काम से नागरकोइल तक जाना था। नागरकोइल पहुंचकर मन्‍मथबाबू ने स्‍वामीजी को कहा कि यहाँ से कन्‍याकुमारी मात्र 12मील है। स्‍वामीजी ने कन्‍याकुमारी जाने का निश्‍चय किया। पोस्‍ट को पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं -
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Saturday, September 22, 2012

तृतीय खण्‍ड – विवेकानन्‍द राजस्‍थान में

गतांक से आगे - तृतीय खण्‍ड
स्‍वामी विवेकानन्‍द के लिए राजपुताने का महत्‍व सर्वाधिक रहा है। राजपुताना ही ऐसा प्रदेश था जहाँ उन्‍होंने व्‍यापक स्‍तर पर बौद्धिक चर्चाएं प्रारम्‍भ की। सभी वर्गों और सभी सम्‍प्रदायों को अपने ज्ञान से अभिभूत किया। उनके पास राजा भी नतमस्‍तक हुए और रंक भी, उनके पास हिन्‍दु भी आए और मुसमलमान भी। वृन्‍दावन से निकलकर उन्‍होंने राजपुताने का रुख किया और सर्वप्रथम अलवर आए। पूरी पोस्‍ट के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें - 
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