<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5543246866765877657</id><updated>2012-01-31T16:02:12.212+05:30</updated><category term='अन्‍ना हजारे'/><category term='जन्‍मदिन की बधाई'/><category term='जन्‍म दिन'/><category term='लघुकथा'/><category term='men problem women'/><category term='अतीत'/><category term='अमेरिका'/><category term='talking'/><category term='फतेहसागर'/><category term='blogging work shop'/><category term='books'/><category term='विचार'/><category term='tribal area america mevad'/><category term='मन'/><category term='bharat vikas parishad'/><category term='नववर्ष'/><category term='idol आदर्श कौन'/><category term='summer vacation. hill station'/><category term='दीपावली'/><category term='मेरा मन'/><category term='मालिक या गुलाम'/><category term='कविता'/><category term='ब्‍लाग जगत'/><category term='short story लघुकथा'/><category term='कर्मण्‍य तपोभूमि सेवा न्‍यास'/><category term='RAJASTHAN'/><category term='diwali'/><category term='ग्‍वालियर'/><category term='सुन्‍दरता'/><category term='दोहा लेखन'/><category term='navgeet'/><category term='new year'/><category term='विवाह'/><category term='लोरी'/><category term='rail safety'/><category term='जीव-जन्‍तु और हम'/><category term='लेख्नन लोकार्पण'/><category term='UDAIPUR'/><category term='birthday'/><category term='रंल यात्रा'/><category term='बाते करना'/><category term='संस्‍मरण'/><category term='लघुकथा लेखन'/><category term='प्रवास'/><category term='मन की स्‍वतंत्रता'/><category term='private school'/><category term='60 years'/><category term='king kingdom राजा'/><category term='rajendra nath mahrotra'/><category term='रेल मंत्री के नाम खुला पत्र letter to railway minister'/><category term='कविता माँ'/><category term='india'/><category term='bagdara nature reserve udaipur'/><category term='bloging work shop'/><category term='website'/><category term='हिन्‍दी-विश्‍व गौरव-ग्रन्‍थ'/><category term='साधना'/><category term='माँ और बेटी'/><category term='समाजिक सरोकार'/><category term='उदयपुर'/><category term='शिरडी के साईं बाबा'/><category term='भविष्‍य'/><category term='new generation'/><category term='sachin'/><category term='परिवार या होटल'/><category term='amitabh. bhagwan'/><category term='नयी-वधु'/><category term='america'/><category term='समाज'/><category term='मानसिक प्रबंधन'/><category term='kavita'/><category term='satire'/><category term='मित्र'/><category term='old and new generation'/><title type='text'>अजित गुप्‍ता का कोना</title><subtitle type='html'>श्रीमती अजित गुप्‍ता
प्रकाशित पुस्‍तकें - शब्‍द जो मकरंद बने, सांझ की झंकार (कविता संग्रह), अहम् से वयम् तक (निबन्‍ध संग्रह) सैलाबी तटबन्‍ध (उपन्‍यास), अरण्‍य में सूरज (उपन्‍यास)
हम गुलेलची (व्‍यंग्‍य संग्रह), बौर तो आए (निबन्‍ध संग्रह), सोने का पिंजर---अमेरिका और मैं  (संस्‍मरणात्‍मक यात्रा वृतान्‍त), प्रेम का पाठ (लघु कथा संग्रह) आदि।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://ajit09.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ajit09.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>ajit gupta</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02729879703297154634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_jm9w3syumo4/S7mJg_5YHQI/AAAAAAAABo0/-LFkHcxkUCU/S220/Copy+of+DSC_0198.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>162</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5543246866765877657.post-1034626034970437038</id><published>2012-01-31T10:12:00.000+05:30</published><updated>2012-01-31T10:12:00.619+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='website'/><title type='text'>एक आवश्‍यक परिवर्तन, शायद यही समय की मांग है।</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कल मेरा याहू अकाउण्‍ट हैक हो गया परिणाम स्‍वरूप मेरे सारे ही कांटेक्‍टस समाप्‍त हो गए। यह तो किसी हैकर का कमाल था लेकिन हमारी सरकार द्वारा तो गूगल को प्रतिदिन चेतावनी दी जा रही है कि हम गूगल की सर्विस को बन्‍द कर देंगे। इसलिए मैंने भी एक परिवर्तन करने का निश्‍चय कर लिया। मैंने एक वेबसाइट प्रारम्‍भ की है &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.sahityakar.com/"&gt;www.sahityakar.com&lt;/a&gt; &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;इसी पर वर्ड-प्रेस के माध्‍यम से अपना ब्‍लाग वहाँ शिफ्‍ट किया है। अभी ब्‍लागस्‍पाट पर भी मेरा ब्‍लाग रहेगा लेकिन धीरे-धीरे मैं पूर्णतया अपनी वेबसाइट पर ही आ जाऊँगी। अत: आप सभी से निवेदन है कि आप मेरी साइट पर जाकर मुझे सबस्‍क्राइब करें। जिससे आप मेरी पोस्‍ट पढ़ सकें और हम एक दूसरे से सम्‍पर्क में रह सकें। आभार। &amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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नहीं जी यह तो बाजार का नया साल है, इसलिए बाजार में ही मनेगा। अभी एक संत का प्रवचन सुना, वे कह रहे थे कि रात को 12 बजे हम कहते है कि बधाई हो, नये साल की। फिर सो जाते हैं, तभी रात को एक बजे किसी का फोन आ जाता है तो उससे गुस्‍से में कहते हैं कि आधी रात को क्‍यों फोन कर रहा है? बर्फ गिर रही है, सर्दी की मार पड़ रही है, सारी दुनिया अपने खोल में सिमटी है और हम कह रहे हैं कि नया साल आ गया! &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बचपन में एक दिन आता था, जब चारों तरफ फूल खिले होते थे, मन चहक रहा होता था। प्रकृति ने मानो नए वस्‍त्र धारण किये हो। सुबह-सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही मिश्री और नीम की कोपल प्रसाद रूप में मिल जाती थी और कहा जाता था कि नया साल आ गया है। परिवार में ही मिठाई बनती थी और सारे ही परिवारजन एकत्र होकर नये साल की खुशियां मनाते थे। होटल नहीं थे, बाजार नहीं थे बस था तो परिवार था, अपना समाज था। मदहोशी नहीं थी, थी तो जागरूकता थी। प्रकृति को परिवर्तन का जरिया मानते थे। प्रकृति के अनुरूप ही तिथियों का निर्धारण करते थे। तब शायद हम शिक्षित नहीं थे, आज है। मुझे लगता है कि तब हम ज्ञानवान थे लेकिन आज नहीं हैं। क्‍या शिक्षित होने से केवल एक ही सोच पर चला जाता है? क्‍या अपना विवेक प्रयोग में नहीं लिया जाता? क्‍या अब परिवारों का स्‍थान होटल ले लेंगे? हम ऐसा कार्य क्‍यों नहीं कर पाते जिसमें अपना विवेक जागृत रहे। क्‍यों हम प्रत्‍येक कार्य में मदहोशी ही चाहते हैं। क्‍यों ह‍म अपने होश खो देना चाहते हैं? क्‍या जीवन में इतनी निराशा है? क्‍या जीवन में इतनी कटुता है? जो सबकुछ भुला देना चाहते हैं। खुशियां जागृत अवस्‍था में मनायी जाती हैं या मदहोशी में? ऐसे कई प्रश्‍न हैं जो मुझे परेशान करते हैं, आप के पास इनके उत्तर होंगे? तारीख के अनुसार यह मेरी इस वर्ष की अन्तिम पोस्‍ट हैं लेकिन नव-वर्ष के अनुसार अभी मार्च तक और पोस्‍ट आएंगी। जब प्रकृति गुनगुनाएगी तब हम भी गुनगुनाएंगे कि नव वर्ष आप सभी के लिए नव-प्रेरणा लेकर आए। अभी तो प्रकृति सिकुड़ी हुई है तो हम कैसे कहें कि नव-वर्ष मुबारक। खैर आप धुंध में लिपटे, बिस्‍तरों में दुबके होकर, होटल में नाच-गान के साथ ही जबरन नयेपन को आमंत्रण देंगे तो हम भी कह देंगे कि आपका जीवन ऐसे ही संघर्षों में बीते जैसे आज प्रकृति संघर्ष कर रही है। तो विदा 2011, क्‍या करें तुझे सर्दी में ही विदा करना पड़ रहा है। भारत का ज्ञान आज साथ होता तो तुझे हम बसन्‍त में विदा करते और 2012 को भी बसन्‍त में ही अपने घर भोर की बेला में घर ले आते। लेकिन अब तो क्‍या करें?&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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कभी आत्‍मा को जानने का प्रयास तो कभी परमात्‍मा को खोजने का प्रयास, कभी सृष्टि को समझने का प्रयास तो कभी मानवीय जगत को परखने का प्रयास करते हुए म‍हर्षि भी कभी बोध तो कभी ज्ञान तो कभी केवल ज्ञान प्राप्‍त करने के क्रम में जीवन समर्पित कर देते हैं। लेकिन फिर भी स्‍वयं को परखने का कार्य अधूरा ही रह जाता है। हम आध्‍यात्‍म की बात करते हैं अर्थात् अपनी आत्‍मा को पहचानने की बात। लेकिन हमारे मन में किसकी चाहत है, हम क्‍या करना चाहते हैं शायद कभी समझ ही नहीं पाते। शरीर तो जैसे तैसे सध जाता है, कभी गरीबी में और कभी अमीरी में भी स्‍वयं को ढाल ही लेता है लेकिन यह जो मन है वह कभी सधता नहीं है। क्‍यों नहीं सध पाता? क्‍यों‍कि इसका हमें बोध ही नहीं है, बस भागता है, कभी इधर तो कभी उधर। हम बस सागर में गोते खा रहे हैं। मन को साधने के लिए प्रत्‍येक रिश्‍ते में बस मित्रता ही ढूंढते हैं। कहते हैं कि माँ हो तो मित्रवत, पिता हो तो मित्रवत, भाई बहन सभी मित्रवत होने चाहिए और मित्र? जब मित्र तलाशते हैं तो उनके अन्‍दर अपने मन को ढूंढते हैं। न जाने कौन सी ध्‍वनी तरंगे मन से निकल आती हैं और मन को मन से राहत मिल जाती है। मित्र बन जाते हैं। लगता है हमें सब कुछ मिल गया। लेकिन बोध की प्‍यास नहीं बुझती। मित्र तो मिल गया लेकिन अपने मन सा सारा ही कच्‍चा चिठ्ठा उड़ेलने का साहस तो अभी नहीं आया ना? बहुत कुछ भर रखा है मन ने, ना जाने कितने कलुष, कितने राग और कितने द्वेष। एक मित्र कहता है कि मुझे रिक्‍त होने दो तो दूसरा कहता है कि नाहक ही मुझे मत भरो। इस रिक्‍त होने और भरने की प्रक्रिया में मित्रता कहीं पीछे छूट जाती है। तब आपका बोध वहीं रह जाता है। &lt;/span&gt;&lt;u style="font-family: Mangal;"&gt;जब तक मन रिक्‍त नहीं होगा तब तक बोध नहीं आ पाएंगा, ज्ञान नहीं आ पाएंगा।&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;स्‍वयं की जानने की प्रक्रिया वास्‍तव में बड़ी पेचीदा है, हम स्‍वयं के बारे में न जाने कितने श्रेष्‍ठ विचार रखते हैं लेकिन दुनिया हमारे बारे में एकदम विपरीत विचार रखती है। तब क्‍या करें? हमें हमारी एक भूल बहुत छोटी सी दिखायी देती है लेकिन दुनिया को वही भूल चावल का एक दाना समझ आता है। लेकिन मित्र की आँखों मे सत्‍यता होती है। हम सब चाहत रखते हैं मित्र की, लेकिन सच्‍चाई यह है कि हम मित्र तो चाहते हैं केवल स्‍वयं को रिक्‍त करने के लिए लेकिन सच्‍चाई को जानने से डरते हैं। जैसे अकस्‍मात मुसीबत आने पर आपके मुँह से आपकी मातृभाषा में ही शब्‍द निकलते हैं वैसे ही आपके अन्‍दर का छिपा हुआ गुण भी संकट के समय बाहर निकल आता है। हम स्‍वयं को निर्भीक समझते हैं लेकिन सामने सर्प आ जाने पर ही आपके साहस को पता लगता है। ऐसे ही हम समझते हैं कि हम बहुत ही विनम्र हैं लेकिन जब एक दुर्जन व्‍यक्ति आपके समक्ष हो तब आपकी परीक्षा होती है। ऐसे ही कितने बोध हैं जो नित्‍य प्रति आपको आपसे परिचय कराते हैं लेकिन हम उन्‍हें नजर अंदाज कर देते हैं। हम प्रतिदिन लोगों से सर्टिफिकेट लेने के फेर में रहते हैं। बस कोई हमारी तारीफ कर दे। इसलिए कभी मुझे लगता है कि हम चाहे सारी दुनिया की समझ रखते हों लेकिन यदि स्‍वयं के बारे में अन्‍जान हैं तो हमेशा धोखा ही खाते हैं। जीवन में कभी सुख और शान्ति का अनुभव नहीं करते। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;स्‍वयं को पहचाने बिना कुछ लोग अपना कार्य क्षेत्र चुन लेते हैं। ऐसे कितने ही लोग हैं जो लेखन को अपना विषय चुनते हैं लेकिन उनके अन्‍दर लेखन के तत्‍व नहीं हैं। बस धोखा खाते हैं और असफलता का दंश भोगते हैं। कुछ सामाजिक कार्य करने का दम्‍भ रखते हैं और किसी गरीब की झोपड़ी में जाकर जब उसके टूटे प्‍याले से चाय पीनी पड़ती है तब? कुछ राजनीति में जाने की चाहत रखते हैं और जब चारों दिशाओं से प्रहार होते हैं तब आपका मन भाग खड़ा होता है। इसलिए मन की पहचान या उसका बोध करना भी एक साधना है। ले जाओ इस मन को जीवन के हर प्रसंग में, तब देखो कि वह कहाँ खुश होता है? मत डालो उस पर कोई भी बंधन। मत आडम्‍बर रचकर स्‍वयं को गुमराह करो, कि हम ऐसे हैं या वैसे हैं। हम जैसे भी हैं उस सच को सामने आने दो। जिस दिन सच सामने आ जाएगा आप जो चाहते हैं वैसे ही बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसलिए मित्रों स्‍वयं को जानने का प्रारम्‍भ करो तो दुनिया को भी जान जाओगे नहीं तो केवल अपनी ही नजर से दुनिया को देखते रहोंगे और फिर कहोगे कि यह दुनिया मेरे काम की नहीं। आप जैसे लाखों लोग इस दुनिया में हैं लेकिन हम नहीं खोज पा रहे हैं उन्‍हें। क्‍योंकि उस खोज का हमें ही पता नहीं। केवल आदर्श में जीना चाह रहे हैं। जो दुनिया ने आदर्श बनाए हैं बस उन्‍हें ही अपने अन्‍दर का सच समझ बैठे हैं। नहीं यह आपके अन्‍दर का सच नहीं है, आपके अन्‍दर का सच तो आपको ही खोजना है। साँप जहरीला है इसका उसे बोध है, इसलिए वह केवल दुश्‍मन पर आक्रमण करता है, कोयल मीठा बोलती है इसलिए वह बसन्‍त के आगमन पर ही कुहकती है। हम मनुष्‍य स्‍वयं को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं लेकिन दुनिया के सारे ही जीवों से अधिक अज्ञानी है। सभी को स्‍वयं का ज्ञान है बस नहीं है तो हमें ही नहीं है। हमारे अन्‍दर भी विष है, हमारे अन्‍दर भी अमृत है। लेकिन प्रयोग नहीं आता। कभी सज्‍जन को विष दे देते हैं और कभी दुर्जन को अमृत। यह प्रयोग इसलिए नहीं आता कि हम स्‍वयं को नहीं जानते हैं और जो स्‍वयं को नहीं जानता है वह भला दूसरों को कैसे जान सकता है? मुझे कौन हानि देगा और कौन लाभ, यह तभी सम्‍भव होगा जब हम स्‍वयं के मन को जानेंगे। हम केवल प्रतिक्रिया करते हैं। दूसरे की क्रिया पर प्रतिक्रिया। केवल क्रिया करके देखिए, करने दीजिए दूसरों को प्रतिक्रिया। दुनिया अच्‍छी ही लगने लगेगी। मन में आवेग आता है, हम श्रेष्‍ठ बनने के चक्‍कर में उसे दबा लेते हैं तब स्‍वस्‍थ क्रिया नहीं होती तो उस आवेग जैसा ही प्रसंग उपस्थित होने पर प्रतिक्रिया स्‍वत: बाहर आ जाती है। प्रतिक्रिया तब ही अपना वजूद स्‍थापित करती है जब आप क्रिया नहीं कर पाते। इसलिए जैसा आपका मन है वैसी ही क्रिया करिए। धीरे-धीरे स्‍वत: ही आपको आपका मन समझ आने लगेगा। अच्‍छी है या बुरी है इस पर मत जाइए, बुरी है तब भी आपकी ही है, तो उसे बाहर आने दीजिए। हमने अपने अन्‍दर बहुत कुछ समेट रखा है, उसके कारण हमारा सत्‍य कहीं छिप गया है। इसलिए स्‍वयं के बोध के लिए अंधेरों के बादल छटने जरूरी हैं। बोध होने पर ही प्रकाश होगा और प्रकाश से ही हम दुनिया को प्रकाशित कर पाएंगे। इसलिए दुनिया को जानने से पहले स्‍वयं को जानने का प्रयास ही सुख का मार्ग प्रशस्‍त करता है। स्‍वयं को स्‍वीकारने से ही मन में दूसरे ज्ञान के लिए स्‍थान बन पाएगा। इसलिए आध्‍यात्‍म की पहली सीढ़ी है स्‍वयं को पहचानो। अपने गुण को पहचानो, अपने स्‍वार्थ को पहचानो, अपनी विलासिता को पहचानो और अपने वैराग्‍य को पहचानो। बस धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कल्‍पना साकार हो जाएगी। &amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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इसलिए कि उसमें शोक-संदेश होते हैं। कल ऐसे ही एक शोक-संदेश पर निगाह पड़ी, कुछ अटपटा सा लगा। बहुत देर तक मन में चिन्‍तन चलता रहा कि ऐसा लिखना कितना तार्किक है? किसी महिला का शोक-संदेश था और महिला की फोटो के नीचे लिखा था &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; अवतरण दिनांक ---- और निर्वाण दिनांक -----। अवतरण और निर्वाण शब्‍दों का प्रयोग हम ऐसे महापुरुषों के लिए करते हैं जिनको हम कहते हैं कि ये साक्षात ईश्‍वर के अवतार हैं। इसलिए इनका धरती पर अवतरण हुआ और मृत्‍यु के स्‍थान पर निर्वाण अर्थात मोक्ष की कल्‍पना करते हैं। भारत भूमि में राम, कृष्‍ण, महावीर, बुद्ध आदि इसी श्रेणी में आते हैं। इन्‍हें हम भगवान का अवतार मानते हैं। पृथ्‍वी पर भगवान के रूप में साक्षात अनुभूति के लिए महापुरुषों के रूप में अवतरण होता है, ऐसी मान्‍यता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हम यह भी कह सकते हैं कि प्रत्‍येक परिवार के लिए माँ का रूप भगवान के समान होता है और इसी कारण अवतरण एवं निर्वाण शब्‍द का प्रयोग किया गया होगा। इसी संदर्भ में एक अन्‍य प्रसंग भी ध्‍यान में आता है। क्रिकेट के खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को पत्रकार भगवान कहते हैं और क्रिकेट के भगवान सचिन ऐसी उपाधि देते है। इसी प्रकार कई बार अमिताभ बच्‍चन को भी उनके प्रशंसक भगवान की उपाधि देते हैं। दक्षिणी प्रांतों के कई अभिनेताओं के तो मन्दिर भी हैं और बकायदा उनकी पूजा भी होती है। भारतीय संस्‍कृति में माना जाता है कि हम सब प्राणी भगवान का ही अंश हैं। लेकिन भगवान नहीं है। भगवान सृष्टि का निर्माता है, सम्‍पूर्ण सृष्टि का संचालन उसी के अनुरूप होता है। सृष्टि के सम्‍पूर्ण तत्‍वों का वह नियन्‍ता है। मनुष्‍य के सुख-दुख भी भगवान द्वारा ही नियन्त्रित होते हैं। जब व्‍यक्ति थक जाता है, हार जाता है, दुख में डूब जाता है, तब उसके पास भगवान के समक्ष प्रार्थना करने के अतिरिक्‍त कोई आशा शेष नहीं र‍हती। यह भी अकाट्य सत्‍य है कि लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, उनके दुख दूर होते हैं। उनके मन में नवीन आशा का संचार होता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बच्‍चों के लिए माता, भगवान का रूप हो सकती है लेकिन समाज के लिए नहीं। यदि हमने सभी को यह उपाधि देना प्रारम्‍भ कर दिया तो भगवान का स्‍वरूप ही विकृत हो जाएगा। आप कल्‍पना कीजिए, एक बच्‍चे को भूख लगी है, वह माँ से भोजन प्राप्‍त करता है। लेकिन यदि उसके प्राणों की रक्षा की बात है तब उसे माँ के स्‍थान पर भगवान से प्रार्थना करनी पड़ेगी। इस उदाहरण में तो केवल कुछ शब्‍दों का ही उल्‍लेख है। अभी कुछ दिन पूर्व एक समाचार पढ़कर तो आश्‍चर्य की सीमा ही नहीं रही। समाचार था &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; एक पुरुष ने संन्‍यास धारण किया और संन्‍यासी बनते ही उसने प्राण त्‍याग दिए। पहले तो मैं इसका अर्थ नहीं समझी, लेकिन फिर समझ आया कि संन्‍यासी बनकर मृत्‍यु की कामना करना भी समाज में उत्‍पन्‍न हो गया है। अन्‍त समय में संन्‍यासी बनने की ईच्‍छा व्‍यक्‍त करना और फिर संन्‍यासियों की तरह दाह-संस्‍कार करना। जैसे हमारे राजनेताओं की ईच्‍छा रहती है कि हम तिरंगे में ही श्‍मशान जाएं वैसे ही संन्‍यासी वेश में मृत्‍यु की ईच्‍छा रहती है। यह कृत्‍य भी क्‍या संन्‍यासियों की तपस्‍या को धूमिल करने वाला नहीं है? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;क्‍या कोई भी खिलाड़ी अपने खेल में उत्‍कृष्‍टता के लिए सचिन से प्रार्थना करता है? या अन्‍य सामान्‍य व्‍यक्ति अपने सुख-दुख के लिए सचिन से प्रार्थना करता है। वे सब भी प्रभु के दरबार में जाते हैं। किसी अभिनेता का प्रदर्शन अच्‍छा हो इसके लिए अमिताभ बच्‍चन आशीर्वाद दे सकते हैं? कह सकते हैं कि वत्‍स तथास्‍तु। तब हम क्‍यों एक सामान्‍य व्‍यक्ति की तुलना भगवान से करने लगते हैं? एक मनोरंजन करने वाला व्‍यक्ति कैसे भगवान की उपाधि पा सकता है? गुरु नानक, दयानन्‍द सरस्‍वती, शिरड़ी बाबा आदि जिन्‍होंने समाज के लिए अवर्णनीय कार्य किए उन्‍हें हम भगवान की तरह पूजते हैं। लेकिन जो केवल मनोरंजन जगत के व्‍यक्ति हैं उन्‍हें भी हम भगवान के समकक्ष स्‍थापित कर दें तो क्‍या यह उस ईश्‍वर का अपमान नहीं है जिसे हम सृष्टि का रचयिता कहते हैं? इसलिए समाज को और पत्रकार जगत को गरिमा बनाकर रखनी चाहिए। सामान्‍य व्‍यक्ति को भगवान की उपाधि देना मुझे तो उचित कृत्‍य नहीं लगता, हो सकता है मेरा कथन सही नहीं हो। इस संदर्भ में आप सभी की मान्‍यताएं कुछ और हो। इसलिए मैंने यह विषय उठाया है कि मैं भी समाज में फैल रही इस मनोवृत्ति का कारण जान सकूं और स्‍वयं में सुधार कर सकूं। आप सभी के विचार आमन्त्रित हैं। &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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   &lt;/script&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5543246866765877657-5804638935577099701?l=ajit09.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ajit09.blogspot.com/feeds/5804638935577099701/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5543246866765877657&amp;postID=5804638935577099701' title='54 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default/5804638935577099701'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default/5804638935577099701'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ajit09.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html' title='क्‍या भगवान की उपाधि किसी सामान्‍य मनुष्‍य को दी जानी चाहिए?'/><author><name>ajit gupta</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02729879703297154634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_jm9w3syumo4/S7mJg_5YHQI/AAAAAAAABo0/-LFkHcxkUCU/S220/Copy+of+DSC_0198.JPG'/></author><thr:total>54</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5543246866765877657.post-8341814742038900911</id><published>2011-11-13T10:40:00.003+05:30</published><updated>2011-11-13T10:41:26.316+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='idol आदर्श कौन'/><title type='text'>कौन है हमारा idol ( आदर्श ) व्‍यक्ति?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;एक पोस्‍ट मैंने लिखी थी बाघदड़ा नेचर पार्क पर। जहाँ हम पूर्णिमा की रात में एक नेचर पार्क में थे। (&lt;/span&gt;&lt;a href="http://ajit09.blogspot.com/2011/10/blog-post_13.html"&gt;&lt;span lang="HI" style="background-attachment: initial; background-clip: initial; background-color: #dddddd; background-image: initial; background-origin: initial; color: #992211; font-family: Mangal; font-size: 10.5pt; text-decoration: none;"&gt;पूर्ण चन्‍द्र की रात में जंगल का राग सुनो&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; ) वहाँ बातचीत करते हुए एक प्रश्‍न आया था कि आपका आयडल कौन है? कई लोगों ने उत्तर दिया और किसी ने यह भी कहा कि हम अपने जीवन में कोई आयडल नहीं बना पाए हैं। मेरे मन में एक उत्तर था लेकिन मैंने उस समय कुछ नहीं बोला क्‍योंकि मेरा उत्तर कुछ लम्‍बा था और उस स्‍थान पर कम बोलने को कहा गया था। इसलिए आज अपनी बात कहने के लिए और आप सब की राय जानने के लिए यहाँ लिख रही हूँ।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मेरा आयडल कौन यह प्रश्‍न के उत्तर के लिए मैंने कई व्‍यक्तियों के बारे में चिंतन किया लेकिन उनका एक या अनेक विचार आपके मन में प्रेरणा जगाते हैं लेकिन दूसरे कुछ विचार निराशा का भाव जगाते हैं इसलिए मन ने उन सारे नामों को नकार दिया। मैं दुनिया के कई लोगों से प्रभावित होती हूँ, या यूँ कहना सार्थक होगा कि लोगों के कृतित्‍व या विचार से प्रभावित होती हूँ। उस कृतित्‍व या विचार को अपने अन्‍दर धारण करने का प्रयास करती हूँ। सारे ही विचार या कार्य मैं अपने जीवन में नहीं उतार पाती लेकिन वे विचार मेरे जीवन के आसपास जरूर बने रहते हैं और उन विचारों के अनुकूल ना सही लेकिन प्रतिकूल जाने से अवश्‍य रोकते हैं। शायद आपके साथ भी ऐसा होता हो। कई बार बहुत छोटी सी घटनाएं मन में अंकित हो जाती है, उस घटना में छिपा दर्शन हमारे जीवन का अंग बन जाता है। इसलिए विचारों और कार्यों का समूह मन में दस्‍तक देते हैं और वे ही हमारे आदर्श बनते हैं। जब भी हम किसी एक कृतित्‍व से किसी व्‍यक्ति को आदर्श मान लेते हैं तब वह व्‍यक्ति आवश्‍यक नहीं कि हमेशा आपका आदर्श बना रहे। वर्तमान में अन्‍ना हजारे इसका उदाहरण है। उनके एक कृतित्‍व ने उन्‍हें करोड़ों लोगों का आयडल बना दिया। इसीकारण उनके विरोधी इस छवि को धूमिल करने में लगे हैं। इस कारण कोई एक व्‍यक्ति आयडल ना होकर यदि विचारों को हम आदर्श माने तब उस विचार पर हमारा विश्‍वास बना रहेगा नहीं तो जैसे ही उस व्‍यक्ति का धूमिल चेहरा आपके समक्ष आएगा वह आदर्श विचार भी हवा हो जाएंगे। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आप या मैं किन विचारों से प्रेरित होते हैं? जिन विचारों के साथ वक्‍ता का कृतित्‍व जुड़ा होता है। फिर वह व्‍यक्ति कोई अदना सा है या विशाल व्‍यक्तित्‍व का धनी इससे अन्‍तर नहीं पड़ता है। कई उदाहरण मेरे सामने हैं। उनसे मुझे प्रेरणा मिली। एक बार का वाकया है मैं एक जनजातीय गाँव में गयी। वह गाँव शहरी विकास से कोसो दूर था। प्रकृति के साथ जीना ही वहाँ के व्‍यक्तियों को रास आया हुआ था और वे शायद विकास के स्‍वरूप को देख भी नहीं पाए थे। एक बुजुर्ग व्‍यक्ति एक खाट पर बैठे थे। मैंने प्रश्‍न किया कि बाबा आपको यहाँ क्‍या कमी लगती है? उस व्‍यक्ति ने चारों तरफ देखा और कहा कि यहाँ सब कुछ ही तो है। उसका संतोष मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत बना। अब वह व्‍यक्ति मेरे आयडल नहीं हो सकते लेकिन वह विचार मेरे लिए आदर्श है। हमारे पास सबकुछ है लेकिन मन कहता है कि कुछ नहीं है और उस बुजुर्ग के पास कुछ नहीं था लेकिन वह कह रहा था कि सबकुछ है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;एक और घटना सुनाती हूँ, मेवाड़ में अकाल के दिन थे। पानी की बहुत ही तंगी थी। मैं पानी की तंगी के कारण पेरशान थी और इसी समय मेरी सफाई कर्मचारी ने घण्‍टी बजा दी। पानी की कमी पर उसने कहा कि हमें तो इस कमी से कोई फरक नहीं पड़ता है। क्‍योंकि हम सुबह तालाब पर जाते हैं, वहीं स्‍नान करते हैं, कपड़े धोते हैं और एक घड़ा पानी पीने के लिए ले आते हैं। मेरे हाथ वाशबेसन में बहते हुए पानी को अब रोक रहे थे। ऐसे ही मेरा एक नौकर था। सुबह नौ बजे आता था और शाम को पाँच बजे चला जाता था। हम लोग दिन में दो बजे भोजन करते थे तब उससे मैं कहती थी कि तू भी खाना खा ले। लेकिन उसने कभी खाना नहीं खाया। वह कहता था कि मैं घर से खाना खाकर आता हूँ और शाम को घर जाकर ही खाऊँगा। यदि आपके यहाँ दिन में खाने लगा तो मेरी आदत बिगड़ जाएगी। एक किस्‍सा और सुनाती हूँ, हमने जनजातीय क्षेत्र में अकाल के समय कुएँ गहरे कराने का काम किया। वनवासी से भी 25 प्रतिशत हिस्‍सा लिया गया। कुछ लोगों ने अग्रिम पैसा जमा करा दिया। लेकिन तभी वर्षा आ गयी और कुओं में पानी आ गया। हमने एक वनवासी को पैसे लौटाए तो उसने लेने से मना कर दिया। कहा कि मेरे कुए में तो पानी आ गया है अब मैं पैसे का क्‍या करूंगा आप लोग इससे परसादी कर लो। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;यह सारे उदाहरण नामचीन व्‍यक्तियों के नहीं है। उन लोगों के हैं जिनका समाज में कोई स्‍थान नहीं है। लेकिन वे मेरे मानस में हमेशा बने रहते हैं। मैं इनका बार-बार उल्‍लेख भी इसीलिए करती हूँ कि इनके विचारों से मैं प्रेरित हो सकूं। इन जैसे ढेर सारे उदाहरण है जिनने मेरे मस्तिष्‍क पर दस्‍तक दी। मैंने अपनी लघुकथा संग्रह में इनपर लिखा भी है। इसके विपरीत कई ऐसे बड़े नाम भी हैं जिनका कृतित्‍व निश्चित ही प्रभावित करता है लेकिन वे प्रभावित नहीं कर पाते और ना ही दिल में अंकित हो पाते हैं। क्‍योंकि आज जितने भी बड़े नाम हैं उनके विचारों और कृतित्‍व में कहीं अन्‍तर दिखायी देता है जबकि इन गरीब लोगों के विचार और आचरण में कोई अन्‍तर नहीं है। ये विचार ही उनकी जीवन शैली है। इसलिए जब भी यह प्रश्‍न मेरे समक्ष यक्ष प्रश्‍न सा उपस्थित होता है, मेरे समक्ष न जाने कितने चेहरे जो समाज में कहीं नहीं हैं, वे ही दिखायी दे जाते हैं। सारे ही बड़े नाम मेरे सामने गौण हो जाते हैं। प्रतिदिन ही कोई न कोई विचार हमें प्रभावित कर जाता है और हम उसे अपने मन और मस्तिष्‍क दोनों में अंकित कर लेते हैं। जब ये विचार मन में अंकित हो जाते हैं तब वे हमारी पूंजी बन जाते हैं। जैसे पूंजी को हम प्रतिदिन उपयोग में नहीं लाते हैं लेकिन वे हमारे साथ रहती है। इसलिए मेरे पास इस प्रश्‍न का उत्तर नहीं है कि मेरा आयडल कौन है? या मेरा गुरू कौन है? क्‍योंकि गुरू भी ऐसा ही व्‍यक्तित्‍व है जो कभी एक नहीं हो सकता। न जाने हम&amp;nbsp; कितने लोगों से सीखते हैं। इसलिए इन लोगों को जिनसे मुझे प्रेरणा मिलती है उन्‍हें गुरु मानूं या आयडल समझ नहीं आता है। हो सकता है कि मेरे इन विचारों से आप सहमत नहीं हों और इससे इतर आपके अन्‍य विचार हों। इसलिए इस विषय की व्‍यापक चर्चा हो सके, मैंने इसे यहाँ लिखना उपयोगी लगा। आपकी क्‍या राय है? आपका आयडल कौन है?&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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मुझे लग रहा है कि सफर तो अब प्रारम्‍भ हुआ है। अभी तक तो सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए एक मंजिल तक पहुंचे हैं। जैसे एक पर्वतारोही पर्वत पर जाकर चैन की सांस लेता है और वहाँ से दुनिया को देखने की कोशिश करता है बस वैसे ही आज लग रहा है कि साठ वर्ष पूर्ण हो गए, मैं पर्वतनुमा अपनी मंजिल तक प‍हुंच गयी और यहाँ से अब दुनिया को निहारना है। सारी दुनिया अब स्‍पष्‍ट दिखायी दे रही है। तलहटी में बचपन बसा है, कुछ धुंधला सा ही दिखायी दे रहा है लेकिन सबसे मनोरम शायद वही लग रहा है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;ऊँचे पर्वत पर आकर या उम्र के इस पड़ाव पर आकर सब कुछ तो साफ दिखने लगता है। सारे ही नाते-रिश्‍ते, मित्र-साथी, वफा-बेवफा सभी कुछ। तलहटी पर बसा बचपन, दूब की तरह होता है। जरा सा ही स्‍नेह का पानी मिल जाए, लहलहा जाता है। दूब की तरह ही कभी समाप्‍त नहीं होता। हमेशा यादों में बसा रहता है। बचपन में दूब की तरह ही जब हर कोई अपने पैरों से हमें रौंदता है तो लगता है कि हम कब इस पेड़ की तरह बड़े होंगे? कब हम पर भी फल लगेंगे? कब हम भी उपयोगी बनेंगे? लेकिन आज वही दूब सा बचपन प्‍यारा लगने लगता है, उसकी यादों में खो जाने का मन करता है। बचपन खेलते-कूदते, डाँट-फटकार खाते, सपने देखते चुटकी बजाते ही बीत गया। हर कोई कहने लगा कि अब तुम बच्‍चे नहीं रहे, बड़े हो गए हो। हम भी सपने देखते बड़े होने के, घण्‍टों-घण्‍टों नींद नहीं आती, बस जीवन के सपने ही आँखों में तैरते रहते थे। हम क्‍या बनेंगे, यह सपने हमारे पास नहीं थे। क्‍योंकि शायद हमारी पीढ़ी में ऐसे सपने हमारे माता-पिता देखा करते थे। इसलिए कुरेदते भी नहीं थे अपने मन को, कि तुझे किधर जाना है? कभी कुरेद भी लिया तो दुख ही हाथ आता था। क्‍योंकि पिता का हुक्‍म सुनायी पड़ जाता था कि तुम्‍हें यह करना है। बस मुझे तो यही संतोष है कि मेरे पिता ने हमें शिक्षा दिलाने का सपना देखा, हमें बुद्धिमान बनाने का सपना देखा। यदि वे यह सपना नहीं देखते तो हम भी आज न जाने किस मुकाम पर जा पहुंचते? कौन से पर्वत पर मैं खड़ी होती? पति के सहारे? या बच्‍चों के सहारे? आज शिक्षा के सहारे ना केवल मजबूती से उम्र के इस पड़ाव पर पैर सीधे खड़े हैं अपितु सारे परिवार को भी थामने का साहस इन पैरों में आ बसा है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;पर्वत से झांकते हुए युवावस्‍था के फलदार वृक्ष दिखायी दे रहे हैं। कभी इसी वृक्ष को कोई निर्ममता से काट देता था तो कोई ममता से पानी पिला देता था। जीवन पेड़ की तरह बड़ा होता है, कटता भी है, छंटता भी है, तो कोई पानी भी डालता है और कोई खाद भी बनता है। फल और फूल भी आते है तो पतझड़ और बसन्‍त भी खिलते हैं। लेकिन पेड़ के फल कैसे हैं बस इसी से पेड़ की ख्‍याति होती है। मीठे फल लगे हैं तो दूर-दूर तक लोग कहते हैं कि फलां पेड़ के फल बहुत मीठे हैं। यदि फल मीठे नहीं हैं तो लोग उस तरफ झांकते भी नहीं। लेकिन माँ के रूप में विकसित इस छायादार पेड़ में जब फल लगते हैं तब उस माँ को अपने फल बहुत ही मीठे और सुगन्धित प्रतीत होते हैं। लेकिन फलों से विरल कभी पेड़ की भी अपनी खुशबू होती है, जैसे चन्‍दन की। देवदार से पेड़, पर्वतों को जब छूते हैं तब भला किसे नहीं लुभाते? कभी झांककर देखा है इन देवदार के पेड़ों की जड़ों को? कहाँ उनकी जड़ होती है और कहाँ उनका अन्तिम छोर होता है? बस जीवन देवदार जैसा ही बन जाए! &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;पर्वतों के ऊपर भी समतल होता है। बहुत सारा स्‍थान। वातावरण एकदम शुद्ध। गहरी सांस लेकर उस प्राण वायु को अपने अन्‍दर समेट लेने की प्रतिपल इच्‍छा होती है। दूर दूर से आकर पक्षी भी यहाँ गुटरगूं करते हैं। पैरों की धरती के नीचे दबा होता है बेशकीमती खजाना, बस थोड़ा सा खोदों तो न जाने जीवन के कितने रत्‍न यहाँ दबे मिल जाते हैं। जीवन का सबसे मधुर पल, जहाँ अब और ऊपर जाने की चाहत नहीं रहती। अब और परिश्रम करने की आवश्‍यकता नहीं रहती। अब और फल और फूल बिखरने की जरूरत नहीं होती। बस संघर्ष के दिन समाप्‍त, अब तो केवल प्रकृति को निहारना है। देखनी है अठखेलियां वृक्षों पर बैठे नन्‍हें पक्षियों की। देखने हैं बस रहे घौंसलों को और ममताभरी आँखों से उस रस को पीना है जो चिड़िया अपनी चोंच से अपने नवजात को चुग्‍गे के रूप में देती है। सब दूर से देखना है, आनन्दित होना है। आगे बढ़कर, दोनों बाहों को फैलाकर इस प्रकृति को अपने पाश में भर लेना है। कितने मधुर क्षण हैं, कितने अपने से पल हैं? साठ वर्ष पार कर लेने पर ठहराव की प्रतीति हो रही है। मन के आनन्‍द को बाहर निकालकर उससे साक्षात्‍कार करने की चाहत जन्‍म ले रही है। अनुभवों के निचोड़ से जीवन को सींचने का मन हो रहा है। खुले आसमान के नीचे, अपने ही बनाए पर्वत पर बैठकर जीवन की पुस्तिका के पृष्‍ठ उलट-पुलटकर पढ़ने का मन हो रहा है। कभी-कभी इन पर्वतों पर कंदराएं भी दिख जाती हैं, ये कंदराएं एकान्‍त में ले जाती हैं। तब हाथों में कूंची लेकर जीवन के रंगों से इन कंदराओं को रंगने का अपना शौक शायद पूरा हो सके। अब तो जीवन स्‍पष्‍ट है, सभी कुछ स्‍पष्‍ट दिख भी रहा है। बस इसके आनन्‍द में उतर जाना है। बहुत कुछ पाया है इस जीवन से। खोया क्‍या है? अक्‍सर लोग प्रश्‍न करते हैं। लेकिन खोने को कुछ था ही नहीं, इसलिए पाया ही पाया है। ना तो बचपन में चाँदी की चम्‍मच मुँह में थी और ना ही जहाँ इस पौधे को रोपा गया था वहाँ कोई बड़ा बगीचा था, तो खोने को क्‍या था? समुद्र मन्‍थन में विष भी था तो अमृत भी, इसी प्रकार जीवन मन्‍थन में विष भी था और अमृत भी। विष को औषधि मान लिया और अमृत को जीवन। बस कदम दर कदम बढ़ाते हुए पहुंच गए इस साठ वर्ष के पहाड़ पर। मन में संतोष है कि यह पहाड़ हमारा अपना बनाया हुआ है, यहाँ अब शान्‍तचित्त होकर दुनिया को अपनी दृष्टि से देखेंगे। पहाड़ के समतल पर एक बगीचा लगाएंगे, उस बगीचे में दुनिया जहान के पक्षियों को बुलाएंगे और उनकी चहचहाट से अपने मन को तृप्‍त करेंगे। &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red;"&gt;( अपने ही जन्‍मदिन 9 नवम्‍बर के अवसर पर, जो मुझे साठ वर्ष पूर्ण करने पर खुशी दे रहा है। इसे आज देव उठनी एकादशी पर लिखा गया है क्‍योंकि तिथि के अनुसार आज ही पूर्ण हो रहे हैं जीवन के अनमोल साठ वर्ष)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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वे सारे सामान का ऑडिट की तरह मुआयना करते। डिब्‍बे घर के अन्‍दर वापस जगह पा जाते, मुड़ा-तुड़ा तार भी किसी खूंटी पर लटक जाता और चिठ्ठी-पत्री के लिए हेंगर बन जाता। पुरानी कॉपियों के खाली पन्‍ने फाड़ लिए जाते और किताबे पुस्‍तकालय की आस में वापस अल्‍मारी में चले जातीं। फिर उनका ध्‍यान आकर्षित होता थैलियों और सू‍तलियों पर, वे भी धूल झाड़कर इठलाती हुई सी वापस घर के अन्‍दर चले जातीं। बस कूड़े के नाम पर रह जाती पाव-आधा किलो धूल। तब ना तो कबाड़ी आता और ना ही डस्‍टबीन भरता।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;नए कपड़ों के नाम पर कभी-कभी एक जोड़ी कपड़े मिल जाते और वे हमारे लिए अमूल्‍य भेंट होती। दीवाली पर सबसे ज्‍यादा आबाद रहती रसोई। दो दिन तक मिठाइयां बनाने का दौर चलता। भगवान महावीर का निर्वाण दिवस दीपावली पर ही होता तो मन्दिर में चढ़ाने के लिए लड्डू घर पर ही बनते। देसी घी में बूंदी निकाली जाती और हम सब लड्डू बांधते। बाजार की मिठाई लाना तो अपराध की श्रेणी में था। साथ में जलेबी भी बनती और गजक भी कुटती। माँ मीठे नमकीन शक्‍करपारे भी बनाती। गुड़ और आटे के खजूर भी बनते, जो आज तक भी भुलाए नहीं भूलते, लेकिन वे सब माँ के साथ ही विदा हो गए। दीवाली पर पटाखे खरीदना और चलाना मानो रूपयों में सीधे ही माचिस दिखाना था। लेकिन बाल मन पटाखों का मोह कैसे त्‍याग सकता था? भाइयों से कहकर कुछ पटाखों का इंतजाम हो ही जाता और छोटी लड़ी वाले बम्‍ब एक-एककर चलाए जाते। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;दीवाली की सांझ भी नवीन उत्‍साह लेकर आती। थाली में दीपक सजते और हम नए कपड़े पहनकर निकल पड़ते सारे ही पड़ोसियों के घर। पड़ोसी के घर की चौखट पर दीपक रखते और दीवाली की ढोक देते। ना उस समय मिठाइयां होती और ना ही कोई तड़क-भड़क। बस मिलने-मिलाने का जो आनन्‍द आता वो अनोखा था। हमारे एक पड़ोसी थे, थोड़े पैसे वाले थे लेकिन पैसे को सोच समझकर खर्च करते थे। इसलिए दीवाली के दूसरे दिन अनार खरीदकर लाते। उन दिनों में अनार मिट्टी की कोठियों में मिलते थे और काफी बड़े होते थे। खूब देर तक भी चलते थे। पटाखे दीवाली के दिन ही चलते थे तो दूसरे दिन पटाखे सस्‍ते मिल जाते थे। वे तभी अनार खरीदते थे और हम सब उनके अनार का आनन्‍द लेते थे। दीवाली के दूसरे दिन मिठाइयों का आदान-प्रदान भी होता था। लेकिन हमारे पिताजी डालडा के प्रति बहुत सख्‍त थे तो किसी के यहाँ की भी मिठाई घर में आने नहीं देते थे। बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट पूछ लिया जाता था कि डालडा कि है तो हमारे घर पर नहीं चलेगी। उन दिनों डालडा घी नया-नया चला ही था तो लोगों को उससे परहेज नहीं था। लेकिन हमारे यहाँ तो कर्फ्‍यू जैसा था। इतनी बंदिशों के बावजूद भी दीवाली का उल्‍लास मन में बसा रहता था, हम किशोर तो न जाने कितने दिन तक दीवाली मनाते थे। क्‍योंकि उन दिनो दिवाली की छुट्टियां भी कई दिनों की आती थी। होमवर्क भी मिलता था लेकिन सभी अध्‍यापकों को पता था कि कोई होमवर्क नहीं करता है तो पूछताछ भी नहीं होती थी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;और आज की दीवाली? घर की सफाई, समस्‍या लेकर आती है। कम से कम पंद्रह दिन चाहिए सफाई को। थोड़ा सा भी पुराना सामान हुआ नहीं कि फेंको इसे, बस यही मानसिकता रहती है। यदि समय पर कबाड़ी नहीं आए तो छत भर जाती है। अब कोई नहीं आता जो यह कह दे कि यह सामान वापस काम आएगा। हम जैसे कचरा उत्‍पन्‍न करने की मशीने बन गए हैं। मिठाइयों से बाजार भरे रहते हैं ना चाहते हुए भी कुछ न कुछ खरीदने में आता ही है। घर पर मिठाई शगुन की ही बनती है। बन जाती है तो समाप्‍त नहीं होती। अपने-अपने घरों में दीपक जला लेते हैं और दीपक से ज्‍यादा लगती है लाइट। पटाखों का ढेर लगा रहता है लेकिन चलाने का उल्‍लास तो खरीदा नहीं जा सकता? मेहमान भी गिनती के ही रहते हैं क्‍योंकि सभी तो दीवाली मिलन पर मिलेंगे। सामूहिक भोज हो गया और रामा-श्‍यामा हो गयी बस। बड़े-बड़े समूह बन गए और छोटे-छोटे समूहों की उष्‍णता समाप्‍त हो गयी। दीवाली की ढोक या प्रणाम ना जाने कहाँ दुबक गए, अब आशीर्वाद नहीं मिलते बस एक-दूसरे को हैपी दीवाली कहकर इतिश्री कर ली जाती है। न जाने क्‍या छूट गया? पहले थोड़ा ही था&lt;span&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;लेकिन उस थोड़े में ही अकूत आनन्‍द समाया था लेकिन अब अकूत है तो आनन्‍द थोड़ा हो गया है। हो सकता हो कि यह उम्र का तकाजा हो, कि अब रस नहीं आता। जिनकी अभी रस ग्रहण करने की उम्र है वे कर ही रहे होंगे लेकिन हमारे जैसे तो यही कहेंगे कि पहले जैसा आनन्‍द अब नहीं। यही गीत याद आता रहा कि इक वो भी दीवाली थी और इक यह भी दीवाली है। आप लोग क्‍या कहते हैं? &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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तो आप क्‍या करेंगे? या फिर पति बोलने वाला और पत्‍नी गूंगी गुडिया! हमारे यहाँ तुर्रा यह भी कि पति और पत्‍नी का साथ सात जन्‍मों का। अब आप बताइए कि कैसे निर्वाह हो? बचपन में जब हम बोलते थे तो पिताजी अक्‍सर टोकते थे कि तुम लोग इतना क्‍यों बोलते हो? मेरा एक ही उत्तर होता था कि यदि इस जन्‍म में नहीं बोले तो भगवान अगले जन्‍म में गूंगा बना देगा, कहेगा कि मैंने तुम्‍हें जुबान भी और तुमने काम ही नहीं ली। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;जो पति और पत्‍नी युवावस्‍था में गुटर-गूं नहीं करते, उनका बुढ़ापा भी कठिनाई में पड़ जाता है। मौनी बाबा के साथ रहते रहते आप भी मूक प्राणी बन जाते हैं। जुबान पर स्‍वत: ही ताले पड़ जाते हैं। लेकिन जो खूब चहकते हैं उन्‍हें विपरीत परिस्थिति भी डगा नहीं पाती है। दुनिया जहान की बाते वे कर लेते हैं और मन को सदैव प्रसन्‍न रखते हैं। जो बाते नहीं करता हमारे यहाँ उसे घुन्‍ना कहा जाता है। कहते हैं कि इसके पेट में दाढ़ी है, अपनी बात बताता ही नहीं। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो छल-कपट रहित होते हैं और उन्‍हें बात करना आता ही नहीं है। लेकिन ऐसे लोगों की संख्‍या कम ही होती है। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्‍हें बातें करने से डर लगता है, कि कहीं उल्‍टा-सीधा कुछ ना निकल जाए, मुँह से। इस समस्‍या के शिकार अक्‍सर पति होते हैं, वे न जाने क्‍यों पत्नियों के सामने लड़खड़ा से जाते हैं। कहते हैं कि बचपन और युवावस्‍था तो पंख लगाकर उड़ जाते हैं लेकिन वृद्धावस्‍था काटे नहीं कटती है। तब सहारा होता है केवल जीवन-साथी। और इन दोनों का सहारा होता है कभी समाप्‍त न होने वाली बातें। यदि दम्‍पत्ती गाँव से आकर शहर में बसे हैं तो देखो चार आने सेर के घी से लेकर तीस हजार रूपए तोले के सोने की बात हो जाएगी। आज से पचास साल पहले स्‍वर्गवासी हुए दीनूकाका की बाते याद कर कभी पत्‍नी हँस देगी तो कभी पति दुखी हो जाएगा। कैसे नदी पर नहाने जाते थे, कैसे चक्‍की से आटा पीसते थे, कैसे शाम पड़े चबुतरे पर बैठकर हरे चने छीलते हुए सारे जहान की बाते कर लिया करते थे। बचपन में गिल्‍ली डंडा कब तक खेला था और हमारी गिल्‍ली से किस का सर फूटा था, सारी ही बाते हो जाती हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कुछ लोगों की बातों में अपना परिवार, अपना बचपन शामिल होता है। बस ऐसे दम्‍पत्ती सबसे सुखी होते हैं और इनकी बातों का कभी अन्‍त नहीं होता। कथा अनन्‍ता की तरह चलता ही रहता है पुराण। अच्‍छे से अच्‍छे मनोविश्‍लेषक भी मन को इतना नहीं जान पाते जितना इनकी बातों से प्रत्‍येक मन की तह पता लग जाती है। लेकिन कुछ लोग बचपन को अछूत सा बना देते हैं, कभी भूले भटके भी याद नहीं करते और बस पिले रहते हैं अमेरिका, यूरोप आदि अन्‍तरराष्‍ट्रीय समस्‍याओं पर। उन्‍हें चिन्‍ता सता रही होती है कि ओबामा अब अफगानिस्‍तान में क्‍या करेंगे लेकिन उनकी चिन्‍ता का विषय नहीं है कि मेरा पोता मुझे प्‍यार से बात करेगा या नहीं! कुछ लोगों की एक और समस्‍या है, वे अन्‍तरराष्‍ट्रीय समस्‍याओं को सुलझाने में इतने तल्‍लीन रहते हैं कि उन्‍हें अपने सुझाव बताने के लिए किसी शिकार की खोज रहती है। अक्‍सर ऐसे विचारकों से उनकी पत्नियां दूर ही रहती हैं और वे निकल पड़ते हैं शिकार की खोज में। हमारे भी ऐसे कई परिचित हैं। उन्‍हें विद्वान श्रोता चाहिए जो उनकी हाँ में हाँ मिला सके और अपने ज्ञान की जुगाली कर सकें। एक ऐसे ही हमारे परिचित हैं, गाहे-बगाहे चले आते हैं। अभी अपनी तशरीफ का टोकरा सोफे पर रखते भी नहीं हैं कि उनका रेडियो ऑन हो जाता है। इसके पहले वे सावधानी भी बरत लेते हैं और जल्‍दी ही कह देते हैं कि चाय भी पीनी है। अब चाय पीनी है तो आधा घण्‍टा तो आपको उन्‍हें सुनना ही होगा। हम तो अतिथि देवो भव: वाले देश के तो मना भी नहीं कर सकते है। वे जानते भी हैं कि मुझे ऐसा कौन सा तीर छोड़ना है जिससे ये मजबूर हो जाएं कुछ टिप्‍पणी करने के लिए। बस आपने उनका प्रतिवाद किया नहीं की बहस अपने परवान चढ़ने लगती है। उनकी मन की इच्‍छा पूर्ण और आप चाय पिलाकर भी मायूस। वे चाय पीकर भी रिक्‍त और हम उनकी सुनकर पस्‍त। लेकिन उनकी दिनभर की चित हो गयी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अभी दो-तीन वर्ष पुरानी बात है। मैं अमेरिका गयी हुई थी। मुझसे मिलने मेरी पुत्री की सहेली आ गयी। अभी उसने कमरे में पैर रखा ही था कि उसका टेप चालू हो गया। वह बिना कोमा, फुलस्‍टाप लगाए बोले जा रही थी, हम सब उसे केवल निहार रहे थे। कुछ देर बाद उसे समझ आ गया कि बोलना शायद ज्‍यादा हो गया है। तो वह बड़ी मासूमियत के साथ बोली कि आण्‍टी प्‍लीज मुझे रोको मत। यहाँ अमेरिका में तीन महिने से कोई बोलने वाला मिला नहीं है तो जुबान पर दही जम गया है। उसका पति एक कोने में चुपचाप बैठा था, मैं उसकी हालत समझ सकती थी। इसलिए बाते करने का सुख मौनी लोग नहीं समझ सकते। यह दुनिया का सबसे बड़ा सुख है, जिसके पास यह कला नहीं है समझो उसके पास जीवन में कुछ नहीं है। अब इसके फायदे भी कितने हैं! बच्‍चों से गप्‍प लगाओ और उनके अन्‍दर की बाते जान लो, आपको अपना मित्र समझकर सब कुछ बताएंगे और आप उन्‍हें सही मार्ग पर चलना आसान करा देंगे। पति और पत्‍नी बातों के द्वारा एक-दूसरे के कितने करीब आ जाते हैं! मित्रता तो होती ही बातों के लिए है। आजकल तो लोग सुबह और शाम बाग-बगीचों में घूमते हुए मिल जाएंगे। अपना-अपना झुण्‍ड बना लेंगे और फिर घर-परिवार से लेकर दुनिया जहान की बातें बहने लगती हैं। घर जाते हैं तब तृप्‍त होकर जैसे छककर अमृत पी लिया हो। बस अब मृत्‍यु आ जाए कोई गम नहीं, हमने अपने मन की बात कह ली है। लेकिन जो अपने मन की बात कभी नहीं कह पाते? वे क्‍या करते होंगे? कैसे जीते होंगे? क्‍या उनके मन में कुछ है ही नहीं या जो अन्‍दर है उसे बाहर निकालने का साहस ही नहीं है? शायद यह भी लेखन की तरह ही है कि कुछ लोग लिखने से ऐसा डरते हैं मानों कलम की जगह हाथ ने साँप पकड़ लिया हो। मन की अभिव्‍यक्ति होती ही नहीं और मन प्‍यास का प्‍यासा रह जाता है। या फिर कुछ लोगों को प्‍यास लगती ही नहीं? &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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एक अन्‍य गाड़ी में हमारे साथी कुछ देर पहले वहाँ पहुँच चुके थे। हमने फोन लगाया, अच्‍छा था कि नेटवर्क आ रहा था। अब उन्‍हें कैसे बताएं कि हम कहाँ हैं, क्‍योंकि वहाँ कोई लेण्‍डमार्क तो था ही नहीं। लेकिन राहत की साँस मिली, उन्‍होंने कहा कि नहीं बस यही इकलौता मार्ग है, चले आओ। तभी वे सब हाथ हिलाते हुए दिखायी दे गए। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;गाड़ी को पार्क कर दिया गया। रात घिर आयी थी। अभी चन्‍द्रमा ने अपना पूरा प्रकाश नहीं फैलाया था, बिना टार्च की रोशनी के आगे बढ़ने में असुविधा हो रही थी। लेकिन वनकर्मी हमारे साथ था। वह एक छोटी सी पगडण्‍डी के सहारे हमे जंगल की ओर बढ़ा रहा था। हमें एकदम सीधे चले जाना था, एक दूसरे के कदमों के पीछे ही रहना था। जरा से चूके तो नीचे 80 फीट गहरी खाई थी और दूसरी तरफ तालाब। जिसमें मगरमच्‍छ भी थे। कहीं-कहीं घास भी काफी थी, लग रहा था कि कहीं से सर्पदेवता ना निकल आएं। लेकिन उस उबड़-खाबड़ पगडण्‍डी से होकर हम जा पहुंचे अपने गंतव्‍य स्‍थान पर। वहाँ चार चबूतरे बनाए हुए थे, वहाँ से तालाब की सुन्‍दरता को निहारा जा सकता था। एक चबूतरे पर टेन्‍ट लगा था, उसमें करीने से बिस्‍तर लगे थे। वाह, यहाँ तो रात बिताने का भी साधन है, लेकिन हम तो रात 10 बजे की योजना ही बनाकर आए थे। लेकिन हमने दूसरे चबूतरे पर अपना आधिपत्‍य जमा लिया। धीरे-धीरे और लोग भी आने लगे। इस भ्रमण में हमारे साथियों के अतिरिक्‍त सारी ही युवा-पीढ़ी थी। मन एकदम से युवा हो गया। जाते ही निर्देश मिल गए कि जितना शान्‍त रहेंगे उतना ही हम यहाँ के प्राणियों को राहत देंगे। यह उनका स्‍थान है, पशु-पक्षियों का घर है। आपको कोई अधिकार नहीं कि आप बिना पूछे उनके घर में चले आएं और शोर-शराबा करके उन्‍हें परेशान करें। हम सब की आवाजें एकदम धीरी हो गयी। बताया गया कि यहाँ पेन्‍थर है, आज ही उसने एक बकरी का शिकार किया है। मतलब उसका पेट भरा हुआ है, हम निश्चिंत हो गए। कभी यह स्‍थान बाघों का बाड़ा था इसलिए इसका नाम बाघदड़ा हो गया। लेकिन अब बाघ नहीं हैं बस पेंथर हैं और अन्‍य जीव। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मुख्‍य वन-संरक्षक श्री निहाल चन्‍द जैन हमारे साथ थे। उन्‍होंने बताया कि आप यहाँ आर्केस्‍टा सुन सकते हैं। मुझे लगा कि शायद कोई अन्‍य दल तालाब किनारे से आर्कस्‍टा बजाएंगा। लेकिन कुछ ही देर में समझ आ गया कि अरे इस आर्केस्‍टा का इंतजाम तो स्‍वयं प्रकृति ने किया है। कितने सुरताल में जीव अपना गान प्रस्‍तुत कर रहे थे, लग रहा था सारे ही शब्‍द मौन हो जाएं और यह तान हमारे कानों में अमृत घोलती रहे बस। तभी प्रकृति प्रेमी मिहिर ने पूछ लिया कि यहाँ आकर यदि एक शब्‍द में पूछा जाए कि कैसा लगा तो आप क्‍या कहेंगे? मैं तो अमृत पीने का प्रयास कर रही थी, मुँह से अचानक ही निकला की अमृत। लेकिन किसी ने कहा कि शान्ति है तो किसी ने कहा कि आनन्‍द है। तभी एक जुगनू अपनी चमक बिखेरता हुआ दिखायी दे गया। जैन साहब ने बताया कि कभी ये जुगनू उदयपुर शहर में भी खूब दिखायी देते थे लेकिन आज इस जंगल में ही सिमटकर रह गए हैं। कारण है प्रदूषण। कुछ प्रकृति के जीव प्रदूषण से असंवेदनशील होते हैं इस कारण प्रकृति प्रेमी इनकी अनुपस्थिति से जान लेते हैं कि यहाँ प्रदूषण बढ़ गया है। अर्थात प्रकृति ने कितने पैमाने छोड़े हैं हम सबके लिए, लेकिन हम कहाँ देखते हैं इन पैमानों को? बस हमारे पैमाने तो बड़ी-बड़ी गगनचुम्‍बी ईमारते हैं और धुँआ उगलते उद्योग-धंधे हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;फ्रकृति को बचाने के लिए आप क्‍या संकल्‍प लेंगे, यह प्रश्‍न था। उसका उत्तर तो सभी ने अपने तरीके से दिया लेकिन मन ने कहा कि हम वास्‍तव में कितने कसूरवार हैं। क्‍या दे जाएंगे हम विरासत में? एक आश्‍चर्यजनक सत्‍य मिहिर ने बताया कि चींटियां कितनी अनुशासनप्रिय हैं यह तो सभी जानते हैं लेकिन इनकी संख्‍या और इनका कुल भार मनुष्‍यों के कहीं ज्‍यादा है। इतनी शक्तिशाली होने पर भी चीटियों ने कभी इस सृष्टि को हानि नहीं पहुँचाई लेकिन हमने हानि के अतिरिक्‍त कुछ किया ही नहीं। व़ास्‍तव में मनुष्‍य कितना छोटा है? तभी घड़ी देखी, रात के साढे नौ बज चुके थे और अभी भोजन करना भी शेष था। हमने सोचा था कि यह स्‍थान हम दस बजे छोड़ देंगे। चाँद हमारे सिरों पर आ चुका था, हाथ की रेखाएं भी साफ दिखायी देने लगी थी। बस चाँद के कारण तारे ही कहीं दुबक गए थे। कुछ दो-चार ही दबंग थे जो टिमटिमा रहे थे। अब हमने भोजन की सुध ली। युवापीढ़ी में से किसी ने बांसुरी पर तान छेड़ दी। एक तरफ हम भोजन का आनन्‍द ले रहे थे तो दूसरी तरफ बांसुरी का रसास्‍वादन भी कर रहे थे। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आखिर हम अनमने मन से साढे दस बजे वहाँ से जाने को तैयार हुए। दूसरे चबुतरे पर युवाओं ने टेण्‍ट तान दिया था। अरे ये सब तो रात यहीं व्‍यतीत करेंगे! और ह‍म? बस मन मसोस कर रह गए। हम केवल दस प्रतिशत ही आनन्‍द ले पाए थे शेष तो अगली यात्रा का ख्‍वाब बुनकर ही पूरा कर आए थे। वापस हमे उसी पगडण्‍डी पर जाना था। टार्च लिए वनकर्मी साथ था लेकिन इस बार चन्‍द्रमा चाँदनी बिखेर रहा था। सब कुछ साफ दिखायी दे रहा था। एक तरफ खाई और एक तरफ तालाब सभी कुछ। इसबार जल्‍दी ही मार्ग तय हो गया और हम अपनी गाड़ी उठाकर उस प्रकृति प्रदत्त सुन्‍दरता को पीछे छोड़ आए। बस अपनी साँसों में ढेर सारी महक लेकर आ गए। इस उम्‍मीद के साथ कि कभी हम भी रात वहीं बिताएंगे।&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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महिलाओं के प्रति उसका तीव्र आकर्षण यहाँ तक की महिला को पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने का पागलपन! शायद कभी समाज ने इसी प्रवृत्ति को देखकर विवाह संस्‍था की नींव डाली होगी। पुरुष के चित्त में सदा महिला वास करती है। उसका सोचना महिला के इर्द-गिर्द ही होता है। पुरुषोचित साहस, दबंगता, शक्तिपुंज आदि सारे ही गुण एक इस विकार के समक्ष बौने बन जाते हैं। वह महिला को पूर्ण रूप से पाना चाहता है, उसे खोने देना नहीं चाहता। पति के रूप में वह पत्‍नी को अपनी सम्‍पत्ति मानने लगता है और इसी भ्रम में कभी वह लाचार और बेबस भी हो जाता है। महिला भी यदि दबंग हुई तो उसकी बेचारगी और बढ़ जाती है। इसलिए आदिकाल से ही पुरुष का सूत्र रहा है कि अपने से कमजोर महिला को पत्‍नी रूप में वरण करो। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;पति के रूप में वह अक्‍सर कमजोर ही सिद्ध हुआ है। कुछ लोग मेरी इस बात पर आपत्ति भी कर सकते हैं। लोग कहते हैं कि पति पत्‍नी पर अत्‍याचार करता है। शराब पीकर उत्‍पात मचाता है। लेकिन व्‍यसन करना किस बात का प्रतीक है? कमजोर मन वाले लोग ही व्‍यसन का सहारा लेते हैं। कमजोर पुरुष ही हिंसा का सहारा लेते हैं। जब आपके अन्‍दर स्‍त्री के समक्ष प्रस्‍तुत होने का सामर्थ्‍य नहीं होता तब आप व्‍यसन का या हिंसा का सहारा लेते हैं। कई बार यह देखने में आता है कि इसी कमजोरी का महिलाएं फायदा भी उठाती हैं। कई बार पति बेचारा-प्राणी बनकर रह जाता है। हम स्‍त्री पर होने वाले अत्‍याचार या उसकी बेबसी की बाते तो हमेशा करते हैं, स्‍त्री को हमेशा ही कमजोर और बेबस सिद्ध करने पर तुले होते हैं लेकिन पुरुष कितना बेबस है इस बात को कोई उद्घाटित नहीं करता। इसलिए मैं कहती हूँ कि पुरुष की बेबसी, पुरुष रूप में जन्‍म लेकर ही समझी जा सकती है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आप सोच रहे होंगे कि आज अचानक ही पुरुष पुराण मैंने क्‍यों खोल दिया है। लेकिन जब भी मैं महिलाओं को बेबस और लाचार सिद्ध करने वाला लेखन पढ़ती हूँ तब लगता है कि आखिर हम चाहते क्‍या हैं? बेबस पुरुष है और सिद्ध किया जा रहा है कि बेबस महिला है। वैसे आज मुझ पर बहुत आक्रमण होने वाले हैं। लेकिन एक घटना जो मुझे एक महिने से पीड़ित कर रही है, उसे उदाहरण के रूप में प्रस्‍तुत करना चाह रही हूँ। इस घटना का अभी अन्‍त नहीं हुआ है, ऊँट किस करवट बैठे यह भी मैं नहीं जानती। किसी सत्‍य घटनाक्रम को सार्वजनिक करना चाहिए या नहीं, बस इसी उहापोह में हूँ। नाम बदल दिये हैं, स्‍थान बदल दिया है। अब आप बताइए कि इस घटना को किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;विनोद और शालिनी का प्रेम विवाह सात वर्ष पूर्व हुआ। अभी एक साल का पुत्र उनके जीवन में है। दोनों ही शिक्षित और उच्‍च पदों पर कार्यरत हैं। जीवन खूबसूरती के साथ निकल रहा था लेकिन एक माह पूर्व भूचाल आ गया। विनोद भुवनेश्‍वर का है और वहाँ एक अन्‍य महिला से परिचित है। वह महिला कुछ दिलफेंक अंदाज की है। बाते रूमानी सी करती है और आगे होकर सम्‍बन्‍ध बनाती है। विनोद जब भी भुवनेश्‍वर जाता, उससे मुलाकात हो जाती। कई बार मुम्‍बई में भी उसके फोन आ जाते। एक बार भुवनेश्‍वर में मुलाकात के दौरान एक चुम्‍बन भी हो गया। बस विनोद में अपराध-बोध ने जन्‍म ले लिया। उसे लगा कि मुझसे कुछ गलत हो रहा है और यही अपराध-बोध उसके लिए प्रायश्चित का कारण बना। उसने लगभग एक महिने पूर्व अपनी पत्‍नी शालिनी को सब कुछ सच बता दिया। उसने प्रायश्चित करना चाहा था लेकिन हो गया एकदम उल्‍टा। शालिनी के‍ लिए यह बहुत बड़ा अपराध था। तभी समझ आया कि विनोद का आत्‍मबल कितना कमजोर था और शालिनी का अहंकार कितना बड़ा। शालिनी को यह घटना स्‍वयं की हार लगी। उसका मानना था कि मैं इतनी परफेक्‍ट हूँ कि मेरा पति तो मेरे सपनों में ही खोया रहना चाहिए। किसी से बात करना भी बहुत बड़ा अपराध है। उसने प्रतिक्रिया स्‍वरूप विनोद को बहुत मारा। उसके जो भी हाथ में आया उसी से उसने मारा। विनोद बुरी तरह से घायल हो गया लेकिन बदले में उसने हाथ नहीं उठाया। मकान शालिनी के नाम था तो उसने विनोद को घर से निकल जाने को कहा। तीन दिन तक भूखा-प्‍यासा विनोद, रात को नींद भी नहीं ले पाया। आखिर मन और शरीर कब तक साथ देते, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। विनोद के मित्र ने उसे सम्‍भाला, डॉक्‍टर के पास लेकर गए लेकिन शालिनी को समझाना कठिन हो गया। विनोद के माता-पिता को भी बुलाया गया। लेकिन परिस्थितियों में कुछ भी सुधार नहीं हुआ। शालिनी की उग्रता कम होने का नाम ही नहीं लग रही थी। आखिर शालिनी ने तलाक का फरमान जारी कर दिया। शालिनी के पिता को भी बुलाया गया लेकिन उन्‍होंने भी अपनी बेटी को समझाने के स्‍थान पर अपने साथ भुवनेश्‍वर ले जाना ज्‍यादा उपयुक्‍त समझा। भुवनेश्‍वर जाते समय भी शालिनी चेतावनी देकर गयी कि उसका यथाशीघ्र मकान खाली कर दिया जाए। &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;विनोद और उसके माता-पिता ने किराये का मकान भी देख लिया और उसे एडवान्‍स भी दे दिया। लेकिन फिर शालिनी के स्‍वर बदल गए और उसने कहा कि मेरे मकान में विनोद किराएदार की हैसियत से रह सकता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;विनोद इतना होने पर भी शालिनी को छोड़ना नहीं चाहता। उसका मानसिक संतुलन कुछ ठीक हुआ है लेकिन पूरी तरह से नहीं। उसके माता-पिता भी बेबस से अपने बेटे के भविष्‍य को देखने की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि बस उनका बेटा स्‍वस्‍थ हो जाए और आपसी विवाद भी समाप्‍त हो जाए। वे भी शालिनी की अभद्रता को सहन कर रहे हैं लेकिन बेटे के भविष्‍य के कारण बेबस से बने हुए हैं। कोई रास्‍ता किसी को भी दिखायी नहीं दे रहा है। लेकिन विनोद का एक वाक्‍य सभी को व्‍यथित कर रहा है, उसने अन्‍त में कहा कि &lt;/span&gt;“&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मैं क्‍या करूं, यदि मुझे शालिनी अपने घर में नहीं रखती है तो मैं जिन्‍दगी को ही छोड़ दूंगा।&lt;/span&gt;“&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;सारे घटनाक्रम से मन प्रतिपल दुखित है। पुरुष की बेचारगी की यह सत्‍य घटना है। परिणाम तो पता नहीं क्‍या निकलेगा, लेकिन वर्तमान इतना अजीब है कि समझ से बाहर है। जब पुरुष छोटी-छोटी बातों का बतगंड बनाता है तो हम उसे कोसते हैं, कहते हैं कि पुरुष होने का नाजायज फायदा उठा रहा है। लेकिन जब यही कृत्‍य महिला करे तो इसे क्‍या कहा जाएगा? क्‍या पुरुष वास्‍तव में इतना कमजोर है कि ऐसी दबंग महिला का सामना नहीं कर सकता? &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;इससे तो यही सिद्ध होता है कि जैसे-जैसे महिलाएं आत्‍मनिर्भर होती जाएंगी वैसे-वैसे पुरुष कमजोर होता जाएगा। उनकी बेचारगी समाज के सामने परिलक्षित होने लगेंगी।&lt;span&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;मैं ना तो नारीवादी हूँ और ना ही पुरातनवादी। मैं तो परिवारवादी हूँ। परिवार में संतुलन बना रहे, बच्‍चों का विकास माता-पिता दोनों के साये में ही हो, बस यही चाह रहती है। ना पुरुष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करे और ना ही महिला। पुरुषों की कमजोरी को घर-घर में देखा है, लेकिन इतनी विकृत रूप शायद पहली बार देखने को मिला। आप सभी लोगों के विचार होंगे, मैं जानना चाहती हूँ कि क्‍या एक दूसरे को थोड़ी भी स्‍वतंत्रता नहीं देनी चाहिए। क्‍या हम विवाह अपनी स्‍वतंत्रता खोने के लिए करते हैं? वर्तमान में अधिकतर युवक विवाह नहीं करना चाहते, वे डरे हुए हैं। तो क्‍या उनके डर को कम करना चाहिए या और बढाना चाहिए? मैं जानती हूँ कि यदि महिला से अपराध हुआ होता तो पुरुष भी ऐसा ही करता लेकिन अब महिला भी यही तरीका अपनाए? एक तरफ ह‍म आधुनिकता में जी रहे हैं और एक तरफ इतनी छोटी-छोटी बातों से अपने परिवार तोड़ रहे हैं, क्‍या ऐसा आचरण उचित है? बहुत सारे द्वन्‍द्व हैं मन में लेकिन यहीं विराम देती हूँ बस आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है।&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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&lt;/span&gt;उदयपुर के समीप वनांचल है, बस कुछ किलोमीटर ही चले और जंगल प्रारम्‍भ होने लगते हैं। वही पर्वत, संकरी और घुमावदार सड़के, कलकल करती नदी(अधिकतर वर्षाकाल में), अनेक वृक्षों की भरमार। कहीं पीपल हैं, कहीं बरगद है तो कहीं पलाश और कहीं सागवान। हर ॠतु में कोई न कोई वृक्ष फल-फूल रहा होता है। कभी महुवा महकता है तो कभी नीम बौराता है। कभी पलाश खिलता है तो कभी सागवान फूलों से भरा रहता है। एक मदभरी गंध वातावरण को बौराती रहती है। महुवा जब फूलता है तब उसके नीचे चादर तान कर लेट जाइए, खुमारी सी छा जाएगी। पलाश जब फूलता है तब लगता है कि जंगल के सीने में किसी ने अपने सौंदर्य से आग लगा दी है। सुबह और शाम को चहचहाते पक्षी, आपको संगीत का रसपान करा देते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="color: blue; font-family: Mangal;"&gt;लेकिन इससे परे एक और दृश्‍य है, गरीबी का, अज्ञानता का। वहाँ के वासी अज्ञानता के साथ रह रहे हैं और स्‍वयं के विकास के प्रति विचारशून्‍य। अंग्रेजों के आने के पूर्व तक इनके कबीले थे, ये जंगल के राजा थे। इनकी वेशभूषा आकर्षक थी। गहनों के रूप में पत्‍थरों और विभिन्‍न धातुओं का भरपूर प्रयोग करते थे। पशुपालन और खेती आजीविका के मुख्‍य साधन थे। शिक्षा का महत्‍व ना ये जानते थे और ना ही इन्‍हें इसकी आवश्‍यकता थी। पूर्ण स्‍वतन्‍त्रता के साथ जीवन यापन करते थे यहाँ के वासी। लेकिन अंग्रेजों ने जंगल पर सरकार का अधिकार घोषित कर दिया और ये राजा से रंक बन गए। बस तभी से इनकी दुर्दशा के दिन प्रारम्‍भ हो गए। सोचा था कि आजादी के बाद भारत का विकास गाँव से शहर की ओर होगा लेकिन हमने विकास का आधार शहर को बनाया। परिणाम स्‍वरूप गाँव उजड़ते चले गए। जहाँ के पहाड़ों से झरने फूटते थे और नदियों से होकर पानी कलकल करता बारहों मास बहता था, अब वही पानी शहरों की ओर जाने लगा। वनांचलवासी पानी को तरसने लगे। उनके कुएं सूख गए, नदियां नालों में तब्‍दील हो गयी। शहर की आवश्‍यकताओं को पूर्ण करने के लिए जंगलों का अंधा-धुंध दोहन किया गया, परिणामत: घने जंगलों का स्‍थान वीरानों ने ले लिया। &lt;/span&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अब सरकार और समाज को समझ आने लगा है कि हमें इन क्षेत्रों के विकास के लिए कुछ करना चाहिए। करोड़ों रूपए पानी की तरह बहाए गए लेकिन जैसे वनांचल का पानी शहर की ओर आ रहा है वैसे ही यहाँ से बहकर आता हुआ रूपया भी शहर के अधिकारियों और राजनेताओं रूपी समुद्र में आ मिला। विकास के रूप में सड़के, स्‍कूल, अस्‍पताल दिखने लगे हैं लेकिन वनांचलवासी की मनोदशा नहीं बदली। वह आज भी गरीबी में दिन गुजार रहा है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इतने मनोरम स्‍थलों पर गरीबी देखकर लगता है कि स्‍वर्ग में गरीबी छा गयी है। क्‍या हम इन स्‍थलों को पर्यटकीय दृष्टिकोण से विकसित नहीं कर सकते? &lt;span style="color: green;"&gt;अमेरिका के जंगलों को देखने का अवसर मिला। उन्‍हें मैंने अच्‍छी प्रकार से समझा कि वहाँ और हमारे जंगलों में क्‍या अन्‍तर है। हमारे जंगल कुछ किलोमीटर जाकर ही समाप्‍त हो जाते हैं लेकिन वहाँ कभी न समाप्‍त होने वाले जंगल दिखायी देते हैं। मैं उन जंगलों की सघनता से मुग्‍ध होकर शाम की वेला में पक्षियों का इन्‍तजार कर रही थी लेकिन पक्षी नहीं आए! आश्‍चर्य का विषय था। हमारे यहाँ तो एक वृक्ष पर ही इतने पक्षी होते हैं कि उनके कलरव की गूंज से चारो दिशायें गूंज जाती है। निगाहें कुछ और खोजने लगी, कहीं फल नहीं थे और कहीं फूल नहीं खिला था। जब फल-फूल ही नहीं थे तो सुगन्‍ध तो कहाँ से होगी? केवल एक ही वृक्ष की उपस्थिति सर्वत्र देखी। ना पलाश था, ना बरगद था, ना पीपल था, ना गूलर था, ना नीम था। कुछ भी नहीं था। लेकिन पर्यटकीय आकर्षण कितना अधिक था कि विश्‍व के सारे ही पर्यटक खिंचे चले आते हैं।&lt;/span&gt; क्‍या हम हमारे जंगलों को जो विविधता से भरे हैं, जो महक रहे हैं, जो फल और फूल रहे हैं उनकी सुगंध से दुनिया को अवगत नहीं करा सकते? जंगलों का पर्यटन बढे़गा और हमारे वनांचलवासी का हौसला भी लौट आएगा। उसकी वेशभूषा जो कभी सतरंगी थी, जिसमें गहनों की भरमार थी, क्‍या पुन: लौटायी नहीं जा सकती? इतनी सुन्‍दरता भरी हुई हैं हमारे जंगलों में कि कोई भी यहाँ आकर बौरा जाए फिर हमने क्‍यों इन्‍हें उपेक्षित छोड़ रखा है? एक ऐसा संसार यहाँ बसा है, जिसकी कल्‍पना शायद युवापीढ़ी को नहीं है। वह शहरों में जीवन का उल्‍लास तलाश रहा है, उसने कभी प्रकृति का आनन्‍द देखा ही नहीं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-pbZEp2Wl_Fg/ToqGyGeARmI/AAAAAAAABxU/U8VdnSTjJAo/s1600/Copy+of+Picture+291.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://2.bp.blogspot.com/-pbZEp2Wl_Fg/ToqGyGeARmI/AAAAAAAABxU/U8VdnSTjJAo/s320/Copy+of+Picture+291.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;एक छोटा सा गाँव जहाँ आज एक उत्‍सव है&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: right; margin-left: 1em; text-align: right;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/--kbq17vUDYA/ToqG-Lmt2XI/AAAAAAAABxY/-s6oK3djvrU/s1600/Picture+380.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/--kbq17vUDYA/ToqG-Lmt2XI/AAAAAAAABxY/-s6oK3djvrU/s1600/Picture+380.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;वनांचल की एक बालिका&amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मैंने इसी शनिवार को अर्थात् 1 अक्‍टूबर को ही ऐसे क्षेत्र की यात्रा की थी। पूर्व में भी कई बार जाती रही हूँ। लेकिन वर्षा के बाद जाने का आनन्‍द तो अनूठा होता है। धरती ने हरियाली ओढ़ी होती है और पहाड़ नर्तन कर रहे होते हैं। झरने खुशी से झूम रहे होते हैं। एक अन्तिम बात और, पहाड़ी स्‍थलों पर और उदयपुर के समीप सीताफल प्रचुरता से होता है। इन दिनों सीताफल ही सीताफल दिखायी देता है। हम जिस गाँव में गए थे, वहाँ के मन्दिर में भी सीताफल का पेड़ लगा था। हमारे साथ एक नवयुवती भी थी जिसने शायद पहले कभी सीताफल नहीं देखा था। उसका कौतुक इस फल के प्रति बहुत था। मैंने कहा अभी पंद्रह दिन में पक जाएंगे, लेकिन उसने कच्‍चे ही तोड़े और कहा कि इन्‍हें ही अपने साथ लेकर जाऊँगी। आप लोग भी कभी वनाचंलों का आनन्‍द ले और भारत कितना प्रकृति से सम्‍पन्‍न है इसकी जानकारी यहाँ आकर लें। तब आप विदेश यात्राओं को भूल जाएंगे। आप भी खुश हो जाएंगे और आपके कारण यहाँ का वनांचलवासी भी सम्‍पन्‍न हो सकेगा। &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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लेखन का उद्देश्‍य क्‍या है?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अपनी पुस्‍तक का लोकार्पण के अर्थ क्‍या हैं? कोई कठिन प्रश्‍न नहीं हैं, बहुत‍ सरल सा उत्तर है कि अपनी पुस्‍तक को लोगों को समर्पित करना। अर्थात अपने विचारों को पुस्‍तक के माध्‍यम से समाज में प्रस्‍तुत करना। ये विचार अब समाज प्रयोग में ला सकता है। लेकिन कई बार विवाद होता है या यूँ कहूँ कि अक्‍सर विवाद होता है कि मेरे विचार को समाज ने कैसे उद्धृत किया? यदि मेरा विचार था तो उसे मेरे नाम से ही उद्धृत करना चाहिए था। लेकिन समाज का कहना है कि जब आपने इसे लोकार्पित कर ही दिया है या सार्वजनिक कर ही दिया है तो ये विचार सभी के हो गए हैं। यह किसका विचार है उद्धृत करना बहुत अच्‍छी बात है लेकिन यदि कोई नहीं भी करे तो क्‍या यह गैरकानूनी की श्रेणी में आएगा? वर्तमान लेखकों या विचारकों के विचारों को हम उद्धृत भी कर देते हैं लेकिन प्राचीन विचारकों को तो हम अक्‍सर भुला ही देते हैं और सीधे ही उस विचार का प्रयोग करते हैं। कितनी लघुकथाएं, बोधकथाएं, मुहावरे, चुटकुले समाज में प्रचलित हैं लेकिन हम उनके लेखकों को नहीं जानते। &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: red; font-family: Mangal; font-size: 14.0pt;"&gt;इसलिए मैं सभी सुधिजनों से जानना चा‍हती हूँ कि क्‍या लोकार्पित विचार आपकी निजि सम्‍पत्ति हैं? &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;क्‍योंकि मुझे किसी विद्वान ने कहा था कि जब तक आपकी पुस्‍तक लोकार्पित नहीं है तभी तक आपकी है, जिस दिन इसका लोकार्पण हो गया यह पुस्‍तक सबकी हो गयी है। जैसे कोई भवन, पुल आदि लोकार्पण के बाद सार्वजनिक हो जाते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #3366ff; font-family: Mangal; font-size: 14.0pt;"&gt;लेखन के बारे में एक और प्रश्‍न है, हमारे लेखन का उद्देश्‍य क्‍या है? &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;क्‍योंकि मेरा मानना है कि शब्‍द ब्रह्म है और इसे नष्‍ट नहीं किया जा सकता है। यह अपना प्रभाव समाज पर अंकित करता ही है। आपके लिखे गए शब्‍द से समाज प्रभावित होता ही है। बोले गए शब्‍द में और लिखे गए शब्‍द में भी अन्‍तर होता है। बोले गए शब्‍द का व्‍याप छोटा होता है लेकिन लिखे गए शब्‍द का व्‍याप भी बड़ा होता है और वह साक्षात सदैव उपस्थित भी रहता है। इसलिए जिसके शब्‍दों या विचारों से समाज को सकारात्‍मक ऊर्जा मिलती है वह लेखक या विचारक उतना ही महान होता है। जिस लेखन से नकारात्‍मक ऊर्जा मिलती है उसे समाज तिरस्‍कृत करता है। आज भी हम रामायण और महाभारत से ऊर्जा लेते हैं लेकिन ऐसे लेखक भी आए ही होंगे जिन्‍होंने समाज में नकारात्‍मकता की उत्‍पत्ति की हो, लेकिन वह शायद स्‍थापित नहीं हो पाए। परिष्‍कृत समाज की हमारी कल्‍पना है। मनुष्‍य और प्राणियों में बस इतना ही अन्‍तर है कि मनुष्‍य सदैव परिष्‍कृत या संस्‍कारित होता रहता है जबकि अन्‍य प्राणी प्रकृतिस्‍थ ही रहते हैं। लेखन इसी संस्‍कार की प्रवृत्ति को विस्‍तारित करने के लिए ही है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;साहित्‍य और पत्रकारिता में एक अन्‍तर दिखायी देता है। पत्रकार प्रतिदिन की घटनाओं को समाज के समक्ष प्रस्‍तुत करते हैं, उसमें विचार नहीं होता लेकिन साहित्‍यकार के लिए आवश्‍यक नहीं है कि वह प्रतिदिन साहित्‍य की रचना करे। जब भी श्रेष्‍ठ विचार उसके अन्‍तर्मन में जागृत हों, उन्‍हें विभिन्‍न विधाओं के माध्‍यम से समाज तक विस्‍तार देने का प्रयास करता है। इसलिए साहित्‍यकार प्रतिदिन नवीन रचना नहीं कर पाता। समाज के मध्‍य जाकर प्रचलित विचारों से उसके नवीन विचार जन्‍म लेते हैं और वे उन्‍हें पुन: प्रांजल कर समाज को लौटाता है। इसलिए एक साहित्‍यकार के लिए&lt;span&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;लेखन से भी अधिक आवश्‍यक है उसका समाज के साथ एकाकार होना। या फिर भिन्‍न विचारों का पठन, जो समाज में पुस्‍तकरूप में विद्यमान है। इन्‍हीं संस्‍कारित विचारों को हम समाज को देते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: green; font-family: Mangal; font-size: 14.0pt;"&gt;इसलिए आइए हम इस बात पर चिंतन करें कि हमारे लेखन का उद्देश्‍य क्‍या है और जो लेखन लोकार्पित हो गया है वह क्‍या आपकी निजि सम्‍पत्ति है या फिर सभी के उपयोग के लिए उपलब्‍ध है? &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: green; font-size: 14.0pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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ठूंठ बने वृक्ष पर कौवा आकर कॉव-कॉव करने लगता है। सूखे श्रीहीन वृक्ष पर कैसा कर्कश स्‍वर है? लेकिन य‍ही नियति है। निर्मम पतझड़ ने सबकुछ तो उजाड़ दिया है। क्‍यों किया उसने ऐसा? यह पतझड़ ही खराब है, चारों तरफ से आवाजें आने लगी हैं। हवाएं भी चीत्‍कार उठी हैं, सांय-सांय बस चलती रहती हैं। माहौल गर्मा गया, हरियाली विलोप हो गयी। आँखों का सुकून कहीं बिसरा गया। प्रकृति का ऐसा मित्र? नहीं हमें जरूरत नहीं ऐसे मित्र की। पशु-पक्षी सभी ने मुनादी घुमा दी, नहीं चाहिए हमें पतझड़।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अभी बवण्‍डर अपना रूप ले ही रहा था कि एक अंकुर फूट गया। वृक्ष पर हरीतिमा छाने लगी। नवीन कोपल मन को उल्‍लास से भरने लगी। देखते ही देखते वृक्ष लहलहा गया। इतनी सुंदरता? इतनी मोहकता? कहाँ थी यह पहले? पतझड़ ने धो-पौंछकर नवीनता ला दी। अब तो राग भी बदल गया, कौवे का स्‍थान कोयल ने ले लिया। चिड़ियाऐं भी फुदकने लगी। मधुमक्‍खी ने भी छत्ता बना डाला। पुष्‍पों से पराग सींच-सींचकर मकरन्‍द बन गया। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बहुत सुन्‍दर है प्रकृति, बहुत जरूरी है इसके सारे ही तत्‍व। सारी ही ॠतुएं। इनमें से एक भी अपना कर्तव्‍य भूल जाए तो चक्र डांवाडोल हो जाएगा। प्रकृति ही विनाश करती है और प्रकृति ही सृष्टि को पुन: रचती है। जब-जब भी विरूपता-कुरूपता का आक्रमण हुआ, प्रकृति ने नवनिर्माण किया। जब प्रकृति डोलती है तब उसकी नाराजी सहन नहीं होती। लेकिन वह तो नव-निर्माण कर रही होती है। मनुष्‍य को सावचेत कर रही होती है कि इस संसार में सभी कुछ नश्‍वर है। पुरातन के बाद ही नवीन का उदय होगा।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हमारे मन में भी अनेकानेक विचार करवट लेते रहते हैं। कभी ये विचार भूचाल ला देते हैं तो कभी सुनामी। एकबारगी तो धरती विषैली सी हो जाती है लेकिन विष के बाहर आने के बाद एकदम शान्ति। आवश्‍यक है विचारो का उर्ध्‍व-वमन, निकल जाने दो इन्‍हें बाहर। प्रकृति में विष विस्‍तार लेगा तो अमृत की भी खोज होगी। समुद्र मंथन शायद हमारे मनों में ही हुआ हो। अमृत और विष दोनों ही बाहर आ सके थे। जिसको जो लेना था, उसने वो ले लिया। य‍ह सृष्टि ऐसे ही विस्‍तार लेती है। आज की युवा-पीढ़ी कहती है &lt;/span&gt;“&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;सारे ही फेंडस जरूरी है&lt;/span&gt;”&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;। हम भी यही कहते हैं कि सारे ही व्‍यक्ति जरूरी हैं। भोजन में षडरस। यात्रा पर निकलिए, करेला कितना मधुर लगता है। तीखे अचार का तो कहना ही क्‍या। भोजन के अन्‍त में मीठा ना हो तो? सारे ही रस अपने-अपने स्‍वादों की प्रधानता को स्‍थापित करते रहेंगे। जैसे हम अपने विचारों को स्‍थापित करते रहते हैं। परिवार में सारे ही सदस्‍य भोजन की टेबल पर बैठे हैं, बच्‍चा सबसे पहले करेले जैसी सब्‍जी को बाहर निकालता है, गुस्‍से में बोलता है कि मुझे नहीं खाना करेला। तभी दादाजी घुड़का देते हैं, क्‍यों नहीं खाना करेला? लेकिन अगले ही पल वे भी बोल उठते हैं कि मुझे नहीं खाना आलू-बेसन। सभी के अपने स्‍वाद हैं, सभी की जरूरतें। मत खाइए जो आपको पसन्‍द ना हो, लेकिन दूसरे के खाने को बुरा मत कहिए। आज जो मुझे पसन्‍द नहीं, हो सकता है वही कल मेरी जरूरत बन जाए। इसलिए मित्रों हमें भी सभी की जरूरत है। बस यही कहते रहिए कि सभी मित्र, सभी व्‍यक्ति जरूरी होते हैं। &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;इस धरती की खूबसूरती बनाए रखने के लिए प्रत्‍येक रंग जरूरी है, कहीं काला फबता है तो कहीं सफेद, कही हरा तो कहीं लाल। कभी कौवा आवश्‍यक होता है तो कभी कोयल का मधुर राग अच्‍छा लगता है। विचित्रता में ही आनन्‍द है। लड़ाई-झगड़े भी हमारे मन के कलुष को निकालने के लिए आवश्‍यक है। सभी का सम्‍मान कीजिए, सभी को जीने का अवसर दीजिए। बस हमेशा कहते रहिए &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; सभी प्राणी जरूरी हैं।&amp;nbsp;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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लेकिन क्‍या आपको नहीं लगता कि यह सच है। यदि नहीं लगता तो शायद आपके ज्ञान के चक्षु अभी खुले नहीं है। हम तो अनुभव के उस मुकाम पर पहुंच गए हैं जहाँ चक्षु प्रतिदिन नित नया ज्ञान दिखाते हैं। मुझे तो कभी-कभी आशंका होने लगती है कि कहीं ऐसे ही तीव्र गति से ज्ञान की प्राप्ति होती रही तो केवलज्ञान के समीप ही नहीं पहुंच जाए हम! &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बिच्‍छू के जहर से एक बात और ध्‍यान में आयी। किसी तत्‍वज्ञानी ने बताया था कि यदि महिला गर्भवती हो और उसे बिच्‍छू काट ले तो बिच्‍छू मर जाता है। एक बार साक्षात मैंने देखा भी है, लेकिन एक बार ऐसा होना संयोगमात्र भी हो सकता है। लेकिन एक सिद्धान्‍त तो बन ही जाता है कि यदि आपके मन में कोई अन्‍य का मन आत्‍मसात हो तो शायद बिच्‍छू का जहर असर ना करे उल्‍टा बिच्‍छू ही मर जाए! इसे यूं भी कह सकते हैं कि जो किसी के प्रेम में अंधे होकर घूमते हैं उन्‍हें शायद ऐसे बिच्‍छुओं के जहर का असर होता ही नहीं हो। अब यह प्रेम कई प्रकार का होता है, व्‍यक्ति का प्रेम, काम का प्रेम, देश का प्रेम आदि आदि। जो धुन का मतवाला है उसे कितने भी डंक मारो, नालायक को असर ही नहीं होता। बेचारे बिच्‍छू जैसे लोग बड़े आहत हो जाते हैं! &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;डंक मारने के प्रयोग देखिए, एक संत-फकीर टाइप इंसान अनशन करता है तो राजनेता डंक मारते हैं कि इसकी नियत में खोट है, यह स्‍वयं सत्ता पर काबिज होना चाहता है। लेकिन कोई राजनेता ही उपवास पर बैठ जाए तो डंक लगेगा कि नहीं इसे अधिकार नहीं है, ऐसे नाटक करने का अधिकार तो केवल मेरे पास ही है। और बानगी देखिए, आपने घर में जरा भी ऊँची आवाज में अपनी बात पुरजोर शब्‍दों में कह दी तो झट से एक डंक निकल आएगा कि नेतागिरी करते हो? अब आज के नेता की बदनामी का जहर आपके शरीर में इंजेक्‍शन की तरह घुसा दिया गया है और आप कई दिनों तक इस जहर से उबर नहीं पाते। कभी-कभी आपको स्‍याणों की शरण में भी जाना पड़ जाता है। आज शनिवार है, इस देश के करोड़ों लोग आज के दिन व्रत रखते हैं। लेकिन बस आज यही प्रश्‍न डंक की तरह फड़फड़ाता रहेगा &lt;/span&gt;“&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अरे आज आपने भी उपवास रखा है&lt;/span&gt;”&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अभी दो दिन पूर्व मेरे मोबाइल पर एक मेसेज आया &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color: #993300; font-size: 16.0pt;"&gt;don’t get upset with people or situation … they are powerless without your reaction&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;. &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इस वाक्‍य को मैंने अपनी एक टिप्‍पणी में भी उद्धृत किया था। मेरे अनुभव से मुझे यह ज्ञान भी प्राप्‍त हुआ कि जो जितना शिक्षित उसके डंक में उतना ही तीव्र जहर। पत्रकारों को देखा नहीं कैसे-कैसे प्रश्‍न करते हैं! लोग तो कहते हैं कि इनका काटा पानी नहीं मांगता। लेकिन राजनेता इनको झेल जाते हैं। मैं आप लोगों से इतना ही ज्ञान बांट रही हूँ कि लोग कितने ही बिच्‍छू बन जाएं लेकिन आप उन पर ध्‍यान मत दीजिए। मेरा यह अचूक फार्मूला है और मैंने इसी फार्मूले से कई लड़ाइयां जीती हैं। मुझे लोग कहते रहते हैं कि आप प्रतिक्रिया क्‍यों नहीं करती? मैं हमेशा कहती हूँ कि मेरा कार्य है क्रिया करना, प्रतिक्रिया दूसरों के लिए छोड़ रखी है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;एक छोटा सा उदाहरण देती हूँ, मेरे द्वारा आयोज्‍य एक कार्यक्रम में कुछ लोग उपद्रव करने की मंशा से आए थे। मंच से एक विद्वान ने कह दिया कि हमारे जमाने में विश्‍वविद्यालय में रौनक रहती थी। बस फिर क्‍या था, उपद्रव प्रारम्‍भ। प्रश्‍नों के बाण आने लगे कि क्‍या वर्तमान में ताले लगे हैं? कुछ देर तक मैं तमाशे का आनन्‍द लेती रही और अन्‍त में मैंने कहा कि आज आप लोगों की प्रतिक्रिया देखकर मन प्रसन्‍न हो गया क्‍योंकि न जाने कितने बरसों तक एक वर्ग बेचारा प्रतिक्रिया करता था और आप लोग प्रसन्‍न होते थे आज पहली बार हमें अवसर मिला है कि आप हमारी बात पर प्रतिक्रिया कर रहे हैं तो यह प्रसन्‍नता की बात है। शान्ति छा गयी। आज ऐसी ही प्रसन्‍नता फिर हो रही है कि अब तो प्रतिक्रिया में उपवास भी होने लगे हैं। कहीं ऐसा नहीं हो कि गांधी जी की तरह कोई व्‍यक्ति लंगोटी धारण कर ले और ये सरकारी नेता भी कहे कि हम भी अब केवल लंगोटी ही पहनेंगे। जनता तय करे कि असली फकीर कौन? लेकिन ऐसा होता नहीं दिखता। यहाँ तो होड़ लगी है कि खाई कितनी चौड़ी हो। जनता के पास से खाने के दाने भी छीन लो और इन सरकारी नेताओं का धन हजारों में नहीं और ना ही लाखों में बस करोड़ों में प्रतिवर्ष बढ़ता रहे और जनता और नेताओं के बीच की खाई का विस्‍तार होता रहे। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;जनता तो बेचारी हो गयी है, कभी किसी के डंक से आहत होती है और कभी किसी के। अब राजनेताओं के डंकों से आहत हो रही है। कभी पेट्रोल के दाम के माध्‍यम से तो कभी मंहगाई के डंक से। ये सारे डंक भी बिच्‍छू के जहर जैसे ही हैं, दो-तीन दिन रोना-पीटना रहता है फिर आदत सी हो जाती है। जनता निकल पड़ती है अपने काम को फिर नए डंक की तलाश में। हमने तो सरकारी मंहगाई को भी प्राकृतिक आपदा मान लिया है की कभी सूखा और कभी अतिवृष्टि। बस प्रतिक्रिया मत करो और अपना काम करते रहो। पेट्रोल के लिए जेब आज्ञा नहीं देती तो सार्वजनिक वाहन का उपयोग करो और मंहगाई की मार से प्‍याज का तड़का नहीं लगा स‍कते तो केवल जीरा ही बहुत है, पेट भरने को। स्‍वाद में वैसे भी क्‍या धरा है? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;u&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #3366ff; font-family: Mangal; font-size: 14.0pt;"&gt;विशेष नोट &lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color: #3366ff; font-size: 14.0pt;"&gt;–&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;u&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #3366ff; font-family: Mangal; font-size: 14.0pt;"&gt; कई दिनों से बाहर प्रवास पर रहने के कारण कोई पोस्‍ट नहीं लिखी गयी थी तो सारी भंडास एक साथ ही निकाल दी गयी है। आप चाहें तो प्रतिक्रिया कर स‍कते हैं। &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color: #3366ff; font-size: 14.0pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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वे बिल्‍कुल ही नजदीकी बनाकर बोल रहे थे तो उन्‍हें उपेक्षित भी नहीं किया जा सकता था। लेकिन मैंने इस बार चर्चा में भागीदारी करने से अच्‍छा सुनने को प्राथमिकता दी। वे लगातार बोले जा रहे थे कि ये सारे जनता के सेवक हैं इन्‍हें काम करना चाहिए। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;ऊपर की बर्थ पर जो सज्‍जन लेटे थे वे रामपुर में ही कोई अधिकारी थे। उनके आने और जाने वाले फोन से पता लग रहा था। अब जब उन्‍होंने सेवक कह दिया तो अधिकारी महोदय को जवाब देना ही था। वे बोले कि नहीं नहीं सब बेकार की बात है। संसद सर्वोपरी है। अब वे भी नीचे की बर्थ पर आ चुके थे। कुछ देर तक ऐसे ही बातों का सिलसिला चलता रहा। अब जैसा कि कांग्रेस की आदत है कि सर्वप्रथम दूसरे का चरित्रहनन करो वैसे ही स्‍वर में वे अधिकारी बोले कि आप वोट कास्‍ट करते हैं? वे शायद उनका प्रश्‍न समझ नहीं पाए या सुन नहीं पाए। बस अधिकारीजी का बोलना शुरू हो गया कि वोट देते नहीं और रईसों की तरह चाय की टेबल पर चर्चा करते हैं। लेकिन तभी उन सज्‍जन ने उनका भ्रम तोड़ दिया कि वोट तो सभी देते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अब दूसरा प्रश्‍न जो इस आंदोलन में अक्‍सर उठा कि जनता भ्रष्‍ट है, अन्‍ना के आंदोलन में जो आ रहे हैं पहले वे अपना चरित्र देखें। उन्‍होंने दूसरा प्रश्‍न दाग दिया कि आप क्‍या करते हैं? उन सज्‍जन ने बताया कि व्‍यापारी हूँ, कपड़े का धंधा है। बस फिर क्‍या था? आप इनकम-टेक्‍स देते हैं? देते हैं तो पूरा देते हैं? आदि आदि। उन्‍होंने कहा कि मेरा 80 लाख का कारोबार है और पूरे हिसाब से टेक्‍स देता हूँ। वे सज्‍जन जितने विश्‍वास के साथ बोल रहे थे उससे कहीं भी नहीं लग रहा था कि वे झूठ बोल रहे हैं। आखिर अधिकारीजी का वार खाली चले गया और वे निरूत्तर हो गए। एक मौन छा गया। तभी उन व्‍यापारी सज्‍जन ने बताया कि मेरा एक बेटा इनकम टेक्‍स कमीश्‍नर है। हमारे यहाँ दादाजी के समय से कई बार छापे पड़ चुके हैं लेकिन आजतक भी एक पैसे की भी गड़बड़ नहीं निकली। अब तो अधिकारीजी के पास बोलने को कुछ नहीं था।&lt;span&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;जनलोकपाल के कारण अधिकारी और राजनेता बौखलाए हुए से हैं। वे स्‍वयं को सेवक सुनने के आदि नहीं हैं। वे तो स्‍वयं को मालिक मान बैठे हैं। इसलिए व्‍यापारी को तो वे बेईमान ही मानकर चलते हैं। इन व्‍यापारियों को ही सर्वाधिक वे निशाना भी बनाते हैं। बेचारे मरता क्‍या न करता की तर्ज पर इन्‍हें हफ्‍ता भी देता है। लेकिन रेल यात्रा में एक आम आदमी का दर्द उभरकर सामने आ जाता है। मुझे उन व्‍यापारी सज्‍जन पर हँसी भी आ रही थी कि वे अपनी बात कहने के लिए कितने उतावले हो रहे थे। शायद व्‍यापारी वर्ग को तो पहली बार बोलने का अवसर मिला होगा कि वे भी अपना दर्द सांझा करे। व़े जिस अंदाज में बोले थे कि राहुल गांधी को बोलना चाहिए था वह अनोखा था। शायद उनकी बात सुन ली गयी थी और राहुल गांधी उवाच भी हुआ और यदि ना बोले होते तो कुछ छवि बची रह जाती। खैर जो हुआ अच्‍छा ही हुआ। मुझे तो इस बात की खुशी है कि आज के पंद्रह वर्ष पूर्व मैंने इस विषय पर लिखना प्रारम्‍भ किया था कि कानून सभी के लिए बराबर हो और इस कारण लोकपाल बिल शीघ्र ही पारित हो। ऐसा लोकपाल बिल जिसमें प्रत्‍येक सरकारी कर्मचारी और प्रत्‍येक राजनेता कानून के सीधे दायरे में आएं और देश से राजा और प्रजा की बू आना बन्‍द हो। इसलिए अन्‍ना हजारे और उनकी टीम को बधाई कि उन्‍होंने एक सफल आंदोलन को अंजाम दिया। लेकिन अभी केवल लोकतंत्र की ओर एक कदम बढ़ाया है मंजिल अभी दूर है। न जाने कितने कठिन दौर आएंगे बस जनता को जागृत रहना है। विवेकानन्‍द को स्‍मरण करते हुए &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; उत्तिष्‍ठत जागृत प्राप्‍य वरान्निबोधत।&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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कब तक लातों के सहारे इनकी अकड़ को काबू में रखा जाएगा? ये तो अपनी स्‍वतंत्रता चाहेंगे ही ना। अब देखो ना ये कहते हैं कि हमें स्‍वतंत्रता दो और अर्गलाएं कहती हैं कि तुम स्‍वतंत्रता नहीं स्‍वच्‍छन्‍दता मांग रहे हो।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हमारी वर्तमान सरकार की भी यही स्थिति है। आम जनता और सरकार के बीच यही कसमकस मची है। अन्‍ना हजारे रूपी बौछारे आ रही हैं और आम आदमी को लग रहा है कि आजादी के बाद पहली बार किसी ने आम आदमी के लिए प्रेम की बरसात की है। उसे बताया है कि तुम इस देश के मालिक हो। अभी तक तो हम यही समझे थे कि जनता तो बेचारी गुलाम ही रहती है, कभी परायों की और कभी अपनों से। हम भी मालिक हैं, यह सुनकर तो शरीर में झुरझुरी सी होने लगी। वैसे जब भी देश में चुनाव होते हैं, नेता लोग कहते हैं कि हमें सेवा का अवसर दीजिए। लेकिन यह नहीं सुना था कि आप मालिक हैं और हमें आपकी सेवा का अवसर दीजिए। वे तो इतना कहते थे कि देश की सेवा का अवसर दीजिए। अब देश का तो मूर्त स्‍वरूप दिखायी देता नहीं तो बेचारे किस की सेवा करते, स्‍वयं की सेवा को ही उन्‍होंने कर्तव्‍य समझ लिया। लेकिन अब तो समझ आ रहा है कि देश की मूर्त स्‍वरूप जनता रूपी हम है और हमारी सेवा के लिए ही ये नियु‍क्‍त हैं। घर के बाहर झांककर भी देखा कि देखें तो सही कि आखिर कौन नियुक्‍त है हमारी सेवा को? एक बार हमारे शहर में देश के सबसे बड़े सेवक पधारे। लगा कि आज तो जनता दरबार लगेगा। जनता के दरवाजे जाकर पूछा जाएगा कि आपको कोई तकलीफ तो नहीं है? लेकिन उस दिन तो सारा शहर ही मानो कर्फ्‍यूग्रस्‍त हो गया। लाट साहब नहीं वर्तमान में लाट साहिबा है कि सवारी निकलेगी इसलिए सभी रास्‍ते, चौराहे बन्‍द कर दिये गए। जनता को मुनादी करा दी गयी कि कोई सड़क पर नहीं निकले। दिन भर शहर में गस्‍त चलती रही, और बेचारी जनता को समझाया जाता रहा कि आज तुम्‍हारी मालकिन आयी है। अब आप ही बताइए कि अन्‍ना जी की बात पर विश्‍वास करें तो कैसे करें? दिन में कई बार चिकौटी काटकर देख लेते हैं कि सपना तो नहीं है? लेकिन अभी तक तो सच ही लग रहा है। अभी कुछ दिन पहले भी बहुत खुश हुए थे कि देश का खजाना जो बाहर जमा है, आने वाला है लेकिन रातों-रात सपनों को तोड़ दिया गया। देश में ऐसा गदर मचाया गया और ठोक-ठोक के बता दिया गया कि तुम जनता ही हो, मालिक नहीं अत: अपनी औकात में रहो। इसलिए अब देखों कि आम जनता कब ठुकती है बस इसी बात का इन्‍तजार है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मैं तो मेरे नमी से सरोबार दरवाजे को देख रही हूँ, उसकी अकड़ को समझा भी रही हूँ कि अपनी औकात में आ जाओ नहीं तो अभी लातों के सहारे तुम्‍हें चौखट में बन्‍द किया जाता है नहीं मानोंगे तो आरी से छील दिए जाओगे। थोड़ी सी छिलाई हुई और सारी अकड़ समाप्‍त। मालिक बनने का भ्रम पालने का नतीजा जल्‍दी ही समझ आ जाएगा, मुझे तो समझ आ गया है। अभी जनता जनार्दन को भी आ ही जाएगा। फिर भी आशा तो लगी ही है शायद कुछ चमत्‍कार हो जाए? आप लोग क्‍या कहते हैं? &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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हमने आवाज की तरफ पलटकर देखा। साइड लोअर बर्थ के पास एक विदेशी महिला खड़ी थी, जिसने लगभग चार इंच की हील वाली चप्‍पल पहन रखी थी। मानो वह युधिष्ठिर की तरह धरती से ऊपर चलना चाह रही हो। उसने अपने पैर को जो हील वाली चप्‍पल से घिरा था, जोर से धम से पटका। हम समझ गए कि यह धमक देशी नहीं विदेशी ही है। अब उसके हाथ में मोबाइल था और वह पूरी मेघ गर्जना के साथ फोन पर किसी पर बिजली गिरा रही थी। उसके साथ एक वृद्ध व्‍यक्ति भी थे और बाद में आता जाता एक किशोर वय का बालक भी दिखायी दिया। उसे पूरे हिन्‍दुस्‍थानी तर्ज पर चिल्‍लाते देख शहनवाज ने कहा कि आपका सफर कैसा रहेंगा? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;वह शायद अपने एजेण्‍ट पर चिल्‍ला रही थी, कि उसने ढंग की बर्थ नहीं दिलायी और इस कारण उसके बेटे को भी साथ-साथ बर्थ नहीं मिली। लेकिन उसका प्रकोप शान्‍त नहीं हुआ। एक बार तो मन किया कि उसकी फोटो ले जी जाए, लेकिन फिर डर भी लगा कि कहीं मेरे ही ना चिपट जाए? हमारे साथ ही दो चाइनीज लड़किया भी थी, वे भी अपनी भाषा में बोलकर आनन्‍द ले रही थी। मेरे आसपास और कोई नहीं था, एक महिला कुछ देर से आयी लेकिन वह भी बातों में रुचि प्रदर्शित नहीं कर रही थी। सुबह जाकर पता लगा कि वह अपनी छोटी सी नातिन को छोड़कर आयी है इसलिए अनमनी सी थी। इसलिए मैं प्रतिक्रिया के आनन्‍द से वंचित थी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अक्‍सर बात होती रहती है अमेरिका की, दूसरे दिन ही वाराणसी में एक मित्र के यहाँ जाना था। वहाँ उनकी एक रिश्‍तेदार जो दुबई में रहती हैं, से मुलाकात हो गयी। बातों ही बातों में पता चला कि दुबई में भी अमेरिका की तरह ही ना बच्‍चे रोते हैं और ना ही कुत्ते भौंकते हैं। यदि बच्‍चे रोते हैं तो समझो हिन्‍दुस्‍थानी है। हिन्‍दुस्‍थान में भी देखा है कि हिन्‍दी भाषी बेल्‍ट ही ज्‍यादा मुखर और&lt;span&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;प्रखर दिखायी देती है। मैं उस समय ट्रेन में सोच रही थी कि अमूमन विदेशी यात्री शान्‍त होते हैं। वे अक्‍सर अपनी नींद पूरी करने में ही यकीन रखते हैं। लेकिन वह महिला अपने गुस्‍से पर काबू ही नहीं पा रही थी। दो-एक घण्‍टे बाद रात्रि-भोज का आदेश लेने वेटर आया तो उसके सहयात्री बुजुर्ग व्‍यक्ति ने जो शायद उसका पति ही था ने वेटर से हिन्‍दी में बात की। तब उस महिला ने भी कुछ शब्‍द हिन्‍दी में बोले। मैंने अपनी चुप्‍पी पर राहत की साँस ली। यदि अन्‍य कोई सहयात्री होता तो मैं अवश्‍य ही हिन्‍दी में कुछ न कुछ टिप्‍पणी अवश्‍य करती। और फिर? रात्रि को जब सोने का अवसर आया तब भी उस महिला ने अपनी ऊपर वाली बर्थ का उपयोग नहीं किया और दुख-सुख के साथ बड़बड़ाती हुई एक छोटी सी साइड लोअर बर्थ पर ही दोनों ने अपना आसरा बनाया। मैने लाइट बन्‍द करनी चा‍ही तो उसकी गुर्राहट फिर उभरी- नो नो। मैंने अपना पर्दा खींचा और सोने में ही भलाई समझी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #ff6600; font-family: Mangal; font-size: 14.0pt;"&gt;लेकिन मुझे इस तथ्‍य से ज्ञान प्राप्ति अवश्‍य हो गयी थी कि आम तौर पर शान्‍त रहने वाले ये विदेशी हिन्‍दी भाषी होने के कारण ही शायद चमक-धमक रहे हैं। इतना तेवर नहीं तो आया कहाँ से?&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; वाराणसी पहुंचने तक उसके तेवर वैसे ही बने रहे। शाहनवाज भाई बस ऐसा ही कटा मेरा सफर। खुशदीपजी ने भी मेरी पिछली पोस्‍ट में पूछा था कि उस विदेशी महिला का क्‍या हाल रहा तो मैंने सोचा यह यात्रा वृतान्‍त भी लिख ही दो। &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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कुछ देर वे चुपचाप सुनते रहे, फिर मुझे लगा कि बेकार की बहस में समय जाया हो रहा है और बेग महाशय चुपचाप अपनी जगह विराजमान ही हैं। मैंने उनसे कहा कि पहले बेग उठाओ और इसे और कहीं रख दो। टीसी बेमन से उसे उठाकर ले गया। कुछ देर बाद ही खबर आयी कि उसमें कुछ नहीं है। दो-तीन पुलिस वाले भी अपनी बंदूक लिए परिक्रमा करने चले आए थे। हम सभी ने पूछा कि आप लोग तो कभी दिखायी देते नहीं फिर अब कैसे? वे बोले कि हमारा एसी कोच में आना मना है। यह भी मजेदार बात है, जेसे पुलिस वालों को कह रखा हो कि आप लोग एसी डिब्‍बे में चौथ-वसूली नहीं कर सकते इसलिए आपका वहाँ जाना वर्जित है? खैर वे भी परिक्रमा पूरी करके जा चुके थे और बातों का सिलसिला फिर शुरू हो चुका था। क्‍योंकि भला बाते जब शुरू हो जाएं तो कहीं जल्‍दी से थमती हैं क्‍या? फिर चाहे डिब्‍बा एसी हो या नान एसी। एक शंका यह भी जतायी जा रही थी कि कहीं उस पेसेन्‍जर के साथ कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी? इसीलिए वह दो घण्‍टे से गायब है। बातों का बतरस बहते हुए आखिर इलाहाबाद आने लगा। तभी वह महिला यात्री प्रगट हो गयी। अब तो तमाशा हो गया। वह महिला 14 नम्‍बर बर्थ वाली बोली कि क्‍या मैं आपको आतंककारी दिखती हूँ? अरे भाई क्‍या आतंककारी के दो सींग लगे होते हैं? फिर उसकी अकड़ बढ़ने लगी और बोली कि मैं कहीं भी जाकर बैठूं क्‍या जरूरी है कि बताकर जाऊँ? अभी उसकी आवाज का सुर तेजी पकड़ने ही लगा था कि इलाहाबाद आ गया और गाड़ी रूकते ही धड़ाधड़ पुलिस वाले अपनी लकदक वर्दी में आने लगे। हमारी बर्थ 9 नम्‍बर थी तो पहलं वहीं से गुजरे। हमने बता दिया कि खतरे की कोई बात नहीं हैं, लड़की आ गयी है। उन्‍होंने चैन की सांस ली। अब पुलिस को देखकर लड़की की सिट्टी-पिट्टी गुम। आखिर उसके साक्षात्‍कार के साथ उसका पता-ठिकाना नोट कर लिया गया। शिकायत दर्ज कराने वाली का भी नोट कर लिया गया। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इस सारी घटना से प्रश्‍न यह उगा कि ऐसी परिस्थिति में सहयात्री क्‍या करें? अपना सामान और वह भी केवल एक बेग को छोड़कर दो घण्‍टे तक दूसरे कोच में जाकर बैठना क्‍या शक पैदा नहीं करता? उस सहयात्री की शिकायत को गम्‍भीरता से लेना चाहिए या फिर वैसे ही बात का बतंगड बनाना कह देना चाहिए। आतंक की बढ़ती घटनाओं के कारण क्‍या हम सभी यात्रियों को सावधानी नहीं रखनी चाहिए? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कई दिनों से कोई पोस्‍ट नहीं लिखी थी, कल भी पुन: दिल्‍ली जाना है तो सोचा आज इसी पोस्‍ट से काम चला लिया जाए। वैसे दो घण्‍टे तक कोच में बड़ा ही सौहार्द का वातावरण रहा। लगा कि मुसीबत में ह‍म सभी को एक होने की आदत है नहीं तो स्‍वयं के खोल से बाहर नहीं आते हैं हम। देश पर हमला होता है तो हम सब एक हो जाते हैं नहीं तो वापस से अपने-अपने कुनबे का राग गाने लगते हैं। बस एक सीख मिली है कि अपने सामान की स्‍वयं ही सुरक्षा करें और दूसरे कोच में जाने से पूर्व यह अवश्‍य सोचें कि इससे अन्‍य यात्रियों में शक उत्‍पन्‍न हो सकता है। मैं तो कम से कम अवश्‍य ध्‍यान रखूंगी, क्‍या आप भी इस बात का ध्‍यान रख पाएंगे?&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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- अजित गुप्‍ता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बहुत दिनों पूर्व एक कहानी पढ़ी थी, अकस्‍मात उसका स्‍मरण हो आया। कहानी कुछ यूँ थी &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; एक व्‍यक्ति एक गाँव में जाता है, एक परिवार का अतिथि बनता है। उस परिवार में विवाह योग्‍य एक लड़की है लेकिन वह बहुत ही कमजोर और बीमार से थी इस कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा है। उस गाँव में एक प्रथा थी कि विवाह के समय लड़का जिस भी लड़की से विवाह करना चाहता था, वह उस लड़की को अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार गाय भेंट में दिया करता था। जितनी गायें दी जाती थी समझो लड़की उतनी ही सुन्‍दर है। उस असुन्‍दर लड़की के भविष्‍य की चिंता करते हुए वह व्‍यक्ति गाँव से लौट आया। कुछ बरसों बाद वह व्‍यक्ति पुन; उस गाँव में गया। इस बार वह एक युवक के यहाँ अतिथि था। उस युवक ने कुछ समय पूर्व ही विवाह किया था और अपनी होने वाली पत्‍नी को 100 गायें भेंट में देकर विवाह किया था। निश्चित ही वह लड़की सुंदरता में सानी नहीं रखती होगी। युवक ने कहा कि मैंने इस गाँव की सबसे सुन्‍दर लड़की से विवाह किया है। उस व्‍यक्ति को उसकी पत्‍नी को देखने की उत्‍सुकता बढ़ गयी। कुछ ही देर में एक लड़की घर के अन्‍दर से उस अतिथि के लिए शरबत बनाकर लायी। वास्‍तव में वह बहुत ही सुन्‍दर थी। अतिथि ने उसे पास से देखा और देखकर उसे लगा कि इसे मैंने पहले कहीं देखा है। उसकी मुखमुद्रा देखकर उस युवक ने बताया कि यह वही लड़की है जिसे कभी असुन्‍दर कहा जाता था। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आखिर यह चमत्‍कार कैसे हुआ? अतिथि की जिज्ञासी बढ़ चुकी थी। युवक ने कहा कि मैं चाहता था कि मेरी पत्‍नी इस गाँव की सुन्‍दरतम लड़की हो इसलिए मैंने इस लड़की को पसन्‍द किया और उसे 100 गायें भेंट में दी। इस लड़की का आत्‍मविश्‍वास लौट आया और आज यह आपके समक्ष खड़ी है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इसी संदर्भ में एक बात और ध्‍यान आ रही है कि आप देखते होंगे कि जब युवक और युवतियां शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं तब अक्‍सर वे सामान्‍य ही दिखते हैं। बहुत ही कम युवा ऐसे होते हैं जो खूबसूरत दिखते हैं। साधारण परिवार के युवा अक्‍सर साधारण ही दिखते हैं। लेकिन जैसे ही उन्‍हें नौकरी मिलती है, उनके चेहरे पर एक चमक आ जाती है। विवाह के बाद तो यह चमक दुगुनी हो जाती है। ऐसा क्‍यों होता है? शिक्षा लेते समय हम परिवार के अधीन होते हैं और हमेशा हमारा आकलन कम ही किया जाता है। 90 प्रतिशत नम्‍बर आने के बाद भी कहा जाता है कि नहीं और मेहनत करो। हमारे जमाने में परिवार में अविवाहित बच्‍चों की कोई विशेष कद्र नहीं होती थी, आज अवश्‍य वे वीआईपी बने हुए हैं। लेकिन आज भी उनके परामर्श को बहुत गम्‍भीरता से नहीं लिया जाता इसलिए उनके अन्‍दर स्‍वाभिमान जागृत ही नहीं हो पाता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लेकिन जब ये ही युवा नौकरी पर जाते हैं और वहाँ बहुत सारे निर्णय स्‍वयं को करने होते हैं तब उनका आत्‍म सम्‍मान जाग उठता है और उनका व्‍यक्तित्‍व निखर उठता है। इसी प्रकार विवाह हो जाने के बाद लड़के और लड़की दोनों को ही कोई चाहने वाला मिल जाता है इस कारण उनका व्‍यक्तित्‍व निखर जाता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;एक बात आप सभी ने गौर की होगी कि जब भी परिवार में या मोहल्‍ले में कोई भी नव-वधु आती है तब उसे बच्‍चे घेरे रहते हैं। कोई घूंघट के अन्‍दर झांकने के लिए नीचे झुकता है तो कोई समीपता पाने के लिए एकदम पास आकर बैठता है। हमने भी ऐसा ही किया था और हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ था। नव-वधु की कल्‍पना हमारे अन्‍दर बसी हुई है। साड़ी में लिपटी हुई, हाथ चूड़ियों से भरे हुए, माथे पर सिंदूर, गहने और चेहरे पर नवीनता। हमारे देश में एक लड़की का यही रूप बरसों तक रहता है। पुराने जमाने में तो जीवन भर यही रूप रहता था। पूरे घर में नवीनता रहती थी। शायद ही कोई वधु ऐसी हो जो दिखने में कुरूप लगती हो, सभी पहनने-ओढने के बाद सुन्‍दर ही दिखती थी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लेकिन अब युग बदल गया है। नयी-वधु की सुन्‍दरता एक दो दिन से ज्‍यादा रहती नहीं। उसकी साड़ी, उसकी बिन्‍दी, चूड़ियां सभी गायब हो जाती है। एक साधारण सी लड़की में बदल जाता है उसका व्‍यक्तित्‍व। कई बार तो लगता है कि यह लड़की विवाह के पूर्व ही ज्‍यादा सलीके से रहती थी। एक बार मैंने एक लड़की से पूछ लिया कि बिन्‍दी क्‍यों नहीं&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;लगाती हो? तो कहने लगी कि मैं ही विवाहित क्‍यों दिखायी दूं जबकि लड़कों के भी तो कोई विवाहित होने का चिन्‍ह नहीं होता? बात तो उसकी जायज थी लेकिन अविवाहित क्‍यों दिखना चाहती हैं, इस बात का उत्तर नहीं था। क्‍या अवसर मिलते ही दूसरा विवाह करने की फिराक में है? या विवाह होने के बाद भी विवाहेत्तर सम्‍बन्‍ध बनाने में परहेज नहीं है? मुझे इस प्रश्‍न का उत्तर समझ नहीं आता कि आखिर लड़कियां विवाह के बाद भी अविवाहित ही दिखना क्‍यों चाहती हैं? वे साधारण सी लड़की क्‍यों बनी रहना चाहती हैं? मुझे तो पहनी-ओढी वधुएं बहुत अच्‍छी लगती हैं, जब मेरी बहु और बेटी किसी विवाह समारोह के लिए सजती हैं तो कितनी प्‍यारी लगती हैं लेकिन आम दिनों में? मैं मानती हूँ कि आजकल नौकरी का दवाब इतना है कि बस जेसे-तैसे काम चला लिया जाता है। लेकिन नौकरी तो हमारे जमाने में भी होती थी, फिर ऐसा क्‍या हो गया आज? इसका उत्तर मेरे पास नहीं है, शायद आप लोगों के पास हो।&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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font-size: 13.0pt;"&gt;द्वानों से मिलना होता है, उनका लिखा पढ़ने को मिलता है। कुछ विद्वान ऐसे हैं जिनके शब्‍द सीधे हृदय में उतर जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनके शब्‍द मस्तिष्‍क में उहापोह मचा देते हैं। ऐसे जटिल और नीरस शब्‍दों का ताना-बुना बुनते हैं कि कुछ देर दिमाग माथापच्‍ची करता है फिर झटककर दूर कर देता है। अहंकार और दम्‍भ उनके शब्‍द-शब्‍द में भरा रहता है। वे हर शब्‍द से यह सिद्ध करने पर तुले होते हैं कि मेरे जैसा विद्वान दूसरा कोई नहीं। विद्वानों का सान्निध्‍य कौन नहीं चाहता, मैं भी सदैव चाहती हूँ, इसलिए यहाँ ब्‍लाग पर भी उन्‍हें ढूंढती रहती हूँ। लेकिन कुछ विद्वान अपने सामने एक दम्‍भ की दीवार तान लेते हैं। आप कैसा भी प्रयास करें लेकिन उस दीवार को ना भेद पाते हैं और ना ही जान पाते हैं। एक आलेख कुछ दिन पूर्व लिखा था, उसे ही यहाँ आप सभी के अवलाकनार्थ प्रस्‍तुत कर रही हूँ। आपकी प्रतिक्रिया की अभिलाषा में। &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;दम्भ की दीवार&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style="mso-tab-count: 1;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;तुम्हारे व्यक्तित्व से प्रभावित होकर मुझे लगा कि विचार शून्य सी इस दुनिया में कुछ क्षण तुम्हारे शब्दों से अपने मन को भिगो लूं। फिर तुम इतने अप्राप्य भी नहीं थे कि मैं तुम तक नहीं पहुँच सकूं। तुम मेरे सामने थे&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मैंने तुम्हारे सान्निध्य के लिए जैसे ही तुम्हें पुकारा&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तुमने मेरी तरफ उपेक्षा से देखा। मैं फिर भी तुम्हारे शब्दों के जादू से खिंची हुई तुम्हारी तरफ बढ़ती रही। जैसे ही मैं और तुम संवाद की मियाद में आए&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अचानक मेरा सिर लहुलुहान हो गया। मैं एक ऐसी पारदर्शी दम्भ की दीवार से टकरा गयी थी जिसने मुझे क्षत विक्षत कर दिया था। मुझे अपना व्यक्तित्व तुम्हारे सामने एकदम बौना लगने लगा। बौना इस मायने में नहीं कि मुझमें और तुम में बहुत बड़ा अंतर था&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बौना इस मायने में कि मेरी सहजता और तुम्हारे दम्भ में बहुत फासले थे। मैं यह भी जानती हूँ कि तुम्हारी दीवार से केवल तुम्हारा ऊपरी शरीर आवृत्त है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तुम्हारे पाँव तो सबको मूक निमंत्रण देते हैं। उन्हें मैं आसानी से छू सकती हूँ। शायद उनको छूने के बाद ही तुम्हारा सान्निध्य मुझे मिल सके। मैंने एकाध बार कोशिश भी की यदि तुम्हारे दम्भ की दीवार पाँवों के स्पर्श से ही सरकती है तो क्या हर्ज है। लेकिन तब यह दीवार और मोटी होकर मेरे सामने आ गयी। मैंने फिर भी हठ नहीं छोड़ी&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मुझे लगा शायद एक दिन यह दीवार पिघल जाएगी। तुम्हारे दम्भ की दीवार से तुमको अनावृत्त करने के लिए मैंने मौन धारण कर लिया और तुम्हारे सम्भाषण को एकाग्र मन से सुना। लेकिन जैसे जैसे मैं तुम्हारे सामने मौन होती चली गयी वैसे वैसे तुम्हारा दम्भ घटने की जगह बढ़ता चला गया। तब मुझे लगा कि मेरे मौन होने से तुम्हारा दम्भ नहीं घटेगा। ना मेरा मौन और ना मेरे सहज शब्द इस दीवार को पिघला पाए थे। मुझे दीवार के पीछे खड़े तुम भी प्यासे ही दिखायी दे रहे थे। मैं देख रही थी कि तुम्हारी प्यास बढ़ती जा रही है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तुम्हारे शब्द तुम्हारे अंदर घुट कर तुम्हें मानसिक त्रास दे रहे हैं। उन्हें चाहिए एक ऐसा मित्र जिसे वे अपना शिल्प बता सकें। लेकिन तुम्हारे दम्भ की दीवार के कारण वे भी घुट रहे थे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style="mso-tab-count: 1;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;तुम ऐसे अकेले नहीं हो&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;जो शब्दों का भण्डार लेकर अपने आपको एक दीवार से आवृत्त करके बैठे हो। कभी तुमने आधुनिक कार्यस्थल देखें हैं&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;एक बड़े से कक्ष में सभी कर्मचारियों के लिए कांच के केबिन बने होते हैं जो नीचे और ऊपर से खुले होते हैं। बस सभी दीवारों से पृथक होते हैं। ऐसे ही आज&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तुम जैसे बुद्धिजीवी अपने अपने केबिन में बैठे हैं। जब तुम्हारा मन करता है किसी से बतियाने का&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तब तुम किसी केबिन वाले से ही बात कर पाते हो। तुम भी दीवार से आवृत्त और वे भी आवृत्त। मेरे जैसे व्यक्तित्व अपने साथ दीवारें नहीं रखते&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बस रखते हैं एक झोला जिसमें कुछ शब्द होते हैं जो आम आदमी अपने सुख और दुख में बोल लेता है। मैं उन्हीं शब्दों को लोगों में बांटती रहती हूँ। तुम्हारी आँखों से जब कोई बूंद कभी लुढ़क जाती होगी तब तुम्हारी बच्ची के नन्हें हाथ और उसके तोतले शब्दों से ही तुम्हें सहारा मिला होगा। क्यों अपने आपको तुमने भारी भरकम शब्दों के आवरण में कैद कर रखा है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;क्यों तुम्हें लगता है कि ये ही शब्द लोगों को सहारा देंगे&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;क्यों नहीं तुम आम जन की भाषा से अपने आपको भिगो पाते हो&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आओं हम सब के साथ मिलकर बैठो&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;शब्दों की निर्झरणी को स्वतः ही बहने दो। उन्हें हिमखण्डों में मत बदलो। अपने आपको दम्भ की दीवार से अनावृत्त करो। मेरे जैसे अनेक लोग तुम्हारे पास शब्दों की पूंजी लेने आएंगे उन्हें दो&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;उनके लिए सहज सुलभ बनो तुम। तुम्हारी सहजता से हमारे हाथ ही नहीं हमारा मन भी तुम्हारे पाँवों को चूमेगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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   &lt;/script&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5543246866765877657-5039554914624466275?l=ajit09.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ajit09.blogspot.com/feeds/5039554914624466275/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5543246866765877657&amp;postID=5039554914624466275' title='56 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default/5039554914624466275'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default/5039554914624466275'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ajit09.blogspot.com/2011/06/blog-post_14.html' title='दम्‍भ की दीवार - अजित गुप्‍ता'/><author><name>ajit gupta</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02729879703297154634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_jm9w3syumo4/S7mJg_5YHQI/AAAAAAAABo0/-LFkHcxkUCU/S220/Copy+of+DSC_0198.JPG'/></author><thr:total>56</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5543246866765877657.post-2926721157802078932</id><published>2011-06-03T22:30:00.000+05:30</published><updated>2011-06-03T22:30:06.656+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरा मन'/><title type='text'>सुकून आता जाएगा - अजित गुप्‍ता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;वर्तमान में हम सब प्रेम के लिए तरस उठते हैं, सारे सुख-सुविधाएं एक तरफ हो जाती हैं और प्रेम का पलड़ा दूसरी तरफ हमें बौना सिद्ध करने पर तुला रहता है। कुछ दिन पूर्व एक आलेख लिखा था, आज उसका स्‍मरण हो आया। कारण भी था कि कुछ पोस्‍ट ऐसी पढ़ी जिसमें उहापोह था, शायद मेरे मन में भी था, इसलिए वे पोस्‍टे मन को छू गयी और सोच में डाल गयी कि क्‍यों इंसान सब कुछ पाने के बाद भी प्रेम से वंचित क्‍यों रह जाता है? इस वंचना से बचने का भी कोई उपाय है क्‍या? अधिक भूमिका नहीं बांधते हुए सीधे ही आलेख पढ़ा देती हूँ। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #993300; font-family: Mangal; font-size: 16.0pt;"&gt;सुकून आता जाएगा&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color: #993300; font-size: 16.0pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style="mso-tab-count: 1;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;कई दिनों से मन में एक उद्वेग उथल पुथल मचा रहा है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लेकिन समझ नहीं आ रहा कि क्या है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तभी डॉक्टर पति के पास एक बीमार आया&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;उसे फूड पोइजनिंग हो गयी थी और वह लगातार उल्टियां कर रहा था। मुझे मेरी उथल पुथल भी समझ आ गयी। दिन रात मनुष्यता को समाप्त करने वाला जहर हम पीते हैं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;शरीर और मन थोड़ा तो पचा लेता है लेकिन मात्रा अधिक होने पर फूड पोइजनिंग की तरह ही बाहर आने को बेचैन हो जाता है। मन से निकलने को बेचैन हो जाता है यह जहर। कुछ लोग गुस्सा करके इसे बाहर निकालते हैं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कुछ लोग झूठी हँसी हँसकर बाहर निकालने का प्रयास करते हैं और हम स्याही से खिलवाड़ करने वाले लोग स्याही को बिखेर कर अपनी उथल-पुथल को शान्त करते हैं। बच्चा जब अपने शब्द ढूंढ नहीं पाता तब वह स्याही की दवात ही उंडेल देता है। शब्द भी पेड़ों से झरे फूलों की तरह होते हैं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;वे झरते हैं और सिमट कर एक कोने में एकत्र हो जाते हैं। अच्छा मकान मालिक उन्हें झोली में भरता है और अपने घर में सजा लेता है। लेखक भी शब्दों को अपनी स्याही के सहारे पुस्तकों में सजा देता है। जैसे ही कमरे में फूलों का गुलदस्ता सजा दिया जाता है स्वतः ही वातावरण सुगंधित हो जाता है। वहाँ फैली घुटन&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;सीलन झट से बाहर भाग जाती है। ऐसे ही जब हम शब्दों को मन में सजाते हैं उन्हें कोरे पन्नों में उतारते हैं तब मन की घुटन और ऊब पता नहीं कहां तिरोहित हो जाती हैं। जीवन फिर खिल उठता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style="mso-tab-count: 1;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;आज एक कसक फिर उभर आयी। बचपन से ही मेरे पीछे पड़ी है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कभी भी छलांग लगाकर मेरे वजूद पर हावी हो जाती है। मैं नियति का देय मानकर सब कुछ स्वीकार कर चुकी हूँ लेकिन फिर भी यह कसक मेरे अंदर अमीबा की तरह अपनी जड़े जमाए बैठी है। जैसे ही अनुकूल वातावरण मिलता है यह भी अमीबा की तरह वापस सक्रिय हो जाती है। आदमी सपनों के सहारे जिंदगी निकाल देता है। बचपन में जब नन्हें हाथ प्रेमिल स्पर्श को ढूंढते थे तब एक सपना जन्म लेता था। हम बड़े होंगे अपनी दुनिया खुद बसाएंगे और फिर प्रेम नाम की ऑॅक्सीजन का हम निर्यात करेंगे। जिससे कोई भी रिश्ते में उत्पन्न हो रही कार्बन-डाय-आक्साइड का शिकार ना हो जाए। लेकिन यह कारखाना लगाना इतना आसान नहीं रहा। हवा इतनी दूषित हो चली थी कि आक्सीजन का निर्यात तो दूर स्वयं के लिए भी कम पड़ती थी। जैसे तैसे करके काम चलाते रहे। बच्चे बड़े होने लगे&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तब फिर सपना देख लिया। सपने में देखने लगे कि अब तो प्राण वायु का पेड़ बड़ा होगा और हमें भरपूर वायु मिलेंगी। लेकिन क्या&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हमने पेड़ बोना चाहा लेकिन बच्चे पंछी बन गए। वे हमारे पेड़ से उड़कर बर्फ की धवल चोटी पर बैठ गए। जहाँ उष्मा नहीं थी&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;थी केवल ठण्डक। हम फिर आक्सीजन के अभाव में तड़फड़ाने लगे। अब तो सपने भी साथ छोड़ने को आमादा हो गए। वे बोले कि तुम जिंदगी भर हमारा सहारा लेते रहे&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तुमने सच करके कुछ भी नहीं दिखाया। हम भला तुम्हारा साथ कब तक देंगे&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;और एक दिन उन्होंने बहुत ही रुक्षता के साथ हम से कह दिया कि नहीं अब नहीं होगा&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बाबा हमारा पीछा छोड़ो।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style="mso-tab-count: 1;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;हमने भी जिद ठान ली कि देखें सपने कैसे नहीं आते&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लेकिन सपनों ने नींद से दोस्ती कर ली। वे बोले सपने तभी देखोंगे ना&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;जब नींद आएगी&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हम नींद को भी अपने साथ ले जाते हैं। हम फिर भी हताश नहीं हुए। हमने कहा कि कोई बात नहीं हम खुली आँखों से सपना देखेंगे। लेकिन इतना सुनते ही सपने फिर हँस दिए&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;वे बोले कि दिन में जब भी खुली आँखों से सपना देखने की कोशिश करोगे तो नींद झपकी बनकर उसे तोड़ देगी। अब तुम उस संन्यासी की तरह हो जिस का तप भंग करने के लिए अप्सरा जरूर आएगी। अतः भूल जाओ सपने और कठोर धरातल पर जीना सीखो। यहाँ रिश्तों में जहरीली हवा ज्यादा है और प्रेम की ताजगी से भरी प्राण वायु कम है। तुम ने जिस प्राण वायु का कारखाना लगाना चाहा था वह भी तुम्हारे लिए नहीं रहा। तुम्हें तो उसी जद्दो-जहेद में अपनी जिंदगी निकालनी है। यदि हिम्मत को बटोर सको तो फिर जुट जाओ। लेकिन इस बार ध्यान रखना कि सपनों की दुनिया बसाने का अब समय नहीं है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;जो भी करना है ठोस धरातल पर खुली आँखों के सहारे करना है। रोज ही पीना है जहर और जब भी आत्मसात ना हो तब शब्दों के सहारे उन्हें उलट देना है। तुम्हारी बगियां की प्राण वायु शायद तुम्हारें लिए ना हो लेकिन उठो और खोजों शायद कहीं किसी की बगियां में थोड़ी प्राण वायु तुम्हारे लिए हो। विवेकानन्द की तरह हिम्मत मत हारो&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;जब तक प्रयत्न करते रहो जब तक कि मंजिल ना मिल जाए। बस शब्दों की निर्झरनी को बहाते रहो और अपने आप सुकून आता जाएगा&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आता जाएगा बस आता जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लोगों ने कहा कि प्रजा के मन से अभी तब उनका प्रभाव नहीं गया है। लेकिन आज स्वतंत्रता के 60 वर्ष बाद भी राजाओं के प्रति प्रजा को मोह समाप्त नहीं हुआ है। क्या कारण है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;एक तरफ राजाओं के प्रति दुष्प्रचार का अतिरेक है फिर भी प्रजा के मन से उनका मोह नहीं जाता&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आखिर इसका क्या कारण है&lt;/span&gt;? &lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;शाश्वत लेखन - राजाओं द्वारा निर्मित अनेक संग्रहालय देखें हैं। उनको देखने के बाद राजाओं की विलासिता ही उजागर होती रही है क्योंकि उनकी विलासिता के बारे में ही हमारी पीढ़ी ने पढ़ा है। इसलिए ही पुरानी पीढ़ी की भक्ति स्वतंत्रता के बाद जन्में व्यक्तियों के गले नहीं उतरती। लेकिन एक दिन अकस्मात ही मुझे उदयपुर महाराणा का पुस्तक संग्रहालय देखने का अवसर मिल गया। उदयपुर के पूर्व राजाओं द्वारा किए गए कार्यों का लेखा जोखा वहाँ शब्द रूप में संग्रहित है। एक एक मिनट का हिसाब लिखा गया है। राजा की दिनचर्या खुली किताब की तरह वहाँ संग्रहित है। उन्हीं पुरानी बही खातों को देखते हुए शब्द की ताकत का अंदाजा हुआ। जो भी शब्द लिखा जाता है वह एक दिन इतिहास बनता है और इतिहास बनकर वर्तमान को गुदगुदाता है। जब भी शब्द लिखा जाता है तब कितने लोगों को प्रेरणा देता है इसका अंदाजा शब्दों को अनुभूत करके ही किया जा सकता है। जब प्रजा राजा के बारे में जानती है तो अपनत्व का अनुभव करती है। जब मनुष्य भगवान के बारे में जानते हैं उन्हें साधारण मनुष्य की तरह किस्से कहानियों में पढ़ते हैं तब भगवान आत्मीय लगते हैं। हमने भगवान और राजा दोनों को ही अपने दिल में बसा कर रखा। बसाने का माध्यम बने ये शब्द। एक भगवान है केवल इतना लिख देने से आत्मीय भाव कैसे बनता&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;भगवान विष्णु है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;उनके साथ लक्ष्मी है। भगवान राम है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कृष्ण है उनका जीवन चरित्र हमारे सामने है और जीवन चरित्र सामने होने से आत्मीयता का निर्माण होता है। जब रामायण लिखी गयी और जब रामचरित मानस लिखा गया तब राम जन जन के प्रिय हुए। अतः राजा उतना ही लोकप्रिय होता है जितना वह जनता के समक्ष होता है। किसी कि जीवनी पढ़ते ही वह व्यक्ति हमारा आत्मीय बन जाता है अतः राजाओं की लोकप्रियता का एक कारण ये शब्द हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;दाता एवं रक्षक - राजाओं ने प्रजा को भगवान की तरह सुरक्षा भी दी। प्रजा का अंतिम सहारा राजा ही बनते थे। गाँव जलकर राख हो गए या बाढ़ में बह गए&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;राजा ही एक मात्र सहारा बनते थे। सुरक्षा का भार राजा पर ही था। युद्ध होते थे और हार जाने पर प्रभाव राजा पर ही पड़ता था। इसलिए भगवान के बाद राजा को ही प्रजा रक्षक मानती थी। उनके अत्याचारों को शैतान का रूप मानकर श्रेष्ठ राजा के आने का इंतजार करती थी। इसलिए भारत में जितने भी श्रेष्ठ राजा हुए प्रजा ने उन्हें भगवान का दर्जा दिया। अत्याचार होने पर प्रजा भाग्य का ही दोष मानती रही और कभी कभी राजा के द्वारा सहयोग देने को भगवान की कृपा के समान मानती रही। इसलिए आज तक प्रजा और राजा की आत्मीयता बनी हुयी है। वर्तमान में देखें तो लोकतंत्र में कोई भी स्थिर नहीं हैं आज एक राजनेता है तो कल दूसरा। देश में युद्ध जैसी कोई भी विपरीत परिस्थिति आने पर जहाँ राजा को ही परिणाम भोगने पड़ते थे वहीं वर्तमान में राजनेता सर्वाधिक सुरक्षित है। राजतंत्र उनके लिए उपभोग का साधन बन गया है। प्रजा आज राजतंत्र को भगवान की तरह अंतिम सहारा नहीं मानती। यही कारण है कि आज राजनेताओं के प्रति आत्मीयता का भाव उत्पन्न नहीं होता। वह दाता नहीं है अपितु भिक्षुक है। प्रतिदिन होने वाले चुनावों ने उन्हें भिक्षुक बना दिया है। देश का सारा समय राजनेता चुनने में ही व्यतीत हो रहा है। राजनेता के प्रति भावना निर्माण का समय तो आता ही नहीं। अतः राजाओं के प्रति आज तक चला आ रहा दाता का भाव प्रजा के मन से कम नहीं होता। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;श्रेष्ठता का विश्वास - आज हम जिन्हें भगवान मानकर पूजते हैं वे सभी राजा थे। राम&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कृष्ण&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;महावीर&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बुद्ध आदि। हमारे यहाँ विश्वास की एक परम्परा थी कि यदि कंस हुआ है तो कृष्ण भी होंगे&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हिरण्यकश्यप हुए तो प्रहलाद भी आएगा। लेकिन आज एक दूसरे के प्रति आरोप प्रत्यारोप के कारण सारे ही राजनेता शैतान की श्रेणी में आ गए हैं। कोई कृष्ण नहीं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कोई राम नहीं बस हैं तो केवल कंस और रावण। प्रसार माध्यमों ने व्यक्ति के छोटे छोटे अवगुणों को जनता के समक्ष अपराधों की तरह प्रदर्शित किया है और यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि सभी राजनेता अपराधी या चरित्रहीन हैं। आज यह क्रम चल निकला है। हम सभी की सम्भावित कमजोरियों को ही ढूंढते दिखायी देते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति - राजाओं का काल यदि हम तटस्थ भाव से देखें तो पाएंगे कि जितना निर्माण राजाओं के काल में हुआ उतना शायद अभी नहीं हुआ। उदयपुर की ही बात करें और केवल जल स्त्रोतों को ही देखें तो वे सब राजाओं के काल में बने और आज हम उन्हें संरक्षित भी नहीं रख पा रहे। इसी प्रकार कला और साहित्य पूर्ण रूप से राज्याश्रित था। उस काल में कितनी पेंटिग्स बनी&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कितना साहित्य लिखा गया इसका तो पैमाना ही नहीं है। आज इतिहास को देने के लिए हमारे पास क्या है&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;साहित्य के नाम पर समाचार पत्र रह गए हैं और ये सारे राजनीति की गंदगी से भरे पड़े हैं। चित्र के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही है जो भविष्य में शायद हमारा मूल्यांकन करे। आज प्रजा असुरक्षित अनुभव करती है। आज देश में जितने भी संग्रहालय हैं वे सब राजाओं की देन है। जीवन की मूल भूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्होंने कार्य किए। अतः उस युग में उपलब्ध संसाधन जनता के लिए भी सुलभ कराए गए। सबसे बढ़कर कला और विज्ञान को जितना आश्रय राजाओं के काल में मिला शायद ऐसा अभी नहीं हुआ। इसीलिए आज हम प्रत्येक क्षेत्र में पुरातन के मुकाबले अविकसित दिखायी देते हैं। वास्तुशास्त्र&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;शिल्प&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;ज्योतिष&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;चिकित्सा&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;साहित्य&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;चित्रकारी&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हस्तकला आदि में आज हम उस काल को छू भी नहीं पाएं हैं। ऐसे में यदि कुछ लोगों के मन में आज भी राजा को भगवान समझा जाता है तो शायद यह उनकी भूल नहीं है। इसलिए राजाओं का इस देश को क्या योगदान रहा है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;यह बात जनता के समक्ष आनी चाहिए। लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप को देखकर आज प्रश्न खुद ब खुद निकल रहे हैं। लोग कहने लगे हैं कि यदि इसी का नाम लोकतंत्र है तो फिर ऐसे लोकतंत्र से तो राजशाही ही श्रेष्ठ थी। यह भी निर्विवादित सत्य है कि लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है लेकिन गैर जिम्मेदार नेतृत्व कभी भी हितकर नहीं होता। अतः आज भारत के प्राचीन स्वरूप और वर्तमान राज्य प्रणाली के बारे में विस्तार से बहस होनी चाहिए। राजाओं का उज्ज्वल कृतित्व जनता के समक्ष आना ही चाहिए। किसी भी शासन प्रणाली में अनेक कमियां हो सकती हैं लेकिन अच्छाइयां भी होती हैं। अतः आज अनेक पहलू हैं जो राजाओं की लोकप्रियता को जन जन तक पहुंचाते हैं। यही कारण है कि राजाओं का चरित्र हनन इतने व्यापक पैमाने से करने पर भी उनकी हस्ती मिटती नहीं। आज भी जनता उन्हें भगवान के बाद दूसरे संरक्षक के रूप में पूजती है। शहर के सुंदर परकोटे&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बावड़िया&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तालाब&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मंदिर आज भी सभी को अभिभूत करते हैं। आज भी पर्यटक राजमहलों में सुरक्षित संग्रहालय देखने अवश्य जाता है। आज भी कलाकार राज परिवारों की तरफ ही आशा भरी निगाहों से देखते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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– अजित गुप्‍ता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal;"&gt;गर्मियों की छुट्टियो में पर्वतीय क्षेत्रों के भ्रमण की परम्‍पर हमेशा से ही रही है। पहले अंग्रेजों ने अपनी कोठियां पर्वतीय क्षेत्रों में बनवायी और गर्मी की राजधानी भी इन्‍हें ही बनाया। रईसों ने भी अपनी कोठियां बनवाना शुरू किया और फिर होटल व्‍यवसाय भी खूब फला-फूला। जैसे ही गर्मियों की छुट्टियां होती हैं, बच्‍चों का स्‍वर सुनाई देने लगता है कि चलो घूमने। पूर्व में तो एक ही स्‍वर था चलो नाना के घर। कहानियां भी तो कितनी थी नाना के घर की। लेकिन अब धीरे-धीरे पूरे दो महिने की नाना के घर की धमा-चौकड़ी कम होते जा रही है। बच्‍चों की रुचियां बदल गयी हैं, उन्‍हें खेत-खलियान, या घर में बैठकर केरमबोर्ड, चाइनिस चैकर, शतरंज आदि खेलना रुचिकर नहीं&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;लगता। अब उन्‍हें चाहिए कोई फन गेम। हैरतअंगेज, तीव्र गति वाला, धड़कनों को बढ़ाने वाला ऐसा ही कोई फन। एक कहानी याद आती है कि लड़का नाना के घर जाने को निकलता है, रास्‍ते में जंगल हैं और उसे शेर मिल जाता है। वह शेर से कहता है कि नाना के घर जाऊँगा, मोटा-ताजा होकर आऊँगा तब मुझे खाना, अभी तो मैं दुबला हूँ। शेर बात मान लेता है, अब शेर उसकी वापसी का इंतजार करता है। लड़का होशियार है, वह एक ढोलक बनवाता है और उसमें बैठकर शेर को गच्‍चा दे देता है। इस कहानी में रोमांच भी है और शिक्षा भी। ऐसी ही कितनी कहानियां और अनुभव हम सबके पास हैं। लेकिन यह सब पीछे छूटता जा रहा है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;14 मई को दिल्‍ली जाना था, ट्रेन में बड़ी भीड़-भाड़ थी। पूरे कोच में शोर-शराबा, धूम-धड़ाका मचा हुआ था। मैंने पूछ लिया कि कहाँ जा रहे हैं? मालूम पड़ा कि पूरे आठ परिवार हैं, संख्‍या पच्‍चीस से तीस रही होगी। याने पूरे डिब्‍बे में ही उनका राज था। शिमला घूमने जा रहे थे, जाने का उत्‍साह था तो सभी के अन्‍दर उत्‍साह का पेट्रोल फुल था। मेरे साथ मेरी मित्र भी थी, वे बोली कि अभी टंकी फुल है तो धमा-चौकड़ी रहेगी लेकिन वापसी में जब टंकी खाली हो जाएगी तब हवा निकले गुब्‍बारे की तरह लटके हुए होंगे। रात 12 बजे से भी अधिक समय तक उनकी उछल-कूद चलती रही। हम जानते थे कि उन्‍हें टोकने का भी कोई फायदा नहीं होगा। बस हमें चिन्‍ता थी कि नींद पूरी नहीं होगी तो दूसरे दिन की मीटिंग में झपकियां लेना ठीक नहीं होगा। लेकिन क्‍या कर सकते थे? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;दूसरे दिन ही शाम को वापस लौटना था, वापसी में एक परिवार मिला। बुझा हुआ सा, चेहरा लटका हुआ। सब चुपचास अपनी बर्थ पर बैठे हुए, बस उनका 10 वर्षीय पुत्र ही शैतानी कर रहा था। वो उसी से परेशान हो रहे थे और बार-बार उसे मारने की धमकी भी दे रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि कहाँ से आ रहे हैं? वे बोले की वैष्‍णो देवी गए थे, लेकिन गर्मी के मारे बुरा हाल हो गया है। वे जल्‍दी से जल्‍दी सो जाना चाहते थे लेकिन उनके पुत्र को नींद नहीं आ रही थी तो अन्‍त तक तो उसने दो-चार थप्‍पड़ खा ही लिए। हम दोनों आँखों ही आँखों में कह रहे थे कि देखो इनके गुब्‍बारे की हवा निकल चुकी है, तो कैसे निढ़ाल पड़े हैं? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;गर्मी के मौसम में घूमने जाना अपने आपको सजा देने से कम नहीं है। वैसे भी भारतीय व्‍यक्ति किसी भी पर्वतीय स्‍थल पर दो-तीन दिन से ज्‍यादा टिकता नहीं है और इतना ही समय उसे आने-जाने में लग जाता है। दो दिन ठीक से ठण्‍डक भी नहीं मिलती कि झुलसती गर्मी उसके सामने खड़ी होती है। सर्दी और गर्मी के कपड़े भी लादकर ले जाने होते हैं। आनन्‍द के स्‍थान पर थकान मन को घेर लेती है। इसलिए इस भरी गर्मी में दो-तीन दिन के लिए घूमने जाना समझ नहीं आता। या तो आप पुराने रईसों की तरह पूरे दो महिने ही पर्वतीय क्षेत्रों में रहें या फिर छुट्टियों में नाना-मामा के घर पर या स्‍वयं के घर पर ही उनके लिए योजना बनाएं। घूमने जाने के‍ लिए ऐसा मौसम चुने जब दोहरे मौसम की मार ना पड़े। वैसे भी एक सप्‍ताह घूमने से पूरे दो महिने का काम चलता नहीं है। आप सभी का इस बारे में क्‍या विचार है? क्‍या इस भरी गर्मी में घूमने जाना चाहिए या फिर घर में ही अपने परिवार के साथ अंतरंग होने का प्रयास करना चाहिए। क्‍या टीवी और कम्‍प्‍यूटर के अतिरिक्‍त अन्‍य खेलों से भी बच्‍चों को अवगत कराना चाहिए? हम तो यदि मामा के घर नहीं भी जाते थे तब भी हमारी दिनचर्या इतनी व्‍यस्‍त होती थी कि समय ही कम पड़ता था। सारे ही इन्‍डोर और आउटडोर गेम्‍स खेले जाते थे। अपने साथ प्रत्‍येक आयुवर्ग के व्‍यक्ति को जोड़ लेते थे और रात 10 बजे के बाद भी धमा-चौकड़ी चलती ही रहती थी। कभी बच्‍चे नहीं कहते थे कि हम बोर हो गए है। आज भी वे दिन आँखों में बसे हैं। वे महफिले भूले नहीं भूलती। कभी खयाल में ही नहीं आता था कि कहीं घूमने भी जाना है, बस सुबह से ही महफिल सजनी शुरू होती थी और रात जाते-जाते ही हँसी ठट्टा के साथ समाप्‍त होती थी। कितनी रात तक धीरे-धीरे फुसफुसाते रहते थे, ना गर्मी की चिन्‍ता थी और ना ही बारिश का डर। डॉट खाने का डर हमेशा बना रहता था लेकिन फिर भी बिंदास काम होते थे। क्‍या अब वो ही हमारे वाला बचपन का युग हम वापस नहीं ला सकते?&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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   &lt;/script&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5543246866765877657-5535411619089299211?l=ajit09.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ajit09.blogspot.com/feeds/5535411619089299211/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5543246866765877657&amp;postID=5535411619089299211' title='37 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default/5535411619089299211'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default/5535411619089299211'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ajit09.blogspot.com/2011/05/blog-post_20.html' title='गर्मियों की छुट्टियों में घूमने जाना क्‍या वास्‍तव में मन में ऊर्जा भरता है? – अजित गुप्‍ता'/><author><name>ajit gupta</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02729879703297154634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_jm9w3syumo4/S7mJg_5YHQI/AAAAAAAABo0/-LFkHcxkUCU/S220/Copy+of+DSC_0198.JPG'/></author><thr:total>37</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5543246866765877657.post-3827077774146294643</id><published>2011-05-11T11:16:00.000+05:30</published><updated>2011-05-11T11:16:51.912+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajendra nath mahrotra'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कर्मण्‍य तपोभूमि सेवा न्‍यास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्‍दी-विश्‍व गौरव-ग्रन्‍थ'/><title type='text'>मिलिए एक व्‍यक्तित्‍व से – डॉ. राजेन्‍द्र नाथ मेहरोत्रा और हिन्‍दी-विश्‍व गौरव-ग्रन्‍थ के सम्‍पादक, प्रकाशक से – अजित गुप्‍ता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लगभग 4 वर्ष पूर्व की बात है, फोन पर एक व्‍यक्तित्‍व से परिचय हुआ। उन्‍होंने मेरे आलेखों की प्रशंसा की और अपनी पत्रिका के लिए कुछ आलेख भी मांगे। फोनों का सिलसिला चलता रहा और वे किसी न किसी जानकारी या आलेख के लिए बात करते रहे। कई बार फोन से बात होने पर नाम भी याद हो गया। कोई राजेन्‍द्र नाथ मेहरोत्रा हैं, विवेकानन्‍द एकादमी का संचालन करते हैं और ग्‍वालियर में रहते हैं, बस इतना भर परिचय मेरे मस्तिष्‍क में था। मैं भारत विकास परिषद के साथ काम करती हूँ तो एक बार ग्‍वालियर के प्रतिनिधि एक मीटिंग में मिल गए, मैंने जानकारी की दृष्टि से उनसे पूछ लिया कि आप किसी मेहरोत्राजी को जानते हैं। उन्‍होंने कहा कि बिल्‍कुल जानता हूँ, वे समाज के प्रतिष्ठित व्‍यक्तियों में से हैं और हमारा भी बहुत सहयोग करते हैं। अभी उन्‍होंने एक लाख रूपया परिषद के सेवाकार्यों के लिए दिया है और हम जो कार्यक्रम करने जा रहे हैं, उसमें भी उनका बड़ा सहयोग रहेगा। लेकिन वे सहयोग का प्रदर्शन नहीं करते। मेरा उनसे परिचय है, इस बात का विस्‍मय भी था उनको। कुछ दिनों बाद ही ग्‍वालियर जाने का अवसर मिल गया और मैंने तत्‍काल ही मेहरोत्रा जी को फोन किया कि मैं ग्‍वालियर आ रही हूँ। वे बड़े प्रसन्‍न हुए और कहने लगे कि आप मेरे निवास स्‍थान पर ही रूकेंगी। मैंने उनसे क्षमा मांगी और कहा कि मैं आयोजकों की व्‍यवस्‍था से ही रूकूंगी लेकिन आपसे मिलने अवश्‍य आऊँगी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कुछ दिन पूर्व ही उन्‍होंने मुझे बताया था कि मैं एक हिन्‍दी-विश्‍व गौरव-ग्रन्‍थ का प्रकाशन करने जा रहा हूँ और उसमें आपका सहयोग भी चाहिए। मेरे ग्‍वालियर आने के समाचार से वे प्रसन्‍न हुए और मिलने का समय निश्चित हो गया। वे स्‍वयं कार्यक्रम स्‍थल पर आए, उन्‍हें देखकर विवेकानन्‍द का स्‍मरण हो आया। गैरूआ वस्‍त्र, धवल लम्‍बी दाड़ी और पूर्ण ओजमयी एवं गरिमामयी व्‍यक्तित्‍व। बडे ही स्‍नेहपूर्वक वे मुझे अपने घर ले गए। उनके सामने मुझे स्‍वयं का व्‍यक्तित्‍व बहुत ही बौना लग रहा था। हमने घर पहुंचते ही सबसे पहले गौरव-ग्रन्‍थ की ही चर्चा प्रारम्‍भ की। उनकी पूरी टेबल पत्रावलियों से भरी थी। हिन्‍दी साहित्‍य का ऐसा कोई हस्‍ताक्षर नहीं था जिससे उन्‍होंने पत्र व्‍यवहार नहीं किया हो। एक-एक अध्‍याय के बारे में हमने वार्ता की, उन्‍होंने विस्‍तार से अपनी पूरी योजना को मेरे समक्ष रखा। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हिन्‍दी का विश्‍व क्‍या है और विश्‍व में हिन्‍दी कहाँ खड़ी है इसका समग्र चिंतन उस ग्रन्‍थ की विषय-वस्‍तु थी। उनका संग्रह देखकर दंग हुए बिना नहीं रह सकी। हिन्‍दी क्षेत्र से इतर व्‍यक्ति जो कभी भारतीय सेना को अपनी सेवाएं देकर सेवानिवृत्त हुए हो, का हिन्‍दी साहित्‍य के प्रति इतना अनुराग देखकर आश्‍चर्यचकित रहने के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं था मेरे पास। मेरे सुझावों को उन्‍होंने बहुत ही स्‍नेह भाव से माना। इतने बड़े व्‍यक्तित्‍व के समक्ष वैसे भी भला मैं क्‍या सुझाव देती? एक यादगार मुलाकात के साथ मैं ग्‍वालियर से लौटी। इसके बाद भी ग्रन्‍थ के बारे में फोन पर बातचीत होती रही। सौभाग्‍य से एक वर्ष बाद पुन: ग्‍वालियर जाना हुआ और फिर उनसे मिलने का सुअवसर भी। ग्रन्‍थ के बारे में भी रुचि बनी हुई थी क्‍योंकि उसका कार्य प्रारम्‍भ हुए काफी&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;लम्‍बा समय व्‍यतीत हो गया था। इस बार फिर उन्‍होंने मुझे प्रत्‍येक खण्‍ड के बारे में विस्‍तार से बताया और कहा कि इसका स्‍वरूप इतना वृहत हो चुका है कि समझ नहीं आ रहा कि कार्य कब पूरा होगा? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लेकिन अभी 17 अप्रेल को उनका फोन आया और उन्‍होंने बताया कि ग्रन्‍थ इतना विशाल हो गया था कि उसे तीन खण्‍डों में प्रकाशित किया है। उसका प्रथम खण्‍ड प्रकाशित हो चुका है और मैं उसे आपके पास भेज रहा हूँ। आप उसकी समीक्षा करके मुझे शीघ्र भेजें जिससे मैं दूसरे खण्‍ड में उस समीक्षा को प्रकाशित कर सकूं। मुझे दूसरे दिन ही दिल्‍ली के लिए निकलना था, मैंने उन्‍हे बताया कि कल दिल्‍ली जाना है तो वहाँ से आने के बाद ही आप भिजवाएं। लेकिन उन्‍होंने कहा कि मेरा एक परिचित आज ही उदयपुर जा रहा है उसके साथ ग्रन्‍थ भेज रहा हूँ, आप दिल्‍ली साथ ही लेकर जाएं। मेरे ट्रेन के समय से पूर्व मुझे ग्रन्‍‍थ मिल गया। 252 ग्‍लेज और रंगीन पृष्‍ठों का ग्रन्‍थ वजनी भी था, लेकिन उसका कलेवर देखकर वजन उठाने का दृढ़ संकल्‍प कर लिया। यात्रा अकेले ही करनी थी और किस्‍मत से मेरे आसपास मेरे कोच में दूसरा यात्री भी कोई नहीं था। तो पूरे तीन घण्‍टे मुझे ग्रन्‍थ को पढ़ने का समय मिल गया।&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;एक व्‍यक्ति का चिंतन इतना विस्‍तारमय होगा कल्‍पना नहीं की जा सकती। हिन्‍दी का कोई भी पक्ष छूटा नहीं है, यह तो अभी प्रथम खण्‍ड है, अभी दो खण्‍ड आने शेष हैं। मैंने अपनी समीक्षा में यही लिखा कि यह पुस्‍तक ना होकर हिन्‍दी साहित्‍य प्रेमियों और शौधार्थियों के लिए पुस्‍तकालय है। आप सब लोग भी ऐसे ग्रन्‍थ और ऐसे व्‍यक्तित्‍व से परिचय में आएं इसलिए मैंने यहाँ विस्‍तार से लिखा है। हमारे समाज में कितने ही ऐसे व्‍यक्तित्‍व हैं जो नि:स्‍वार्थ भाव से देशहित में कार्य कर रहे हैं। मैंने इस ग्रन्‍थ के आर्थिक पक्ष के बारे में जब उनसे पूछा तो उन्‍होंने कहा कि सब ऊपर वाला करेगा। एक बात और बताना चाहूंगी कि मेहरोत्राजी ने जो पत्र-व्‍यवहार और फोन से सम्‍पर्क किया है उसका मूल्‍य शायद इस ग्रन्‍थ से भी अधिक हो। उनका कक्ष ही उनका शयन कक्ष भी बन गया है, वे इतनी आयु होने के बाद भी दिन-रात साहित्‍य की सेवा में लगे हैं। उनसे मिलना, उनका सानिध्‍य पाना एक विलक्षण अनुभव है। इस ग्रन्‍थ का विमोचन सम्‍भवतया: दिल्‍ली में हो, आज इसीलिए वे दिल्‍ली गए हैं। दिनांक निश्चित होने पर आप सभी को सूचित करूंगी। यदि आपमें से किसी को भी इस ग्रन्‍थ को देखने और पढ़ने का मन हो तो आप डॉ. राजेन्‍द्र नाथ मेहरोत्रा, कर्मण्‍य तपोभूमि सेवा न्‍यास प्रकाशन, ग्‍वालियर से सम्‍पर्क कर सकते हैं। बस मेरा तो इतना कहना है कि इस अद्भुत ग्रन्‍थ को अवश्‍य पढ़ना चाहिए।&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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लाख साधो, सधता ही नहीं। कभी लगता है कि नहीं हमारा मन हमारे कहने में हैं लेकिन फिर छिटककर दूर जा बैठता है। अपने आप में मनमौजी होता है &lt;/span&gt;“&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मन&lt;/span&gt;”&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;। ना यह हमारी परवाह करता है और ना ही हम इसकी परवाह करते हैं। जीवन के घेरे में ना जाने कितनी बार मन को परे धकेल देते हैं! इस मन की कीमत हम कभी नहीं लगा पाते। नौकरी और व्‍यापार से कमाए धन की गणना हम खूब कर लेते हैं, लेकिन मन की खुशियों की कीमत का हम आकलन कर ही नहीं पाते। एक फकीर से पूछ बैठते हैं कि तुम फकीर क्‍यों हो? साधनों का अभाव खटकता नहीं है? लेकिन उसके मन की पूँजी जो उसके पास है उसकी गणना कोई नहीं कर पाता। उसे दुनियादारी से वंचित व्‍यक्ति मान लिया जाता है। जो तन के सुख के लिए लाखों कमाए, बस उसी की गणना होती है लेकिन जो मन के सुख के लिए लाखों गँवा दे उसे तो कभी गणना के लायक भी नहीं मानते।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लेकिन यदि इसी की सुनो तो दुनियादारी ऐसी छूटती है कि आप चारों तरफ से विरोध से घिर जाते हो। सुबह उठे, अभी चाय बनाने रसोई में घुसे ही थे कि इस मन ने न जाने कब का भूला-बिसरा गाना जुबान पर ला दिया और बस सारा दिन वही टेप चलता रहा। इन्‍टरनेट खोला तो बस उसी गाने के इर्द‍-गिर्द घूमता रहा मन। बड़ी अच्‍छी-अच्‍छी पोस्‍ट लगी हैं, ना जाने कितने विषयों पर लोगों ने लिखा है लेकिन आज तो आपका मन उसी गाने के चारों तरफ घूम रहा है तो बस उसे उसी के अनुरूप पोस्‍ट चाहिए और कुछ नहीं। ढूंढ मच गयी, सारी श्रेष्‍ठ पोस्‍ट रिजेक्‍ट हो गयी, बस जो मन को जँची उसी को पढ़ा गया। लेकिन इस मन के चक्‍कर में दुनियादारी पीछे छूट गयी। न जाने कितने लोग नाराज हो गए। हमने इतने अच्‍छे विषय पर पोस्‍ट लिखी लेकिन फला व्‍यक्ति ने पढ़ी ही नहीं, जरूर कोई नाराजी है। बस इस मन ने करा दिया लोगों को नाराज। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कभी इस मन का मन होता है कि गद्य पढे तो कभी मन होता है पद्य पढे। कभी मन होता है कि परिवार से सम्‍बंधित कोई बात पढे तो कभी मन होता है कि देश से सम्‍बंधी कोई पोस्‍ट पढे। कहने का तात्‍पर्य यह कि गलती यह करे और सजा मिले व्‍यक्ति को। लेकिन कुछ लोग हैं जो दुनियादारी खूब निभाते हैं और इस मन को परे धकेल कर रखते हैं। अब आप ही बताइए कि मन को परे धकेलकर केवल दुनियादारी ही निभानी चाहिए या फिर मन की सुननी चाहिए। मैं कई दिनों से उहापोह में हूँ। इस मन ने मेरी ऐसी की तैसी कर रखी है। लोग मुझसे नाराज होते जा रहे हैं और यह पठ्ठा मजे में है। लोग कह रहे हैं कि आप हमारे घर नहीं आते, ब्‍लाग पर लोग कह रहे हैं कि आप हमारी पोस्‍ट नहीं पढ़ते। सामाजिकता क्‍या होती है, इसने भुला दिया है। हमारा नाम भी लोगों की सूची से कटता जा रहा है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मुझे एक घटना याद आ रही है, जब मैं कॉलेज में थी। एक बदमाश टाइप के छात्र ने विवाह कर लिया, बाहर कितना ही शेर बने लेकिन पत्‍नी के आगे गीदड़ जैसा। जब ज्‍यादा परेशान हो गया तो मुझे बुलाने आया, बोला कि मेडम एक बार मेरे घर चलो, मेरी पत्‍नी को देख लो। मैंने टालमटोल की लेकिन वो माना नहीं तो अपने राम भी चल दिए। मनोवैज्ञानिक समस्‍या थी, उसे समझाया और वापस आ गए। लेकिन कॉलेज में चर्चा का विषय बन गए कि ये बदमाशों के घर जा आती हैं। अब उन्‍हें कैसे समझाऊँ कि भाई मेरा उससे कोई लेना-देना नहीं, बस मानवता और चिकित्‍सक होने के नाते ही गयी थी। यहाँ ब्‍लाग-जगत में भी ऐसा ही है। आपके ब्‍लाग पर कौन आता है और आप किसके ब्‍लाग पर जा आते हैं, वह चर्चा का विषय बन जाता है। आप लोगों के साथ होता हो या नहीं लेकिन मेरे साथ तो बड़ा होता है। लोग लठ्ठ लेकर पीछे पड़ जाते हैं कि तुम्‍हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। कभी-कभी लगता है कि मैं कुछ खास हूँ क्‍या? जो मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। लोग कहने लगते हैं कि आप ऐसे लोगों से बात करें यह शोभा नहीं देता। अब मैं क्‍या करूँ? यह मन ऐसा है कि दूसरों के सामने बड़ी समझदारी और अपनेपन से बात करने लग जाता है तो कुछ लोग कहते हैं कि नहीं हमें आपकी मित्रता चाहिए। एक बार ऐसा ही हुआ, एक बहुत बड़े व्‍यक्ति आ गए, मन से कुछ असंयमित थे। हमारा मन बोला कि बेचारे दुखी हैं तो यहाँ सकून ढूंढ रहे हैं तो कुछ देर बात करने में क्‍या जाता है? हद तो तब हो गयी जब रक्षा-बंधन के दिन आ टपके। सारा घर मुझ पर हँस रहा और मैं दीवार कूदकर पड़ोसी के घर। लेकिन दुनिया आजतक मुझे चिढ़ाती है। अब इसका ईलाज है आप लोगों के पास? &lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अब यह पोस्‍ट भी यह मन ही लिखा रहा है, मैंने कहाँ से शुरू की थी और कहाँ समाप्‍त होगी मुझे नहीं मालूम। इस मन से परेशान होकर ही इस ब्‍लाग-जगत में आयी थी कि यहाँ अपने मन की करने की पूरी छूट होगी। कोई टोका-टोकी नहीं होगी। लेकिन यहाँ भी पूरी दुनियादारी निकली। कभी कोई नाराज तो कभी कोई राजी। ऐसा भी नहीं है कि मेरे से ही लोग नाराज होते हैं, मेरा मन भी लोगों से दूर भाग जाता है। कई बार मैंने अनुभव किया है कि यह बड़ा डरपोक भी है। किसी ने कुछ ऊँचा-नीचा कह दिया तो अपनी चादर समेटने में देर ही नहीं करता। कहता है कि दुनिया में पत्‍थरबाजी क्‍या कम है जो यहाँ भी झेलने चले आए। जो बिना बात ही तुमपर पत्‍थर मार रहे हों, उनसे दूर ही रहो ना। यह समझो कि तुम्‍हारे और उनके गण नहीं मिलते बस। इसलिए आज इस पोस्‍ट के माध्‍यम से बस यही कहना चाह रही हूँ कि मुझे मेरा मन जहाँ ले जाता है बस उसी के इशारे पर चले जाती हूँ। जो पोस्‍ट पढ़ने को कहता है, बस उसे ही पढ़ती हूँ। आप लोग मुझसे नाराज ना हो, क्‍योंकि मैं किसी से नाराज नहीं हूँ। बस पत्‍थरबाजी से डरती हूँ, मेरी गलती हो तो प्रेम से बता दें कि आप यहाँ गलत हैं, मैं मान लूंगी। लेकिन यह कभी ना सोचे कि मैं किसी नाराजी के कारण आपकी पोस्‍ट पर नहीं आ रही हूँ। आपने यदि अपने मन को साध रखा है और दुनियादारी के अनुसार चलते हैं तो आपको मैं महान मानती हूँ लेकिन मैं अपने मन को साध नहीं पाती हूँ, बस इसके कहने में ही रहती हूँ। मेरा मानना है कि मन की मानो तो बात लाखों की है और ना मानो तो फिर खाक की है। अन्‍त में एक प्रश्‍न क्‍या आप भी मन की बात सुनते हैं या फिर दुनियादारी को महत्‍व देते हैं? इस पोस्‍ट को पढ़कर भी मुझसे नाराज रहेंगे?&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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अरे मेरे अनुभव का लाभ ले। बस सुबह 5 बजे निद्रा देवी को बाय-बाय कह दें और आनन-फानन में अपने नित्‍य के कार्यों को सम्‍पादित करके पैरों में जूते डालिए और निकल पड़िए सूनी सड़क को गुलजार करने। उदयपुर का नाम तो आपने सुना ही होगा, हमारा छोटा सा शहर है। इस शहर में एक बहुत बड़ी झील है, नाम है फतेहसागर। मेरे घर से एकदम नजदीक। बस हम सुबह फतेहसागर की राह पकड़ लेते हैं। अभी भोर हो रही होती है, पुरवाई चल रही होती है और वातावरण में कहीं से नीम बौराने की गंध भर जाती है तो कहीं से अमलतास के फूलों से लदे वृक्षों के फूल रास्‍ते में झरते हुए मिल जाते हैं। कभी आपने अमलतास जब फूलता है तब उसकी झटा का आनन्‍द लिया है? शायद लिया हो। &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: left;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अमलताश को फूलते हुए देखने का आनन्‍द ही अनूठा है। ना पत्तियां शेष रहती हैं और ना ही लम्‍बी फलियां। बस रहते हैं तो पीले रंग के झूमरनुमा फूल। शायद ड्रांइगरूम में लटकने वाले झूमरों की डिजायन यही की कल्‍पना का फल होगा? आज सुबह अचानक ही मेरी दृष्टि अमलताश के पेड़ पर पड़ गयी। पूरी तरह फूलों से लदा था। पास ही नीम भी बौरा रहा था और उसकी मंजरियों की भीनी-भीनी खुशबू मन को आल्‍हादित कर रही थी। इनके साथ ही आक में भी डोडेनुमा फल आ गया था। अब कुछ ही दिनों में उसमें से रूई निकलकर वातावरण में फैल जाएगी। बचपन में कुछ दिन हनुमानगढ़ रहने का अवसर मिला था, वो इलाका रेगिस्‍तानी इलाका है और वहाँ आक खूब होता है। हम बच्‍चे खूब रूइ एकत्र करते थे, मखमल सी रेशमी रूई। खैर अभी तो सुबह की सैर को चलें। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: left;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;फतेहसागर का बहुत बड़ा घेरा है, हम उसके पिछवाड़े वाले भाग की सड़क पर जाते हैं। वहाँ लोगों का आवागमन कुछ कम होता है। लेकिन पक्षियों का कलरव खूब होता है। झुण्‍ड के झुण्‍ड पक्षी एक पेड़ से उड़कर दूसरे पेड़ पर जाते हुए किलोल करते हैं। अभी तो माइग्रेटिंग बर्डस का आना भी शुरू हो गया है तो जहाँ पर थोड़ा भी पानी कम हो गया है और पानी में छोटी सी धरती दिखायी देने लगती है बस वहाँ पक्षियों का शोर सुनायी देता है। लेकिन इनका समय तय है, आप यदि पाँच मिनट पहले आ गए तो आकाश में कम पक्षी मिलेंगे और देर से आए तब भी। बस निश्चित समय जाइए और पक्षियों का आनन्‍द उठाइए। अभी हम पक्षियों का आनन्‍द ही उठा रहे होते हैं कि नेहरू गार्डन के पीछे से थाली के आकार का लाल सुर्ख सूरज निकल आता है। नेहरू गार्डन क्‍या है? अभी बताती हूँ, फतेहसागर के बीच में एक पार्क बनाया गया है जहाँ नाव से जाया जाता है बस सूरज वहीं से इठलाता हुआ निकल आता है ठीक 6 बजे। आज आकाश में कुछ बादल थे, तो ये नटखट बादल महा शक्तिशाली सूरज को कभी बीच से काट देते थे तो कभी पूरा ही ढक लेते थे। बस उसकी किरणों को नहीं रोक पा रहे थे। सफेद-सफेद बादलों से छनकर लाल-लाल किरणे देखने का आनन्‍द ही कुछ और है। तभी किसी पेड़ पर बैठी कोयल कुहक उठी, साथ में चिड़ियों ने भी अपना स्‍वर मिला दिया। मन करता है कि यह सुबह बहुत लम्‍बी हो जाए लेकिन सूरज की गति को भला कौन रोक सका है? वो तो अपनी मंथर गति से आगे बढ़ने लगता है और हमारे कदम भी तेज हो जाते हैं। एक खुशनुमा सुबह को जी लेने के बाद, सारा दिन उसकी ताजगी में ही गुजर जाता है। तो कल आप भी सुबह का आनन्‍द लें और निकल पड़े गर्मी से लड़ने के लिए सारे दिन की खुराक लेने। बड़े शहरों वाले कहेंगे कि अजी हमारे यहाँ ऐसा फतेहसागर नहीं है। लेकिन पार्क तो हैं? उदयपुर में इतने पार्क और झीलों का साथ है कि कहीं भी रहिए आपको सुबह का आनन्‍द उठाने का पूरा मौका मिलेगा।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="float: left; margin-right: 1em; text-align: left;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-96uXK34y8HU/TbuI6jqjuOI/AAAAAAAABwE/Kui-yPdm2Y0/s1600/Picture+361.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="150" src="http://3.bp.blogspot.com/-96uXK34y8HU/TbuI6jqjuOI/AAAAAAAABwE/Kui-yPdm2Y0/s200/Picture+361.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;अमलताश का वह पेड़ जिसने पोस्‍ट लिखा दी।&amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-82ZoWvRlwQs/TbuInNZz0PI/AAAAAAAABwA/rz1R1LNdyHE/s1600/Picture+342.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="150" src="http://1.bp.blogspot.com/-82ZoWvRlwQs/TbuInNZz0PI/AAAAAAAABwA/rz1R1LNdyHE/s200/Picture+342.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;पक्षियों को कैमरे में कैद करना कठिन है &lt;br /&gt;लेकिन ये पकड़ आ ही गए।&amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-F7wf4-fjreA/TbuJH9TKNeI/AAAAAAAABwI/uDAdoss-gZk/s1600/Picture+354.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="150" src="http://4.bp.blogspot.com/-F7wf4-fjreA/TbuJH9TKNeI/AAAAAAAABwI/uDAdoss-gZk/s200/Picture+354.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;नेहरू गार्डन से सूर्योदय।&amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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उसी क्षण दो आँखों ने मेरा पीछा किया, दो कानों ने मेरी बातों पर अपना मन गड़ा दिया। मैं अपनी बेटी से बात कर रही थी और एक चेहरा मुझे निहार रहा था। मन में उथल-पुथल थी शायद। मेरे फोन बन्‍द करते ही मेरी मित्र ने पूछा कि बिटिया से बात कर रही थीं ना? हाँ, मैंने सहजता से कहा। उनका अगला प्रश्‍न चौंकाने वाला था। पूछ रही थीं कि आप बिटिया से मन की सारी ही बाते कर लेती होंगी? मैं उनके चेहरे को देख रही थी। बिटिया से तो मन की बाते होती ही हैं, आज ऐसा प्रश्‍न क्‍यों? उनकी भाव-भंगिमा देखकर लग रहा था जैसे किसी डायबिटीज के रोगी के सामने मिठाई रखी हो और वह उसे खा नहीं सके, बस मायूसी से उस मिठाई को देखता ही रहे। या यूँ कहूँ कि आप किसी को मेल करना चाहे और वह आपकी मेल को स्‍पेम में डाल ले। वे अपने आप से ही बातें करने लगी, कह रही थी कि बेटी से बात करना कितना सुखद होता है! मन की सारी बाते हो जाती है। मिसेज सिन्‍हा को भी रोज देखती हूँ, कई घण्‍टे वे बेटियों से बातें करती हैं। कितना खुश लगती हैं। मेरी देवरानी भी कितनी खुश रहती है, वो भी रोज ही अपनी बेटी से बातें करती हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;एक माँ जिसके बेटे तो हैं, बहुएं भी हैं लेकिन बेटी नहीं है, उसका दुख आज छलक पड़ा था। दुख का यह पैमाना मेरे लिए अन्‍जाना था। अपने मन की बात किसी से ना कर सकें तो मन में घुटन होती है लेकिन बेटी से इस घुटन का रिश्‍ता है यह कभी सोचा ही नहीं था। घर में कोई छोटी-मोटी बात हो, बेटे ने कुछ कह दिया हो, या बहु की बात समझ नहीं आ रही हो तो एक सहारा बेटी ही तो है, जिसे अपने मन की बात कहकर हल्‍का हुआ जा सकता है। लेकिन जिसके बेटी नहीं हैं वह क्‍या करे? आज मुझे मेरी मित्र की आँखों में अनायास ही उस पीड़ा के दर्शन हो गये। अपने में मस्‍त, साधन-सुविधाओं से सम्‍पन्‍न, लेकिन बेटी नहीं। बेटी ना होने का दर्द इस प्रकार प्रकट होगा, मुझे कल्‍पना नहीं थी। लोग तो बेटे की माँ से ईर्ष्‍या करते हैं, यहाँ आज बेटी की माँ से ईर्ष्‍या हो गयी। एक ठण्‍डी आह के साथ निकल आया दिल का दर्द कि काश मेरे भी बेटी होती! &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कहावत है कि बेटी माँ का दर्द जानती है, उसे बाँटती भी है। इसके विपरीत बहुत कम बेटे होते हैं जो माँ के दर्द को समझते हैं या साझीदार बनते हैं। उनके पास शायद समय भी नहीं होता कि वे माँ की पूरी रामायण सुन लें। अभी रिश्‍तेदारी में एक विवाह सम्‍पन्‍न हुआ, बेटे से बात हुई तो बोला कि कैसी रही शादी? कुछ एकाध प्रश्‍न पूछकर बात समाप्‍त हो गयी। मैंने अपनी तरफ से ही कई बाते बताई लेकिन उसने प्रश्‍न दर प्रश्‍न नहीं किए। इसके विपरीत बेटी ने आगे होकर पूछा कि क्‍या-क्‍या हुआ शादी में? जहाँ-जहाँ भी बातों के चटखारों की उम्‍मीद थी, उन सभी बातों के लिए भी पूछा। बेटे को मैं बता रही थी और बेटी मुझसे पूछ रही थी, बस इतना ही अन्‍तर था। आस-पड़ोस की रोज-मर्रा की बातों से बेटी वाकिफ होना चाहती है, बेटा बेपरवाह सा सुन लेता है लेकिन उन बातों में रमता नहीं है। बस यही अन्‍तर है, बेटा और बेटी में। आप शायद इस बात का प्रतिवाद करें लेकिन यह तो सच है कि मन तक बेटियां ही पहुंचती हैं। मेरी मित्र की आँखों में मुझे जो दर्द दिखायी दिया, उस कारण मेरा भी नजरियां बदल गया है। अब मुझे बेटे वाली माँएं बेबस सी दिखायी देने लगी हैं। कहाँ जाएं अपने मन का दर्द बाँटने? एक उम्र आती है जब बेटा बड़ा हो जाता है और वह माँ का पल्‍लू छोड़कर अन्‍य जगह अपनी खुशियां तलाशता है। उस समय माँ एकदम अकेली हो जाती है और तब उसे अपने मन को बाँटने के लिए एक बिटिया की आवश्‍यकता होती है। बहु भी आपकी बेटी बन सकती है, लेकिन आप कितना भी प्रयास कर लें आपके मन की गहराइयों तक उसकी पहुंच नहीं हो सकती। मेरी मित्र का कहना था कि एक डर सा बना रहता है कि किस बात का क्‍या अर्थ निकाल लिया जाएगा लेकिन बिटिया के सामने यह डर नहीं होता। चाहे आप बेटी से कितना ही लड़ ले लेकिन यह आश्‍वासन हमेशा रहता है कि गलत अर्थ नहीं निकाला जाएगा। इस बारे में अनेक विचार हो सकते हैं, लेकिन मैने जो अनुभव किया, पूरी ईमानदारी के साथ आपसे सांझा किया। प्रभु का आभार भी माना कि मुझे एक बिटिया दी हैं, जिससे रोज एक घण्‍टा बात करके अपने मन को हल्‍का कर लेती हूँ, हँस लेती हूँ। इसलिए यदि आपके बेटी नहीं है तो मानिए आपके जीवन में आनन्‍द की वर्षा शायद कम हो और आप भी किसी माँ को बेटी से बात करते देख एक हूक सी अपने मन के अन्‍दर महसूस करते हों। आप इस बारे में क्‍या सोचते हैं? मन की गहराइयों तक बेटी की पहुंच होती है या बेटे की भी होती है? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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बस आप एक मुद्दा छोड़ दीजिए, कानों में ईयर-फोन लगाया व्‍यक्ति भी बोल उठेंगा। कोई डर नहीं, कोई चिन्‍ता नहीं कि मेरी बात से कोई नाराज होगा या बहस किस दिशा में जाएगी? क्‍योंकि सभी को कुछ घण्‍टों में ही बिछड़ जाना है। कभी बहस के ऊँचे स्‍वर भी सुनायी दे जाते हैं लेकिन छोटे से सफर में भला बहस को कितनी लम्‍बाई मिल सकेगी? खैर मैं अपनी बात कह रही थी अभी 9 अप्रेल को दिल्‍ली जाने के लिए रेल सेवा का उपयोग कर रही थी, साथ में दो साथी भी थे। एक जगह रहने के बाद भी बातचीत का सिलसिला रेल यात्रा में ही पूरा होता है। साथी के बेटे के बारे में बात निकली और पूछा कि कब शादी कर रहे हो? बात आगे बढ़ी और इस बात पर आकर ठहर गयी कि बच्‍चे कहते हैं कि आप कुछ नहीं समझते हो। पहले माता-पिता कहते थे कि तुम कुछ नहीं समझते हो और अब बच्‍चे कहते हैं कि आप लोग कुछ नहीं समझते हैं और आपको हम समझा भी नहीं सकते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इस युग की पीड़ा वास्‍तव में समझ भी नहीं आती है। वे एक दूसरे को जानने के लिए लिविंग रिलेशनशिप को आवश्‍यक मानते हैं और हम इसे पाप की संज्ञा देते हैं। बात कई मोड़ों से होकर गुजर रही थी, तभी मैंने कहा कि वास्‍तव में बड़ी अजीब सी स्थिति बन गयी है। क्‍योंकि मैंने अभी कुछ दिन पहले ही टीवी पर आ रही एक फिल्‍म को देखा था। उसके पहले उस फिल्‍म के चर्चे सुने थे तो सोचा कि जब टीवी पर आ ही रही है तो देख लिया जाए। नाम था बैण्‍ड बाजा बारात। खैर फिल्‍म शुरू हुई और&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;एक दृश्‍य ने हमारे दिमाग की घण्‍टी को बजा दिया। सब कुछ इतना स्‍वाभाविक? लड़की कितनी सहजता से साथ लड़के के साथ शारीरिक सम्‍बंध स्‍थापित कर लेती है और सुबह होते के साथ ही भूल जाती है। लड़का तो उहापोह में है लेकिन लड़की ने जैसे रात में किसी के साथ डिनर किया हो बस। अरे डिनर करते हैं तब भी कोई चर्चा होती है लेकिन उतनी चर्चा भी नहीं। हम तो सकते में आ गए कि क्‍या वास्‍तव में इतना परिवर्तन आ गया है? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;खैर जब हम इस फिल्‍म की चर्चा कर रहे थे तब हमारे साथी ने भी कहा कि मैंने भी देखी थी यह फिल्‍म। तभी पास में बैठा सहयात्री मुखर हो उठा, इतनी देर से तो वह अपने कम्‍प्‍यूटर पर मग्‍न था। एकदम से बोल उठा तो हमें भी लगा कि अरे हम अपनी बातों में कितना मशगूल थे और यह भी नहीं जान पाए कि दूसरा भी कोई इसे सुन रहा है। लेकिन वह जो बोला उसे सुनकर एक अविश्‍वसनीय सत्‍य हमारे सामने पसर गया और आज की पोस्‍ट लिखने को मजबूर कर गया। मैं कल याने 11 अप्रेल को ही दिल्‍ली से लौट आयी थी और कल से ही मेरे दिमाग में उस सहयात्री की बात घुमड़ रही है। कभी लगता है कि पोस्‍ट पर नहीं लिखू, फिर लगने लगा कि लिख ही दूं। बेकार में मन में पड़ें रखने से तो अच्‍छा है कि शेयर कर लिया जाए। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;उन सज्‍जन ने बताया कि अभी कुछ दिन पहले मैं रेल में यात्रा कर रहा था। मुझे एसी का टिकट नहीं मिला तो मैं स्‍लीपर में था। वहाँ दो युगल भी यात्रा कर रहे थे। वे दोनों अपर बर्थ पर आराम से &lt;/span&gt;“&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;प्रोपर सेक्‍स&lt;/span&gt;”&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; कर रहे थे। मैंने यह शब्‍द उसी का लिखा है। शब्‍दों को छिपाया नहीं है, क्‍योंकि हम सब परिपक्‍व हैं और जिस बात को मैं इंगित कर रही हूँ उसमें छिपाव होना भी नहीं चाहिए। उसने कहा कि सारे अन्‍य यात्री मुँह फाड़े उन्‍हें देख रहे थे और बोल रहे थे कि पिक्‍चर चल रही है। मैं यह नहीं कहना चाह रही कि कितना पतन हो गया है, क्‍योंकि हो सकता है कुछ लोग इसे उत्‍थान माने। लेकिन हमारी पीढी के लिए आश्‍चर्यजनक और आपत्तिजनक भी है। क्‍या अन्‍य यात्रियों को उन्‍हें रोकना नहीं चाहिए था? या यह घटना ही झूठ का पुलिंदा है? कुछ समझ नहीं आ रहा है, तो आप लोगों से शेयर कर ली। बस इस बात को समझने का प्रयास कर रही हूँ कि वास्‍तव में हम कुछ नहीं समझ सकते। आखिर हम अपनी सोच से कितना आगे बढ़े? कितनी कल्‍पना करें, कि कितना परिवर्तन और होगा? क्‍या मनुष्‍य सामाजिक प्राणी से केवल प्राणी-मात्र रह जाएगा? क्‍या हमारे बच्‍चों की पीड़ा जायज नहीं है कि उन्‍हें भी ऐसे वातावरण को जीना पड़ता है और उसे आत्‍मसात भी करना पड़ता है। एक तरफ उनके पारिवारिक संस्‍कार हैं और दूसरी तरफ उनकी पीढी है जो सारी ही वर्जनाएं तोड़ देना चाहती है, अ‍ाखिर वे किस का साथ दें? तभी वे बात बात में कहते हैं कि आप नहीं समझोगे। आखिर हम समझ भी कैसे सकते हैं? &lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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font-size: 11pt;"&gt;इन्टरनेट पर एक अंग्रेजी लघुकथा पढ़ने को मिली। नन्हें मेढ़कों की दौड़ आयोजित की गयी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;एक बहुत ही ऊँची चट्टान पर मेढ़कों को पहुँचना था। चढ़ाई एकदम खड़ी थी। चारों तरफ से आवाजें आ रही थी कि &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;यह असम्भव है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;इतनी ऊँची चढ़ाई इन मेढ़कों की बस की नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;’ &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;दौड़ प्रारम्भ हुई&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;हताशा भरी आवाजें निरन्तर आती रही। देखते ही देखते कुछ मेढ़क बेहोश होकर गिरने लगे। लेकिन फिर भी कुछ मेढ़क अभी तक दौड़ में बने हुए थे। आवाजें अभी भी आ रही थीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;कि &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;इनके बस का नहीं है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;कोई भी चट्टान पर चढ़ नहीं सकता।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;’ ‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;ये पिद्दी से मेढ़क क्या कर पाएंगे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;?’ &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;धीरे-धीरे और मेढ़क बेहोश होकर गिरने लगे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;निराशा भरे स्वर और बढ़े। लेकिन सबके आश्चर्य का ठिकाना तब नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि एक मेढ़क चट्टान पर चढ़ने में सफल हो गया है। सबने उसकी सफलता का रहस्य जानना चाहा तो मालूम पड़ा कि वह बहरा है। हताशा भरी आवाजें उसने सुनी ही नहीं। वह तो अपने कर्म की धुन पर आगे ही बढ़ता रहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;बढ़ता रहा। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;हम भी चारों तरफ ऐसे ही शोर से घिरे हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, ‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;यह कुछ नहीं कर सकता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;’, ‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;इसे कुछ नहीं आता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;’, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;आदि&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;आदि। हम प्रतिपल ऐसे ही वाक्य सुन रहे हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;निराश हो रहे हैं और अक्सर प्रतिक्रिया भी कर रहे हैं। हमारा समय इसी निराशा और प्रतिक्रिया की उधेड़-बुन में ही निकल जाता है। उधेड़-बुन का अर्थ आप समझते है न&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;महिलाएं अधिक समझती हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;क्योंकि वे स्वेटर बुनती हैं। किसी स्वेटर को बुनना और फिर उधेड़ देना&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;यही है उधेड़-बुन। हम बस यही कर रहे हैं। एक कदम आगे बढ़ाते हैं और फिर लोगों की फब्तियों के डर से वापस पीछे लौट जाते हैं या फिर पत्थर उठाकर दो कदम पीछे करते हुए उस भागते हुए व्यक्ति को मारने दौड़ते हैं। हमारी मंजिल कहीं पीछे छूट जाती है। मेढ़क इसलिए सफल हुआ कि वह बहरा था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;उसने निराशा भरे शब्दों का श्रवण ही नहीं किया। उसे अपना लक्ष्य दिखायी दे रहा था और मौन साधना के साथ वह आगे बढ़ रहा था। हम समझते हैं कि हमारे कार्य में लोग हमारी सहायता करेंगे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;हम यहीं धोखा खा जाते हैं। हम सब की सहायता से आगे बढ़ना चाहते हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;और जब सहायता प्राप्त नहीं होती तब निराश हो जाते हैं। यह जीवन एक संघर्ष है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;यदि आपको आगे बढ़ना है तो निराशा के स्वर सुनने बन्द कर दो। अपने कानों में रूई ठूँस लो। ये स्वर ही आपके आत्मविश्वास को डगमगा देते हैं। जब सुनाई देता है कि चट्टान बहुत ऊँची है तब हम भी उसे देखने लगते हैं और हमारा आत्मविश्वास टूट जाता है। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;जब हम कार्य की विशालता को देखते हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;मार्ग की दुरूहता को देखते हैं और स्वयं को अकेला पाते हैं तब हिम्मत टूट जाती है। लेकिन फिर भी कार्य करने का जुनून हमें कार्य करने को बाध्य करता है। तभी निराशा के स्वर हमें सुनायी देते हैं और हम कार्य से पीछे हट जाते हैं। लोग यही चाहते हैं कि यदि वे सफल नहीं हुए तो आप भी सफल नहीं हो। आँखों पर पट्टी बाँध लीजिए और काम की लम्बाई मत देखिए&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;काम करना प्रारम्भ कर दीजिए। आप देखेंगे कि नियत समय से भी कम समय में आपने कार्य को पूरा कर लिया है। अपना समय प्रतिक्रिया करने में भी बर्बाद मत करिए। प्रागैतिहासिक काल से ही भारत में परम्परा रही है कि हम साधना के लिए एकान्त स्थान का चयन करते हैं। जिससे निराशा के स्वर हमारा व्यवधान न बन सकें। लेकिन जैसे ही विश्वामित्र की साधना से इन्द्र का सिंहासन डोलने लगता है वैसे ही वे मेनका को धरती पर भेज देंते हैं। कभी ऋषियों की तपस्या भंग करने राक्षस आ जाते हैं। लेकिन जो तपस्वी सारे बाहरी आक्रमणों को सुनते ही नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;देखते ही नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;वे केवलज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और महावीर बन जाते हैं। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;आचार्य चाणक्य नन्द साम्राज्य का पतन चाहते हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;वे भारत के राजाओं का एकीकरण चाहते हैं। लेकिन सभी आपस में लड़ रहे हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;उनका एकीकरण असम्भव दिखायी देता है। सभी गणराज्यों के अधिपतियों का दम्भ उन्हें एक नहीं होने देता। चाणक्य को चारों ओर से निराशा के स्वर सुनायी देते हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;लेकिन वे उन स्वरों को सुनते नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;उन पर प्रतिक्रिया नहीं करते। उनका लक्ष्य केवल मात्र एकीकरण बन जाता है। वे सफल होते हैं। इसके विपरीत सिकन्दर विश्व विजय करने निकलता है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;भारत में छिट-पुट विजय के बाद उसके सैनिक हताशा का शिकार हो जाते हैं और वे सिकन्दर को बाध्य कर देते हैं कि हम यह दुरूह कार्य अब और नहीं कर सकते। सिकन्दर को लौटना पड़ता है और इसी निराशा में वह रास्ते में ही अपने प्राण त्याग देता है। हनुमान के सामने विशाल समुद्र खड़ा है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;वे साहस नहीं जुटा पा रहे हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;इसे लाँघने का। उन्हें स्वर सुनाई देते हैं कि हनुमान तुममें शक्ति है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;तुम अपनी शक्ति को विस्मृत कर बैठे हो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;लगाओ छलाँग और पार कर लो इस समुद्र को। हनुमान लंका पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। श्रीराम नल और नील की सहायता से समुद्र पर पुल बना लेते हैं। पाँच पाण्डव&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;कौरवों की विशाल सेना को परास्त कर देते हैं। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;सारी ही शक्ति हमारे समक्ष चारों ओर से आती हुई आवाजों की है। निराशा भरे स्वर हमें हतोत्साहित करते हैं और आशा भरे स्वर हमें कार्य की प्रेरणा देते हैं। रावण जैसा महाबलि भी इन्हीं निराशा भरे स्वरों का शिकार होता है। उसे प्रतिपल कहा जाता है कि श्रीराम के बल से डर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;तू उसका मुकाबला नहीं कर सकता। रावण परास्त हो जाता है। कंस के मन में प्रतिपल डर बिठा दिया गया है कि देवकी का आठवां पुत्र तेरा वध करेगा। वह शक्तिहीन होता जाता है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;प्रतिदिन केवल प्रतिक्रिया ही करता रहता है और एक दिन परास्त हो जाता है। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;राम और कृष्ण क्यूँ भगवान बन जाते हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;उन्हें प्रारम्भ से ही अवतार बताया जाता है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;उनके कानों में प्रतिक्षण एक ही आवाज गूँजती है कि तुम भगवान हो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;तुम समर्थ हो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;तुम्हारा आगमन पापियों के नाश के लिए हुआ है। वे सफलता प्राप्त करते हैं। भारत के कथानकों में प्रारम्भ से ही सत्ता का संघर्ष बताया गया है। सत्ता अर्थात् इन्द्र का वैभवशाली&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;भोगवादी सिंहासन। किसी भी ऋषि की तपस्या से इन्द्र का विचलित होना&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;उसे अपना सिंहासन डोलता सा प्रतीत होना&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;सत्ता के भोग से विलग होने का डर बन जाता है। एक तरफ ऋषि का त्याग है तो दूसरी तरफ भोग है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;भोगवाद हमेशा से ही त्याग से डर जाता है। त्यागी पुरुष ही ज्ञान की प्राप्ति करने में सक्षम बनते हैं और ज्ञान प्राप्त होने पर जनता ज्ञान की ओर दौड़ती है। जनता चाहती है कि ज्ञानी पुरुष के हाथ में सत्ता रहे इसी कारण भोगवादी ज्ञानी पुरुषों से डरने लगते हैं। यही असुरक्षा बोध ज्ञान के मार्ग में रोड़े अटकाता है। कोई भी व्यक्ति जब कर्म को अपना लक्ष्य बना लेता है तब उसके मार्ग में ऐसे ही रोड़े आने लगते हैं। चारों तरफ से उसपर आक्रमण होने लगते हैं। उसमें हीनता-बोध उत्पत्ति के सारे ही प्रयास किये जाते हैं। आक्रमण का एकमात्र आधार हीनता बोध का जागरण मात्र ही होता है। अतः ऐसे बिन्दु पर आक्रमण करो जिससे उसका व्यक्तित्व बौना दिखायी दे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;उसके प्रति आदर कम हो जाए और वह हीनता-बोध का शिकार होकर असफल हो जाए। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;लेकिन कर्मठ व्यक्ति ऐसे निराशा भरे व्यंग्य बाणों से आहत होने के स्थान पर दृढ़ता के साथ स्वयं को स्थापित कर&amp;nbsp; लेते हैं। कालिदास को मूर्ख कहा जाता है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;पत्नी उन्हें तिरस्कृत कर देती है। तिरस्कार के कतिपय वाक्यों के बाद वे ऐसे शब्दों को सुनना बन्द कर देते हैं और साधनारत हो जाते हैं। परिणाम कालजयी रचनाकार कालिदास। तुलसी भी पत्नी के तिरस्कार से साधनारत होते हैं और वे बन जाते हैं सभी के हृदय-सम्राट। हमारे शास्त्रों में ऐसे हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;जब शब्दों की मार से कोई परास्त हुआ है और कोई विजयी। श्रीराम रावण विजय कर अयोध्या आते हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;एक धोबी के शब्द सुनते हैं और सीता को वनवास दे देते हैं। राम का मानसिक बल आधा रह जाता है। यदि वे इन निरर्थक शब्दों को नहीं सुनते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;उन पर ध्यान नहीं देते तो वे सीता के साथ मिलकर कितने श्रेष्ठ कार्य करते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;रावण विजय के बाद उनके नाम कौन सी विजय अंकित है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;वे राजसूय यज्ञ कराते हैं और दो बालक उनके घोड़े को पकड़ लेते हैं! अतः निराशा और हताशा के शब्दों को मत सुनो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;आपके कार्य में व्यवधान उपस्थित होता है। केवल अपने लक्ष्य पर निगाह स्थिर रखो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;आपको आपका साध्य अवश्य मिलेगा। आप केवल क्रिया करें&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;प्रतिक्रिया नहीं। प्रतिक्रिया दूसरों के लिए छोड़ दें। प्रतिक्रिया करने वाले व्यक्ति क्रिया करना भूल जाते हैं और उनका जीवन उद्देश्यहीन बन जाता है। जब हम क्रियाशील बनते हैं तब हमारे सामने एक उद्देश्य होता है और उसे पूर्ण करने के लिए एक लक्ष्य भी। प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि इस सृष्टि को समृद्ध करे। हम प्रारम्भ से ही मानते आए हैं कि इस सृष्टि पर दो प्रकार की शक्तियां हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;एक सुर और दूसरी असुर। एक विकास चाहती है और दूसरी विनाश। एक त्याग को महत्व देती है और दूसरी भोग को। एक चाहती है कि इस सृष्टि के समस्त चर और अचर पदार्थों का रक्षण हो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;दूसरी चाहती है कि केवल मेरा ही रक्षण हो। अतः जब आप बहुजन-हिताय और बहुजन-सुखाय कार्य करते हैं तब ये ही आसुरी शक्तियां जो केवल स्वयं का ही हित चाहती हैं वे आपके कार्य में बाधक बन जाती है। आपको हीनता-बोध की ओर प्रवृत्त करने के लिए हताशा से भरे स्वरों को प्रतिपल गुँजायमान करती हैं। वे चाहती हैं कि आप निराशा से घिर जाएं और कार्य करना बन्द कर दें। जब आप अपना लक्ष्य भूल जाएँगे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;अपना उद्देश्य भूल जाएँगे तब उनका हित सध जाएगा। इसलिए मत सुनिए निराशा के स्वर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;मत लाइए हीनता-बोध। अर्जुन की तरह केवल चिड़िया की आँख पर ही दृष्टि गड़ाए रखिए&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;आपका निशाना अचूक होगा।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;सदियों से महिलाओं को ऐसे ही हीनता-बोध का पाठ पढ़ाया जा रहा है। वे स्वयं मान बैठी हैं कि हम पुरुष के मुकाबले शक्तिहीन हैं। मुझे कहा जाता है कि आप महिला होते हुए भी इतना प्रवास कर लेती हैं! मैं कहती हूँ कि तभी तो कर लेती हूँ। हम तो सारे परिवार का बोझ अपने कंधों पर उठाकर जीवन का सफर पूर्ण करती हैं तो फिर इन छुट-पुट प्रवासों की क्या बिसात है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;महिला तो धरती है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;सारे ही अंकुरण उसके उदर से प्रस्फुटित होते हैं। विशाल वृक्ष उसके वक्ष से ही स्नेह-पान करते हैं। लेकिन उसके अन्दर आग का भी विशाल भण्डार होता है जिसे वह सहिष्णुता के जल के नीचे दबाकर रखती है। यदि यह जल कम हो जाएगा तब फिर अग्नि का भण्डार धधक उठेगा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 11pt;"&gt;तब महाप्रलय होगी। अतः संसार को इन आसुरी शक्तियों से बचाना है। हमें हताशा के शब्दों से निजात पाना है और हीनताबोध को स्थान नहीं देना है। तभी हम श्रेष्ठ भारत की कल्पना कर सकेंगे।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 11pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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   &lt;/script&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5543246866765877657-7244087264687463977?l=ajit09.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ajit09.blogspot.com/feeds/7244087264687463977/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5543246866765877657&amp;postID=7244087264687463977' title='41 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default/7244087264687463977'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5543246866765877657/posts/default/7244087264687463977'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ajit09.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='मत सुनिए निराशा के स्वर - अजित गुप्‍ता'/><author><name>ajit gupta</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02729879703297154634</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_jm9w3syumo4/S7mJg_5YHQI/AAAAAAAABo0/-LFkHcxkUCU/S220/Copy+of+DSC_0198.JPG'/></author><thr:total>41</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5543246866765877657.post-3416551122411648630</id><published>2011-03-31T17:34:00.001+05:30</published><updated>2011-04-01T08:52:13.162+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाजिक सरोकार'/><title type='text'>दुनिया में बहुत रास्‍ते हैं बेईमानी के अलावा  – अजित गुप्‍ता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इस ब्‍लाग जगत के जाने माने ब्‍लागर श्री अनुराग शर्मा ( स्‍मार्ट इंडियन) की अभी एक पोस्‍ट आयी थी &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; शिक्षा और ईमानदारी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मेरी टिप्‍पणी निम्‍न थी -&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="color: #666666; font-family: Verdana; font-size: 9pt;"&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/02729879703297154634"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #666666; text-decoration: none;"&gt;ajit gupta&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;said...&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #666666; font-family: Verdana; font-size: 9pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="mso-margin-bottom-alt: auto; mso-margin-top-alt: auto;"&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #666666; font-family: Mangal; font-size: 9pt;"&gt;सच तो यह है कि कुछ बेइमानों ने सारे भारत को बदनाम कर रखा है। वे ही प्रचारित करते हैं कि बिना बेईमानी कुछ नहीं होता। यह सत्‍य भी है लेकिन इतना सत्‍य भी नहीं है। मुझे स्‍मरण नहीं कि मैंने अपने जीवन में कभी बेईमानी से समझौता किया हो। आज यदि ईमानदारी प्रदर्शित होने लग जाए तो तस्‍वीर का उजला पक्ष सामने आएगा।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;श्री अनुराग शर्मा जी ने मुझे लिखा है कि मैं इसे उदाहरण सहित बताऊँ कि कैसे बेईमानी से लड़ा जा सकता है? &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आज यह पोस्‍ट इसी विषय पर है। जीवन जीने के दो मार्ग है, एक मार्ग है जिस पर सभी लोग चलना चाहते हैं और वो है अभिजात्‍य वर्ग वाला मार्ग। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;1 अर्थात् मेरा बच्‍चा नामी गिरामी स्‍कूल में पढ़े, जिस विषय से समाज में प्रतिष्‍ठा बढ़ती हो बच्‍चों को वही विषय में शिक्षा दिलायी जाए। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;2 सरकारी नौकरी में मुझे इस शहर में ही नौकरी करनी है, ऐसी प्रतिबद्धता हो। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;3 मुझे यथाशीघ्र प्रमोशन मिलें।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;4 मेरे पास भौतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हो। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लगभग एक आम भारतीय इन्‍हीं विषयों पर चिन्‍ता करता है। लेकिन इसके विपरीत एक मार्ग और है, वो है कि -&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;1 मेरा बच्‍चा ऐसे स्‍कूल में पढ़े जहाँ ज्ञान मिलता हो। चाहे वह स्‍कूल सरकारी या छोटे स्‍कूलों में शामिल क्‍यों ना हो।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;2 यदि सरकारी नौकरी करनी है तो कहीं भी नौकरी हो, उसे सहज स्‍वीकार करना।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;3 प्रमोशन आपकी योग्‍यता के अनुसार होगा, उसके लिए छोटे मार्ग नहीं अपनाएंगे। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;4 मेरे पास जितनी भी समृद्धि है वह भी प्रभु की कृपा से बहुत है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अब जो पहले मार्ग को अपनाता है वह अपने बच्‍चों की शिक्षा के लिए ऐसे स्‍कूल का चयन करता है जहाँ उसे या तो सिफारिशी पत्र का सहारा चाहिए या फिर डोनेशन का। जब मेरा बेटा तीन वर्ष का हुआ तब उसके लिए स्‍कूल चयन की बात आयी। मेरी प्रतिबद्धता भारतीय शिक्षा प्रणाली के प्रति है और मैं चाहती रही हूँ कि बच्‍चों पर ऐसा कोई प्रभाव नहीं पड़े जिससे उसकी चिन्‍तनधारा किसी एक वर्ग के लिए प्रभावित होती हो। ऐसे स्‍कूल शहर में मिलने दुर्लभ थे। लेकिन मुझे झूठी प्रतिष्‍ठा का कोई लालच नहीं था। मैंने उन्‍हीं दिनों अपना घर भी बदला था तो सारे ही स्‍कूल कुछ दूरी पर हो गए थे। मेरा मानना है कि बच्‍चे का घर के पास वाले स्‍कूल में ही पढ़ाना चाहिए। मैंने देखा एक स्‍कूल का बोर्ड मेरी कॉलोनी में ही लगा है। अभी खुलने की तैयारी में है, बेहद छोटा सा। संचालक कौन है, मालूम पड़ा कि जाने माने शिक्षाविद इसे चलाएंगे। मैंने मेरे बेटे का तुरन्‍त प्रवेश करा दिया और मेरा बेटा उस स्‍कूल का प्रथम छात्र था। आज वह स्‍कूल उदयपुर के श्रेष्‍ठ स्‍कूलों में गिना जाता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मुझे मेरे साथियों ने बहुत कहा कि आप केवल 20 छात्रों की संख्‍या वाली कक्षा में बच्‍चे को पढ़ा रहे हैं, इसका कैसे मूल्‍यांकन होगा? मेरा एक ही उत्तर होता था कि मुझे इसे केवल इंसान बनाना है कोई मशीन नहीं बनाना है। इसके बाद जब उच्‍च कक्षाओं में बच्‍चों को जाने का अवसर मिला तो मैंने केन्‍द्रीय विद्यालय को चुना। जहाँ के अध्‍यापक तक कहने लगे कि अरे आप इतने अच्‍छे स्‍कूल से निकालकर बच्‍चों को सरकारी स्‍कूल में क्‍यों पढ़ाना चाह रहे हैं? मैंने उनसे यही कहा कि अब ये उच्‍च कक्षा में आ गए हैं इन्‍हें श्रेष्‍ठ और योग्‍य अध्‍यापक चाहिए, क्‍या आपसे अधिक योग्‍य अध्‍यापक अन्‍य स्‍कूलों में हैं? आप सच मानिए मेरे बेटे ने बिना किसी ट्यूशन और कोचिंग के इंजीनियरिंग एन्‍ट्रेस टेस्‍ट पास किया था। मेरी बेटी भी मेरिट में थी। जहाँ हमारे साथियों ने अपनी बच्‍चों की पढ़ाई पर न जाने कितने पैसे फूंके थे, मैंने उनके सामने बहुत कम पैसा खर्च किया था।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बेटी ने इंजीनियर और डॉक्‍टर बनने से मना कर दिया, मैंने कभी प्रतिष्‍ठा का विषय नहीं बनाया। उसे कहा कि जो तुम्‍हें करना हो वह करो। उसने फिर एमबीए किया। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हम अक्‍सर सिफारिश और रिश्‍वत का सहारा अपनी नौकरी के लिए करते हैं। मनचाही जगह पोस्टिंग हो। मैंने इसे कभी स्‍वीकार नहीं किया। मैंने कहा कि यदि मुझे राजस्‍थान के सुदूर गाँव में भी नौकरी करनी पड़ी तो करूंगी लेकिन कभी भी सिफारिश का सहारा नहीं लूंगी। परिणाम निकला कि कुछ दिनों बाद ही मुझे उदयपुर महाविद्यालय में लेक्‍चरशिप मिल गयी, जो एक मात्र आयुर्वेद कॉलेज था इसकारण कहीं भी स्‍थानान्‍तरण का अवसर नहीं था। &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;प्रत्‍येक व्‍यक्ति प्रमोशन के लिए अनुचित मार्ग अपनाता है। मैंने कहा कि मेरी तो एक ही चाहत थी कि मुझे कॉलेज में प्राध्‍यापक की नौकरी मिले बस वो भगवान ने पूरी कर दी अब कुछ नहीं चाहिए। मुझे वैसे भी बीस वर्ष के बाद सामाजिक कार्य और लेखन के लिए नौकरी छोड़नी थी तो किसी प्रमोशन की वैसे भी इच्‍छा नहीं थी। इसलिए हमेशा बिंदास रहे और सभी लोग इज्‍जत की निगाह से देखते रहे। लेकिन जो अपना स्‍वाभिमान बनाकर चलता है उसका भगवान भी ध्‍यान रखता है। मैंने स्‍वैच्छिक सेवानिवृति ली और उसके बाद भी मुझे प्रोफेसर पद पर प्रमोशन मिला। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;ऐसे ही मेरे पास भी गाडी हो बंगला हो कभी सोचा भी नहीं। बस एक ही बात का चि‍न्‍तन था कि मैं अपने परिवार की जिम्‍मेदारियों को सहर्ष पूरा करूं। मैंने ना केवल पारिवारिक जिम्‍मेदारियों को पूरा किया अपितु आज भगवान की दया से सभी कुछ है मेरे पास। बस मुझे इतना ही चाहिए, ज्‍यादा तो मुझे हिसाब करना भी नहीं आता। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;पोस्‍ट लम्‍बी हो जाएगी इसलिए इसे यहीं विराम देती हूँ। अभी जीवन के ऐसे बहुत से प्रकरण हैं जिन्‍हें हमने सादगी के साथ ही जीया। अगली कड़ी में उन्‍हें भी लिखने का प्रयास करूंगी। हाँ अन्‍त में एक बात और कि मैंने अपनी इस पोस्‍ट में जगह जगह लिखा है कि मैंने यह किया, असल में बच्‍चों की सारी चिन्‍ताएं मेरी ही हैं, मेरे पति हमेशा से ही मुझसे सहमत रहते हैं। &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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नानी दवा ले लो। &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मन झूम उठता है, अरे मिहू तुम कहाँ हो? नहीं कोई नहीं है और पैर टीसना चालू रखते हैं। तुम्‍हारे पीछे दौड़ते हुए तो मरे ये पैर कभी शिकायत नहीं करते थे? अभी दो घूंट पानी हलक के नीचे भी नहीं उतरा था कि तुम ठुमकती हुई आ जाती थी &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; नानी सू सू आ रही है। मैं जानती थी कि सू सू का तो बस बहाना है, असल में तो कपड़े खुलवाने की मौज तुम्‍हारी आँखों में तैर रही होती थी। लेकिन यह ऐसा बहाना था कि जानकर भी दौड़कर उठना पड़ता था। तुम्‍हें जल्‍दी से सू सू कराना पड़ता था और वो क्षण? जैसे ही तुम कपड़ों के बंधनों से मुक्‍त हुई और कैसे तो दोनों पैरों को झुकाकर नाच उठती थी। तुम्‍हारी आँखें बोल रही होती थी कि देखो मेरी जीत हो गयी। मैं चड्डी लेकर तुम्‍हारे पीछे दौड़ती थी, कभी बोलती मिहू ------- चलो आओ। लेकिन तुम्‍हें तो मजा आ रहा होता मुझे नचाने में। फिर प्‍यार से बोलती मेरी चीयां आ जा, देख तू कितनी अच्‍छी है, बेटा कपड़े पहनते हैं। जब ये मुए पैर कभी भी इतराते नहीं थे, अहसास ही नहीं होता था कि ये हैं भी। &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तुम्‍हारा एक नारा सबसे अनोखा था &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; किचन में चलो। तुम गोद में अट जाती थी और किचेन में न जाने कितने दिन पहले छिपायी हुई चीज तुम्‍हें याद आ जाती थी। मैं खोजती ही रहती कि कहाँ है, लेकिन तुम बता देती कि फ्रिज के ऊपर छिपायी हुई है चाकलेट। अरे ये तो एक महिने पहले छिपायी थी, उसकी माँ बोल उठती। झट से पूरा डिब्‍बा ही मेरे हाथों से छीन लेती और फिर कितनी ही पीछे भागो लेकिन मजाल है जो डिब्‍बा छीन लो। भागना भी कितना होता है, आजकल के फ्‍लेटों में? यहाँ मेरे घर आती तो पता लगता इन इतराने वाले पैरों को? पूरे घर के कितने चक्‍कर लगा देती लगता कि एक बॉल खेलकर ही मानो दौड़कर दस रन बना लिए हों। कैसी अजीब-अजीब जिद थी तुम्‍हारी? बिस्किट खाने है, लो खा लो। नहीं दूध के साथ खाने है। अब दूध तो छंटाक भर और बिस्किट चार खा लिए गए। चम्‍मच में दूध भरा जाता और तुम टुकड़े तोड़-तोड़कर उसमें बिस्किट डालती और जैसे ही चम्‍मच को मुँह में डाला, बिस्किट सुड़ुप और दूध वहीं का वहीं। अरे अरे यह क्‍या है, चलो दूध भी पीओ। नहीं तो यह नन्‍हें पैर कैसे मजबूत होंगे? लेकिन दूध के नाम से तो उसकी आँखों के गोले घूम जाते और बहुत ही शरारती अदा के साथ दुध्‍धू बोलकर माँ के सामने देखती। माँ क्‍या करे, पूरे दो साल तक तो पिलाया है लेकिन दो महिने होने आए मोह छूटता ही नहीं। दूध पीना है तो केवल माँ का, बाकि तो फिर डे-केयर वाले ही पिला सकते हैं। यहाँ तो बस दूध पीने का केवल नाटक भर है। तभी उसकी छोटी-छोटी अंगुलियां घूम जाती और पोरों को गोल-गोल घुमाकर बोलती कि अंगूर। अरे अब बीच में ही अंगूर कहाँ आ गए? &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;चल उठती हूँ, फ्रिज में से एक गुच्‍छा अंगूर निकाला और उसने थाम लिए। देखा कि अरे अंगूर तो समाप्‍त होने वाले हैं, अब क्‍या करूं? यहाँ कॉलोनी में तो अंगूर मिलते नहीं, अब? मिहू के पापा तो लंदन गए हुए हैं और मैं यहाँ के रास्‍ते जानती नहीं। मम्‍मा भी ऑफिस है और उसके रास्‍ते में भी अंगूर नहीं मिलेंगे। सोच में पड़ जाती हूँ। दिन में जैसे ही उसे डे-केयर छोड़ती हूँ, दौड़कर सब्‍जी वाले की दुकान पर पहुँच जाती हूँ। यह सोचकर कि अंगूर नहीं तो तरबूज तो मिल ही जाएगा। पैरों का खून रेंगने लगता है, लगता है कि जैसे पंख लग गए हों, बस एक ही धुन है कि कैसे भी कुछ मिल जाए। जैसे ही सब्‍जी वाली थड़ी जैसी दुकान के पास जाती हूँ, तो एकदम सकते में! अरे दुकान ही नहीं है, लेकिन बस एक ही क्षण में आँखे बता देती हैं कि चिन्‍ता मत करो, यह दुकान उठकर सामने आ गयी है। नये अंदाज के साथ। जैसे ही दुकान के पास जाती हूँ, एक पेटी भर अंगूर रखे हैं, एकदम ताजा और बेस्‍ट। आह मन पुलकित हो जाता है, बस फटाफट एक किलो तुलवा लेती हूँ। फिर ध्‍यान आता है कि दुकानदारी का तकाजा है कि भाव जरूर पूछना चाहिए तो नियम सा निभाते हुए भाव भी पूछ लेती हूँ। अब मुझे आजतक ही किसी का भाव मालूम नहीं हुआ तो पूछकर भी क्‍या होगा? तभी ध्‍यान आया कि कल ही तो बेटी ने बताया था कि साठ रूपए किलो हैं। बस अब तो मन शेर हो गया। अरे अस्‍सी रूपए कैसे? माना अंगूर बहुत अच्‍छे हैं तो सत्तर ले लो। वो भी एकदम से ही मान गया। मानता भी क्‍यों नहीं, क्‍योंकि मैंने केवल अंगूर का ही तो भाव पूछा था, बस दस्‍तूर निभा दिया और बाकि सारे अन्‍य फल और सब्जियों को तो बेभाव ही खरीद लिया। लेकिन मैं खुश थी, मेरी मिहिका के लिए अंगूर और तरबूज मिल गये थे। आज पहली बार ही पैदल चलकर थैला लटकाकर सब्‍जी लेने जो गयी थी। तभी से पैर भी इठलाते रहते है और आज अकेले बैठे-बैठे न जाने क्‍यों टीस रहे हैं। &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तभी फोन की घण्‍टी बज उठती है, भागकर फोन उठाती हूँ, उधर से मिहू बोल रही है, &lt;/span&gt;“&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;नानी दवा ले ली&lt;/span&gt;”&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;? बस इन पैरों में जैसे आयोडेक्‍स मल दिया हो, और उस आवाज के साथ ही पिण्‍डलियों की थकान फुर्र हो गयी। घड़ी में देखा छ: बज गए हैं, अरे यह समय तो मिहू को डे-केयर से लाने का होता है। जल्‍दी से तैयार होने लगती हूँ, लेकिन अरे पुणे से तो परसों ही वापस आ गयी थी! जैसे ही मैं डे-केयर जाती और एकदम चहक उठती &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; नानी आ गयी। दिव्‍या बोलती कि मिहू नानी आयी हैं तो झट से प्रतिवाद कर देती, नहीं मेरी नानी है। बस जल्‍दी से जूते पैरों पर डाले और बिना अंगुली पकड़े ही दरवाते के बाहर दौड़ पड़ती। मैं पीछे भागती, अरे रूक, धीरे, गिर जाएगी तो लग जाएगा। लेकिन जब स्‍कूल की छुट्टी होती है तो बस भागने का ही भाव मन में आता है। लेकिन उसे तब घर नहीं जाना होता, वो दौड़ पड़ती पार्क की ओर। नन्‍हें-नन्‍हें दो साल के पैरों को लेकर झट से चढ़ जाती रिसट-पट्टी पर। मैं धीरे-धीरे ही कहती रहती। जैसे ही रिपसने को तैयार होती मैं दौड़कर नीचें रिपसती हुई उसे पकड़ लेती। कितने ही चक्‍कर कटा देती वो लेकिन तब ये पैर नहीं दुखते थे। पूरा एक घण्‍टा खेलकर ही घर जाने का नाम लेती। अब मम्‍मा के आने का भी समय हो जाता। लेकिन अभी दरवाजा खोला भी नहीं कि सामने वाला एक वर्षीय ऑरेक दिखायी दे गया। बस ऑरेक बेबी के साथ खेलना है। उसके खिलौनों के साथ खेलना जायज है लेकिन अपने खिलौने उसे देना गैरकानूनी सा है। पूरा कमरा खिलौनों से भरा पड़ा है लेकिन सब बेकार। सीडी और कम्‍प्‍यूटर का जमाना आ गया है। सीडी में कितनी पोयम है सारी ही याद हैं, और एक के बाद एक लगाते चलो, आप थककर चूर हो जाओ लेकिन उसकी &lt;/span&gt;“&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;और&lt;/span&gt;”&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; समाप्‍त नहीं होती। &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आजकल पैदा होते ही एबीसीडी सिखा दी जाती है और साथ में वन टू थ्री। लेकिन अ आ इ ई का पता नहीं। मिहू पॉटी में बैठी है, बोल रही है कि एबीसीडी बोलो। मैंने कहा कि बोलों अ से अनार। उसे अचार का खूब शौक है तो बोली कि नहीं अ से अचार। अब मैंने अ से अचार और आ से आम ही सिखाना शुरू कर दिया। दो दिन बाद ही मम्‍मा को बता दिया कि अ से अचार और आ से आम, इ से इमली और ई से ईख। अरे यह कब सीख लिया, मम्‍मा एकदम से खुश हो गयी। बस लेकिन इन पैरों की सारी मशक्‍कत तो रात को होती जब कपड़े पहनने के लिए पलंग के चक्‍कर लगाने पड़ते और सुलाने के लिए न जाने कितनी लोरियां और गाने गाए जाते। अब एक लोरी तो बना दी उसके लिए &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; टिमटिम टिमटिम तारे बोलें, निदियां चुपके जाना। लेकिन गाना तो ऐसे जैसे मरी बिल्‍ली के मुँह से आवाज निकले। उसका फरमाइशी प्रोग्राम चलता ही रहे। लेकिन यह अच्‍छी बात थी कि मैंने लोरी टूटी-फूटी या मरी बिल्‍ली की आवाज में रिकोर्ड कर दी थी तो बस वो चलती ही रहती। जैसे ही बन्‍द होती, उसकी आवाज आ जाती नानी टिमटिम तारे बोले। एक दिन तो एक नया प्रयोग ही कर डाला, गायत्री मंत्र बोलना शुरू किया अरे उसे तो वो भी याद था और बस झट से सुनकर सो गयी। दूसरे दिन भी बोली कि भूर्भव: सुनाओ। &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;लेकिन अब बस आराम ही आराम हैं, जब एक पैर पर खड़े होकर दौड़ लगानी पड़ रही थी तब ये नालायक कभी नहीं फड़फड़ाते थे लेकिन अब आराम में इन्‍हें अवसर मिल गया है। बस फोन की घण्‍टी पर ही कान लगे हैं कि कब आवाज सुनाई देगी &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; नानी दवा खा लो।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12.0pt; mso-ansi-language: EN-US; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-language: HI; mso-fareast-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-fareast-language: EN-US; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;दवा भी कैसी, केलशियम और बुढापे में पैर जुड़ा नहीं जाए उसके लिए अमेरिका से एक दवा ले आयी थी, बस वो दो गोली रोज लेनी होती थी। अब रात का खाना खाकर गोली ले लेती थी लेकिन उसे तो मुझे याद दिलाना ही नहीं था बस हाथ पकडकर सूटकेस तक ले जाती और वहाँ से दवा की डिब्‍बी निकालती और फिर दवा को खुद गिनकर मेरे हाथ में रखती। कई बार तो मेरे मुँह में भी वो ही रखती। मैं उससे कहती कि अरे अभी खाना नहीं खाया है। लेकिन उसने कह दिया तो बस ले लो दवा। बड़ी मुश्किल से उसे मनाना पड़ता और उसका ध्‍यान हटाना पड़ता। लेकिन जैसे ही खाना होता उसे फिर ध्‍यान आ जाता और फिर वही &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-size: 12.0pt; mso-ansi-language: EN-US; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-fareast-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-fareast-language: EN-US;"&gt;“&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12.0pt; mso-ansi-language: EN-US; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-language: HI; mso-fareast-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-fareast-language: EN-US; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;नानी दवा खा लो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; font-size: 12.0pt; mso-ansi-language: EN-US; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-fareast-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-fareast-language: EN-US;"&gt;”&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 12.0pt; mso-ansi-language: EN-US; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-language: HI; mso-fareast-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-fareast-language: EN-US; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 16px;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-small;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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- अजित गुप्‍ता</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह रश्मि रविजा जी से चेट पर मुलाकात हो गयी, पूछने लगी कि पुणे में कैसे बीत रही है? मैने कहा कि लग रहा है कि भगवान ने किसी ट्रेनिग पर भेजा है। आप लोग कहेंगे कि एक मॉं अगर अपनी बेटी के घर आकर रहे तो भला इसमें काहे की ट्रेनिंग? लेकिन आप को क्‍या बताएं, हमारी आपबीती? अब देखिए हम ठहरे छोटे शहर के लोग, हमारा दिन ही ठहराव के साथ शुरू होता है, खरामा खरामा। सुबह समाचारपत्र और टीवी के साथ हम पति-पत्‍नी बड़ी तसल्‍ली से चाय पीते हैं और फिर वे अपने क्लिनिक पर और हम अपने नेट पर। लेकिन पुणे जैसे महानगर में यह सम्‍भव नहीं है। यहॉं चाय पीने के लिए समय निकालना पड़ता है। शुरू के कुछ दिन तो मुझे चाय कभी 9 बजे तो कभी उसके भी बाद नसीब हुई लेकिन अब गणित समझ आने लगा है तो उठते ही सबसे पहले अपनी चाय का बंदोबस्‍त करती हूँ। यहॉं जल्‍दी उठना तो महज कल्‍पना ही है क्‍योंकि जल्‍दी सो जो नहीं सकते। अब जब चाय बनाने लगती हूँ तो सबसे पहले काम करने वाली से पूछ लेती हूँ कि चाय पीनी है? कभी तो वह आर्डर सा मारती हुई कह देती है कि हॉं बना लो, तब उसका आर्डर मारना भी चैन की सॉंस बन जाता है। मेरे यहॉं तो हमेशा मेरी कामवाली ही पूछती है कि चाय बनाऊं? लेकिन कोई बात नहीं यहॉं बड़ा शहर है तो कुछ तो बदलाव होगा ही ना? लेकिन यदि वह मना कर दे कि नहीं आज चाय नहीं पीनी है तब कई प्रश्‍न एक साथ मन में आने लगते हैं। नाराज तो नहीं हो गयी? मेरे पूछने में कहीं कोई गड़गड़ तो नहीं थी? आदि आदि। फिर पूछ ही लेती हूँ कि क्‍यों नहीं पीनी? तो वह बड़े ठसके के साथ कहती है कि आण्‍टी क्‍या है ना कि आजकल गर्मी हो गयी है तो ज्‍यादा चाय चलती नहीं है। वह नाराज नहीं है यह सोचकर भगवान को धन्‍यवाद देती हूँ। अब जैसे ही चाय बनाकर पीने लगती हूँ बेटी पूछ लेती है कि आपने मीरा की चाय नहीं बनायी? अरे भाई उसने मना किया था, क्‍या करूं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पद्मा सचदेव की याद आ जाती है, उन्‍होंने एक उपन्‍यास लिखा "इन बिन", अरे नहीं समझे? इनके बिना याने कामवालों के बिना आप कितने अधूरे हैं। मुझे लगता है कि मैं तो दो-चार दिन में चले जाऊंगी लेकिन यदि मेरे किसी भी व्‍यवहार से इनकी नौकरानी भाग गयी तो बस भूचाल ही आ जाएगा। नौकरानी भी यदि स्थानीय हो तो समस्‍या अधिक है, क्‍योंकि वह दूसरे को भी नहीं आने देगी। फरमान जारी हो जाएंगा कि इनके यहॉं काम ज्‍यादा है कोई नहीं जाए। बस फिर क्‍या है आप लाख सर पटक लो क्‍या मजाल कोई आपके यहॉं काम कर ले। एक बात का ज्ञान और हुआ मुझे। ये आपकी परीक्षा भी ले लेती हैं कि आपमें कितना दम है? मैं यहॉं आयी ही थी कि दो-चार दिन बाद अचानक ही मेम साहब नहीं आयी। बेटी मेरा मिजाज जानती है उसने पडोस में कहा कि आप अपनी भेज देना, मम्‍मी को आदत नहीं है। अब मुझे लगा कि यहॉं कुछ सीख ही लेना चाहिए तो मैं डट गयी वाशबेसन पर बर्तनों के साथ। पडोस में भी मना कर दिया कि नहीं मैने ही सब कर लिया है। अब जब दूसरे दिन उसे मालूम पड़ा कि मैंने सारा काम कर लिया तो उसे लगा कि ये तो परेशान ही नहीं हुए। शायद मैं उसकी परीक्षा में पास हुई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब एक और है, केवल शाम के लिए खाना बनाने आता है। गिनकर रोटियां बनाता है यदि एक भी रोटी ज्‍यादा हो जाए तो आपका रिकोर्ड बिगड जाएगा। उसमें लिखा जाएगा कि इनके यहॉं मेहमान ज्‍यादा आते हैं। अब हमारे यहॉं तो रोज कोई भी टपक जाता है, कभी कोई शिकायत नहीं। हॉं हम भी पूरा ध्‍यान रखते हैं और बराबर से उसका हाथ काम में बंटाते हैं। थोड़ा भी काम ज्‍यादा हुआ नहीं कि अलग से पैसे दे देते हैं। पैसे तो यहॉं भी देने पड़ते हैं लेकिन काम उतना ही। अब उसे देखते ही मेरा डर फिर बाहर निकल आता है और उससे कहती हूँ कि भैया जितनी रोटी हमेशा बनाते हो उतनी ही बना लो और रही सब्‍जी की बात तो काट के रख दो मैं ही बना लूंगी। अब जब शाम को बेटी आती है तो कहती है कि आप उससे काम क्‍यों नहीं कराती? अब हम ठहरे छोटे शहर वाले अपनी इज्‍जत से बड़ा डर लगता है, क्‍योंकि और तो कुछ हमारे पास होता नहीं तो बस इज्‍जत को लेकर ही बैठे रहते हैं कि कोई यह ना कह दे कि उनके कारण हमारा नौकर छोड़कर चला गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आप सोच रहे होंगे कि हमने पहली पोस्‍ट में तो लिखा था कि महानगरों में नौकरों के सपने नहीं होते और अब आप लिख रही हो कि इनसे डरकर रहना पड़ता है। तो नौकर भी कई प्रकार के होते हैं। स्‍थानीय नौकरों की पूरी दादागिरी है और जो बाहर से आए हैं वे अपने बेहतर भविष्‍य के लिए चाहे सपने ना देखे लेकिन कामचोरी जरूर सीख लेते हैं। फिर जो लड़के हैं वे तो कमाई के जरिए ढूंढ ही लेंते हैं। यदि ये लोग सपने देखने लगें तो अच्‍छे मालिक और बुरे मालिक का अन्‍तर भी समझने लगेंगे और फिर इनके सपने भी पूरे होंगे। लेकिन ये तो बस चन्‍द पैसों के लिए ही जीते हैं। खैर मैं यहॉं नौकरों की मानसिकता से अधिक अपनी मानसिकता को लिख रही हूँ कि कैसे बदल गयी है यहॉं आकर। मुझे लगने लगा है कि मैं भी सुपर हाउस वाइफ में तब्‍दील होती जा रही हूँ। ना ज्‍यादा पोस्‍ट पढ़ पाती हूँ और ना ही टिप्‍पणी कर पाती हूँ। इसलिए जो हाउस-वाइफ रहकर ब्‍लागिंग की दुनिया में मजबूती के साथ डटी हुई हैं उन्‍हें मैं प्रणाम करती हूँ। यहॉं तो लग रहा है कि दिमाग शून्‍य हो चला है क्‍योंकि यहाँ घरों के अन्‍दर ही करण्‍ट है बाहर तो एकदम शान्ति रहती है। कहॉं से मिले नयी कहानी? चलो अब बन्‍द करती हूँ आप लोग बोर हो रहे होंगे। इतना पढ़ा उसके लिए आभार। अपनी नातिन के जलवों के बारे में अलग से लिखूंगी। बस अभी तो लहरों पर हूँ, जीवन का नया पाठ पढ़ रही हूँ। सोचा आप लोगों से ही सांझा कर लूं बाकि तो बात करने की किसी को फुर्सत नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;&lt;!--
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